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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

हिन्दी अनुवाद २७
श्रेष्ठ गुणों वाले, सूक्तिरूपी रत्नों वाली जिस समुद्र में सज्जनों की
अल्प मूल्य वाली सूक्तियाँ भी बहुत मूल्य को प्राप्त करती हैं (अर्थात् बहुमूल्य
हो जाती हैं) ॥४॥
नटी—आर्य ! अब देर क्यों कर रहे हैं ? अपूर्व होने के कारण
इसका प्रदर्शन शीघ्र ही करना चाहिए ।
सूत्रधार—मैं तो—
सङ्गीत ही है धन जिसका ऐसा (मैं) कवि इस समय कवि के गुणों
को कहने से नीचता को प्राप्त हो गया हूँ ।
(नेपथ्य में)
प्यारी ! देवसोमा ।
जवान स्त्री के सहचर, कपाल ही जिसकी सम्पत्ति है, (ऐसे) मदिरा
के कारण (नीचे गिरते हुए) इस कपाली के समान (मैं भी नीचता को प्राप्त
हो गया हूँ ।) ॥५॥
(दोनों निकल जाते हैं ।)
॥ स्थापना ॥
(तब सहचरी सहित कपाली प्रवेश करता)
कपाली—(मस्ती का अभिनय करके) प्यारी ! देवसोमा ये तो
सच ही है कि तप से इच्छानुसार रूप मिलता है, क्योंकि तुमने परम व्रत
का विधिपूर्वक पालन करने के कारण ही क्षण भर में नया ही सौन्दर्य प्राप्त
कर लिया है। क्योंकि—
(तुम्हारे) मुख पर स्वेद बिन्दु फूट निकले हैं, लतासदृश भौंहों में
विलास है, क्रीड़ायुक्त गति है; (तुम) बिना किसी कारण हँस रही हो,
(तुम्हारी) बोली अस्पष्ट वर्णों वाली है, दोनों नेत्र लालिमा से भरे हैं,
(आँखों की) पुतलियाँ चञ्चल हैं, (दृष्टि) अलसाई और तिरछी है, माला
की गाँठ ढीली पड़ गई है, (और) केश कंधों तक लटक गए हैं ॥६॥
देवसोमा—भगवन् (मैं) नशे में हूँ, नशे में हूँ, (आप) ऐसा कह
रहे हैं ?
कपाली—आपने क्या कहा ?
देवसोमा—कुछ नहीं कह रही हूँ ।
कपाली—(तो) क्या मैं ही नशे में हूँ ?