मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ३९
कपाली—प्रिये ! हाँ ऐसा ही है और इसके हाथ में चीथड़े के
भीतर छिपा हुआ और कुछ भी है ।
देवसोमा—भगवन् ! इसलिए पास जाकर पकड़कर मालूम
करते हैं ।
कपाली—प्रिये ! ठीक है । (पास जाकर) अरे भिक्षु ! ठहर ।
शाक्यभिक्षु—(मुड़कर और देखकर) मुझे इस प्रकार कौन बुला
रहा है ? अरे यह एकाग्रवासी दुष्ट कापालिक । अच्छा तो मदिरा के नशे
में चूर इसका लक्ष्य न बनूं । (जल्दी से जाता है )
कपाली—प्रिये ! अरे कपाल मिल गया । मुझे देखते ही डर
जाने के कारण इसकी शीघ्रता ही (इसकी) चोरी का प्रमाण है । (जल्दी
से पास जाकर सामने से रोकता है ) अरे धूर्त ! अब कहाँ जाता है ?
शाक्यभिक्षु—अरे उपासक कपाली ! नहीं ऐसी बात नहीं है । यह
क्या ? (मन ही मन) अहा ! सुन्दर रूप वाली सेविका ।
कपाली—अरे भिक्षु ! जरा दिखा । तेरे हाथ में वस्त्र के भीतर
छिपे हुए इस (पात्र) को जरा देखना चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—इसमें देखने योग्य क्या है ? यह तो भिक्षा पात्र है ।