मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ३७
(दोनों घूमते हैं )
(तब पात्र हाथ में लिए शाक्यभिक्षु प्रवेश करता है)
उपासक धनदास सेठ की सभी को आवास देकर बड़ा दान देने
की महिमा कितनी अद्भुत है, जिसमें मैंने अभीष्ट रंग, गंध और स्वाद वाला
मछली और माँस के बहुत से प्रकार जिसमें है ऐसा खाना प्राप्त किया है।
तो अब (मैं) राजविहार में ही जाता हूँ। (घूमकर स्वगत) अरे ! अत्यन्त
दयालु भगवान् तथागत ने महलों में रहना, अच्छी तरह गद्दे जिसमें लगाए
गए हैं ऐसे पलँगों पर सोना, दिन के पूर्वार्द्ध में खाना, उत्तरार्द्ध में स्वादिष्ट
पेय, पाँच सुगन्धों से युक्त ताम्बूल (पान), मुलायम वस्त्र पहनना, ऐसे इन
उपदेशों से भिक्षु सङ्घ पर कृपा करते हुए स्त्री-सहवास और मदिरा पीने का
विधान क्यों नहीं देखा ? अथवा सर्वज्ञ यह नहीं देखता है, यह कैसे हो सकता
है ? निश्चय ही उन दुष्ट वृद्ध और उत्साहहीन बौद्धों ने हम युवकों के
प्रति ईर्ष्या के कारण पिटक ग्रन्थों में स्त्री-सहवास (और) मदिरा पीने के
विधान को हटा दिया होगा, ऐसा मेरा तर्क है। अब कहाँ से अविनष्ट
मूलपाठ को प्राप्त करूँ ? तब मैं सम्पूर्ण बुद्ध के उपदेश को संसार में
प्रकाशित (प्रचारित) करते हुए सङ्घ का उपकार करूँगा । (घूमता है )
देवसोमा---स्वामी ! देखो, देखो ! विश्वस्त पुरुषों के आने-जाने वाले
इस राज-मार्ग पर, लाल वस्त्र पहने हुए, सब अंगों को सिकोड़े हुए, दोनों
ओर दृष्टिपात करता हुआ, संदेहजनक ढंग से पैर रखता हुआ (चलता
हुआ) जल्दी-जल्दी जा रहा है ।