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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 45

हिन्दी अनुवाद : ३३
कपाली—प्रिये ! देखो, देखो । यह मदिरा की दुकान यज्ञ-स्थल के
वैभव का अनुकरण करती है। क्योंकि यहाँ ध्वजा का स्तम्भ यज्ञस्तम्भ है,
मदिरा सोमरस है, मदिराविक्रेता पुरोहित हैं, (मदिरा के) प्याले पात्र हैं, शूली
पर पका माँस आदि उपदंश हवन पदार्थ हैं; शरावियों की बोलियाँ यजुर्वेद
(के मन्त्र) हैं, गाने सामवेद (के गान) हैं; चमड़े का वर्तन यज्ञ का चमचा,
प्यास अग्नि और दुकानदार यजमान है ।
देवसोमा—हम दोनों की भिक्षा भी रुद्र का भाग बन जाएगी ।
कपाली—अहा ! ये बजते हुए तबले की ध्वनि का अनुसरण करने
वाले, तरह-तरह के अङ्गों के विक्षेप वाले, शब्द (व) तिरछी भौंहों वाले,
एक हाथ में उत्तरीय को पकड़ने वाले, गिरते हुए वस्त्र को सम्भालने के
समय लयभङ्ग होने वाले, लड़खड़ाते हुए कण्ठ स्वर वाले शरावियों के
नृत्त देखने योग्य हैं ।
देवसोमा —आचार्य तो बड़े रसिक हैं ।
कपाली—प्यालों में भरी हुई यह मदिरा देवी मानों शृङ्गार की
चुनौती है, प्रेम में कुपित जनों (को मनाने) की विनती है, यौवन की
वीरता है (और) विलासियों का प्राण है । बहुत कहने से क्या—
शिव के तृतीय नेत्र की अग्नि से कामदेव की मूर्ति भस्म बन गयी
(यह लोग) झूठ कहते हैं । प्रिये ! (वास्तव में) अत्यधिक गर्मी के कारण
गलकर (मदिरा के रूप में) द्रव बनकर वही यह मनों को तुरन्त मस्त बना
देती है ॥१०॥
देवसोमा—स्वामी ! यह ठीक है । संसार के उपकार में लगे हुए
संसार के स्वामी (शिव) संसार का विनाश नहीं करते ।
(दोनों गाल बजाते हैं ।)
कपाली—देवी ! भिक्षा दो ।
(नेपथ्य में)
भगवान् ! यह भिक्षा है। आप लीजिए ।