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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 45 of 173

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४८ मुद्राराक्षस—

चाणक्य ।—क्या चन्दनदास ! तुम ने यह निश्चय किया है ?
चन्दन० ।—हा ! मैने यही दृढ निश्चय किया है ।
चाणक्य ।—(आप ही आप) वाह चन्दनदास ! वाह, क्यों न हो !
दूजे के हित प्राण दे, करे धर्म प्रतिपाल ।
को ऐसो शिवि के बिना, दूजो है या काल ॥
(प्रकाश) क्या चन्दनदास, तुमने यही निश्चय किया है ?
चन्दन० ।—हा ! हा ! मैने यही निश्चय किया है ।
चाणक्य ।—(क्रोध से) दुरात्मा दुष्ट बनिया ! देख राजकोप का कैसा फल पाता है !
चन्दन० ।—(बांह फैलाकर) मै प्रस्तुत हूं, आप जो चाहिए अभी दण्ड दीजिए ।
चाणक्य ।—(क्रोध से) शारङ्गरव ! कालपाशिक, दण्डपाशिक से मेरी आज्ञा कहो कि अभी इस दुष्ट बनिये को दण्ड दें। नहीं, ठहरो, दुर्गपाल विजयपाल से कहो कि इस के घर का सारा धन ले लें और इसको कुटुम्ब समेत पकड़ कर बांध रक्खें, तब तक मै चन्द्रगुप्त से कहूं, वह आप ही इस के सर्वस्व और प्राणहरण की आज्ञा देगा।
शिष्य ।—जो आज्ञा महाराज । सेठ जी इधर आइये ।
चन्दन० ।—लीजिए महाराज ! यह मै चला (उठकर चलता है) (आप ही आप) अहा ! मै धन्य हूं कि मित्र के हेतु मेरे प्राण जाते हैं अपने हेतु तो सभी मरते हैं।
(दोनों बाहर जाते हैं)
चाणक्य ।—(हर्ष से) अब ले लिया है राक्षस को, क्योंकि
जिमि इन तृन सम प्रान तजि, कियो मित्र का त्रान।
तिमि सोहू निज मित्र अरु, कुल रखि है दै प्रान ॥
(नेपथ्य मे कलकल)

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