मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in contextप्रथम अङ्क । ४५
चन्दन० ।—महाराज ! जो आज्ञा, मुझ से कौन और कितनी
वस्तु चाहते हैं ?
चाणक्य ।—सुनिये साहजी ! यह नन्द का राज * नही है,
चन्द्रगुप्त का राज्य है, धन से प्रसन्न होनेवाला तो वह
लालची नन्द ही था, चन्द्रगुप्त तो तुम्हारे ही भले से ५
प्रसन्न होता है।
चन्दन० ।—( हर्ष से ) महाराज, यह तो आप की कृपा है।
चाणक्य ।—पर यह तो मुझ से पूछिये कि वह भला किस
प्रकार से होगा ?
चन्दन० ।—कृपा कर के कहिये । १०
चाणक्य ।—सौ बात की एक बात यह है कि राजा के विरुद्ध
कर्मों को छोड़ो।
चन्दन० ।—महाराज ! वह कौन अभागा है जिसे आप राज-
विरोधी समझते हैं ?
चाणक्य ।—उस में पहिले तो तुम्ही हो। १५
चन्दन० ।-- ( कान पर हाथ रख कर ) राम ! राम ! राम !
भला तिनके से और अग्नि से कैसा विरोध ?
चाणक्य ।—विरोध यही है कि तुम ने राजा के शत्रु राक्षस
मन्त्री का कुटुम्ब अब तक घर मे रख छोड़ा है।
चन्दन० ।—महाराज ! यह किसी दुष्ट ने आप से झूठ कह २०
दिया है।
चाणक्य ।—सेठ जी ! डरो मत, राजा के भय से पुराने राजा
के सेवक लोग अपने मित्रों के पास बिना चाहे भी कुटुम्ब
छोड़ कर भाग जाते हैं, इस से इस के छिपाने ही में दोष
होगा। २५
* यहा तुच्छता प्रगट करन के लिये 'राज्य' का अपभ्रंश “राज” लिखा गया है।
रा० र० वि० सिंह ।