मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
मत्तविलास-प्रहसन
श्री महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित
हिन्दी अनुवाद
(नान्दी के अन्त में सूत्रधार प्रवेश करता है।)
अकुण्ठित ज्ञान की महिमा वाले जो भाषा, वेष, शरीर, क्रिया (तथा)
गुण कृत (नाना प्रकार के) भेदों का आश्रय लेकर, भावावेश के वशीभूत
अनेक रसों को प्राप्त हुए, तीनों लोकों के व्यवहार रूप नृत्त को (करते हैं),
और जो स्वयं दर्शक हैं, वह दिव्य कपालधारी (शिव) भूमण्डलरूपी पात्र
में व्याप्त यश आपको प्रदान करें ॥१॥
अरे ! मैंने छोटी पत्नी के विषय में मिथ्याग्रह होने से रुष्ट (नाराज
हुई) बड़ी पत्नी को प्रसन्न करने का (मनाने का) और अधिक अच्छा उपाय
ढूंढ़ लिया है, क्योंकि आज हमें बहुत दिनों बाद सभा ने नाटक प्रदर्शन करने
को नियुक्त किया है। तो अब इसके पास जाता हूँ। [नेपथ्य की ओर
देखकर) आर्ये ! इधर आओ।
(प्रवेश करके)
नटी—(क्रोध सहित) आर्यपुत्र ! क्या तुम बहुत दिनों बाद जवानी
के गुणों से भरा हुआ शराबियों के विलासों का प्रहसन दिखाने आए हो ?
सूत्रधार—जैसा आपने कहा। (ठीक ही है)
नटी—तब उसी (स्त्री) को दिखाओ, जो तुम्हारे साथ रमण के
योग्य है।
सूत्रधार—तुम्हारे साथ दिखाऊँगा। (इस उद्देश्य से मैं तुम्हारे पास
आया हूँ।)
नटी—क्या उसी (औरत) ने तुम्हें भेजा है ?
सूत्रधार—हां ठीक ही है। और फिर वहाँ जाओगी तो बहुत
अनुग्रह मिलेगा।
नटी—यह केवल तुम्हारे लिए ही ठीक है।
सूत्रधार—आर्ये ! तुम्हारे लिए भी ठीक है। सभा तुम्हारे
अभिनय से संतुष्ट होकर (तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा) अनुग्रह करेगी। (तुम्हारा
बहुत आदर करेगी)।
बौद्ध भिक्षु नागसेन से विवाद, कपाल-पात्र अन्वेषण एवं पाशुपत मध्यस्थता
२४ मत्तविलास-प्रहसन
नटी—(सहर्षम्) एवस् । लद्धो अय्यमिस्साणं पसादो । [एवम् ।
लब्ध आर्यमिश्राणां प्रसादः ।]
सूत्रधारः—बाढम् । लब्धः ।
नटी—जइ एवं, किं दे पिअक्खाणिअं देमि । [यद्येवं, किं ते
प्रियाख्यानिकं^५ ददामि । ]
सूत्रधारः—अलं प्रियाख्यानिकपुनरुक्तेन । पश्य,
उद्भिन्नरोमाञ्चकपोलरेख-
माविर्मयूखस्मितमञ्चितभ्रु ।
लब्ध्वा प्रिये ! दुर्लभमाननं ते
भूयोऽपि किं प्रार्थयितव्यमस्ति ॥२॥
नटी—किं दाणि अय्येण पउज्जिदव्वं । [किमिदानीमार्येण^६
प्रयोक्तव्यम् । ]
सूत्रधारः—ननु त्वयैवाभिहितं मत्तविलासप्रहसनमिति ।
नटी—णूणं इमस्सि पक्खवादी मे कोवो, जेण अभिप्पाअणु-
रूवं भणाविद ह्मि । अय्य कदमो उण सो कवी, जो इमाए किदीए
पआसीअदि । [नूनमस्मिन्^७ पक्षपाती मे कोपः, येनाभिप्रायानुरूपं
भणितास्मि । आर्य ! कतमः पुनः स कविः, योजनया^८ कृत्या
प्रकाश्यते । ]
सूत्रधारः—भवति ! श्रूयताम् ।^९ पल्लवकुलधरणिमण्डल-^१०
कुलपर्वतस्य सर्वंनयविजितसमस्तसामन्तमण्डलस्य आखण्डल सम-
पराक्रमश्रियः श्रीमहिमानुरूपदानविभूतिपरिभूतराजराजस्य श्रीसिंह-
विष्णुवर्मणः पुत्रः शत्रुषद्वर्गनिग्रहपरः परहितपरतन्त्रतया महाभूत-
सधर्मा महाराजः श्रीमहेन्द्रविक्रमवर्मा नाम । अपि च,
प्रज्ञादानदद्यानुभावधृतयः कान्तिः कलाकौशलं,
सत्यं शौर्यममायता विनय इत्येवम्प्रकारा गुणाः ।
अप्राप्तस्थितयः समेत्य शरणं याता यमेकं कलौ,
कल्पान्ते जगदादिमादिपुरुषं सर्गप्रभेदा इव ॥३॥
किञ्च,
५. न कुतः, उद्भिन्न—। ६. नाटकं नाटयितव्यम् । ७. आम्, अ— ।
८. येनानया कृत्या आत्मानमेव प्रकाशयिष्यति । ६. ताम् । विदितप
१०. लपर्वत
हिन्दी अनुवाद २५
नटी—(हर्ष के साथ) ऐसी बात है ! (तो) आर्यसभिकों का प्रसाद
मिल गया।
सूत्रधार—हाँ, मिल गया।
नटी—यदि ऐसा है तो तुमको अच्छा वृत्तान्त सुनाने का पारितोषिक
क्या दूं ?
सूत्रधार—पारितोषिक की पुनरावृत्ति न करो। देखो—
तुम्हारे, फूटे हुए रोमाञ्च से युक्त कपोल वाले, प्रकट हुए किरणों
से युक्त मन्दहास वाले, तिरछी भौंहों वाले, दुष्प्राप्य मुख को प्राप्त करके
और फिर क्या माँगना है ॥२॥
नटी—तो अब आप कौन सा नाटक प्रदर्शित करेंगे ?
सूत्रधार—अभी तुमने ही तो कहा कि मत्तविलास प्रहसन।
नटी—इस विषय में भी मेरा क्रोध पक्षपाती है, जिससे (मैं) अभि-
प्रायवश कहने के लिए विवश की गई हूँ। आर्य ! फिर वह कौन सा कवि
है जो इस कृति के द्वारा प्रसिद्ध किया जा रहा है।
सूत्रधार—आर्ये ! सुनिए ! पल्लववंशरूपी पृथ्वीमण्डल के कुलपर्वत,
सब प्रकार की नीति से सम्पूर्ण सामन्तों के समूह को जीतने वाले, इन्द्र के
तुल्य पराक्रमरूपी सम्पत्ति वाले, विशाल सम्पत्ति के अनुरूप दान के उत्कर्ष
से कुबेर को भी तिरस्कृत करने वाले, श्रीसिंहविष्णुवर्मा के पुत्र श्री महेन्द्र-
विक्रमवर्मा नाम के राजा हैं, जो षड्वर्गरूपी (अन्तः) शत्रुओं को नियंत्रित
करने वाले, पञ्चमहाभूतों के समान केवल परोपकार में लगे हुए हैं।
और भी,
विवेक, उदारता, सहानुभूति, मर्यादा, स्थैर्य (संतोष), दीप्ति, (शिल्प,
ललित) कला, समृद्धि, सत्य, पराक्रम, निष्कपटता, नम्रता-आदि ये गुण
कलियुग में (कोई अन्य) स्थान न पाकर एक साथ जिस एक (राजा) की
शरण में उसी प्रकार चले गए, जैसे प्रलय के अन्त में समस्त सृष्टियाँ संसार
के आदि (विराजमान) आदिपुरुष की (शरण में चली जाती हैं ) ॥३॥
और,
२६ मत्तविलास-प्रहसन
आकरे सूक्तिरत्नानां यस्मिन् गुणगरीयसाम् ।
अर्हन्ति ११ बहुसूक्तानि सतां सारलघून्यपि ॥४॥
नटी—किं दाणि अय्येण विलम्बीअदि । णं अपुरुवदाए तुरिअं
अणुट्टिदव्वो अअं पओओ । [किमिदानीमार्येण विलम्ब्यते । नन्व-
पूर्वतया त्वरितमनुष्ठातव्योऽयं प्रयोगः ।]
सूत्रधार—अहं १२ तु—
सम्प्रति सङ्गीतधनः कविगुणकथयास्मि निघ्नतां नीतः ।
(नेपथ्ये)
प्रिये ! देवसोमे !
सूत्रधार—युवतिसख एष सुरया कपालविभवः कपालीव ॥५॥
(निष्क्रान्तौ)
॥ स्थापना ॥ १३.
(ततः प्रविशति सपरिग्रहः कपाली ।)
कपाली—(क्षीबतां रूपयित्वा) प्रिये ! देवसोमे ! सत्यमे-
वैतत् १४ तपसा कामरूपता प्राप्यत इति । यत् त्वया परमव्रतस्य
विधिवदनुष्ठानेनान्य एव रूपातिशयः क्षणात् प्रतिपन्नः । तव हि—
उद्भिन्नश्रमवारिबिन्दुवदनं सभ्रूलताविभ्रमं
खेलं यातमकारणानि हसितान्यव्यक्तवर्णा गिरः ।
रागाक्रान्तमधीरतारमलसापाङ्गं युगं नेत्रयो-
रंसोपान्तविलम्बिनश्च विगलन्मालागुणा मूर्धजाः ॥६॥
देवसोमा—भअवं ! मत्तं विअ मत्तं विअ मं भणासि । [भगवन् !
मत्तामिव मत्तामिव मां भणसि । ]
कपाली—किमाह भवती ।
देवसोमा—ण हु किञ्चि भणामि । [न खलु किञ्चद् भणामि ।]
कपाली—किन्नु खलु मत्तोऽस्मि ।
११. बहु अर्हन्ति वहमूल्यं प्राप्नुवन्ति, श्लाघामनलपां लभत इत्यर्थः ।
१२. हन्त सम्प्रति— १३. आमुखम् १४. —मेतत्
हिन्दी अनुवाद २७
श्रेष्ठ गुणों वाले, सूक्तिरूपी रत्नों वाली जिस समुद्र में सज्जनों की
अल्प मूल्य वाली सूक्तियाँ भी बहुत मूल्य को प्राप्त करती हैं (अर्थात् बहुमूल्य
हो जाती हैं) ॥४॥
नटी—आर्य ! अब देर क्यों कर रहे हैं ? अपूर्व होने के कारण
इसका प्रदर्शन शीघ्र ही करना चाहिए ।
सूत्रधार—मैं तो—
सङ्गीत ही है धन जिसका ऐसा (मैं) कवि इस समय कवि के गुणों
को कहने से नीचता को प्राप्त हो गया हूँ ।
(नेपथ्य में)
प्यारी ! देवसोमा ।
जवान स्त्री के सहचर, कपाल ही जिसकी सम्पत्ति है, (ऐसे) मदिरा
के कारण (नीचे गिरते हुए) इस कपाली के समान (मैं भी नीचता को प्राप्त
हो गया हूँ ।) ॥५॥
(दोनों निकल जाते हैं ।)
॥ स्थापना ॥
(तब सहचरी सहित कपाली प्रवेश करता)
कपाली—(मस्ती का अभिनय करके) प्यारी ! देवसोमा ये तो
सच ही है कि तप से इच्छानुसार रूप मिलता है, क्योंकि तुमने परम व्रत
का विधिपूर्वक पालन करने के कारण ही क्षण भर में नया ही सौन्दर्य प्राप्त
कर लिया है। क्योंकि—
(तुम्हारे) मुख पर स्वेद बिन्दु फूट निकले हैं, लतासदृश भौंहों में
विलास है, क्रीड़ायुक्त गति है; (तुम) बिना किसी कारण हँस रही हो,
(तुम्हारी) बोली अस्पष्ट वर्णों वाली है, दोनों नेत्र लालिमा से भरे हैं,
(आँखों की) पुतलियाँ चञ्चल हैं, (दृष्टि) अलसाई और तिरछी है, माला
की गाँठ ढीली पड़ गई है, (और) केश कंधों तक लटक गए हैं ॥६॥
देवसोमा—भगवन् (मैं) नशे में हूँ, नशे में हूँ, (आप) ऐसा कह
रहे हैं ?
कपाली—आपने क्या कहा ?
देवसोमा—कुछ नहीं कह रही हूँ ।
कपाली—(तो) क्या मैं ही नशे में हूँ ?
२८ मत्तविलास-प्रहसन
देवसोमा—भअवं। परिब्भमइ परिब्भमइ पुहुवी। पुरो वदामि
विअ। अवलम्ब दाणि मं। [भगवन् ! परिभ्रमति, परिभ्रमति
पृथिवी पुरः पतामीव। अवलम्बस्वेदानीं माम् । ]
कपाली—प्रिये ! तथास्तु। (अवलम्बमानः पतनं रूपयित्वा)
प्रिये ! सोमदेवे ! किं त्वं कुपितासि, यदवलम्बितुमुपसर्पतो मे
दूरीभवसि।
देवसोमा—अहो णु खु आदकोवा सामदेवा, जा तुए सीसेण
पणामिअ अणुणीअमाणा वि दूरी होइ। [अहो नु खलु आगतकोपा
सोमदेवा या त्वया शीर्षेण प्रणम्यानुनीयमानापि दूरीभवति।]
कपाली—ननु त्वमेवासि सोमदेवा। (ध्यात्वा) नहि, १५ देवसोमा
देवसोमा—भअवं। णं तहा वल्लहा सोमदेवा, णाहंदि मम
णामकेणाभिधादुं १६। [भगवन् ! ननु तथा वल्लभा सोमदेवा, नार्हति
मम नामकेनाभिधातुम् । ]
कपाली—भवति ! सुलभपदस्खलितो मे मदोऽयं तवात्रापराध्दः।१७
देवसोमा—दिट्ठिआ ण तुवं। [दिष्ट्या न त्वम् ।]
कपाली—कथं मद्यदोषो मामेवं सङ्क्रामयति। भवतु भवतु,
अद्यप्रभृति मद्यनिवेषणान्निवृत्तोऽस्मि।
देवसोमा— १८भअवं। मा या मम कारणादो बदभङ्गेण
तवो खण्डेदुं। [भगवन् ! मा मा मम कारणाद् व्रतभङ्गेन तपः
खण्डयितुम् । ] (पादयोः पतति)
कपाली—(सहर्षमुत्थाप्यालिङ्ग्य) धृणं धृणं, १९ नमः शिवाय ।
प्रिये !
पेया सुरा प्रियतमामुखमीक्षितव्यं
ग्राह्यः स्वभावललितो विकृतश्च वेषः।
येनेदमीदृशमदृश्यत मोक्षवर्त्म
दीर्घायुरस्तु भगवान् स पिनाकपाणिः ॥७॥
१५. नहि नहि १६. —मद्येन
१७. —राध्यति १८. मा मा भगवन् मम— १९. धृष्ण धृष्ण; धिणं धिणं
हिन्दी अनुवाद २६
देवसोमा-स्वामी ! पृथ्वी घूम रही है, घूम रही है। सामने गिरने
वाली हूँ, अब मुझे सम्हालिए ।
कपाली- प्यारी ! ठीक है। [सहारा देता हुआ गिरने का अभिनय
करके] प्यारी ! सोमदेवा ! क्या तुम नाराज हो ? (क्योंकि) मैं सहारा
देने के लिए पास आ रहा हूँ (और) तुम दूर होती जा रही हो ।
देवसोमा-हाँ, सोमदेवा को गुस्सा आया तो तुम्हारे सिर से नमस्कार
करके मनाने पर भी दूर होती जा रही है ।
कपाली-निस्संदेह तुम ही सोमदेवा हो । (सोचकर) नहीं, देवसोमा ।
देवसोमा-स्वामी ! वैसी प्यासी सोमदेवा को मेरे नाम से बुलाना
उचित नहीं है ।
कपाली-आर्ये ! मेरे नशे के कारण यह शब्दों के उलट-फेर का
दोष है ।
देवसोमा-अच्छा तो तुम अपराधी नहीं हो ।
कपाली-यह मेरे ऊपर मदिरा का प्रभाव कैसे हो रहा है ? अच्छा,
अच्छा, आज से मदिरा पीना छोड़ता हूँ।
देवसोमा-स्वामी ! नहीं, नहीं, मेरे कारण व्रतभङ्ग करके तप को
तोड़ना ठीक नहीं । (पैरों पर गिर पड़ती है ।)
कपाली-(हर्ष से उठाकर, आलिङ्गन करके) नमः शिवाय ।
मदिरा पीनी चाहिए, प्रियतमा का मुख देखना चाहिए, स्वभाव से
सुन्दर तथा विकृत वेष पहनना चाहिए, जिन्होंने ऐसा यह मोक्ष का मार्ग
दिखाया वह भगवान् शिव दीर्घजीवी हों ॥७॥
३० मत्तविलास-प्रहसन
देवसोमा—भअवं ! णं तहा भणिदव्वं । अहन्ते मोक्खमग्गं
अण्णहा वण्णअन्ति । [भगवन् ननु तथा भणितव्यम् । अर्हन्तो२०
मोक्षमार्गमन्यथा वर्णयन्ति ।]
कपाली—भद्रे ! ते खलु मिथ्यादृष्टयः । कुतः,
कार्यस्य निःसंशयमात्महेतोः
सरूपतां हेतुभिरभ्युपेत्य ।
दुःखस्य कार्यं सुखमामनन्तः
स्वेनैव वाक्येन हता वराकाः ॥८॥
देवसोमा—सन्तं सन्तं पावं । [शान्तं शान्तं पापम् ।]
कपाली—शान्तं शान्तं पापम् । न खलु ते पापा आक्षेपमुखे-
नाप्यभिधातुमर्हन्ति, ये ब्रह्मचर्यकेशनिर्लोटनमलधारणभोजनवेला-
नियममलिनपटपरिधानादिभिः प्राणिनः परिक्लेशयन्ति । तदिदानीं
कुतीर्थसङ्कीर्तनोपहतां जिह्वां सुरया प्रक्षालयितुमिच्छामि ।
देवसोमा—तेण हि अण्णं दाणिं सुरापणं गच्छामो । [तेन
ह्यन्यमिदानीं सुरापणं गच्छावः ।]
कपाली—प्रिये ! तथास्तु ।
(उभौ परिक्रामतः ।)
कपाली—अहो नु खलु विमानशिखरविश्रान्तघनरसित-
सन्दिग्धमृदङ्गशब्दस्य मधुसमयनिर्माणमातृकायमाणमाल्यापणस्य
कुसुमशरविजयघोषणायामानवरयुवतिकाञ्चीरवस्य काञ्चीपुरस्य
परा विभूतिः । अपि च—
अनतिशयमनन्तं सौख्यमप्रत्यनीकं
समधिगतसतत्त्वा मेनिरे यन्मुनीन्द्राः ।
तदिह निरवशेषं दृष्टमेतत् तु चित्रं
यदुत करणभोग्यं कामभोगात्मकं च ॥९॥
देवसोमा—भअवं ! भअवदी वाहुणीव... विअ अणवगीअमहुरा
काञ्ची । [भगवन् ! भगवती वारुणीवानवगीतमधुरा काञ्ची।]
२०. अन्यथा मोक्षमार्गम्
हिन्दी अनुवाद ३१
देवसोमा—स्वामी ! वैसा ही कहना चाहिए (अर्थात् आपने एकदम
ठीक कहा)। अर्हत् के अनुयायी मोक्ष मार्ग का वर्णन दूसरी तरह से
करते हैं।
कपाली—कल्याणि ! वे तो मिथ्या दृष्टि वाले हैं (इनका दर्शन
गलत है।) क्योंकि—
निस्सन्देह कार्य (अपने) कारण जैसा होता है, (इस प्रकार) हेतुवाद
के द्वारा सिद्ध करके (पुनः) सुख को दुख का कार्य बनाते हुए (ये) बेचारे
अपने ही वचन से परास्त हो गए ॥८॥
देवसोमा—पाप शान्त हो, शान्त हो ।
कपाली— पाप शान्त हो, शान्त हो। वे तो इतने पापी हैं कि निंदा
के लिए भी उनका नाम नहीं लेना चाहिए, जो ब्रह्मचर्य, बालों के उखाड़ने,
मल धारण करने, भोजन के समय के नियम .(सूर्यास्त से पहले खाना), मैले
वस्त्र धारण करने—आदि से लोगों को सताते हैं। तो अब पापियों का नाम
लेने से अपवित्र हुई जीभ को मदिरा से धोना चाहता हूँ !
देवसोमा—तो अब दूसरी मदिरा की दुकान पर चलते हैं ।
कपाली—प्यारी ! ठीक है।
( दोनों घूमते हैं )
अहा ! काञ्चीपुरी की प्रकृष्ट शोभा (जहाँ)—महलों के शिखरों पर
आराम करने वाले मेघों के गर्जन से मृदङ्ग ध्वनि का सन्देह हो रहा है, जहाँ
फूलों की दुकानों से वसन्त ऋतु का निर्माण किया जा सकता है, जहाँ की
श्रेष्ठ युवतियों की मेखलाओं की ध्वनि कामदेव की विजय घोषणा की तरह
होती है। और भी,
तत्त्ववेत्ता श्रेष्ठ मुनियों ने जिस सुख को सर्वोत्कृष्ट, अनन्त अद्वितीय
माना है, वही (सुख) पूरा यहाँ दिखाई दे रहा है, लेकिन आश्चर्य (की बात)
है कि यहाँ यह (सुख) इन्द्रियों के द्वारा भोग करने योग्य है और काम भोग
रूपी है ॥६॥
देवसोमा—स्वामी ! मदिरा देवी की तरह काञ्ची भी दोष रहित है।
३२ मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—प्रिये ! पश्य पश्य ! एष सुरापणो यज्ञवाटविभूति-
मनुकरोति । अत्र हि ध्वजस्तम्भो यूपः, सुरा सोमः, शौण्डा ऋत्विजः,
चषकाश्चमसाः, शूल्यमांसप्रभृतय उपदंशा हविर्विशेषाः, मत्तवचनानि
यजूंषि, गीतानि सामानि, उदङ्काः स्रुवाः, तर्षोऽग्निः, सुरापणाधि-
पतिर्यजमानः ।
देवसोमा—अम्हाणं पि एत्थ भिक्खा रुद्दभाओ भविस्सदि ।
[आवयोरप्यत्र भिक्षा२१रुद्रभागो भविष्यति ।]
कपाली - अहो दर्शनीयानि प्रहृतमर्दल२२ करणानुगतानि
विविधाङ्गहारवचनभ्रूविकाराणि उच्छ्रितैकहस्तावलम्बितोत्तरीयाणि
विगलित२३वसनप्रतिसमाधानक्षणविषमितलयानि व्याकुलितकण्ठ-
गुणानि मत्तविलासनृत्तानि ।
देवसोमा—अहो रसिओ खु आअय्यो । [अहो रसिकः
खल्वाचार्यः ।]
कपाली—एषा भगवती वारुणी चषकेष्वावर्जिता प्रत्यादेशो
मण्डनानाम्, अनुनयः प्रणयकुपितानां, पराक्रमो यौवनस्य, जीवितं
विभ्रमाणाम् । किं बहुना —
मिथ्या त्रिलोचनविलोचनपावकेन
भस्मीकृतां मदनमूर्तिमुदाहरन्ति ।
स्नेहात्मिका तदभितापवशाद् विलीना
सेयं प्रिये ! मदयति प्रसभं मनांसि ॥१०॥
देवसोमा —भअवं ! जुज्जइ एदं । णहि लोओवआरणिरदो
लोअणाहो लोअं विणासेदि । [भगवन् ! युज्यत एतत् । नहि लोको-
पकारनिरतो लोकनाथो लोकं विनाशयति ।]
(उभौ कपोलपटहं कुरुतः)
कपाली—भवति ! भिक्षां देहि ।
(नेपथ्ये)
भअवं ! एसा भिक्खा । पडिगण्हदु भअवं । [भगवन् ! एषा
भिक्षा । प्रतिगृह्णातु भगवान् ।२४]
२१. भिक्षविभागः २२. मद्दल २३. —लितानि २४. भवान्
हिन्दी अनुवाद : ३३
कपाली—प्रिये ! देखो, देखो । यह मदिरा की दुकान यज्ञ-स्थल के
वैभव का अनुकरण करती है। क्योंकि यहाँ ध्वजा का स्तम्भ यज्ञस्तम्भ है,
मदिरा सोमरस है, मदिराविक्रेता पुरोहित हैं, (मदिरा के) प्याले पात्र हैं, शूली
पर पका माँस आदि उपदंश हवन पदार्थ हैं; शरावियों की बोलियाँ यजुर्वेद
(के मन्त्र) हैं, गाने सामवेद (के गान) हैं; चमड़े का वर्तन यज्ञ का चमचा,
प्यास अग्नि और दुकानदार यजमान है ।
देवसोमा—हम दोनों की भिक्षा भी रुद्र का भाग बन जाएगी ।
कपाली—अहा ! ये बजते हुए तबले की ध्वनि का अनुसरण करने
वाले, तरह-तरह के अङ्गों के विक्षेप वाले, शब्द (व) तिरछी भौंहों वाले,
एक हाथ में उत्तरीय को पकड़ने वाले, गिरते हुए वस्त्र को सम्भालने के
समय लयभङ्ग होने वाले, लड़खड़ाते हुए कण्ठ स्वर वाले शरावियों के
नृत्त देखने योग्य हैं ।
देवसोमा —आचार्य तो बड़े रसिक हैं ।
कपाली—प्यालों में भरी हुई यह मदिरा देवी मानों शृङ्गार की
चुनौती है, प्रेम में कुपित जनों (को मनाने) की विनती है, यौवन की
वीरता है (और) विलासियों का प्राण है । बहुत कहने से क्या—
शिव के तृतीय नेत्र की अग्नि से कामदेव की मूर्ति भस्म बन गयी
(यह लोग) झूठ कहते हैं । प्रिये ! (वास्तव में) अत्यधिक गर्मी के कारण
गलकर (मदिरा के रूप में) द्रव बनकर वही यह मनों को तुरन्त मस्त बना
देती है ॥१०॥
देवसोमा—स्वामी ! यह ठीक है । संसार के उपकार में लगे हुए
संसार के स्वामी (शिव) संसार का विनाश नहीं करते ।
(दोनों गाल बजाते हैं ।)
कपाली—देवी ! भिक्षा दो ।
(नेपथ्य में)
भगवान् ! यह भिक्षा है। आप लीजिए ।
३४ मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—एष २५ प्रतिगृह्णामि । प्रिये ! क्व मे कपालम् ?
देवसोमा—अहं वि ण पेक्खामि । [अहमपि न पश्यामि ।]
कपाली—(ध्यात्वा) आ तस्मिन्नेव सुरापणे विस्मृतमिति
तर्कयामि । भवतु, प्रतिनिवृत्य द्रक्ष्यावः ।
देवसोमा—भअवं ! अधम्मो खु एसो आदरोवणीदाए भिक्खाए
अप्पडिग्गहो । किं दाणि करम्ह । [भगवन् ! अधर्मः खल्वेष आदरो-
पनीताया भिक्षाया अप्रतिग्रहः । किमिदानीं कुर्वः ।]
कपाली—आपद्धर्मं २६ प्रमाणीकृत्य गोशृङ्गेण प्रतिगृह्यताम् ।
देवसोमा—भअवं ! तह । (प्रतिगृह्णाति) [भगवन् ! तथा]
(२७उभौ परिक्रम्यावलोकयतः)
कपाली—कथमिहापि न दृश्यते । (विषादं रूपयित्वा) भो
भो माहेश्वराः ! माहेश्वराः ! अस्मदीयं भिक्षाभाजनमिह भवद्भिः
किं दृष्टम् २८ । किमाहुर्भवन्तः- न खलु वयं पश्याम इति । हा
हतोऽस्मि । भ्रष्टं मे तपः । केनाहमिदानीं कपाली भविष्यामि ।
भोः कष्टम्—
येन मम पानभोजनशयनेषु नितान्तमुपकृतं शुचिना ।
तस्याद्य मां वियोगः सन्मित्रस्येव पीडयति ।।११।।
(पतितः शिरस्ताडनं रूपयित्वा) भवतु । अस्ति लक्षणमात्रम् । न
मुक्तोऽस्मि कपालिसंज्ञायाः । (उत्तिष्ठति )
देवसोमा—भअवं ! केण खु गहीदं कवालं । [भगवन् ! केन
खलु गृहीतं कपालम् २९ । ]
कपाली—प्रिये ! तर्कयामि शूल्यमांसगर्भत्वाच्छुना वा
शाक्यभिक्षुणा वेति ।
देवसोमा—तेण हि अण्णेसणणिमित्तं सव्वं कञ्चीउरं परिब्भ-
मामो । [तेन ह्यन्वेषणनिमित्तं सर्वं ३० काञ्चीपुरं परिभ्रमावः ।]
कपाली—प्रिये ! तथा ।
—
२५. एष एष २६. प्रिये, आप— २७. उभौ तथा कृत्वा प………… ।
२८. —ष्टम् । (कर्णन्दत्वा) किमा— । २९. —लं भवेत् । ३०. सर्वमेव ।
हिन्दी अनुवाद ३५
कपाली—मैं लेता हूँ। प्रिये ! मेरा कपाल कहाँ है ?
देवसोमा—मुझे भी नहीं दिखाई दे रहा है।
कपाली—(सोचकर) शायद उसी (पहली) मदिरा की दुकान पर
भूल आये हैं। अच्छा तो लौटकर देखेंगे।
देवसोमा -- स्वामी ! आदरपूर्वक लाई गई भिक्षा को स्वीकार न
करना यह तो अधर्म है। अब क्या करें ?
कपाली—आपद्धर्म को प्रमाण मानकर गोसींग से ले लो।
देवसोमा - अच्छा स्वामी। (लेती है)
(दोनों घूमकर देखते हैं )
कपाली—अरे यहाँ भी दिखाई नहीं देता।
(दुःख का अभिनय करके )
अरे-अरे माहेश्वरो ! माहेश्वरो ! यहाँ आप लोगों ने क्या हमारा भिक्षा
का पात्र देखा है ? आपने क्या कहा-हमने नहीं देखा। हाय (मैं) मारा गया।
मेरा तप भ्रष्ट हो गया। अब मैं कपाली कैसे होऊँगा (कहलाऊँगा)। ओह !
दुःख है—
जिस पवित्र (कपाल) के द्वारा (मदिरा) पीने, खाने (और) सोने में
मेरा अत्यन्त उपकार किया गया, आज सच्चे मित्र के (विरह के) समान
उसका वियोग मुझे पीड़ित कर रहा है ॥११॥
(गिरकर सिर पीटने का अभिनय करके)
अच्छा ! (वह कपाल तो) लक्षण मात्र था। कपाली की संज्ञा से
मुक्त नहीं हुआ हूँ। (उठता है )
देवसोमा—भगवन् ! कपाल (भला) किसने लिया होगा ?
कपाली—प्रिये ! मुझे ऐसा लगता है कि शूल्यमांस से युक्त होने के
कारण किसी कुत्ते अथवा शाक्यभिक्षु ने (लिया होगा ) ।
देवसोमा—तो फिर (उसे) ढूंढ़ने के लिए समस्त काञ्चीपुरी में
घूमते हैं।
कपाली—प्रिये ! ठीक है।
३६ मत्तविलास-प्रहसन
(उभौ परिक्रामतः )
(ततः प्रविशति शाक्यभिक्षुः पात्रहस्तः )
शाक्यभिक्षुः--अहो³¹ उवासअस्स ³²धणदाससेट्ठिणो सब्बावास-
महादाणमहिमाणो, जहिं मए अभिभदवण्णगन्धरसो मच्छमंसप्प-
आरबहुलो अअं पिण्डवादो समासादिदो। जाव दाणि राअविहारं
एव्व गच्छामि। (परिक्रम्य आत्मगतम्) भोः ! परमकारुणिएण
भववदा तहागएण पासादेसु वासो सुविहिअ³³सय्येसु पज्जङ्केसु
सअणं, पुव्वण्हे भोअणं, अवरण्हे सुरसाणि पाणआणि, पञ्चसुगन्धव्वो³४
वहिअं तम्बोल्लं³५ सण्हवसणपरिधाणं ति एदेहि उवदेसेहि भिक्खु-
सङ्घस्स अगुग्गहं करन्तेण किण्णु हु³⁶ इत्थि आपरिग्गहो सुरावाण-
विहाणं च ण दिट्ठं। अहव कहं सव्वञ्ञो एतं ण पेक्खदि। अवस्सं
एदेहि दुट्ठबुद्धत्थविरेहि णिरुच्छाएहि अह्माणं तरुणजणाणं मच्छरेण
पिडअपुत्थएसु इत्थिआ सुरावाण विहाणाणि पलामिट्टाणि त्ति
तक्केमि। कहिं णु हु अविणट्ठमूलपाठं समासादएअं। तदो सम्पुण्णं
बुद्धवअणं लोए पआसन्तो सङ्घोवआरं करिस्सं। [अहो उपासकस्य
धनदासश्रेष्ठिनः सर्वावासमहादानमहिमा, यस्मिन् मयाभिमतवर्ण-
गन्धरसो मत्स्यमांसप्रकारबहुलोऽयं पिण्डपातः समासादितः। यावदि-
दानीं राजविहारमेव गच्छामि। (परिक्रम्य आत्मगतम्) भोः
परमकारुणिकेन भगवता तथागतेन प्रासादेषु वासः, सुविहितशय्येषु
पर्यङ्केषु शयनं, पूर्वाह्णे भोजनं अपराह्णे सुरसानि पानकानि,
पञ्चसुगन्धोपहितं³७ताम्बूलं श्लक्ष्णवसनपरिधानमित्येतैरुपदेशै-
र्भिक्षुसङ्घस्यानुग्रहं कुर्वता किन्नु खलु स्त्रीपरिग्रहः सुरापानविधानं
च न दृष्टम् अथवा कथं सर्वज्ञ एतन्न पश्यति। अवश्यमेतैर्दुष्ट-
बुद्धस्थविरैर्निरुत्साहैरस्माकं तरुणजनानां मत्सरेण पिटकपुस्तकेषु
स्त्रीसुरापानविधानानि परामृष्टानीति तर्कयामि। कुत्र नु खल्व-
विनष्टमूलपाठं समासादयेयम्। ततः सम्पूर्ण बुद्धवचनं लोके प्रकाशयन्
सङ्घोपकारं करिष्यामि।] (परिक्रामति)
देवसोमा—भवअं ! पेक्ख पेक्ख । एसो रत्तपडो इमस्सि
विस्सत्थपुरिससम्पादे राअमग्गे सङ्कुइदसव्वङ्गो उभयपक्खसञ्चा-
रिददिट्ठी सङ्किदपदविक्खेवो तुरिअ-तुरिअं गच्छइ। [भगवन् !
३१. (गन्धमघ्राय) अहो । ३२. घ ३३. हिद—।
३४. मुगन्धो— ३५. म्वु ३६. खु। ३७. —न्धोद्बोधितं—
हिन्दी अनुवाद ३७
(दोनों घूमते हैं )
(तब पात्र हाथ में लिए शाक्यभिक्षु प्रवेश करता है)
उपासक धनदास सेठ की सभी को आवास देकर बड़ा दान देने
की महिमा कितनी अद्भुत है, जिसमें मैंने अभीष्ट रंग, गंध और स्वाद वाला
मछली और माँस के बहुत से प्रकार जिसमें है ऐसा खाना प्राप्त किया है।
तो अब (मैं) राजविहार में ही जाता हूँ। (घूमकर स्वगत) अरे ! अत्यन्त
दयालु भगवान् तथागत ने महलों में रहना, अच्छी तरह गद्दे जिसमें लगाए
गए हैं ऐसे पलँगों पर सोना, दिन के पूर्वार्द्ध में खाना, उत्तरार्द्ध में स्वादिष्ट
पेय, पाँच सुगन्धों से युक्त ताम्बूल (पान), मुलायम वस्त्र पहनना, ऐसे इन
उपदेशों से भिक्षु सङ्घ पर कृपा करते हुए स्त्री-सहवास और मदिरा पीने का
विधान क्यों नहीं देखा ? अथवा सर्वज्ञ यह नहीं देखता है, यह कैसे हो सकता
है ? निश्चय ही उन दुष्ट वृद्ध और उत्साहहीन बौद्धों ने हम युवकों के
प्रति ईर्ष्या के कारण पिटक ग्रन्थों में स्त्री-सहवास (और) मदिरा पीने के
विधान को हटा दिया होगा, ऐसा मेरा तर्क है। अब कहाँ से अविनष्ट
मूलपाठ को प्राप्त करूँ ? तब मैं सम्पूर्ण बुद्ध के उपदेश को संसार में
प्रकाशित (प्रचारित) करते हुए सङ्घ का उपकार करूँगा । (घूमता है )
देवसोमा---स्वामी ! देखो, देखो ! विश्वस्त पुरुषों के आने-जाने वाले
इस राज-मार्ग पर, लाल वस्त्र पहने हुए, सब अंगों को सिकोड़े हुए, दोनों
ओर दृष्टिपात करता हुआ, संदेहजनक ढंग से पैर रखता हुआ (चलता
हुआ) जल्दी-जल्दी जा रहा है ।
३८ मत्तविलास-प्रहसन
पश्य पश्य ! एष रक्तपटोऽस्मिन् विश्वस्तपुरुषसम्पाते३८ राजमार्गे
सङ्कुचितसर्वाङ्ग उभयपक्षसञ्चारितदृष्टिः शङ्कितपदविक्षेपस्त्व-
रितत्वरितं गच्छति ।]
कपाली—प्रिये ! एवमेतत् । अपि चास्य हस्ते चीवरान्तप्रच्छा-
दितं किमप्यस्तीव ।
देवसोमा—भअवं ! तेण हि ओलम्बिअ आसादिअ जाणीमो ।
[भगवन् ! तेन हि अवलम्ब्यासाद्य जानीवः ।]
कपाली—भवति ! तथा । (उपगम्य) भो भिक्षो ! तिष्ठ ।
शाक्यभिक्षुः—को णु खु मं एवं भणादि (निवृत्यावलोक्य च)
अइ अयं एअंतेवासी दुट्ठकवालिओ । भोदु, इमस्स सुराविब्भमस्स
लक्खं ण होमि । [को नु खलु मामेवं भणति । अयि अयमेकान्तेवासी
दुष्टकापालिकः । भवतु अस्य सुराविभ्रमस्य लक्ष्यं न भवामि ।
(सत्वरं३९गच्छति ।)
कपाली—प्रिये ! हन्त लब्धं कपालं । अस्य हि मद्दर्शनजनि-
तभयात् त्वरैव४० चौर्यसाक्षित्वं प्रतिपन्ना । (द्रुतमुपगम्याग्रतो रुणद्धि)
आः धूर्त ! क्वेदानीं गमिष्यसि ।
शाक्यभिक्षुः—कवालिआउस । मा मा एवं । किं एदं
(आत्मगतम्) अहो ललिअरूवा उवासिआ । [कापालिकोपासक ।
मा मैवम् । किमेतत् । अहो ललितरूपा उपासिका । ]
कपाली—भो भिक्षो ! दर्शय४१ तावत् । यावदेतत् ते पाणौ
चीवरान्तः४२प्रच्छादितं द्रष्टुमिच्छामि ।
शाक्यभिक्षुः—किं एत्थ पेक्खिदव्वं । भिक्खाभाअणं खु एदं ।
[किमत्र द्रष्टव्यम् । भिक्षाभाजनं खल्वेतत् ।]
३८. सञ्चारे । ३९. त्वरितो ग- । ४०. त्वरयैव ।
४१. — य भवान् । ४२. —न्तरितं द्र — ।
हिन्दी अनुवाद ३९
कपाली—प्रिये ! हाँ ऐसा ही है और इसके हाथ में चीथड़े के
भीतर छिपा हुआ और कुछ भी है ।
देवसोमा—भगवन् ! इसलिए पास जाकर पकड़कर मालूम
करते हैं ।
कपाली—प्रिये ! ठीक है । (पास जाकर) अरे भिक्षु ! ठहर ।
शाक्यभिक्षु—(मुड़कर और देखकर) मुझे इस प्रकार कौन बुला
रहा है ? अरे यह एकाग्रवासी दुष्ट कापालिक । अच्छा तो मदिरा के नशे
में चूर इसका लक्ष्य न बनूं । (जल्दी से जाता है )
कपाली—प्रिये ! अरे कपाल मिल गया । मुझे देखते ही डर
जाने के कारण इसकी शीघ्रता ही (इसकी) चोरी का प्रमाण है । (जल्दी
से पास जाकर सामने से रोकता है ) अरे धूर्त ! अब कहाँ जाता है ?
शाक्यभिक्षु—अरे उपासक कपाली ! नहीं ऐसी बात नहीं है । यह
क्या ? (मन ही मन) अहा ! सुन्दर रूप वाली सेविका ।
कपाली—अरे भिक्षु ! जरा दिखा । तेरे हाथ में वस्त्र के भीतर
छिपे हुए इस (पात्र) को जरा देखना चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—इसमें देखने योग्य क्या है ? यह तो भिक्षा पात्र है ।
४० मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—अतएव द्रष्टुमिच्छामि ।
शाक्यभिक्षुः—आ, उस ! मा मा एवं । पच्छण्णं खु एदं णेदव्वं ।
[आः, उपासक ! मा मैवम् । प्रच्छन्नं खल्वेतन्नेतव्यम् ।]
कपाली—नूनमेवमादिप्रच्छादननिमित्तं बहुचीवरधारणं
बुद्धेनोपदिष्टम् ।
शाक्यभिक्षुः—सच्चं एदं । [सत्यमेतत् ।]
कपाली—इदं तत् संवृत⁴³सत्यम् । परमार्थसत्यं श्रोतुमि-
च्छामि ।
शाक्यभिक्षुः—भोदु एत्तओ परिहासो । अविक्कमदि भिक्खा-
वेला । साहेमि अहं । [भवत्वेतावान् परिहासः । अतिक्रामति
भिक्षावेला । साधयाम्यहम् ।] (प्रतिष्ठते)
कपाली—आः, धूर्त ! क्व गमिष्यसि । दीयतां मे कपालम् ।
(चीवरान्तमालम्बते)
शाक्यभिक्षुः—णमो बुद्धअ । [नमो बुद्धाय ।]
कपाली—नमः खरपटायेति वक्तव्यं येन चोरशास्त्रं प्रणीतम् ।
अथवा खरपटादप्यस्मिन्नधिकारे बुद्ध एवाधिकः । कुतः—
वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् यो महाभारतादपि ।
विप्राणां मिषतामेव कृतवान् कोशसञ्चयम् ॥१२॥
शाक्यभिक्षुः—सन्तं पापं सन्तं पापं । [शान्तं⁴⁴ पापं शान्तं
पापम् ।]
कपाली—एवं सुवृत्तस्य तपस्विनः कथमिव पापं न शाम्यति ।
देवसोमा—भववं ! परिस्सन्तो विअ लक्खीअसि । ण एदं
सुहोवाअसुलहं कवालं । ता एदिणा गोसिङ्गेण सुरं पिबिअ
जादबलो भविअ इमिणा सह विवादं करेहि । [भगवन् ! परिश्रान्त
इव लक्ष्यसे । नैतत् सुखोपायसुलभं कपालम् । तदेतेन गोशृङ्गेण
सुरां पीत्वा जातबलो भूत्वानेन सह विवादं कुरु ।]
कपाली—तथास्तु ।
४३. —तं परमस—। ४४. शान्तं शान्तं पापम् ।
हिन्दी अनुवाद ४१
कपाली—इसीलिए (तो) देखना चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—अरे, उपासक ! नहीं ऐसी बात नहीं है । इसे छिपाकर
ही ले जाना चाहिए ।
कपाली—अवश्य ही इस प्रकार छिपाने के लिए ही बुद्ध ने बहुत
से वस्त्रों को धारण करने का उपदेश दिया है ।
शाक्यभिक्षु—यह सत्य है ।
कपाली—यह तो छिपा हुआ सत्य है । मैं वास्तविक सत्य सुनना
चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—अच्छा ! इतना हँसी-मजाक काफी है । भिक्षा का
समय व्यतीत हो रहा है । मैं जाता हूँ । (जाता है )
कपाली—अरे धूर्त ! कहाँ जाएगा ? मेरा कपाल दे । (वस्त्र का
कोना पकड़ता है )
शाक्यभिक्षु—नमो बुद्धाय ।
कपाली—फिर 'खरपट को नमस्कार' इस प्रकार कहना चाहिए, जिसने
चोरशास्त्र की रचना की । अथवा इस क्षेत्र में बुद्ध खरपट से भी बढ़कर
है । क्योंकि—
जिसने वेदान्तों से (और) महाभारत से भी विषयों को ग्रहण करके,
ब्राह्मणों के देखते ही (देखते ) कोश भर लिया ॥१२॥
शाक्यभिक्षु—पाप शान्त हो, पाप शान्त हो ।
कपाली—इस प्रकार सदाचारी तपस्वी का पाप कैसे शान्त हो ?
देवसोमा—भगवन् ! थके हुए से दिखाई दे रहे हो । यह कपाल
सरलता से मिलने वाला नहीं है । तो इस गोशृङ्ग से मदिरा पीकर शक्ति-
शाली होकर इसके साथ झगड़ा करो ।
कपाली—ठीक है ।
४२ मत्तविलास-प्रहसन
(देवसोमा कपालिने सुरां प्रयच्छति)
कपाली-(पीत्वा) प्रिये ! त्वयापि श्रमापनोदः कर्तव्यः ।
देवसोमा-भअवं ! तह । [भगवन् ! तथा ।] (पिबति)
कपाली-अयमस्माकमपकारी । संविभागप्रधानः स्व-
सिद्धान्तः ।४५ शेषमाचार्याय प्रदीयताम् ।
देवसोमा-जं भअवं आणवेदि । गह्र्,णदु भअवं । [यद्
भगवानाज्ञापयति । गृह्,णातु भगवान्४६ ।]
शाक्यभिक्षुः-(आत्मगतम्) अहो सुहोवणदो अब्भुदओ ।
एत्तओ दोसो-महाजणो पेक्खिस्सदि । (प्रकाशम्) भोदि ! मा मा
एवं । ण वड्ढेदि अम्हाणं । [अहो सुखोपनतोऽभ्युदयः । एतावान्४७
दोषः-महाजनो द्रक्ष्यति । भवति ! मा मैवम् । न वर्धतेऽस्माकम्।]
(सृक्वणी लेढि)
देवसोमा-धंस । कुदो दे एत्तिआणि भाअधेआणि ।
[ध्वंसस्व४८ । कुतस्ते एतावन्ति भागधेयानि ।]
कपाली-प्रिये ! इयमस्येच्छाविरोधिनी वाग् मुखप्रसेकेन
स्खल(य?)ति ।
शाक्यभिक्षुः-इदाणिं वि णत्थि दे करुणा । [इदानीमपि
नास्ति ते करुणा ।]
कपाली-यद्यस्ति करुणा, कथं वीतरागो भविष्यामि ।
शाक्यभिक्षुः-एवं वीदरागिणा वीदरोसेण विहोदव्वं [एवं
वीतरागिणा वीतरोषेणापि भवितव्यम् ।]
कपालो-वीतरोषो भविष्यामि, यदि मे स्वकं दास्यति ।
शाक्यभिक्षुः-किं दे सअं । [किं ते स्वकम् ।]
कपाली-कपालम् ।
शाक्यभिक्षुः-कहं कवालं । [कथं ४६कपालम् ।]
४५. -न्तः प्रमाणयितव्यः । ४६. भवान् । ४७. अत्र खलु एष दो- ।
४८. दुष्ट ! कुतस्ते एतानि भा- । ४६. कस्मिन् क- ।