मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context४४ मुद्राराक्षस-
भी इस से डरते है, फिर कहा मै इस का नित्य का अप-
राधी, इसी से मैने वनसेनादिक तीन महाजनों से कह
दिया है कि दुष्ट चाणक्य जो मेरा घर लूट ले तो आश्चर्य
नही, इस से स्वामी राक्षस का कुटुम्ब और कही ले
जाओ, मेरी जो गति होनी है वह हो ।
५ शिष्य ।—इधर आइये साह जी !
चन्दन० ।—आया ( दोनों घूमते हैं ) ।
चाणक्य ।—( देख कर ) आइये साह जी ! कहिये, अच्छे तो
है ? बैठिये, यह आसन है ।
१० चन्दन० ।—( प्रणाम करके ) महाराज ! आप नही जानते कि
अनुचित सत्कार अनादर से भी विशेष दु ख का कारण
होता है, इस से मै पृथ्वी ही पर बैठू गा ।
चाणक्य ।—वाह ! आप ऐसा न कहिए, आप को तो हम
लोगों के साथ यह व्यवहार उचित ही है, इससे आप
१५ आसन ही पर बैठिये ।
चन्दन० ।—( आप ही आप ) कोई बात तो इस ने जानी
( प्रकाश ) जो आज्ञा ( बैठता है ) ।
चाणक्य ।—कहिए साह जी ! चन्दनदास जी ! आप को
व्यापार मे लाभ तो होता है न ?
२० चन्दन० ।—महाराज, क्यो नही, आप की कृपा से सब बनज
ब्यौपार अच्छी भांति चलता है ।
चाणक्य ।—कहिए साहजी ? पुराने राजाओ के गुण चन्द्रगुप्त
के दोषों को देख कर कभी लोगों को स्मरण आते हैं ?
चन्दन० ।—(कान पर हाथ रख कर) राम ! राम ! शरद ऋतु
२५ के पूर्ण चन्द्रमा की भांति शोभित चन्द्रगुप्त को देख कर
कौन नही प्रसन्न होता ?
चाणक्य ।—जो प्रजा ऐसी प्रसन्न है तो राजा भी प्रजा से कुछ
अपना भला चाहते है ।