मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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About this granth
This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.
The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.
This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.
४४ मुद्राराक्षस-
भी इस से डरते है, फिर कहा मै इस का नित्य का अप-
राधी, इसी से मैने वनसेनादिक तीन महाजनों से कह
दिया है कि दुष्ट चाणक्य जो मेरा घर लूट ले तो आश्चर्य
नही, इस से स्वामी राक्षस का कुटुम्ब और कही ले
जाओ, मेरी जो गति होनी है वह हो ।
५ शिष्य ।—इधर आइये साह जी !
चन्दन० ।—आया ( दोनों घूमते हैं ) ।
चाणक्य ।—( देख कर ) आइये साह जी ! कहिये, अच्छे तो
है ? बैठिये, यह आसन है ।
१० चन्दन० ।—( प्रणाम करके ) महाराज ! आप नही जानते कि
अनुचित सत्कार अनादर से भी विशेष दु ख का कारण
होता है, इस से मै पृथ्वी ही पर बैठू गा ।
चाणक्य ।—वाह ! आप ऐसा न कहिए, आप को तो हम
लोगों के साथ यह व्यवहार उचित ही है, इससे आप
१५ आसन ही पर बैठिये ।
चन्दन० ।—( आप ही आप ) कोई बात तो इस ने जानी
( प्रकाश ) जो आज्ञा ( बैठता है ) ।
चाणक्य ।—कहिए साह जी ! चन्दनदास जी ! आप को
व्यापार मे लाभ तो होता है न ?
२० चन्दन० ।—महाराज, क्यो नही, आप की कृपा से सब बनज
ब्यौपार अच्छी भांति चलता है ।
चाणक्य ।—कहिए साहजी ? पुराने राजाओ के गुण चन्द्रगुप्त
के दोषों को देख कर कभी लोगों को स्मरण आते हैं ?
चन्दन० ।—(कान पर हाथ रख कर) राम ! राम ! शरद ऋतु
२५ के पूर्ण चन्द्रमा की भांति शोभित चन्द्रगुप्त को देख कर
कौन नही प्रसन्न होता ?
चाणक्य ।—जो प्रजा ऐसी प्रसन्न है तो राजा भी प्रजा से कुछ
अपना भला चाहते है ।
प्रथम अङ्क । ४५
प्रथम अङ्क । ४५
चन्दन० ।—महाराज ! जो आज्ञा, मुझ से कौन और कितनी
वस्तु चाहते हैं ?
चाणक्य ।—सुनिये साहजी ! यह नन्द का राज * नही है,
चन्द्रगुप्त का राज्य है, धन से प्रसन्न होनेवाला तो वह
लालची नन्द ही था, चन्द्रगुप्त तो तुम्हारे ही भले से ५
प्रसन्न होता है।
चन्दन० ।—( हर्ष से ) महाराज, यह तो आप की कृपा है।
चाणक्य ।—पर यह तो मुझ से पूछिये कि वह भला किस
प्रकार से होगा ?
चन्दन० ।—कृपा कर के कहिये । १०
चाणक्य ।—सौ बात की एक बात यह है कि राजा के विरुद्ध
कर्मों को छोड़ो।
चन्दन० ।—महाराज ! वह कौन अभागा है जिसे आप राज-
विरोधी समझते हैं ?
चाणक्य ।—उस में पहिले तो तुम्ही हो। १५
चन्दन० ।-- ( कान पर हाथ रख कर ) राम ! राम ! राम !
भला तिनके से और अग्नि से कैसा विरोध ?
चाणक्य ।—विरोध यही है कि तुम ने राजा के शत्रु राक्षस
मन्त्री का कुटुम्ब अब तक घर मे रख छोड़ा है।
चन्दन० ।—महाराज ! यह किसी दुष्ट ने आप से झूठ कह २०
दिया है।
चाणक्य ।—सेठ जी ! डरो मत, राजा के भय से पुराने राजा
के सेवक लोग अपने मित्रों के पास बिना चाहे भी कुटुम्ब
छोड़ कर भाग जाते हैं, इस से इस के छिपाने ही में दोष
होगा। २५
* यहा तुच्छता प्रगट करन के लिये 'राज्य' का अपभ्रंश “राज” लिखा गया है।
रा० र० वि० सिंह ।
४६ मुद्राराक्षस-
चन्दन० ।—महाराज ! ठीक है, पहिले मेरे घर पर राक्षस
मन्त्री का कुटुम्ब था ।
चाणक्य ।—पहिले तो कहा कि किसी ने झूठ कहा है । अब
कहते हो था यह गबड़े की बात कैसी ?
५ चन्दन० ।—महाराज ! इतना ही मुझसे बातों मे फेर पड़ गया ।
चाणक्य । सुनो, चन्द्रगुप्त के राज्य मे छल का विचार नहीं
होता, इस से राक्षस का कुटुम्ब दो, तो तुम सच्चे हो
जाओगे ।
चन्दन० ।—महाराज ! मै कहता हूँ न, पहिले राक्षस का
१० कुटुम्ब था ।
चाणक्य ।—तो अब कहा गया ?
चन्दन० ।—न जाने कहा गया ।
चाणक्य ।—( हसकर ) सुनो सेठजी ! तुम क्या नहीं जानते
कि सांप तो सिर पर दवो पहाड़ पर । और जैसा चाण-
१५ क्य ने नन्द को ( इतना कह कर लाज से चुप रह जाता
है ) ।
चन्दन० ।—( आप ही आप )
प्रिया दूर घन गरजही, अहो दुख अतिघोर ।
औषधि दूर हिमाद्रि पै, सिर पै सर्प कठोर ॥
२० चाणक्य ।—चन्द्रगुप्त को अब राक्षस मन्त्री राज पर से उठा-
देगा यह आशा छोड़ो, क्योंकि देखो —
नृप नन्द जीवत नीतिबल सों, मति रही जिन की भली ।
ते “वक्रनासादिक” सचिव नहि, थिर सके करि न सि चली ॥
सो श्री सिमिटि अब आय लिपटी, चन्द्रगुप्त नरेस सों ॥
२५ तेहि दूर को करि सकै चादनि, छुटत कहु राकेस सों ? ॥
और भी
“सदा दन्ति के कुम्भ को” इत्यादि फिर से पढता है ।
प्रथम अङ्क । ४७
प्रथम अङ्क । ४७
चन्दन०।—(आप ही आप) अब मुझ को सब कहना फबता है ।
(नेपथ्य मे) हटो हटो—
चाणक्य।—शार्ङ्गरव ! यह क्या कोलाहल है देख तो ?
शि०।—जो आज्ञा (बाहर जाकर फिर आकर) महाराज, ५
राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा से राजद्वेषी जीवसिद्धि क्षपणक निरादरपूर्वक नगर से निकाला जाता ह ।
चाणक्य।—क्षपणक ! हा ! हा ! अथवा राजविरोध का फल भोगै। सुनो चन्दनदास ! देखो, राजा अपने द्वेषियों को कैसा कड़ा दण्ड देता है, मैं तुम्हारे भले की कहता हूं, १०
सुनो, और राक्षस का कुटुम्ब देकर जन्म भर राजा की कृपा से सुख भोगो।
चन्दन०।—महाराज ! मेरे घर राक्षस मन्त्री का कुटुम्ब नहीं है ।
(नेपथ्य में कलकल होता है) १५
चाणक्य।—शार्ङ्गरव ! देख तो यह क्या कलकल होता है ?
शिष्य।—जो आज्ञा (बाहर जाकर फिर आता है) महाराज !
राजा की आज्ञा से राजद्वेषी शकटदास कायस्थ को सूली देने ले जाते हैं ।
चाणक्य।—राजविरोध का फल भोगै। देखो, सेठ जी ! राजा २०
अपने विरोधियों को कैसा कड़ा दण्ड देता है, इस से राक्षस का कुटुम्ब छिपाना वह कभी न सहैगा, इसी से उस का कुटुम्ब देकर तुम को अपना प्राण और कुटुम्ब बचाना हो तो बचाओ ।
चन्दन०।—महाराज ! क्या आप मुझे डर दिखाते हैं, मेरे यहा २५
अमात्य राक्षस का कुटुम्ब हई नहीं है, पर जो होता तो भी मैं न देता ।
४८ मुद्राराक्षस—
चाणक्य ।—क्या चन्दनदास ! तुम ने यहा निश्चय किया हे ?
चन्दन० ।—हा ! मैने यही दृढ निश्चय किया हे ।
चाणक्य ।—( आप ही आप) वाह चन्दनदास ! वाह, क्यों न हो !
५ दूजे के हित प्राण दे, करै धर्म प्रतिपाल ।
भो ऐसो शिबि के बिना, दूजो है या काल ॥
( प्रकाश ) क्या चन्दनदास, तुमने यही निश्चय किया है ?
चन्दन० ।—हा ! हा ! मैने यही निश्चय किया है ।
चाणक्य ।—( क्रोध से ) दुरात्मा दुष्ट बनिया ! देख राजकोप
१० का कैसा फल पाता है !
चन्दन० ।—( बांह फैलाकर ) मै प्रस्तुत हूं, आप जो चाहिए अभी दण्ड दीजिए ।
चाणक्य ।—(क्रोध से) शारङ्गरव ! कालपाशिक, दण्डपाशिक से मेरी आज्ञा कहो कि अभी इस दुष्ट बनिये को दण्ड
१५ दें । नही, ठहरो, दुगपाल विजयपाल से कहो कि इस के घर का सारा धन ले लें और इसको कुटुम्ब समेत पकड़ कर बांध रक्खें, तब तक मै चन्द्रगुप्त से कहूं, वह आप ही इस के सर्वस्व और प्राणहरण की आज्ञा देगा ।
शिष्य ।—जो आज्ञा महाराज । सेठ जी इधर आइये ।
२० चन्दन० ।—लीजिए महाराज ! यह मै चला ( उठकर चलता है ) ( आप ही आप ) अहा ! मै धन्य हूं कि मित्र के हेतु मेरे प्राण जाते हैं, अपने हेतु तो सभी मरते हैं ।
( दोनों बाहर जाते हैं )
चाणक्य ।—( हर्ष से ) अब ले लिया है राक्षस को, क्योंकि
२५ जिमि इन तृन सम प्रान तजि, कियो मित्र का त्रान ।
तिमि सोहू निज मित्र अरु, कुल रखि है दै प्रान ॥
( नेपथ्य मे कलकल )
प्रथम अङ्क । ४६
प्रथम अङ्क । ४६
चाणक्य ।—शार्ङ्गरव !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा गुरु जी !
चाणक्य ।—देख तो यह कैसी भीड़ है ।
शिष्य ।—( बाहर जाकर फिर आश्चर्य से आकर ) महाराज !
शकटदास को सूली पर से उतार कर सिद्धार्थक लेकर ५
भाग गया ।
चाणक्य ।— ( आप ही आप ) वाह सिद्धार्थक ! काम का
आरम्भ तो किया ( प्रकाश ) हैं क्या ले गया ? ( क्रोध से )
बेटा ! दौड़ कर भागुरायण से कहो कि उस को
पकड़े । १०
शिष्य ।—( बाहर जाकर आता है ) ( विषाद से ) गुरुजी !
भागुरायण तो पहिले ही से कही भाग गया है ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) निज काज साधने के लिये जाय
( क्रोध से प्रकाश ) भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुराज, बलगुप्त
राजसेन, रोहिताक्ष और विजयवर्मा से कहो कि दुष्ट १५
भागुरायण को पकड़े ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर फिर आकर विषाद से )
महाराज ! बड़े दुख की बात है कि सब बेड़े का बेड़ा
हलचल हो रहा है । भद्रभट इत्यादि तो सब पिछली
ही रात भाग गये । २०
चाणक्य ।—( आप ही आप ) सब काम सिद्ध करै ( प्रकाश )
बेटा, सोच मत करो ।
जे बात कछु जिय धारि भागे भले सुख सों भागहीं ।
जे रहे तेहू जाहि तिन को, सोच मोहि जिय कछु नहीं ॥
सत सैन हूं सो अधिक साधिनि, काज की जेहि जग कहै । २५
सो नन्दकुल की खननहारी, बुद्धि नित मो मैं रहै ॥
४८ मुद्राराक्षस—
चाणक्य ।—क्या चन्दनदास ! तुम ने यह निश्चय किया है ?
चन्दन० ।—हा ! मैने यही दृढ निश्चय किया है ।
चाणक्य ।—(आप ही आप) वाह चन्दनदास ! वाह, क्यों न हो !
दूजे के हित प्राण दे, करे धर्म प्रतिपाल ।
को ऐसो शिवि के बिना, दूजो है या काल ॥
(प्रकाश) क्या चन्दनदास, तुमने यही निश्चय किया है ?
चन्दन० ।—हा ! हा ! मैने यही निश्चय किया है ।
चाणक्य ।—(क्रोध से) दुरात्मा दुष्ट बनिया ! देख राजकोप का कैसा फल पाता है !
चन्दन० ।—(बांह फैलाकर) मै प्रस्तुत हूं, आप जो चाहिए अभी दण्ड दीजिए ।
चाणक्य ।—(क्रोध से) शारङ्गरव ! कालपाशिक, दण्डपाशिक से मेरी आज्ञा कहो कि अभी इस दुष्ट बनिये को दण्ड दें। नहीं, ठहरो, दुर्गपाल विजयपाल से कहो कि इस के घर का सारा धन ले लें और इसको कुटुम्ब समेत पकड़ कर बांध रक्खें, तब तक मै चन्द्रगुप्त से कहूं, वह आप ही इस के सर्वस्व और प्राणहरण की आज्ञा देगा।
शिष्य ।—जो आज्ञा महाराज । सेठ जी इधर आइये ।
चन्दन० ।—लीजिए महाराज ! यह मै चला (उठकर चलता है) (आप ही आप) अहा ! मै धन्य हूं कि मित्र के हेतु मेरे प्राण जाते हैं अपने हेतु तो सभी मरते हैं।
(दोनों बाहर जाते हैं)
चाणक्य ।—(हर्ष से) अब ले लिया है राक्षस को, क्योंकि
जिमि इन तृन सम प्रान तजि, कियो मित्र का त्रान।
तिमि सोहू निज मित्र अरु, कुल रखि है दै प्रान ॥
(नेपथ्य मे कलकल)
प्रथम अङ्क । ४६
प्रथम अङ्क । ४६
चाणक्य ।—शारङ्गरव !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा गुरु जी !
चाणक्य ।—देख तो यह कैसी भीड़ है ।
शिष्य ।—( बाहर जाकर फिर आश्चर्य से आकर ) महाराज !
शकटदास को सूली पर से उतार कर सिद्धार्थक लेकर भाग गया । ५
चाणक्य ।— ( आप ही आप ) वाह सिद्धार्थक ! काम का
आरम्भ तो किया ( प्रकाश ) हैं क्या ले गया ? ( क्रोध से )
बेटा ! दौड़ कर भागुरायण से कहो कि उस को
पकड़े । १०
शिष्य ।—( बाहर जाकर आता है ) ( विषाद से ) गुरुजी !
भागुरायण तो पहिले ही से कही भाग गया है ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) निज काज साधने के लिये जाय
( क्रोध से प्रकाश ) भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुराज, बलगुप्त
राजसेन, रोहिताक्ष और विजयवर्म्मा से कहो कि दुष्ट १५
भागुरायण को पकड़े ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर फिर आकर विषाद से )
महाराज ! बड़े दुःख की बात है कि सब बेड़े का बेड़ा
हलचल हो रहा है । भद्रभट इत्यादि तो सब पिछली
ही रात भाग गये । २०
चाणक्य ।—( आप ही आप ) सब काम सिद्ध करै ( प्रकाश )
बेटा, सोच मत करो ।
जे बात कछु जिय धारि भागे भले सुख सों भागहीं ।
जे रहे तेह जाहि तिन को, सोच मोहि जिय कछु नही ॥
सत सैन हूं सो अधिक साधिनि, काज की जेहि जग कहै । २५
सो नन्दकुल की खननहारी, बुद्धि नित मो मै रहै ॥
५०
मुद्राराक्षस—
(उठ कर और आकाश की ओर देख कर) अभी भद्रभटादिकों को पकड़ता हूं (आप ही आप) राक्षस ! अब मुझ से भाग के कहा जायगा, देख—
एकाकी मद्गलित गज, जिमि नर लावहि बाधि।
५ चन्द्रगुप्त के काज मे, तिमि तोहि धरि है साधि॥
(सब जाते हैं)—(जवनिका गिरती है)
इति प्रथमांक
द्वितीय अंक ।
स्थान—राजपथ
( मदारी आता है )
**मदारी।—**अललललललल, नाग लाये सांप लाये ।
तन्त्र युक्ति सब जानही, मण्डल रचहि विचार ।
मन्त्र रक्षही ते करहि, अहि नृप को उपचार ॥
( * आकाश मे देख कर ) महाराज ! क्या कहा ? तू कौन है ? महाराज ! मै जीर्णविष नाम सपेरा हूं (फिर आकाश की ओर देख कर ) क्या कहा कि मै भी साप का मन्त्र जानता हूं खेलूंगा ? तो आप काम क्या करते हैं, यह तो कहिये ?
(फिर आकाश की ओर देख कर ) क्या कहा—मै राजसेवक हूं ? यो आप तो साप के साथ खेलते ही है । (फिर ऊपर देख कर ) क्या कहा, कैसे ? मन्त्र और जड़ी बिन मदारी और अंकुस बिन मतवाले हाथी का हाथीवान, वैसे ही नये अधिकार के संग्रामविजयी राजा के सेवक—ये तीनों अवश्य नष्ट होते हैं (ऊपर देख कर ) यह देखते २ कहा चला गया ? (फिर ऊपर देख कर ) क्या महाराज ! पूछते हो कि इन पिटारियों मे क्या है ? इन पिटारियों मे मेरी जीविका के सर्प हैं। (फिर ऊपर देख कर ) क्या कहा कि मै देखूंगा ? वाह वाह महाराज ! देखिये देखिये, मेरी बोहनी हुई, कहिये इसी स्थान पर खोलूं ? परन्तु यह स्थान अच्छा नही
* आकाश में देख कर' या 'ऊपर देख कर' का आशय यह है मानो दूसरे से बात करता है।
५२ मुद्राराक्षस -
है, यदि आप को देखने की इच्छा हो तो आप इस स्थान मे
आइये मै दिखाऊ (फिर आकाश की ओर देख कर) क्या
कहा कि यह स्वामी राक्षस मन्त्री का घर है, इस मे मै घुसने
न पाऊ गा, तो आप जाय, महाराज ! मै तो अपनी जीविका के
५ प्रभाव से सभी के घर जाता आता हू। अरे क्या वह गया
(चारो ओर देख कर) अहा, बडे आश्चर्य की बात है, जब मै
चाणक्य की रक्षा मे चन्द्रगुप्त को देखता हू तब समझता हू कि
चन्द्रगुप्त ही राज्य करैगा, पर जब राक्षस की रक्षा मे मलयकेतु
को देखता हूं तब चन्द्रगुप्त का राज गया सा दिखाई देता है।
१० क्योंकि—
चाणक्य ने लै जदपि बाधी बुद्धिरूपी डोर सों।
करि अचल लक्ष्मी मौर्यकुल मै नीति के निज जोर सों।
पै तदपि राक्षस चातुरी करि हाथ मे ताकों करै।
गहि ताहि खींचत आपुनी दिसि मोहि यह जानी परै।
१५ सो इन दोनो परम नीतिचतुर मन्त्रियों के विरोध मे नन्द-
कुल की लक्ष्मी संशय मे पडी है
दोऊ सचिव विरोध सों, जिमि वन जुग गजराय।
हथिनी सी लक्ष्मी बिचल, इत उत झोंका खाय॥
तो चलू अब मन्त्री राक्षस से मिलू।
२० (जवनिका उठती है और आसन पर बैठा राक्षस और पास
प्रियम्बदक नामक सेवक दिखाई देते हैं)
राक्षस।— (ऊपर देखकर आखो मे आस भरकर) हा ! बड़े
कष्ट की बात ह—
गुन नीति बलसों जीति अरि, जिमि आपु जादवगन हयो।
२५ तिमि नन्द को यह बिपुल कुल, बिधि बाम सों सब नसि गयो॥
एहि सोच मै मोहि दिवस अरु निसि, नित्य जागत बीतही।
यह लखौ चित्र बिचित्र मेरे भाग के बिनु भीतही ॥
द्वितीय अंक। ५३
द्वितीय अंक। ५३
अथवा
बिनु भक्तिमूले, बिनहि स्वारथ हेतु, हम यह पन लियो।
बिनु प्राण के भय, बिनु प्रतिष्ठा लाभ, सब अबलौ कियो॥
सब छोड़ि कै परदासता एहि हेत नित प्रति हम करैं।
जो स्वर्ग मै हूं स्वामि मम निज शत्रु हत लखि सुख भरै॥ ५
(आकाश की ओर देख कर दुख से) हा! भगवती लक्ष्मी!
तू बड़ी अगुणज्ञा है क्योंकि—
निज तुच्छ सुख के हेतु तजि, गुणरासि नन्द नृपाल कौं।
अब शूद्र मै अनुरक्त ह्वै लपटी सुधा मनु ब्याल कौं॥
ज्यों मत्त गज के मरत मद की धार ता साथहि नसै। १०
त्यों नन्द के साथहि नसी किन निलज अजहूं जग बसै॥
अरे पापिन!
का जग मै कुलवन्त नृप, जीवत रह्यौ न कोय?
जो तू लपटी शूद्र सों, नीच गामिनी होय॥
अथवा १५
वारवधू जन को अहै, सहजहि चपल सुभाव।
तजि कुलीन गुनियन करहि, ओछे जन सों चाव॥
तो हम भी अब तेरा आधार ही नाश किए देते हैं (कुछ सोचकर) हम मित्रवर चन्दनदास के घर अपना कुटुम्ब छोड़कर बाहर चले आए सो अच्छा ही किया। क्योंकि एक तो २० अभी कुसुमपुर को चाणक्य घेरा नहीं चाहता, दूसरे यहा के निवासी महाराज नन्द मे अनुरक्त है, इस से हमारे सब उद्योगों में सहायक होते हैं। वहा भी विषादिक से चन्द्रगुप्त के नाश करने को और सब प्रकार से शत्रु का दाव घात व्यर्थ करने को बहुत सा धन देकर शकटदास को छोड़ ही दिया २५ है। प्रतिक्षण शत्रुओं का भेद लेने को और उन का उद्योग
५४ मुद्राराक्षस—
नाश करने को भी जीवसिद्धि इत्यादि सुहृद नियुक्त ही है।
सो अब तो—
बिष वृक्ष, अहिसुत, सिंहपोत समान जा दुखरास कों।
नृपनन्द निजसुत जानि पाल्यो, सकुल निज असु नाश कों ॥
५ ता चन्द्रगुप्तहि बुद्धि सर मम तुरत मारि गिराइहै।
जो दुष्ट दैव न कवच बनिकै असह आड़े आइहै ॥
( कञ्चुकी आता है )
कञ्चुकी ।—( आप ही आप )
नृपनन्द काम समान चानक नीति जरजर जर भयो।
१० पुनि धर्म्म सम पुर देह सों नृप चन्द्र क्रम सों बढ़ि लयो ॥
अवकास लहि तोह लोभ राक्षस जदपि जीतन जाइहै।
पै सिथिल बल ने नाहि कोउ बिधि चन्द्र पै जय पाइहै ॥
(देखकर) यह मन्त्री राक्षस है ( आगे बढ़ कर ) मन्त्री !
आप का कल्याण हो।
१५ राक्षस ।—जाजलक ! प्रणाम करता हू। अरे प्रियम्बदक !
आसन ला।
प्रियम्बदक । (आसन ला कर) यह आसन है, आप बैठें।
कञ्चुकी ।—(बैठकर) मन्त्री, कुमार मलयकेतु ने आप को यह
कहा है कि “आप ने बहुत दिनों से अपने शरीर का सब
२० शृङ्गार छोड़ दिया है इस से मुझे बड़ा दुख होता है।
यद्यपि आप को अपने स्वामी के गुण नहीं भूलते और
उन के वियोग के दुख मे यह सब कुछ नहीं अच्छा
लगता तथापि मेरे कहने से आप इन को पहिरें।”
(आभरण दिखाता है) मन्त्री ! ये आभरण कुमार ने अपने
अङ्ग से उतार कर भेजे है, आप इन्हें धारण करें।
२५ राक्षस ।—जाजलक ! कुमार से कह दो कि तुम्हारे गुणों के
आगे मैं स्वामी के गुण भूल गया। पर—
द्वितीय अङ्क। ५५
द्वितीय अङ्क। ५५
इन दुष्ट बैरिन सों दुखी निज अंग, नाहि संवारि हौ।
भूषन बसन सिगार तब लौं, हौ न तन कछु धारिहौ ॥
जब लौं न सब रिपु नासि, पाटलिपुत फेर बसाइहौ।
हे कुवर ! तुम को राज दै, सिर अचल छत्र फिराइहौ ॥ ५
कचुकी।—अमात्य ! आप जो न करो सो थोड़ा है, यह बात
कौन कठिन है ? पर कुमार की यह पहिली बिनती तो
मानने ही के योग्य है।
राक्षस।—मुझे तो जैसी कुमार की आज्ञा माननीय हे वैसी
ही तुम्हारी भी, इस से मुझे कुमार की आज्ञा मानने मे
कोई विचार नही है। १०
कचुको।—(आभूषण पहिराता है) कल्याण हो महाराज !
मेरा काम पूरा हुआ।
राक्षस।—मै प्रणाम करता हूं।
कचुकी।—मुझ को जो आज्ञा हुई थी सो मै ने पूरी की
(जाता है)। १५
राक्षस।—प्रियम्बदक ! देख तो मेरे मिलने को द्वार पर कौन
खड़ा है।
प्रियम्बदक।—जो आज्ञा (आगे बढ़कर सपेरे के पास आकर)
आप कौन है ?
सपेरा।—मै जीर्णविष नामक सपेरा हूं और राक्षस मन्त्री के २०
साम्हने मै सांप खेलना चाहता हूं। मेरी यही जीविका है।
प्रियम्बदक।—तो ठहरो, हम अमात्य से निवेदन कर लें
(राक्षस के पास जाकर) महाराज ! एक सपेरा है, वह
आप को अपना करतब दिखलाया चाहता है।
राक्षस।—(बाईं आंख का फड़कना दिखाकर, आप ही आप) २५
है, आज पहिले ही सांप दिखाई पड़े (प्रकाश) प्रिय-
५६ मुद्राराक्षस—
म्बदक ! मेरा साप देखने को जी नही चाहता सो इर कुछ देकर बिदा कर ।
**प्रियम्बदक ।—**जो आज्ञा ( सपेरे के पास जाकर ) लो, मन्त्र तुम्हारा कौतुक बिना देखे ही तुम्हे यह देते है, जाओ ।
५ **सपेरा ।—**मेरी ओर से यह बिनती करो कि मै केवल सपेरा ही नही हू किन्तु भाषा का कवि भी हू, इस से जो मन्त्र जी मेरी कविता मेरे मुख से न सुना चाहै तो यह पत्र ही दे दो पढ ले ( एक पत्र देता है ) ।
प्रियम्बदक ।—( पत्र लेकर राक्षस के पास आकर ) महाराज
१० वह सपेरा कहता है कि मै केवल सपेरा ही नही हूं, भाषा का कवि भी हू । इस से जो मन्त्री जी मेरी कविता मेरे मुख से सुनना न चाहै तो यह पत ही दे दो पढ लैं ( पत्र देता है ) ।
राक्षस ।—( पत्र पढता है )
१५ सकल कुसुम रस पान करि, मधुप रसिक सिरताज ।
जो मधु त्यागत ताहि लै, होत स्रै जगकाज ॥
( आप ही आप ) अरे ! !—“मैं कुसुमपुर का वृत्तान्त जाननेवाला आप का दूत हू ” इस दोहे से यह ध्वनि निकलती है । अह ! मै तो कामों से ऐसा घबडा रहा हूं
२० कि अपने भेजे भेदिया लोगों को भी भूल गया । अब स्मरण आया, यह तो सपेरा बना हुआ विराधगुप्त कुसुमपुर से आया है ( प्रकाश ) प्रियम्बदरू ! इस को बुलाओ, यह सुकवि है, मै भी इस की कविता सुना चाहता हू ।
२५ **प्रियम्बदक ।—**जो आज्ञा ( सपेरे के पास जाकर ) चलिए, मन्त्री जी आप को बुलाते है ।
सपेरा ।—( मन्त्री के साम्हने जाकर और देखकर आप ही आप ) अरे यही मन्त्री राक्षस है ! अहा !—
द्वितीय अङ्क । २७
द्वितीय अङ्क । २७
ले बाम बाहु लताहि राखत कण्ठ सौ खसि खसि परै ।
निमि धरे दच्छिन बाहु कोहू गोद मे बिचले गिरै ॥
जा बुद्धि के डर होइ संकित नृप हृदय कुच नहि धरै ।
अजहूं न लछ्मी चन्द्रगुप्तहि गाढ़ आलिगन करै ॥ ५
प्रकाश) मन्त्री की जय हो ।
राक्षस ।—(देख कर) अरे विराध --(सकोच से बात उड़ा-
कर) प्रियम्वदक ! मै जब तक सपों से अपना जी ब-
लाता हू तब तक सब को लेकर तू बाहर ठहर ।
प्रियम्वदक ।—जो आज्ञा ।
(बाहर जाता है) १०
राक्षस ।—मित्र विराधगुप्त ! इस आसन पर बैठो ।
विराधगुप्त ।—जो आज्ञा (बैठता है) ।
राक्षस ।—(खेद के सहित निहार कर) हा ! महाराज नन्द के
आश्रित लोगों की यह अवस्था ! (रोता है)
विराधगुप्त ।—आप कुछ शोच न करें, भगवान की कृपा से १५
शीघ्र ही वही अवस्था होगी ।
राक्षस ।—मित्र विराधगुप्त ! कहो, कुसुमपुर का वृत्तान्त
कहो ।
विराधगुप्त । महाराज ! कुसुमपुर का वृत्तान्त बहुत लम्बा
चौड़ा है, इस से जहां से आज्ञा हो वहा से कहूं । २०
राक्षस ।—मित्र ! चन्द्रगुप्त के नगर प्रवेश के पीछे मेरे भेजे
हुए विष देनेवाले लोगों ने क्या क्या किया यह सुना
चाहता हूं ।
विराधगुप्त ।—सुनिए—शक्, यवन, किरात, काम्बोज पारस,
वाह्लीकादिक देश के चाणक्य के मित्र राजों की सहायता २५
से, चन्द्रगुप्त और पर्वतेश्वर के बलरूपी समुद्र से कुसुम-
पुर चारो ओर से घिरा हुआ है ।
६० मुद्राराक्षस—
समय ही चाणक्य के जी मे अनेक सन्देह उत्पन्न कराया। हा फिर?
विराधगुप्त।—फिर उस दुष्ट चाणक्य ने कुछ सहेज दिया कि आज आधी रात को अब
५ उसी समय पर्व्वतेश्वर के भाई वैरोचक को एक आसन पर बिठा कर पृथ्वी का कर दिया।
राक्षस।—क्यों पर्व्वतेश्वर के भाई वैरोचक मिला, यह पहिले ही उसने सुना दिया?
१० विराधगुप्त।—हा, तो इससे क्या हुआ?
राक्षस।—(आप ही आप) निश्चय यह ब्राह्मण इस ने उस सीधे तपस्वी से इधर-उधर बना कर पर्व्वतेश्वर के मारने के अपयश का यह उपाय सोचा। (प्रकाश) अच्छा कहो—
१५ विराधगुप्त।—तब यह तो उसने पहले ही प्र था कि आज रात को गृह प्रवेश होगा, पि चक को अभिषेक कराया और बड़े बड़े मोतियों का उसको कवच पहिराया औ से जड़ा सुन्दर मुकुट उसके सिर पर ब
२० मे अनेक सुगन्ध के फूलों की माला पहिर एक ऐसे बड़े राजा की भांति हो गया कि उसे सर्वदा देखा है वे भी न पहिचान दुष्ट चाणक्य की आज्ञा से लोगों ने चन्द्र लेखा नाम की हथिनी पर बिठा कर ब
२५ साथ करके बड़ी शीघ्रता से नन्द मन्दिर कराया। जब वैरोचक मन्दिर मे घुसने का भेजा दारुवर्म्म बढ़ई उसको चन्द्रगुप्त
द्वितीय अङ्क। ५६
द्वितीय अङ्क। ५६
राक्षस।—अहा मित्र ! देखो, कैसा आश्चर्य हुआ—
जो बिषमयी नृप चन्द्र बधहित नारी राखी लाय कै।
तासो हत्यो पर्व्वत उलटि चाणक्य बुद्धि उपाइ कै॥
जिमि करन शक्ति अमोघ अर्जुन हेतु धरी छिपाइ कै।
पै कृष्ण के मत सो घटोत्कच पै परी घहराइ कै॥ ५
विराधगुप्त।—महाराज ! समय की सब उलटी गति है !—क्या कीजियेगा ?
राक्षस।—हा ! तब क्या हुआ ?
विराधगुप्त।—तब पिता का बध सुनकर कुमार मलयकेतु नगर से निकल कर चले गये, और पर्व्वतेश्वर के भाई १० वैरोधक पर उन लोगों ने अपना विश्वास जमा लिया तब उस दुष्ट चाणक्य ने चन्द्रगुप्त का प्रवेशमुहूर्त्त प्रसिद्ध कर के नगर के सब बढ़ई और लोहारों को बुला कर एकत्र किया और उन से कहा कि महाराज के नन्दभवन में गृहप्रवेश का मुहूर्त्त ज्योतिषियों ने आज ही आधी रात १५ का दिया है, इससे बाहर से भीतर तक सब द्वारों को जांच लो, तब उस से बढ़ई लोहारों ने कहा कि “महाराज ! चन्द्रगुप्त का गृहप्रवेश जान कर दारुवर्म्म ने प्रथम द्वार तो पहले ही सोने की तोरनों से शोभित कर रखा है, भीतर के द्वारों को हम लोग ठीक करते हैं।” यह सुन २० कर चाणक्य ने कहा कि बिना कहे ही दारुवर्म्म ने बड़ा काम किया इससे उसको चतुराई का पारितोषिक शीघ्र ही मिलैगा।
राक्षस।—(आश्चर्य से) चाणक्य प्रसन्न हो यह कैसी बात है ? इससे दारुवर्म्म का यत्न या तो उलटा हो या निष्फल २५ होगा, क्योंकि इस ने बुद्धि मोह से या राजभक्ति से बिना
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मुद्राराक्षस-
समय ही चाणक्य के जी में अनेक सन्देह और विकल्प
उत्पन्न कराया। हा फिर ?
विराधगुप्त ।—फिर उस दुष्ट चाणक्य ने बुला कर सब को
सहेज दिया कि आज आधी रात को प्रवेश होगा, और
५ उसी समय पर्व्वतेश्वर के भाई वैरोधक और चन्द्रगुप्त
को एक आसन पर बिठा कर पृथ्वी का आधा २ भाग
कर दिया।
राक्षस ।—क्यों पर्व्वतेश्वर के भाई वरोधक को आधा राज
मिला, यह पहिले ही उसने सुना दिया ?
१० विराधगुप्त ।—हा, तो इससे क्या हुआ ?
राक्षस ।—(आप ही आप) निश्चय यह ब्राह्मण बडा धूर्त्त है, कि
इस ने उस सीधे तपस्वी से इधर-उधर की चार बात
बना कर पर्व्वतेश्वर के मारने के अपयश निवारण के हेतु
यह उपाय सोचा (प्रकाश) अच्छा कहो—तब ?
१५ विराधगुप्त ।—तब यह तो उसने पहले ही प्रकाश कर दिया
था कि आज रात को गृह प्रवेश होगा, फिर उसने वैरो
धक को अभिषेक कराया और बडे बड़े बहुमूल्य स्वच्छ
मोतियों का उसको कवच पहिराया और अनेक रत्नों
से जड़ा सुन्दर मुकुट उसके सिर पर रक्खा और गले
२० में अनेक सुगन्ध के फूलों की माला पहिराई, जिससे वह
एक ऐसे बडे राजा की भांति हो गया कि जिन लोगों ने
उसे सर्व्वदा देखा है वे भी न पहिचान सकें, फिर उस
दुष्ट चाणक्य की आज्ञा से लोगों ने चन्द्रगुप्त की चन्द्र
लेखा नाम की हथिनी पर बिठा कर बहुत से मनुष्य
२५ साथ करके बडी शीघ्रता से नन्द मन्दिर में उसका प्रवेश
कराया। जब वैरोधक मन्दिर में घुसने लगा तब आप
का भेजा दारुवर्म्म बढ़ई उसको चन्द्रगुप्त समझ कर उस
द्वितीय अङ्क। ६१
द्वितीय अङ्क। ६१
के ऊपर गिराने को अपनी कल की बनी तोरन ले कर सावधान हो बैठा। इसके पीछे चन्द्रगुप्त के अनुयायी राजा सब बाहर खड़े रह गये और जिस बर्बर को आप ने चन्द्रगुप्त के मारने के हेतु भेजा था वह भी अपनी सोने की छड़ी की गुप्ती जिसमे एक छोटी कृपाण थी लेकर वहा खड़ा हो गया।
**राक्षस।—**दोनों ने बे ठिकाने काम किया, हा फिर ?
**विराधगुप्त।—**तब उस हथिनो को मार कर बढ़ाया और उस के दौड़ चलने से कल की तोरण का लक्ष, जो चन्द्रगुप्त के धोखे वैरोधक पर किया गया था, चूक गया १० और वहा बर्बर जो चन्द्रगुप्त का आसरा देखता था, वह बचार। उसी कल की तोरन से मारा गया। जब दारुवर्म्मा ने देखा कि लक्ष तो चूक गए, अब मारे जायहीगे तो उस ने उस कल के लोहे की कील से उस ऊंचे तोरन के स्थान ही पर से चन्द्रगुप्त के धोखे तपस्वी १५ वैरोधक को हथिनो ही पर मार डाला।
**राक्षस।—**हाय ! दोनों बात कैसे दुःख की हुई कि चन्द्रगुप्त तो काल से बच गया और दोनों बिचारे बर्बर और वैरोधक मारे गए; (आप ही आप) दैव ने इन दोन के नहो मारा हम लोगों को मारा ।। (प्रकाश) और वह २० दारुवर्म्म बढ़ई क्या हुआ ?
**विराधगुप्त।—**उस को वैरोधक के साथ के मनुष्यों ने मार डाला।
**राक्षस।—**हाय ! बड़ा दुःख हुआ ! हाय ! प्यारे दारुवर्म्म का हम लोगों से वियोग हो गया। अच्छा ! उस वैद्य २५ अभयदत्त ने क्या किया ?
**विराधगुप्त।—**महाराज ! सब कुछ किया।