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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 56 of 173

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द्वितीय अङ्क। ५६

राक्षस।—अहा मित्र ! देखो, कैसा आश्चर्य हुआ—

जो बिषमयी नृप चन्द्र बधहित नारी राखी लाय कै।
तासो हत्यो पर्व्वत उलटि चाणक्य बुद्धि उपाइ कै॥
जिमि करन शक्ति अमोघ अर्जुन हेतु धरी छिपाइ कै।
पै कृष्ण के मत सो घटोत्कच पै परी घहराइ कै॥ ५

विराधगुप्त।—महाराज ! समय की सब उलटी गति है !—क्या कीजियेगा ?

राक्षस।—हा ! तब क्या हुआ ?

विराधगुप्त।—तब पिता का बध सुनकर कुमार मलयकेतु नगर से निकल कर चले गये, और पर्व्वतेश्वर के भाई १० वैरोधक पर उन लोगों ने अपना विश्वास जमा लिया तब उस दुष्ट चाणक्य ने चन्द्रगुप्त का प्रवेशमुहूर्त्त प्रसिद्ध कर के नगर के सब बढ़ई और लोहारों को बुला कर एकत्र किया और उन से कहा कि महाराज के नन्दभवन में गृहप्रवेश का मुहूर्त्त ज्योतिषियों ने आज ही आधी रात १५ का दिया है, इससे बाहर से भीतर तक सब द्वारों को जांच लो, तब उस से बढ़ई लोहारों ने कहा कि “महाराज ! चन्द्रगुप्त का गृहप्रवेश जान कर दारुवर्म्म ने प्रथम द्वार तो पहले ही सोने की तोरनों से शोभित कर रखा है, भीतर के द्वारों को हम लोग ठीक करते हैं।” यह सुन २० कर चाणक्य ने कहा कि बिना कहे ही दारुवर्म्म ने बड़ा काम किया इससे उसको चतुराई का पारितोषिक शीघ्र ही मिलैगा।

राक्षस।—(आश्चर्य से) चाणक्य प्रसन्न हो यह कैसी बात है ? इससे दारुवर्म्म का यत्न या तो उलटा हो या निष्फल २५ होगा, क्योंकि इस ने बुद्धि मोह से या राजभक्ति से बिना