Skip to content
SarvaKosh
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 249 of 307

Read in context
Page 249

तृतीय अध्याय

विभूतिपाद

अब हम विभूतिपाद मे आते है।

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

सूत्रार्थ—चित्त को किसी विशेष वस्तु में आबद्ध करके रखने का नाम है धारणा।

व्याख्या—जब मन शरीर के भीतर या उसके बाहर किसी वस्तु के साथ सलग्न होता है और कुछ समय तक उसी तरह रहता है, तो उसे धारणा कहते हैं।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

सूत्रार्थ—वह वस्तुविषयक ज्ञान निरन्तर एक रूप से प्रवाहित होते रहने पर उसे ध्यान कहते हैं।

व्याख्या—मान लो, मन किसी एक विषय को सोचने का प्रयत्न कर रहा है, किसी एक विशेष स्थान में—जैसे, मस्तक के ऊपर अथवा हृदय आदि मे—अपने को पकड रखने का प्रयत्न कर रहा है। यदि मन शरीर के केवल उस अंश के द्वारा संवेदनाओ (अनुभूतियो) को ग्रहण करने मे समर्थ होता है, शरीर के शेष सब भागो को यदि विषय-ग्रहण से विवृत रख सकता है, तो उसका नाम धारणा है, और जब वह अपने को कुछ समय तक उसी अवस्था में रखने मे समर्थ होता है, तो उसका नाम है ध्यान।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि ॥३॥

सूत्रार्थ—वही (ध्यान) जब समस्त बाहरी उपाधियों को छोड़कर अर्थ मात्र को ही प्रकाशित करता है, तब उसे समाधि कहते हैं।