मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ३५
कपाली—मैं लेता हूँ। प्रिये ! मेरा कपाल कहाँ है ?
देवसोमा—मुझे भी नहीं दिखाई दे रहा है।
कपाली—(सोचकर) शायद उसी (पहली) मदिरा की दुकान पर
भूल आये हैं। अच्छा तो लौटकर देखेंगे।
देवसोमा -- स्वामी ! आदरपूर्वक लाई गई भिक्षा को स्वीकार न
करना यह तो अधर्म है। अब क्या करें ?
कपाली—आपद्धर्म को प्रमाण मानकर गोसींग से ले लो।
देवसोमा - अच्छा स्वामी। (लेती है)
(दोनों घूमकर देखते हैं )
कपाली—अरे यहाँ भी दिखाई नहीं देता।
(दुःख का अभिनय करके )
अरे-अरे माहेश्वरो ! माहेश्वरो ! यहाँ आप लोगों ने क्या हमारा भिक्षा
का पात्र देखा है ? आपने क्या कहा-हमने नहीं देखा। हाय (मैं) मारा गया।
मेरा तप भ्रष्ट हो गया। अब मैं कपाली कैसे होऊँगा (कहलाऊँगा)। ओह !
दुःख है—
जिस पवित्र (कपाल) के द्वारा (मदिरा) पीने, खाने (और) सोने में
मेरा अत्यन्त उपकार किया गया, आज सच्चे मित्र के (विरह के) समान
उसका वियोग मुझे पीड़ित कर रहा है ॥११॥
(गिरकर सिर पीटने का अभिनय करके)
अच्छा ! (वह कपाल तो) लक्षण मात्र था। कपाली की संज्ञा से
मुक्त नहीं हुआ हूँ। (उठता है )
देवसोमा—भगवन् ! कपाल (भला) किसने लिया होगा ?
कपाली—प्रिये ! मुझे ऐसा लगता है कि शूल्यमांस से युक्त होने के
कारण किसी कुत्ते अथवा शाक्यभिक्षु ने (लिया होगा ) ।
देवसोमा—तो फिर (उसे) ढूंढ़ने के लिए समस्त काञ्चीपुरी में
घूमते हैं।
कपाली—प्रिये ! ठीक है।