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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

पातंजल-योगसूत्र-२ २१९

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पातंजल-योगसूत्र-२ २१९

के लिए और कुछ भी आवश्यक नहीं था, क्योंकि हमी सुखस्वरूप हैं। हम देख लेंगे कि यह ज्ञान और किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहता। जगत् में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो हमारे ज्ञानालोक से प्रकाशित न हो। यही योगी की अन्तिम अवस्था है। तब योगी धीर और शान्त हो जाते हैं, वे और कोई कष्ट अनुभव नहीं करते, वे फिर कभी अज्ञान-मोह से भ्रान्त नहीं होते, दुःख उन्हें छू नहीं सकता। वे जान लेते हैं कि मैं नित्यानन्दस्वरूप, नित्य-पूर्णस्वरूप और सर्वशक्तिमान् हूँ।

योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥२८॥

सूत्रार्थ— योग के विभिन्न अंगों का अनुष्ठान करते-करते जब अपवित्रता का नाश हो जाता है, तब ज्ञान प्रदीप्त हो उठता है; उसकी अन्तिम सीमा है विवेकख्याति।

व्याख्या— अब साधन की बात कही जा रही है। अभी तक जो कुछ कहा गया, वह अपेक्षाकृत उच्चतर व्यापार है। वह अभी हमसे बहुत दूर है, किन्तु वही हमारा आदर्श है, हमारा एकमात्र लक्ष्य है। उस लक्ष्यस्थल पर पहुँचने के लिए पहले शरीर और मन को संयत करना आवश्यक है। तभी उस आदर्श में हमारी अनुभूति स्थायी हो सकेगी। हमारा लक्ष्य क्या है यह हमने जान लिया है, अब उसे प्राप्त करने के लिए साधन आवश्यक हैं।

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान-
समाधयोऽष्टावंगानि ॥२९॥

सूत्रार्थ— यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये आठ (योग के) अंग हैं।

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

सूत्रार्थ— अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह का अभाव)—ये पाँच यम कहलाते हैं।

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-२२०

राजयोग

**व्याख्या—**जो पूर्ण योगी होना चाहते हैं, उन्हे स्त्री-पुरुष-भेद का भाव छोड़ देना पड़ेगा। आत्मा के कोई लिंग नही हैं—उसमे न स्त्री है, न पुरुष, तब क्यो वह स्त्री-पुरुष के भेद-ज्ञान द्वारा अपने आपको कलुषित करे ? बाद में हम और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे कि ये सब भाव हमे क्यो बिलकुल छोड़ देने चाहिए। चोरी जैसे एक कुकर्म है, परिग्रह यानी दूसरे के पास से कुछ ग्रहण करना भी वैसा ही एक कुकर्म है। उपहार ग्रहण करनेवाले मनुष्य के मन पर दाता के मन का असर पड़ता है, इसलिए ग्रहण करनेवाले के भ्रष्ट हो जाने की सम्भावना रहती है। दूसरे के पास से कुछ ग्रहण करने से मन की स्वाधीनता चली जाती है और हम मोल लिए हुए गुलाम के समान दाता के अधीन हो जाते हैं। अतएव किसी प्रकार का उपहार ग्रहण करना भी उचित नही।

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

**सूत्रार्थ—**ये सब (उक्त यम) जाति, देश, काल और समय यानी उद्देश्य के द्वारा अवच्छिन्न न होने पर सार्वभौम महाव्रत कहलाते हैं।

**व्याख्या—**ये सब साधन अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह प्रत्येक व्यक्ति के लिए—प्रत्येक पुरुष, स्त्री और बालक के लिए—बिना किसी जाति, देश या अवस्था के भेद से अनुष्ठेय हैं।

शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥

**सूत्रार्थ—**बाह्य एवं अन्त शौच, सन्तोष, तपस्या, स्वाध्याय (मन्त्र-जप या अध्यात्म-शास्त्रों का पठन-पाठन) और ईश्वरोपासना—(ये पाँच) नियम हैं।

**व्याख्या—**बाह्यशौच अर्थात् शरीर को पवित्र रखना;

पातंजल-योगसूत्र--२ [२२१]

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पातंजल-योगसूत्र--२ [२२१]

अपवित्र मनुष्य कभी योगी नही हो सकता; इस बाह्यशौच के साथ-साथ अन्त:शौच भी आवश्यक है। समाधिपाद के ३३ वे सूत्र में जिन धर्मों (गुणो) की बात कही गई हैं, उनके पालन से यह अन्त शौच आता है। यह सत्य है कि बाह्यशौच से अन्त शौच अधिक उपकारी है, किन्तु दोनो की ही आवश्यकता है, और अन्त शौच के बिना केवल बाह्यशौच कोई फल उत्पन्न नही करता।

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥

सूत्रार्थ — वितर्क अर्थात् योग (यम और नियम) के विरोधी भाव उपस्थित होने पर उनके प्रतिपक्षी विचारो का बारम्बार चिन्तन करना चाहिए।

व्याख्या — ऊपर मे जिन सब धर्मों (गुणो) की बात कही गई है, उनके अभ्यास का यही उपाय है। उदाहरणार्थ, जब मन मे क्रोध की एक बडी तरंग आती है, तब उसे कैसे वश मे लाया जाय ? उसके विपरीत एक तरंग उठाकर। उस समय प्रेम की बात मन मे लाओ। कभी-कभी ऐसा होता है कि पत्नी अपने पति पर खूब गरम हो जाती है, उसी समय उसका बच्चा वहां आ जाता है और वह उसे गोद मे उठाकर चूम लेती है, इससे उसके मन में बच्चे के प्रति प्रेमरूप तरंग उठने लगती है और वह पहले की तरंग को दबा देती है। प्रेम, क्रोध के विपरीत है। इसी प्रकार जब मन मे चोरी का भाव उठे, तो चोरी के विपरीत भाव का चिन्तन करना चाहिए। जब दान ग्रहण करने की इच्छा पैदा हो, तो उसके विपरीत भाव का चिन्तन करना चाहिए—आदि-आदि।

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥

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२२२राजयोग

सूत्रार्थ—वितर्क अर्थात् योग के विरोधी हैं हिंसा आदि भाव; (वे तीन प्रकार के होते हैं—) स्वयं किए हुए, दूसरों से करवाए हुए और अनुमोदन किए हुए, इनके कारण हैं—लोभ, क्रोध और मोह, इनमें भी कोई थोड़े परिमाण का, कोई मध्यम परिमाण का और कोई बहुत बड़े परिमाण का होता है, इनके अज्ञान और क्लेशरूप अनन्त फल हैं,—इस प्रकार (विचार करना ही) प्रतिपक्ष की भावना है।

व्याख्या—मैं स्वयं यदि कोई झूठ कहूँ, तो उससे जो पाप होता है, उतना ही पाप तब भी होता है, जब मैं दूसरे को झूठ बात कहने लगाता हूँ, अथवा दूसरे की किसी झूठ बात का अनुमोदन करता हूँ। वह झूठ भले ही जरासा हो, तो भी झूठ तो है ही। पर्वत की कन्दरा में भी बैठकर यदि तुम कोई पाप-चिन्तन करो, किसी के प्रति भीतर में घृणा का भाव पोषण करो, तो वह भी संचित रहेगा, और कालान्तर में फिर से वह तुम्हारे पास आकर तुम पर आघात करेगा, किसी-न-किसी दिन एक-न-एक प्रकार के दुःख के रूप में वह प्रबल वेग से तुम पर आक्रमण करेगा। यदि तुम अपने हृदय से ईर्ष्या और घृणा का भाव चारो ओर बाहर भेजो, तो वह चक्रवृद्धिब्याज सहित तुम पर आकर गिरेगा। दुनिया की कोई भी ताकत उसे रोक न सकेगी। यदि तुमने एक बार उस शक्ति को बाहर भेज दिया, तो फिर निश्चित जानो, तुम्हे उसका प्रतिघात सहन करना ही पड़ेगा। यह स्मरण रहने पर तुम कुकर्मों से बचे रह सकोगे।

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥

सूत्रार्थ—भीतर में अहिंसा के प्रतिष्ठित हो जाने पर, उसके निकट सब प्राणी अपना स्वाभाविक वैर-भाव त्याग देते हैं।

व्याख्या—यदि कोई व्यक्ति अहिंसा की चरम अवस्था को प्राप्त कर ले, तो उसके सामने, जो सब प्राणी स्वभावत ही

पातंजल-योगसूत्र—२

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पातंजल-योगसूत्र—२

हिंस्र हैं वे भी शान्तभाव धारण कर लेते हैं। उस योगी के सामने शेर और मेमना एक साथ खेलेंगे। इस अवस्था की प्राप्ति होने पर ही समझना कि तुम्हारा अहिंसाव्रत दृढप्रतिष्ठित हो गया है।

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥

सूत्रार्थ — जब सत्यव्रत हृदय में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब कोई कर्म बिना किए ही अपने लिए या दूसरे के लिए कर्म का फल प्राप्त करने की शक्ति योगी में आ जाती है।

**व्याख्या—**जब सत्य की यह शक्ति तुममें प्रतिष्ठित हो जायगी, तब स्वप्न में भी तुम झूठ बात नही कहोगे। तब शरीर, मन और वचन से सत्य ही बाहर आयगा। तब तुम जो कुछ कहोगे, वही सत्य हो जायगा। यदि तुम किसी से कहो, “तुम कृतार्थ होओ,” तो वह उसी क्षण कृतार्थ हो जायगा। किसी पीड़ित मनुष्य से यदि कहो, “रोगमुक्त हो जाओ,” तो वह उसी समय स्वस्थ हो जायगा।

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥

सूत्रार्थ — अस्तेय में प्रतिष्ठित हो जाने पर (उस योगी के सामने) सब प्रकार के धन-रत्न प्रकट हो जाते हैं।

**व्याख्या—**तुम जितना ही प्रकृति से दूर भागोगे, वह उतना ही तुम्हारा अनुसरण करेगी, और यदि तुम उसकी जरा भी परवाह न करो, तो वह तुम्हारी दासी बनकर रहेगी।

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥

**सूत्रार्थ—**ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर वीर्यलाभ होता है।

**व्याख्या—**ब्रह्मचर्यवान मनुष्य के मस्तिष्क में प्रबल शक्ति—महती इच्छाशक्ति संचित रहती है। ब्रह्मचर्य के बिना और किसी भी उपाय से आध्यात्मिक शक्ति नही आ सकती।

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२२४ | राजयोग

जितने महान् मस्तिष्कशाली पुरुष हो गए हैं, वे सभी ब्रह्मचर्य्य-वान थे। इसके द्वारा मनुष्य-जाति पर आश्चर्यजनक क्षमता प्राप्त की जा सकती है। मानवसमाज के सभी आध्यात्मिक नेता-गण ब्रह्मचर्य्यवान थे—उन्हे सारी शक्ति इस ब्रह्मचर्य्य से ही प्राप्त हुई थी। अतएव योगी का ब्रह्मचर्य्यवान होना अनिवार्य्य है।

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३९॥

सूत्रार्थ — अपरिग्रह के दृढ़प्रतिष्ठित हो जाने पर पूर्वजन्मो की बात स्मृति में उदित हो जाती है।

व्याख्या — जब योगी दूसरे के पास से कोई वस्तु स्वीकार नही करते, तब उन पर दूसरो का कोई असर नही पड़ता, वे किसी के द्वारा अनुगृहीत नही होते और इसलिए वे स्वाधीन एव मुक्त-स्वभाव हो जाते हैं। उनका मन शुद्ध हो जाता है। दान स्वीकार करने से दाता के पाप भी लेने की सम्भावना रहती है। इस परिग्रह को त्याग देने पर मन शुद्ध हो जाता है, और इससे जो सब फल प्राप्त होते हैं, उनमें पूर्वजन्म की स्मृति का उदय होना प्रथम है। तभी वे योगी सम्पूर्ण रूप से अपने लक्ष्य में दृढ होकर रह सकते हैं। वे देख लेते हैं कि इतने दिन तक वे केवल आवागमन कर रहे थे। तब वे दृढ प्रतिज्ञा कर लेते है कि अब की वार मै अवश्य मुक्त होऊँगा, मै अब और आवागमन नही करूँगा, प्रकृति का दास नही होऊँगा।

शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥

सूत्रार्थ — शौच के प्रतिष्ठित हो जाने पर अपने शरीर के प्रति घृणा का उद्रेक होता है, दूसरो के साथ संग करने की भी फिर प्रवृत्ति नहीं रहती।

व्याख्या — जब यथार्थ वाह्य और आभ्यन्तर दोनो प्रकार

पातंजल-योगसूत्र—२ २२५

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पातंजल-योगसूत्र—२ २२५

के शौच सिद्ध हो जाते है, तब शरीर के प्रति उदासीनता आ जाती है—उसे कैसे अच्छा रखे, कैसे वह सुन्दर दिखेगा, ये सब भाव बिलकुल चले जाते है। सासारिक लोग जिसे अत्यन्त सुन्दर मुख कहेगे, उसमें यदि ज्ञान का कोई चिह्न न हो, तो वही योगी के निकट पशु के मुख के समान प्रतीत होगा। संसार के मनुष्य जिस मुख मे कोई विशेषता नही देखते, उसके पीछे यदि चैतन्य का प्रकाश हो, तो योगी उसे स्वर्गीय मुखश्री कहेगे। यह देह-तृष्णा मानव-जीवन के लिए एक अभिशापस्वरूप है। अत शौच-प्रतिष्ठा का पहला लक्षण यह दिखेगा कि तुम शरीर के प्रति उदासीन हो जाओगे—तुम्हारे मन में यह विचार तक न उठेगा कि तुम्हारे शरीर है भी। जब यह पवित्रता हममे आती है, तभी हम देह-भाव के ऊपर उठ सकते हैं।

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥

सूत्रार्थ—इसके सिवा (इस शौच से) सत्त्वशुद्धि, सौमनस्य अर्थात् मन का प्रफुल्ल भाव, एकाग्रता, इन्द्रियजय और आत्मदर्शन की योग्यता—ये पाँचो भी होते है।

**व्याख्या—**इस शौच के अभ्यास द्वारा सत्त्व पदार्थ का प्राबल्य होता है और मन एकाग्र एव प्रफुल्ल हो जाता है। तुम धर्म-पथ में अपने अग्रसर होने का प्रथम लक्षण यह देखोगे कि तुम दिन-पर-दिन बड़े प्रफुल्ल होते जा रहे हो। यदि कोई व्यक्ति विषादयुक्त दिखे, तो वह अजीर्ण का फल भले ही हो, पर धर्म का लक्षण नही हो सकता। सुख का भाव ही सत्त्व का स्वाभाविक धर्म है, सात्त्विक मनुष्य के लिए सभी सुखमय प्रतीत होते हैं। अत. जब तुममें यह आनन्द का भाव आता रहे, तो समझना कि तुम योग मे उन्नति कर रहे हो। सारे दुःख-कष्ट तमोगुण से

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> स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

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२२६ राजयोग

उत्पन्न होते हैं; अतएव तुम्हे उससे बचकर रहना होगा—उसको दूर कर देना होगा। विषादपूर्ण होकर चेहरा उतारे रहना तमोगुण का एक लक्षण है। सबल, दृढ़, स्वस्थ, युवक और साहसी मनुष्य ही योगी बनने के योग्य है। योगी के लिए सभी सुखमय प्रतीत होते हैं, वे जिस किसी मनुष्य को देखते हैं, उसी से उनको आनन्द होता है। यही धार्मिक मनुष्य का चिह्न है। पाप ही कष्ट का कारण है, अन्य किसी कारण से कष्ट नहीं आता। उतरा हुआ चेहरा लेकर क्या होगा? कैसा भयानक दृश्य है वह! ऐसी सूरत लेकर बाहर मत जाना। किसी दिन ऐसा होने पर दरवाजा बन्द करके समय बिता देना। संसार के भीतर इस बीमारी को संक्रामित करने का तुम्हें क्या अधिकार है? जब तुम्हारा मन संयत हो जायगा, तब तुम पूरे शरीर को वश में रख सकोगे। तब फिर तुम इस यन्त्र के दास नहीं बने रहोगे, यह देह-यन्त्र ही तुम्हारा दास होकर रहेगा। तब यह देह-यन्त्र आत्मा को खींचकर नीचे की ओर न ले जाकर उसकी मुक्ति में महान् सहायक हो जायगा।

सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥४२॥

सूत्रार्थ— सन्तोष से परम सुख प्राप्त होता है।

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥

सूत्रार्थ— तपस्या से जब अशुद्धि का नाश हो जाता है, तब शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि हो जाती है अर्थात् उनमें नाना प्रकार की शक्तियां आती हैं।

व्याख्या— तपस्या का फल कभी-कभी अचानक दूरदर्शन, दूरश्रवण इत्यादि रूप से प्रकाशित होता है।

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

सूत्रार्थ— मन्त्र के पुनः-पुनः उच्चारण या अभ्यास से इष्टदेवता के दर्शन होते हैं।

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पातंजल-योगसूत्र—२ २२७

**व्याख्या—**जितने उच्च स्तर के जीव (देवता, ऋषि, सिद्ध) देखने की इच्छा करोगे, अभ्यास भी उतना ही अधिक करना पड़ेगा।

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥

**सूत्रार्थ—**ईश्वर में समस्त अर्पण करने से समाधि-लाभ होता है।
**व्याख्या—**ईश्वर पर निर्भरता से समाधि की पूर्णता होती है।

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

**सूत्रार्थ—**स्थिर भाव से सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है।
**व्याख्या—**अब आसन की बात कही जायगी। जब तक तुम स्थिर भाव से बहुत समय तक बैठे रहने में समर्थ नही होते, तब तक प्राणायाम एव अन्यान्य साधनो मे किसी प्रकार सफल नही हो सकोगे। आसन के स्थिर होने का तात्पर्य है—शरीर के अस्तित्व का बिलकुल भान तक न होना। साधारणत यह देखा जाता है कि ज्योही तुम चन्द मिनट के लिए बैठते हो, त्योही शरीर में नाना प्रकार के विकार आने लगते है। पर जब तुम स्थूल देहभाव के परे चले जाओगे, तब तुम्हे शरीर का भान तक न रहेगा। फिर तुम सुख या दुख कुछ भी अनुभव नही करोगे। जब फिर से तुम्हे शरीर का ज्ञान आयगा, जब तुम आसन से उठोगे, तो ऐसा लगेगा कि तुमने बहुत समय तक विश्राम किया है। यदि शरीर को सम्पूर्ण विश्राम देना सम्भव हो, तो वह इसी प्रकार हो सकता है। जब तुम इस प्रकार शरीर को अपने अधीन करके उसे दृढ रख सकोगे, तब जानना कि तुम्हारा साधन भी दृढ हुआ है। किन्तु जब तक शारीरिक विघ्न-बाधाएँ आती रहेगी, तब तक तुम्हारे स्नायु चचल रहेगे और तुम किसी भी प्रकार मन को एकाग्र न कर सकोगे।

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१२८ राजयोग

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

**सूत्रार्थ—**शरीर में एक प्रकार का जो अभिमानात्मक प्रयत्न है (अर्थात् चंचलता की ओर शरीर की जो एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है), उसे शिथिल कर देने से और अनन्त के चिन्तन से (आसन स्थिर और सुखकर होता है)।

**व्याख्या—**अनन्त के चिन्तन के द्वारा आसन अविचलित (स्थिर) हो सकता है। पर हाँ, हम उस सर्वद्वन्द्वातीत अनन्त (ब्रह्म) के बारे में (सरलता से) चिन्तन नहीं कर सकते, किन्तु हम अनन्त आकाश के बारे में सोच सकते हैं।

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

**सूत्रार्थ—**इस प्रकार आसन सिद्ध हो जाने पर, तब द्वन्द्वपरम्परा और कुछ विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकती।

**व्याख्या—**द्वन्द्व का अर्थ है शुभ-अशुभ, शीत-उष्ण, आलोक-अँधेरा, सुख-दुःख आदि विपरीत धर्मवाले दो-दो पदार्थ। ये सब फिर तुम्हें चंचल नहीं कर सकेंगे।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

**सूत्रार्थ—**उस आसन की सिद्धि होने के बाद श्वास और प्रश्वास दोनों की गति को संयत करना प्राणायाम कहलाता है।

**व्याख्या—**जब यह आसन सिद्ध हो जाता है, तब इस श्वास-प्रश्वास की गति को रोककर उस पर जय प्राप्त करना पड़ेगा। अत अब प्राणायाम का विषय आरम्भ होता है। प्राणायाम क्या है? शरीरस्थित जीवनी-शक्ति को वश में लाना। यद्यपि 'प्राण' शब्द बहुधा श्वास के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तो भी वास्तव में वह श्वास नहीं है। प्राण का अर्थ है जागतिक समस्त शक्तियों की समष्टि। यह वह शक्ति है, जो प्रत्येक देह

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पातञ्जल-योगसूत्र-२ २२९

में अवस्थित है, और उसका ऊपरी प्रकाश है—फेफडे की यह गति। प्राण जब श्वास को भीतर की ओर खींचता है, तभी यह गति शुरू होती है, प्राणायाम करने के समय हम उसी को संयत करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्राण पर अधिकार प्राप्त करने के लिए हम पहले श्वास-प्रश्वास को संयत करना शुरू करते हैं, क्योकि वही प्राण-जय का सबसे सरल मार्ग है।

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

सूत्रार्थ— बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति के भेद से यह प्राणायाम तीन प्रकार का है, देश, काल और संख्या के द्वारा नियमित तथा दीर्घ या सूक्ष्म होने के कारण उनमें भी फिर नाना प्रकार के भेद हैं।

व्याख्या— यह प्राणायाम तीन प्रकार की क्रियाओ में विभक्त है। पहली—जब हम श्वास को अन्दर खींचते और धारण करते है, दूसरी—जब हम उसे बाहर निकालते और धारण करते है, तीसरी—जब श्वास और प्रश्वास को फेफडे के भीतर या उसके बाहर रोकते है। ये फिर देश, काल और संख्या के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप धारण करते है। देश का अर्थ है—प्राण को शरीर के किसी अंगविशेष मे आबद्ध रखना। समय का अर्थ है—प्राण को किस स्थान में कितने समय तक रखना होगा, इस बात का ज्ञान, और संख्या का अर्थ है—यह जान लेना कि कितनी बार ऐसा करना होगा। इसीलिए कहाँ पर, कितने समय तक और कितनी बार रेचक आदि करना होगा, इत्यादि कहा जाता है। इस प्राणायाम का फल है उद्घात अर्थात् कुण्डलिनी का जागरण।

> धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥

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२३० राजयोग

वाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥

सूत्रार्थ—चौथे प्रकार का प्राणायाम वह है, जिसमें प्राणायाम के समय बाह्य या आभ्यन्तर किसी विषय का चिन्तन किया जाता है।

व्याख्या—यह चौथे प्रकार का प्राणायाम है। इसमें चिन्तन के साथ दीर्घकाल तक अभ्यास करते रहने से कुम्भक होता है। दूसरे प्राणायामों में चिन्तन का सम्पर्क नहीं रहता।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥

सूत्रार्थ—उस (प्राणायाम के अभ्यास) से (चित्त के) प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है।

व्याख्या—चित्त में स्वभावत समस्त ज्ञान भरा है, वह सत्त्व पदार्थ द्वारा निर्मित है, पर रज और तम पदार्थों से ढका हुआ है। प्राणायाम के द्वारा चित्त का यह आवरण चला जाता है।

धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥

सूत्रार्थ—(उसी से) धारणा में मन की योग्यता भी (होती है)।

व्याख्या—यह आवरण चले जाने पर हम मन को एकाग्र करने में समर्थ होते हैं।

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥

सूत्रार्थ—जब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को छोड़कर मानो चित्त का स्वरूप ग्रहण करती हैं, तब उसे प्रत्याहार कहते हैं।

व्याख्या—ये इन्द्रियाँ मन की ही विभिन्न अवस्थाएँ मात्र हैं। मैं एक पुस्तक देखता हूँ। वास्तव में, वह पुस्तक-आकृति बाहर में नहीं है। वह तो मन में है। बाहर की कोई चीज उस आकृति को केवल जगा भर देती है, वास्तव में तो वह चित्त में ही है।

पातंजल-योगसूत्र—२ २३१

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पातंजल-योगसूत्र—२ २३१

इन इन्द्रियों के सामने जो कुछ आता है, उसके साथ ये मिश्रित होकर, उसी का आकार धारण कर लेती है। यदि तुम चित्त को ये सब विभिन्न आकृतियाँ धारण करने से रोक सको, तभी तुम्हारा मन शान्त होगा और इन्द्रियाँ भी मन के अनुरूप हो जायँगी। इसी को प्रत्याहार कहते है।

तत परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥

**सूत्रार्थ—**उस (प्रत्याहार) से इन्द्रियों पर सम्पूर्ण रूप से जय प्राप्त हो जाती है।

**व्याख्या—**जब योगी इन्द्रियो को इस प्रकार बाहरी वस्तु का आकार धारण करने से रोक सकते हैं और चित्त के साथ उन्हे एक करके रखने में सफल होते हैं, तभी इन्द्रियो पर पूर्ण रूप से जय प्राप्त होता है। और जब इन्द्रियाँ पूरी तरह विजित हो जाती हैं, तब एक-एक स्नायु, एक-एक मांसपेशी तक हमारे वश में आ जाती है, क्योकि इन्द्रियाँ ही सब प्रकार की संवेदना (अनुभूति) और कार्य की केन्द्रस्वरूप हैं। ये इन्द्रियाँ ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय, इन दो भागो में विभक्त हैं। अत जब इन्द्रियाँ संयत होगी, तब योगी सब प्रकार के भावो और कार्यों पर जय-लाभ कर सकेगे। सारा शरीर ही उनके अधीन हो जायगा। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर ही मनुष्य देह-धारण में आनन्द अनुभव करने लगता है। तभी वह सत्यतापूर्वक कह सकता है, “मै धन्य हूँ जो मेरा जन्म हुआ।” जब इन्द्रियो पर ऐसा अधिकार प्राप्त हो जाता है, तभी हम यह अनुभव कर सकते हैं कि यह शरीर भी कैसी अद्भुत चीज है!

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तृतीय अध्याय

विभूतिपाद

अब हम विभूतिपाद मे आते है।

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

सूत्रार्थ—चित्त को किसी विशेष वस्तु में आबद्ध करके रखने का नाम है धारणा।

व्याख्या—जब मन शरीर के भीतर या उसके बाहर किसी वस्तु के साथ सलग्न होता है और कुछ समय तक उसी तरह रहता है, तो उसे धारणा कहते हैं।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

सूत्रार्थ—वह वस्तुविषयक ज्ञान निरन्तर एक रूप से प्रवाहित होते रहने पर उसे ध्यान कहते हैं।

व्याख्या—मान लो, मन किसी एक विषय को सोचने का प्रयत्न कर रहा है, किसी एक विशेष स्थान में—जैसे, मस्तक के ऊपर अथवा हृदय आदि मे—अपने को पकड रखने का प्रयत्न कर रहा है। यदि मन शरीर के केवल उस अंश के द्वारा संवेदनाओ (अनुभूतियो) को ग्रहण करने मे समर्थ होता है, शरीर के शेष सब भागो को यदि विषय-ग्रहण से विवृत रख सकता है, तो उसका नाम धारणा है, और जब वह अपने को कुछ समय तक उसी अवस्था में रखने मे समर्थ होता है, तो उसका नाम है ध्यान।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि ॥३॥

सूत्रार्थ—वही (ध्यान) जब समस्त बाहरी उपाधियों को छोड़कर अर्थ मात्र को ही प्रकाशित करता है, तब उसे समाधि कहते हैं।

पातंजल-योगसूत्र-३ २३३

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पातंजल-योगसूत्र-३ २३३

व्याख्या—जब ध्यान में वस्तु का रूप या बाहरी भाग परित्यक्त हो जाता है, तभी यह समाधि-अवस्था आती है। मान लो, में इस पुस्तक के बारे मे ध्यान कर रहा हूँ और सोचो, मैं उसमें चित्त-संयम करने मे सफल हो गया। तब केवल, बिना किसी रूप मे प्रकाशित, अर्थ नामक आभ्यन्तरिक सवेदनाएँ (अनुभूतियाँ) ही मेरे ज्ञान में आने लगती है। ध्यान की इस अवस्था को समाधि कहते है।

त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

सूत्रार्थ—इन तीनो का जब एक साथ अर्थात् एक ही वस्तु के सम्बन्ध में अभ्यास किया जाता है, तब उसे संयम कहते हैं।

व्याख्या—जब कोई व्यक्ति अपने मन को किसी निर्दिष्ट वस्तु की ओर ले जाकर उस वस्तु में कुछ समय तक के लिए धारण कर सकता है, और फिर उसके अन्तर्भाग को उसके बाहरी आकार से अलग करके बहुत समय तक रख सकता है, तभी समझना चाहिए कि संयम हुआ। अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि, ये तीनों क्रमशः एक के बाद एक, किसी एक वस्तु के ऊपर होने पर एक संयम हुआ। तब उस वस्तु का बाहरी आकार न जाने कहाँ चला जाता है, मन में केवल उसका अर्थ मात्र उद्भासित होता रहता है।

तज्जयात् प्रज्ञालोकः ॥५॥

सूत्रार्थ—उसको जीत लेने से ज्ञानालोक का प्रकाश होता है।

व्याख्या—जब कोई मनुष्य इस संयम के साधन में सफल हो जाता है, तब सारी शक्तियाँ उसके हाथ मे आ जाती हैं। यह संयम ही योगी के ज्ञानलाभ का प्रधान यन्त्रस्वरूप है। ज्ञान के विषय अनन्त हैं। वे स्थूल, स्थूलतर, स्थूलतम और सूक्ष्म,

> तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥

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२३४ | राजयोग

सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम आदि नाना विभागों में विभक्त हैं। इस संयम का प्रयोग पहले स्थूल वस्तु पर करना चाहिए, और जब स्थूल का ज्ञान प्राप्त होने लगे, तब थोड़ा-थोड़ा करके सोपान-क्रम से सूक्ष्मतर वस्तु पर उसका प्रयोग करना चाहिए।

तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥

सूत्रार्थ—उस (संयम) का प्रयोग सोपान-क्रम से करना चाहिए।

व्याख्या—जल्दबाजी मत करना। यह सूत्र इस प्रकार हमें सावधान कर दे रहा है।

त्रयमन्तरंगं पूर्वेभ्यः ॥७॥

सूत्रार्थ—पहले कहे गए (साधनों) की अपेक्षा ये तीनों (साधन अधिक) अन्तरंग हैं।

व्याख्या—इनके पहले यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार की बात कही गई है। वे धारणा, ध्यान और समाधि की अपेक्षा बहिरंग हैं। इन धारणा आदि अवस्थाओं को प्राप्त करने पर मनुष्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान अवश्य हो सकता है, पर सर्वज्ञता अथवा सर्वशक्तिमत्ता तो मुक्ति नहीं है। केवल इन तीन प्रकार के साधनों द्वारा मन निर्विकल्प अर्थात् परिणामशून्य नहीं हो सकता, इन त्रिविध साधनों का अभ्यास होने पर भी देह-धारण का बीज रह जाता है। जब वह बीज, जैसा कि योगीगण कहते हैं, भून दिया जाता है, तभी उसकी पुन वृक्ष उत्पन्न करने की शक्ति जाती रहती है। ये शक्तियाँ उस बीज को कभी भून नहीं सकतीं।

तदपि बहिरंगं निर्बीजस्य ॥८॥

सूत्रार्थ—पर वे (धारणा आदि तीनों) भी निर्बीज (समाधि) की तुलना में बहिरंग (साधन) हैं।

पातंजल-योगसूत्र—३ २३५.

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पातंजल-योगसूत्र—३ २३५.

व्याख्या—इसी कारण निर्बीज समाधि के साथ तुलना करने पर इनको भी बहिरंग कहना पडेगा । सयम-लाभ होने पर हम वस्तुत सर्वोच्च समाधि-अवस्था की प्राप्ति नही कर लेते, वरन् एक निम्नतर भूमि मे अवस्थित रहते है । उस अवस्था में यह परिदृश्यमान जगत् विद्यमान रहता है, और सब सिद्धियाँ इस जगत् के ही अन्तर्गत हैं ।

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ
निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥

सूत्रार्थ—जब व्युत्थान अर्थात् मन की चंचलता का अभिभव (नाश) और निरोध-सस्कार का आविर्भाव हो जाता है, उस समय चित्त निरोध नामक सस्कार के अनुगत होता है, उसे निरोध-परिणाम कहते हैं ।

व्याख्या—इसका तात्पर्य यह है कि समाधि की पहली अवस्था मे मन की समस्त वृत्तियाँ निरुद्ध अवश्य होती हैं, किन्तु सम्पूर्ण रूप से नही, क्योकि वैसा होने पर तो किसी प्रकार की वृत्ति ही न रह जाती । मान लो, मन मे एक ऐसी वृत्ति उठी है, जो मन को इन्द्रिय की ओर ले जा रही है, और योगी उस वृत्ति को सयत करने का प्रयत्न कर रहे है । इस अवस्था मे उस सयम को भी एक वृत्ति कहना पडेगा । एक लहर मानो दूसरी लहर द्वारा रोकी गई है, अतः वह समस्त लहरो की निवृत्तिरूप समाधि नही है, क्योकि वह संयम भी एक लहर है । फिर भी, जिस अवस्था में मन में तरंग के बाद तरंग उठती रहती है, उसकी अपेक्षा यह् निम्नतर समाधि उस उच्चतर समाधि के अधिक समीपवर्ती है ।

तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥१०॥

सूत्रार्थ—अभ्यास के द्वारा इसकी स्थिरता होती है ।

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~२३६ राजयोग

व्याख्या—प्रतिदिन नियमित रूप से अभ्यास करने पर मन का यह नियत संयम प्रवाहाकार में चलता रहता है एव उसकी स्थिरता होती है, और तब मन सदैव एकाग्रशील रह सकता है।

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥

सूत्रार्थ—सब प्रकार के विषयो का चिन्तन करने की वृत्ति का क्षय हो जाना और किसी एक ही ध्येयविषय का चिन्तन करनेवाली एकाग्रता-शक्ति का उदय हो जाना—यह चित्त का समाधि-परिणाम है।

व्याख्या—मन सर्वदा ही नाना प्रकार के विषय ग्रहण कर रहा है, सदैव सब प्रकार की वस्तुओ में जा रहा है। फिर मन की ऐसी भी एक उच्चतर अवस्था है, जब वह केवल एक ही वस्तु को ग्रहण करके अन्य सब वस्तुओ को छोड दे सकता है। इस एक वस्तु को ग्रहण करने का फल है समाधि।

शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम ॥१२॥

सूत्रार्थ—जब मन शान्त और उदित अर्थात् अतीत और वर्तमान दोनों अवस्थाओ में ही तुल्य-प्रत्यय हो जाता है, अर्थात् दोनो को ही एक साथ ग्रहण कर सकता है, तब उसे चित्त का एकाग्रता-परिणाम कहते हैं।

व्याख्या—मन एकाग्र हुआ है, यह कैसे जाना जाय? मन के एकाग्र हो जाने पर समय का कोई ज्ञान न रहेगा। जितना ही समय का ज्ञान जाने लगता है, हम उतने ही एकाग्र होते जाते हैं। हम अपने दैनिक जीवन में भी देख पाते हैं कि जब हम कोई पुस्तक पढ़ने में तल्लीन रहते हैं, तब समय की ओर हमारा बिलकुल ध्यान नहीं रहता। जब हम पढ़कर उठते हैं, तो आश्चर्य करने लगते हैं कि इतना समय बीत गया! सारा समय मानो एकत्र होकर वर्तमान में एकीभूत हो जाता है। इसी-

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पातञ्जल-योगसूत्र-३ २३७

लिए कहा गया है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य आकर जितना ही एकीभूत होते जाते हैं, मन उतना ही एकाग्र होता जाता है ।

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥१३॥

**सूत्रार्थ—**इसी से भूतो में और इन्द्रियों में होनेवाले धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम—(ये तीनों) कहे जा चुके ।

**व्याख्या—**पीछे के तीन सूत्रो में चित्त के निरोध आदि परिणामो की जो बात कही गई है, उसके द्वारा भूतो और इन्द्रियो के धर्म, लक्षण और अवस्थारूप तीन प्रकार के परिणामो की भी व्याख्या कर दी गई । मन लगातार वृत्ति के रूप में परिणत हो रहा है, यह मन का धर्मरूप परिणाम है । वह अतीत, वर्तमान और भविष्य इन तीन कालो के भीतर से होकर चल रहा है, यह मन का लक्षणरूप परिणाम है । कभी निरोधसस्कार प्रबल और व्युत्थानसस्कार दुर्बल हो जाता है, तो कभी ठीक इसका उलटा होता है, यह मन का अवस्थारूप परिणाम है । मन के इन तीन परिणामो के समान भूतो और इन्द्रियो के भी त्रिविध परिणाम समझना चाहिए । जैसे, मिट्टी का पिण्ड जब अपना पिण्डरूप धर्म छोडकर घटरूप धर्म में परिणत हो जाता है, तब उसे धर्म-परिणाम कहते हैं । जब इसी घटना को हम समय की दृष्टि से देखते हैं अर्थात् उसके वर्तमान, अतीत और भविष्य अवस्थारूप परिणामो को देखते हैं, तब उसे लक्षण-परिणाम कहते हैं । फिर उसके नवीनत्व, पुरातनत्व आदि अवस्थारूप परिणामो को अवस्था-परिणाम कहते हैं ।

पहले के सूत्रो में जिन सब समाधियो की बात कही गई है, उनका उद्देश्य यह है कि योगी मन के परिणामो पर इच्छापूर्वक क्षमता प्राप्त कर सके । उससे पूर्वोक्त सयमीशक्ति प्राप्त होती है ।

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२३८ राजयोग

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥१४॥

सूत्रार्थ— शान्त (अतीत), उदित (वर्तमान) और अव्यपदेश्य (आनेवाले) धर्म जिसमें अवस्थित हैं, वह धर्मी है।

व्याख्या— धर्मी उसे कहते हैं, जिस पर काल और संस्कार कार्य कर रहे हैं, जिसमें सतत परिणाम हो रहा है और जो हरदम व्यक्त भाव धारण कर रहा है।

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥१५॥

सूत्रार्थ— भिन्न-भिन्न परिणाम होने का कारण है क्रम की भिन्नता (पूर्वापर पार्थक्य)।

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥१६॥

सूत्रार्थ— पूर्वोक्त तीन परिणामों में चित्त-संयम करने से अतीत और अनागत (भविष्य) का ज्ञान उत्पन्न होता है।

व्याख्या— पहले संयम की जो परिभाषा दी गई है, हम उसे न भूलें। जब मन वस्तु के बाहरी भाग को छोड़कर उसके आभ्यन्तरिक भावों के साथ अपने को एकरूप करने की उपयुक्त अवस्था में पहुँच जाता है, जब दीर्घ अभ्यास के द्वारा मन केवल उसी की धारणा करके क्षण भर में उस अवस्था में पहुँच जाने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, तब उसे संयम कहते हैं। इस अवस्था को प्राप्त करके यदि योगी भूत और भविष्य जानने की इच्छा करे, तो उन्हें केवल संस्कार के परिणामों में संयम का प्रयोग करना होगा। कुछ संस्कार वर्तमान अवस्था में कार्य कर रहे हैं, कुछ का भोग समाप्त हो चुका है और कुछ अभी भी फल प्रदान करने के लिए संचित हैं। इन सबों में संयम का प्रयोग करके वे भूत और भविष्य सब जान लेते हैं।