मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in contextप्रथम अङ्क । ४७
चन्दन०।—(आप ही आप) अब मुझ को सब कहना फबता है ।
(नेपथ्य मे) हटो हटो—
चाणक्य।—शार्ङ्गरव ! यह क्या कोलाहल है देख तो ?
शि०।—जो आज्ञा (बाहर जाकर फिर आकर) महाराज, ५
राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा से राजद्वेषी जीवसिद्धि क्षपणक निरादरपूर्वक नगर से निकाला जाता ह ।
चाणक्य।—क्षपणक ! हा ! हा ! अथवा राजविरोध का फल भोगै। सुनो चन्दनदास ! देखो, राजा अपने द्वेषियों को कैसा कड़ा दण्ड देता है, मैं तुम्हारे भले की कहता हूं, १०
सुनो, और राक्षस का कुटुम्ब देकर जन्म भर राजा की कृपा से सुख भोगो।
चन्दन०।—महाराज ! मेरे घर राक्षस मन्त्री का कुटुम्ब नहीं है ।
(नेपथ्य में कलकल होता है) १५
चाणक्य।—शार्ङ्गरव ! देख तो यह क्या कलकल होता है ?
शिष्य।—जो आज्ञा (बाहर जाकर फिर आता है) महाराज !
राजा की आज्ञा से राजद्वेषी शकटदास कायस्थ को सूली देने ले जाते हैं ।
चाणक्य।—राजविरोध का फल भोगै। देखो, सेठ जी ! राजा २०
अपने विरोधियों को कैसा कड़ा दण्ड देता है, इस से राक्षस का कुटुम्ब छिपाना वह कभी न सहैगा, इसी से उस का कुटुम्ब देकर तुम को अपना प्राण और कुटुम्ब बचाना हो तो बचाओ ।
चन्दन०।—महाराज ! क्या आप मुझे डर दिखाते हैं, मेरे यहा २५
अमात्य राक्षस का कुटुम्ब हई नहीं है, पर जो होता तो भी मैं न देता ।