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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

हिन्दी अनुवाद ४१
कपाली—इसीलिए (तो) देखना चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—अरे, उपासक ! नहीं ऐसी बात नहीं है । इसे छिपाकर
ही ले जाना चाहिए ।
कपाली—अवश्य ही इस प्रकार छिपाने के लिए ही बुद्ध ने बहुत
से वस्त्रों को धारण करने का उपदेश दिया है ।
शाक्यभिक्षु—यह सत्य है ।
कपाली—यह तो छिपा हुआ सत्य है । मैं वास्तविक सत्य सुनना
चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—अच्छा ! इतना हँसी-मजाक काफी है । भिक्षा का
समय व्यतीत हो रहा है । मैं जाता हूँ । (जाता है )
कपाली—अरे धूर्त ! कहाँ जाएगा ? मेरा कपाल दे । (वस्त्र का
कोना पकड़ता है )
शाक्यभिक्षु—नमो बुद्धाय ।
कपाली—फिर 'खरपट को नमस्कार' इस प्रकार कहना चाहिए, जिसने
चोरशास्त्र की रचना की । अथवा इस क्षेत्र में बुद्ध खरपट से भी बढ़कर
है । क्योंकि—
जिसने वेदान्तों से (और) महाभारत से भी विषयों को ग्रहण करके,
ब्राह्मणों के देखते ही (देखते ) कोश भर लिया ॥१२॥
शाक्यभिक्षु—पाप शान्त हो, पाप शान्त हो ।
कपाली—इस प्रकार सदाचारी तपस्वी का पाप कैसे शान्त हो ?
देवसोमा—भगवन् ! थके हुए से दिखाई दे रहे हो । यह कपाल
सरलता से मिलने वाला नहीं है । तो इस गोशृङ्ग से मदिरा पीकर शक्ति-
शाली होकर इसके साथ झगड़ा करो ।
कपाली—ठीक है ।