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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

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५२ मुद्राराक्षस -

है, यदि आप को देखने की इच्छा हो तो आप इस स्थान मे
आइये मै दिखाऊ (फिर आकाश की ओर देख कर) क्या
कहा कि यह स्वामी राक्षस मन्त्री का घर है, इस मे मै घुसने
न पाऊ गा, तो आप जाय, महाराज ! मै तो अपनी जीविका के
५ प्रभाव से सभी के घर जाता आता हू। अरे क्या वह गया
(चारो ओर देख कर) अहा, बडे आश्चर्य की बात है, जब मै
चाणक्य की रक्षा मे चन्द्रगुप्त को देखता हू तब समझता हू कि
चन्द्रगुप्त ही राज्य करैगा, पर जब राक्षस की रक्षा मे मलयकेतु
को देखता हूं तब चन्द्रगुप्त का राज गया सा दिखाई देता है।
१० क्योंकि—

चाणक्य ने लै जदपि बाधी बुद्धिरूपी डोर सों।
करि अचल लक्ष्मी मौर्यकुल मै नीति के निज जोर सों।
पै तदपि राक्षस चातुरी करि हाथ मे ताकों करै।
गहि ताहि खींचत आपुनी दिसि मोहि यह जानी परै।

१५ सो इन दोनो परम नीतिचतुर मन्त्रियों के विरोध मे नन्द-
कुल की लक्ष्मी संशय मे पडी है

दोऊ सचिव विरोध सों, जिमि वन जुग गजराय।
हथिनी सी लक्ष्मी बिचल, इत उत झोंका खाय॥

तो चलू अब मन्त्री राक्षस से मिलू।
२० (जवनिका उठती है और आसन पर बैठा राक्षस और पास
प्रियम्बदक नामक सेवक दिखाई देते हैं)

राक्षस।— (ऊपर देखकर आखो मे आस भरकर) हा ! बड़े
कष्ट की बात ह—

गुन नीति बलसों जीति अरि, जिमि आपु जादवगन हयो।
२५ तिमि नन्द को यह बिपुल कुल, बिधि बाम सों सब नसि गयो॥
एहि सोच मै मोहि दिवस अरु निसि, नित्य जागत बीतही।
यह लखौ चित्र बिचित्र मेरे भाग के बिनु भीतही ॥