मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ३१
देवसोमा—स्वामी ! वैसा ही कहना चाहिए (अर्थात् आपने एकदम
ठीक कहा)। अर्हत् के अनुयायी मोक्ष मार्ग का वर्णन दूसरी तरह से
करते हैं।
कपाली—कल्याणि ! वे तो मिथ्या दृष्टि वाले हैं (इनका दर्शन
गलत है।) क्योंकि—
निस्सन्देह कार्य (अपने) कारण जैसा होता है, (इस प्रकार) हेतुवाद
के द्वारा सिद्ध करके (पुनः) सुख को दुख का कार्य बनाते हुए (ये) बेचारे
अपने ही वचन से परास्त हो गए ॥८॥
देवसोमा—पाप शान्त हो, शान्त हो ।
कपाली— पाप शान्त हो, शान्त हो। वे तो इतने पापी हैं कि निंदा
के लिए भी उनका नाम नहीं लेना चाहिए, जो ब्रह्मचर्य, बालों के उखाड़ने,
मल धारण करने, भोजन के समय के नियम .(सूर्यास्त से पहले खाना), मैले
वस्त्र धारण करने—आदि से लोगों को सताते हैं। तो अब पापियों का नाम
लेने से अपवित्र हुई जीभ को मदिरा से धोना चाहता हूँ !
देवसोमा—तो अब दूसरी मदिरा की दुकान पर चलते हैं ।
कपाली—प्यारी ! ठीक है।
( दोनों घूमते हैं )
अहा ! काञ्चीपुरी की प्रकृष्ट शोभा (जहाँ)—महलों के शिखरों पर
आराम करने वाले मेघों के गर्जन से मृदङ्ग ध्वनि का सन्देह हो रहा है, जहाँ
फूलों की दुकानों से वसन्त ऋतु का निर्माण किया जा सकता है, जहाँ की
श्रेष्ठ युवतियों की मेखलाओं की ध्वनि कामदेव की विजय घोषणा की तरह
होती है। और भी,
तत्त्ववेत्ता श्रेष्ठ मुनियों ने जिस सुख को सर्वोत्कृष्ट, अनन्त अद्वितीय
माना है, वही (सुख) पूरा यहाँ दिखाई दे रहा है, लेकिन आश्चर्य (की बात)
है कि यहाँ यह (सुख) इन्द्रियों के द्वारा भोग करने योग्य है और काम भोग
रूपी है ॥६॥
देवसोमा—स्वामी ! मदिरा देवी की तरह काञ्ची भी दोष रहित है।