राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम आदि नाना विभागों में विभक्त हैं। इस संयम का प्रयोग पहले स्थूल वस्तु पर करना चाहिए, और जब स्थूल का ज्ञान प्राप्त होने लगे, तब थोड़ा-थोड़ा करके सोपान-क्रम से सूक्ष्मतर वस्तु पर उसका प्रयोग करना चाहिए।
तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥
सूत्रार्थ—उस (संयम) का प्रयोग सोपान-क्रम से करना चाहिए।
व्याख्या—जल्दबाजी मत करना। यह सूत्र इस प्रकार हमें सावधान कर दे रहा है।
त्रयमन्तरंगं पूर्वेभ्यः ॥७॥
सूत्रार्थ—पहले कहे गए (साधनों) की अपेक्षा ये तीनों (साधन अधिक) अन्तरंग हैं।
व्याख्या—इनके पहले यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार की बात कही गई है। वे धारणा, ध्यान और समाधि की अपेक्षा बहिरंग हैं। इन धारणा आदि अवस्थाओं को प्राप्त करने पर मनुष्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान अवश्य हो सकता है, पर सर्वज्ञता अथवा सर्वशक्तिमत्ता तो मुक्ति नहीं है। केवल इन तीन प्रकार के साधनों द्वारा मन निर्विकल्प अर्थात् परिणामशून्य नहीं हो सकता, इन त्रिविध साधनों का अभ्यास होने पर भी देह-धारण का बीज रह जाता है। जब वह बीज, जैसा कि योगीगण कहते हैं, भून दिया जाता है, तभी उसकी पुन वृक्ष उत्पन्न करने की शक्ति जाती रहती है। ये शक्तियाँ उस बीज को कभी भून नहीं सकतीं।
तदपि बहिरंगं निर्बीजस्य ॥८॥
सूत्रार्थ—पर वे (धारणा आदि तीनों) भी निर्बीज (समाधि) की तुलना में बहिरंग (साधन) हैं।