Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

Page 455Permalink

प्र० ८१ : अ० ६ ] सन्दिग्ध परीक्षा ३७१

जातकिणसंरब्धहस्तपादं पांसुपूर्णकेशनखं विलूनभुग्नकेशनखं वा सम्यक्स्ना-
तानुलिप्तं तैलप्रमृष्टगात्रं सद्योधौतहस्तपादं वा पांसुपिच्छिलेषु तुल्यपाद-
पदनिक्षेपं प्रवेशनिष्कसनयोर्वा तुल्यमाल्यमद्यगन्धवस्त्रच्छेदविलेपनस्वेदं
परीक्षेत । चोरं पारदारिकं वा विद्यात् ।
(१) सगोपस्थानिको बाह्यं प्रदेष्टा चोरमार्गणम् ।
कुर्यान्नागरिकश्चान्तर्दुर्गे निर्दिष्टहेतुभिः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे शंकारूपकर्माभिग्रहो नाम
षष्ठोऽध्यायः, आदितो द्व्यशीतितमः ।

—: ० :—


हों, जिसके हाथ-पैरों में ठेक पड़ी हो, जिसके बाल तथा नाखून बढ़े हुए हों, स्नान करके जिसने चन्दन का या सुगन्धित तेल का शरीर पर लेप कर दिया हो, मालिश करके जिसने तत्काल ही हाथ-पैर धो दिए हों, धूल या कीचड़ में जिसके पैरों के निशान मिल जायें, जिस पर चोरी गये माल की जैसी गन्ध आती हो, जिसके कपड़े फटे हों, चन्दन लगाने से भी जिस पर पसीना चू रहा हो, इस तरह के पुरुषों से पूछ लेने के बाद ही चोर या व्यभिचारी का पता लगाया जाय ।

( १ ) यदि चोर बाहरी हों तो गोप और स्थानिक की सहायता से प्रदेष्टा उनका पता लगाये । नागरिक भी अपने तरीकों से चोर का पता लगायें ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में शंकारूपकर्माभिग्रह नामक छठा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

Page 456Permalink
प्रकरण ८२## आशुमृतकपरीक्षा
अध्याय ७

(१) तैलाभ्यक्तमाशुमृतकं परीक्षेत ।
(२) निष्कीर्णमूत्रपुरीषं वातपूर्णकोष्ठत्वक्कं शूनपादपाणिमुन्मीलिताक्षं सव्यञ्जनकण्ठं पीडननिरुद्धोच्छ्वासहतं विद्यात् ।
(३) तमेव संकुचितबाहुसक्थिमुद्वन्धहतं विद्यात् ।
(४) शूनपाणिपादोदरमपगताक्षमुद्वृत्तनाभिमवरोपितं विद्यात् ।
(५) निस्तब्धगुदाक्षं सन्दष्टजिह्वमाध्मातोदरमुदकहतं विद्यात् ।
(६) शोणितानुसिक्तं भग्नभिन्नगात्रं काष्ठै रश्मिभिर्वा हतं विद्यात् ।
(७) सम्भग्नस्फुटितगात्रमवक्षिप्तं विद्यात् ।
(८) श्यावपाणिपाददन्तनखं शिथिलमांसरोमचर्माणं फेनोपदिग्धमुखं विषहतं विद्यात् ।


आशुमृतक की परीक्षा

( १ ) आशुमृतक ( बिना किसी बीमारी या घाव के अचानक ही जिसकी मृत्यु हो जाय ) को तेल में डालकर उसकी परीक्षा की जाय ।

( २ ) जिसका पेशाव तथा पाखाना निकल गया हो, पेट या खाल में हवा भर गई हो, हाथ-पैर सूज गये हों, आँखें खुली हों और गले में निशान पड़ गए हों, तो समझना चाहिए कि उसको गला घोंट कर मारा गया है ।

( ३ ) यदि उसकी बाँहें और टाँगें सिकुड़ी हुई हों तो समझना चाहिए कि उसको फाँसी पर लटका कर मारा गया है ।

( ४ ) यदि उसके हाथ, पैर, पेट फूल गये हों, आँखें धँस गई हों और नाभि ऊपर उठ आई हो तो समझना चाहिए कि उसको शूली पर चढ़ा कर मारा गया है ।

( ५ ) यदि उसकी आँखें तथा गुदा बाहर निकले हों, जीभ कट गई हो, पेट फूल गया हो तो समझना चाहिए कि उसको पानी में डुबा कर मारा गया है ।

( ६ ) जो खून से लथपथ हो, जिसका शरीर जगह-जगह टूट गया हो तो समझना चाहिए कि उसको लाठियों या कोड़ों से मारा गया है ।

( ७ ) जिसका शरीर जगह-जगह फट गया हो उसको समझना चाहिए कि मकान से गिरा कर मारा गया है ।

( ८ ) जिसके हाथ, पैर, नाखून काले पड़ गये हों, मांस, रोयें तथा खाल ढीले

Page 457Permalink

प्र० ८२ : अ० ७ ] आशुमृतक की परीक्षा ३७३

(१) तमेव सशोणितदंशं सर्पकीटहतं विद्यात् ।
(२) विक्षिप्तवस्त्रगात्रमतिवान्तिविरिक्तं मदनयोगहतं विद्यात् ।
(३) अतोऽन्यतमेन कारणेन हतं हत्वा वा दण्डभयादुद्वन्धनिकृत्तकण्ठं विद्यात् ।
(४) विषहतस्य भोजनशेषं पयोभिः परीक्षेत । हृदयादुद्धृत्याग्नौ प्रक्षिप्तं चिटचिटायदिन्द्रधनुर्वर्णं वा विषयुक्तं विद्यात् । दग्धस्य हृदयमदग्धं दृष्ट्वा वा ।
(५) तस्य परिचारकजनं वा वाग्दण्डपारुष्यातिलब्धं मार्गेत । दुःखोपहतमन्यप्रसक्तं वा स्त्रीजनं, दायनिवृत्तिस्त्रीजनाभिमन्तारं वा बन्धुम् । तदेव हतोद्वद्धस्य च परीक्षेत ।


पड़ गये हों और मुख से झाग निकलता हो तो समझना चाहिए कि उसको जहर देकर मारा गया है ।

( १ ) यदि यही हालत हो और किसी कटे हुए स्थान से खून निकल रहा हो तो समझना चाहिए कि उसे साँप से या किसी जहरीले कीड़े से कटवा कर मारा गया है ।

( २ ) जिसका शरीर एवं जिसके वस्त्र अस्तव्यस्त हों और जिसको कै दस्त हुए हों तो समझना चाहिए कि उसे धतुरा या ऐसी ही उन्मादक वस्तुओं को खिला-कर मारा गया है ।

( ३ ) इन उक्त कारणों में से किसी एक कारण से मरे हुए व्यक्ति की परीक्षा की जाय अथवा कोई व्यक्ति किसी हत्या या फाँसी के भय से स्वयं ही फांसी लगाकर या आत्महत्या करके मर सकता है, इसकी भी परीक्षा की जाय ।

( ४ ) विष से मरे हुए व्यक्ति के पेट से अन्न निकाल कर उसकी रासायनिक क्रिया से परीक्षा की जाय । यदि पेट में अन्न न हो तो उसके हृदय का एक अंश काट कर आग में छोड़ा जाय, यदि उसमें 'चिट-चिट' की आवाज निकले या इन्द्र धनुष के समान लाल-पीला धुआँ निकले तो उसे विष द्वारा मारा गया समझना चाहिए । अथवा जलाये हुए व्यक्ति के अधजले, हृदय को देख कर परीक्षा करनी चाहिए ।

( ५ ) अथवा मृतक व्यक्ति के उन नौकर-चाकरों से विष देने वाले का पता लगाया जाय, जिन्हें वाक्पारुष्य और दण्डपारुष्य से तङ्ग किया गया हो । दुःखित तथा परपुरुष गामिनी स्त्री से, मृतक की सम्पत्ति का उत्तराधिकार पाने वाले व्यक्तियों से, और जो व्यक्ति मृतक की विधवा स्त्री को अपनी स्त्री बनाने की इच्छा रखते हों, उनसे मृतक व्यक्ति के सम्बन्ध में पूछ-ताछ की जाये । इसी प्रकार किसी की हत्या करने के बाद आत्महत्या कर देने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी पूछ-ताछ की जाय ।

३७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

Page 458Permalink

३७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) स्वयमुद्बद्धस्य वा विप्रकारमयुक्तं मार्गेत ।

(२) सर्वेषां वा स्त्रीदायाद्यदोषः कर्मस्पर्धा प्रतिपक्षद्वेषः पण्यसंस्थासमवायो वा विवादपदानामन्यतमं वा रोषस्थानम् । रोषनिमित्तो घातः ।

(३) स्वयमादिष्टपुरुषैर्वा चोरैरर्थनिमित्तं सादृश्यादन्यवैरिभिर्वा हतस्य घातमासन्नेभ्यः परीक्षेत । येनाहूतः सहस्थितः प्रस्थितो हतभूमिमानीतो वा तमनुयुञ्जीत । ये चास्य हतभूमावासन्नचरास्तानेकैकशः पृच्छेत्—केनायमिहानीतो हतो वा, कः सशस्त्रः सङ्गूहमान उद्विग्नो वा युष्माभिर्दृष्ट इति । ते यथा ब्रूयुस्तथानुयुञ्जीत ।

(४) अनाथस्य शरीरस्थमुपभोगं परिच्छदम् ।
वस्त्रं वेषं विभूषां वा दृष्ट्वा तद्व्यवहारिणः ॥
अनुयुञ्जीत संयोगं निवासं वासकारणम् ।
कर्म च व्यवहारं च ततो मार्गणमाचरेत् ॥


(१) स्वयं ही फाँसी लगाकर आत्महत्या कर देने वाले व्यक्ति के कष्टों और आत्महत्या के कारणों का पता लगाया जाय ।

(२) सामान्यतया हत्या और आत्महत्या का कारण क्रोध है, और क्रोध के भी स्त्री, दायभाग, राजकुलों में हुकूमत के लिए संघर्ष, शत्रुता, व्यापार में पारस्परिक हानि की इच्छा और संघ सम्बन्धी विवाद, आदि अनेक कारण हैं । क्रोध के बढ़ जाने पर ही हत्याएँ और आत्महत्याएँ होती हैं ।

(३) जिसने आत्मघात किया हो या जिसको नौकरों से मरवाया गया हो, या जिसको लुटेरों ने धन के लोभ से मारा हो, या किसी व्यक्ति ने रूप-रङ्ग की एकता जानकर अपना शत्रु होने के धोखे में मारा हो, इस प्रकार की हत्याओं के सम्बन्ध में मृतक के पड़ोसियों से पूछ-ताछ की जाय । जिसने उसको बुलाया हो और जो मृत्यु-स्थान पर इधर-उधर घूमते हों, उन सबसे भी पूछताछ की जाय । उनमें से एक-एक को पूछा जाय 'इस व्यक्ति को यहाँ कौन लाया है ? किसने इसको मारा है ? तुम लोगों ने किसी हथियार बन्द आदमी को लुक-छिप कर, भयभीत, इधर-उधर जाते-आते हुए तो नहीं देखा है ?' इस पर वे जैसा कहें तदनुसार मामले को आगे बढ़ाया जाय ।

(४) मृतक के कपड़े, छाता, जूता, माला, वेश (गृहस्थ या सन्यासी) और आभूषण आदि को भली-भाँति देखकर उन वस्तुओं के व्यापारियों से यह पता लगाया जाय कि 'उस व्यक्ति का मेल-जोल किस-किस से था, किसके साथ वह कारोबार करता था, उसका बर्ताव-व्यवहार कैसा था इत्यादि, इन सब बातों का ठीक-ठीक पता लग जाने के बाद हत्यारे की खोज की जाय ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में आशुमृतकपरीक्षा नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।

Page 459Permalink

प्र० ८२ : अ० ७ ] आशुमृतक की परीक्षा ३७५

( १ ) रज्जुशस्त्रविषैर्वापि कामक्रोधवशेन यः ।
घातयेत्स्वयमात्मानं स्त्री वा पापेन मोहिता ॥
रज्जुना राजमार्गे तां चण्डालेनापकर्षयेत् ।
न श्मशानविधिस्तेषां न सम्बन्धक्रियास्तथा ॥
( २ ) बन्धुस्तेषां तु यः कुर्यात्प्रेतकार्यक्रियाविधिम् ।
तद्गतिं स चरेत्पश्चात्स्वजनाद्वा प्रमुच्यते ॥
( ३ ) संवत्सरेण पतति पतितेन समाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनात्तैश्चान्योऽपि समाचरन् ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे आशुमृतकपरीक्षा नाम सप्तमोऽध्यायः, आदितस्त्र्यशीतितमः ।

— : ० : —


( १ ) जो व्यक्ति काम या क्रोध के वशीभूत होकर, फांसी लगाकर या अस्त्र द्वारा आत्महत्या करे और इसी प्रकार जो स्त्री दुराचार के कारण आत्महत्या करे, चाण्डाल उनकी लाशें रस्सी से बाँधकर बाजार में घसीटता हुआ ले जाय । ऐसे व्यक्तियों के लिए दाहादि संस्कार एवं तिलांजलि आदि संस्कार वर्जित हैं ।

( २ ) ऐसे व्यक्तियों का जो कोई भी भाई-बन्धु उनका दाहादि संस्कार करता हैं, मरने के बाद उसको भी वही गति प्राप्त होती है और जीवितावस्था में उसे जातिच्युत कर दिया जाता है ।

( ३ ) पतित पुरुषों के साथ जो भी व्यक्ति भजन, अध्यापन और विवाह आदि करता है वह भी एक वर्ष के भीतर पतित हो जाता है, और फिर उसके साथ व्यवहार करने वाले लोग भी एक वर्ष में पतित हो जाते हैं ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में आशुमृतकपरीक्षा नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

Page 460Permalink

प्रकरण ८३ | वाक्यकर्मानुयोगः
अध्याय ८ |


(१) मुषितसन्निधौ बाह्यानामाभ्यन्तराणां च साक्षिणमभिशस्तस्य देशजातिगोत्रनामकर्मसारसहायनिवासाननुयुञ्जीत । तांश्चापदेशैः प्रति-समानयेत् । ततः पूर्वस्याह्नः प्रचारं रात्रौ निवासं च आग्रहणादिति अनुयु-ञ्जीत । तस्यापचारप्रतिसन्धाने शुद्धः स्यात् । अन्यथा कर्मप्राप्तः ।

(२) त्रिरात्रादूर्ध्वमग्राह्यः शङ्कितकः पृच्छाभावादन्यत्रोपकरण-दर्शनात् ।

(३) अचोरं 'चोर' इत्यभिव्याहरतश्चोरसमो दण्डः, चोरं प्रच्छाद-यतश्च ।

(४) चोरेणाभिशस्तो वैरद्वेषाभ्यामपदिष्टकः शुद्धः स्यात् । शुद्धं परिवासयतः पूर्वः साहसदण्डः ।


जाँच और यातना के द्वारा चोरी को अंगीकार कराना

( १ ) जिसकी चोरी हुई हो उसके सामने और बाहर-भीतर के दूसरे लोगों के सामने गवाह से, चोरी के सन्देह में गिरफ्तार हुए व्यक्तियों का देश, जाति, गोत्र, नाम, काम, सम्पति, मित्र और निवासस्थान के सम्बन्ध में पूछा जाय । तदनन्तर जिरह ( उपदेश ) में उसके बयानों की आलोचना की जाय । गवाह के बयानों की आलोचना हो जाने के बाद गिरफ्तार हुए व्यक्तियों से उनका पिछला कार्य, रात का निवास और जिस समय वह पकड़ा गया है उस समय तक के सब कार्यों के सम्बन्ध में पूछ-ताछ की जाय । यदि वह निर्दोष साबित हो जाय तो उसको बरी कर दिया जाय, अन्यथा उसको सजा दी जाय ।

( २ ) चोरी के तीन दिन बाद सन्दिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार न किया जाय, क्योंकि इतने दिन बीत जाने के कारण उससे सही बातें मालूम नहीं हो सकती है । किन्तु किसी के पास यदि चोरी के सबूत मिल जाँय तो उसे तीन दिन के बाद भी गिरफ्तार किया जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति साधु पुरुष को ( चोर ) बताये उसे चोरी का दण्ड दिया जाय और यही दण्ड उसे भी दिया जाय जो चोर को छिपाने का यत्न करे ।

( ४ ) यदि चोर व्यक्ति दुश्मनी के कारण किसी सज्जन पुरुष को पकड़वाये और यह बात सिद्ध हो जाय तो उसे अपराधी न समझा जाय । जो अधिकारी ( प्रदेष्टा ) निरपराध को दण्ड दे उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

Page 461Permalink

प्र० ८३ : अ० ८ ] जाँच और यातनाविधि ३७७

(१) शङ्कानिष्पन्नमुपकरणमन्त्रिसहायरूपवैय्यापृत्यकरान् निष्पादयेत् । कर्मणश्च प्रवेशद्रव्यादानांशविभागैः प्रतिसमानयेत् ।
(२) एतेषां कारणानामनभिसन्धाने विप्रलपन्तमचोरं विद्यात् । दृश्यते ह्यचोरोऽपि चोरमार्गे यदृच्छया सन्निपाते चोरवेषशस्त्रभाण्डसामान्येन गृह्यमाणो दृष्टश्चोरभाण्डस्योपवासेन वा यथा हि माण्डव्यः कर्मक्लेशभयादचोरः 'चोरोऽस्मि' इति ब्रुवाणः । तस्मात्समाप्तकरणं नियमयेत् ।
(३) मन्दापराधं बालं वृद्धं व्याधितं मत्तमुन्मत्तं क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तमत्याशितमामकाशितं दुर्बलं वा न कर्म कारयेत् ।
(४) तुल्यशीलपुंश्चलीप्रावादिककथावकाशभोजनदातृभिरसर्पयेत् । एवमतिसन्दध्यात् । यथा वा निक्षेपापहारे व्याख्यातम् ।
(५) आप्तदोषं कर्म कारयेत् । न त्वेव स्त्रियं गर्भिणीं सूतिकां वा मासावरप्रजाताम् । स्त्रियास्त्वर्धकर्म । वाक्यानुयोगो वा ।


( १ ) संदेह में गिरफ्तार हुए व्यक्ति से चोरी करने के उपाय, उसके सलाहकार सहायक वस्तुएँ, चोरी का माल और उसकी मजदूरी के संबंध में विस्तार से पूछताछ की जाय । उससे यह भी पूछा जाय कि चोरी करते समय मकान के भीतर कौन-कौन गया था, क्या-क्या माल हाथ लगा और किस-किस को कितना-कितना हिस्सा मिला ?

( २ ) जो व्यक्ति चोरी सिद्ध करने वाले उक्त प्रश्नों के सम्बन्ध में तो कुछ न कहे; बल्कि डर के मारे अंट-संट बके तो, उसको चोर न समझा जाय । क्योंकि व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि चोर न होते हुए भी, चोरों के रास्ते से जाता हुआ, चोर के समान शक्ल, हथियार और माल लिए हुए राहगीर को भी चोर समझ कर गिरफ्तार कर लिया जाता है; इसी प्रकार चोरी के माल के पास खड़ा निर्दोष व्यक्ति भी गिरफ्तार होते लोक में देखा गया है । उदाहरण के लिए माण्डव्य चोर न होते हुए भी मार के भय से 'मैं चोर हूँ' यह कहते हुए पकड़ा गया था । इसलिए इस प्रकार के मामलों में खूब सोच-विचार करके ही अपराधी को दण्ड देना चाहिए ।

( ३ ) छोटे अपराधी, बालक, बूढ़ा, बीमार, पागल, उन्मादी, भूखा, प्यासा, थका, अति भोजन किये, अजीर्णरोगी और निर्बल आदि व्यक्तियों को कोड़े आदि मारकर शारीरिक दण्ड न दिया जाय ।

( ४ ) समान स्वभाव वाली वेश्याओं, दूतियों, कथकों, सरायों और होटलों आदि के द्वारा छिपे तौर पर बुरा कर्म करने वाले व्यक्तियों का पता लगाया जाय । पहले कही गई युक्तियों से उन्हें धोखा दिया जाय; अथवा निक्षेप चुराने के संबन्ध में जो उपाय बताये गये हैं उन्हीं को काम में लाया जाय ।

( ५ ) जिसका अपराध साबित हो उसी को दण्ड दिया जाय; किन्तु गर्भिणी और

Page 462Permalink

३७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) ब्राह्मणस्य सत्रिपरिग्रहः श्रुतवतस्तपस्विनश्च । तस्यातिक्रम उत्तमो दण्डः । कर्तुः कारयितुश्च कर्मणा व्यापादनेन च ।
(२) व्यावहारिकं कर्मचतुष्कम्–षड् दण्डाः, सप्त कशाः, द्वावुपरि निबन्धौ, उदकनालिका च ।
(३) परं पापकर्मणां नववेत्रलताद्वादशकं, द्वावूरुवेष्टौ, विंशतिर्नक्तमाललताः, द्वात्रिंशत्तलाः, द्वौ वृश्चिकबन्धौ, उल्लम्बने च द्वे, सूचीहस्तस्य, यवागूपीतस्याप्रस्रावः, एकपर्वदहनमंगुल्याः, स्नेहपीतस्य प्रतापनमेकमहः, शिशिररात्रौ बलबजाग्रशय्या चेत्यष्टादशकं कर्म ।
(४) तस्योपकरणं प्रमाणं प्रहरणं प्रधारणमवधारणं च खरपट्टादागमयेत् ।
(५) दिवसान्तरमेकैकं कर्म कारयेत् ।


और एक महीने से कम प्रसूता स्त्री को हर्गिज दण्ड न दिया जाय । पूर्वोक्त अपराधों में जो दण्ड पुरुषों के लिए कहे गए हैं उनका आधा दण्ड स्त्रियों को दिया जाय; अथवा उनको केवल वाग्दण्ड ( वाणी से ताडना ) ही दिया जाय ।

( १ ) ब्राह्मण, वेदज्ञ और तपस्वी को इतना मात्र दण्ड दिया जाय कि सिपाही उनको इधर-उधर दौड़ा-फिरा दे । जो लोग इन नियमों का उल्लङ्घन करें या कराये तथा अपराधी से काम करायें या उसको मारें, उनको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।

( २ ) लोक व्यवहार में चार प्रकार के दंड प्रसिद्ध है: १. छह डंडे मारना, २. सात कोड़े मारना, ३. हाथ-पैर बाँधकर उलटा लटका देना और ४. नाक में नमक का पानी डालना ।

( ३ ) इनके अतिरिक्त पापाचारी पुरुषों के लिए इतने दण्ड और हैं : नौ हाथ-लम्बी बेंत से बारह बेंत लगाना; दोनों टांगों को बाँधकर करञ्ज की छड़ी से बीस छड़ी मारना; बत्तीस थप्पड़ मारना; बायें हाथ को पीछे बायें पैर से और दायें हाथ को पीछे दायें पैर से बाँधना; दोनों हाथ आपस में बाँधकर लटका देना; हाथ के नाखून में सूई चुभाना; लस्सी पिलाकर पेशाब न करने देना; अंगुली की एक पोर जला देना; घी पिलाकर पूरे दिन अग्नि या धूप में बैठाना; जाड़ों की रात में भीगी हुई खाट पर सुलाना; इस प्रकार कुल मिलाकर ये अठारह प्रकार के ( ४ + १४ ) दण्ड हुए ।

( ४ ) इस प्रकार के दण्डकर्म के लिए रस्सी, डंडे, कोड़े आदि की लम्बाई, दण्डनीय व्यक्ति को खड़ा आदि करने का तरीका और शरीर आदि के अनुकूल दण्ड-व्यवस्था आदि के संबंध में आचार्य खरपट्ट के दण्डशास्त्र-विषयक ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिए ।

( ५ ) कठिन शारीरिक श्रम के कार्यों को एक-एक दिन का अन्तर देकर कराया जाय ।

Page 463Permalink

प्र० ८३ : अ० ८ ] जांच और यातनाविधि ३७९

(१) पूर्वकृतापदानं, प्रतिज्ञायापहरन्तम्, एकदेशदृष्टद्रव्यम्, कर्मणा रूपेण वा गृहीतम्, राजकोशमस्तृणन्तम्, कर्मवध्यं वा राजवचनात्समस्तं व्यस्तमभ्यस्तं वा कर्म कारयेत् ।

(२) सर्वापराधेष्वपीडनीयो ब्राह्मणः । तस्याभिशस्ताङ्को ललाटे स्याद्व्यवहारपतनाय । स्तेये श्वा, मनुष्यवधे कबन्धः, गुरुतल्पे भगम्, सुरापाने मद्यध्वजः ।

(३) ब्राह्मणं पापकर्मणमुद्घुष्याङ्ककृतव्रणम् ।
कुर्यान्निर्विषयं राजा वासयेदाकरेषु वा ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे वाक्यकर्मानुयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः, आदितश्चतुरशीतितमः ।

---: ० :---

( १ ) जो लोग सूचना देकर चोरी करें, प्रण करें, किसी की वस्तु को छीनें, चोरी हुई वस्तु के टुकड़े-टुकड़े करके उसे काम में लाये, चोरी करते या माल ले जाते पकड़े जांय, खजाना उड़ा कर ले जांय और जो हत्या आदि महाअपराध करें, उन सबको राजा के आज्ञानुसार एक साथ, अलग-अलग या बारी-बारी आजीवन कठिन श्रम का दण्ड दिया जाय ।

( २ ) ब्राह्मण को किसी अपराध में मृत्युदण्ड या ताडनदण्ड न दिया जाय, बल्कि जैसे-जैसे वह अपराध करे वैसे-वैसे निशान उसके मस्तक पर दाग दिए जांय, जिससे कि वह पतितों की कोटि में रखा जा सके । चोरी करे तो कुत्ते का निशान, मनुष्यों की हत्या करे तो मनुष्य के धड़ का निशान; गुरु पत्नी के साथ संभोग करे तो योनि का चिह्न; शराब पीये तो प्याले का चिह्न; उस ब्राह्मण के मस्तक पर कर दिया जाय ।

( ३ ) पापी ब्राह्मण के माथे पर ये चिह्न दाग कर समग्र जनता में इस बात की घोषणा की जाय; राजा उसे देश-निर्वासित कर दे; या तो उसे खानों में रहने की आज्ञा दी जाय ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में वाक्यकर्मानुयोग नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।

---: ० :---

Page 464Permalink
प्रकरण ८४# सर्वाधिकरणरक्षणम्
अध्याय ९

(१) समाहर्तृप्रदेष्टारः पूर्वमध्यक्षाणामध्यक्षपुरुषाणां च नियमनं कुर्युः।
(२) खनिसारकर्मान्तेभ्यः सारं रत्नं वापहरतः शुद्धवधः ।
(३) फल्गुद्रव्यकर्मान्तेभ्यः फल्गुद्रव्यमुपस्करं वा पूर्वः साहसदण्डः ।
(४) पण्यभूमिभ्यो राजपण्यं माषमूल्यादूर्ध्वमापादमूल्यादित्यपहरतो द्वादशपणो दण्डः । आ द्विपादमूल्यादिति चतुर्विंशतिपणः । आ त्रिपादमूल्यादिति षट्त्रिंशत्पणः । आ पणमूल्यादित्यष्टचत्वारिंशत्पणः । आ द्विपणमूल्यादिति पूर्वः साहसदण्डः । आ चतुष्पणमूल्यादिति मध्यमः । आ अष्टपणमूल्यादित्यत्तमः । आ दशपणमूल्यादिति वधः ।
(५) कोष्ठपण्यकुप्यायुधागारेभ्यः कुप्यभाण्डोपस्करापहारेष्वर्धमूल्येष्वेत एव दण्डाः ।


सरकारी विभागों और छोटे-बड़े कर्मचारियों की निगरानी

( १ ) समाहर्त्ता और प्रदेष्टा अधिकारियों को चाहिए कि पहिले वे विभागीय अध्यक्षों तथा उनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर निगरानी रखें ।

( २ ) जो व्यक्ति खानों या कारखानों से हीरे-जवाहरात आदि बहुमूल्य वस्तुओं की चोरी करें उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति सूत या लकड़ी के कारखानों से सारहीन वस्तुओं की चोरी करें उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति राजकीय खेतों से एक माष से चार माष कीमत की जीरा, अजवायन आदि वस्तुओं को चुराये, उस पर बारह पण दण्ड किया जाय, और जो आठ माष कीमत तक की वस्तुओं को चुराये उस पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार बारह माष तक की वस्तु चुराने पर छत्तीस पण और सोलह माष तक की चुराने पर अठतालीस पण दण्ड किया जाय । यदि दो पण मूल्य तक की वस्तु चुराये तो प्रथम साहस; चार पण मूल्य तक की चुराये तो मध्यम साहस, आठ पण मूल्य तक की चुराये तो उत्तम साहस और दस पण मूल्य तक की चुराये तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय ।

( ५ ) जो व्यक्ति गोदाम से, दूकान से, कारखाने से या शस्त्रागार से आधा माष

Page 465Permalink

प्र० ८४ : अ० ६ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८१

(१) कोशभाण्डागाराक्षशालाभ्यश्चतुर्भागमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः।
(२) चोराणामभिप्रघर्षणे चित्रो घातः । इति राजपरिग्रहेषु व्याख्यातम् ।
(३) बाह्येषु तु प्रच्छन्नमहनि क्षेत्रखलवेश्मापणेभ्यः कुप्यभाण्डमुपस्करं वा माषमूल्यादूर्ध्वमापादमूल्यादित्यपहरतस्त्रिपणो दण्डः। गोमयप्रदेहेन वा प्रलिप्यावघोषणम् । आ द्विपादमूल्यादिति षट्पणः, गोमयभस्मना वा प्रलिप्यावघोषणम् । आ त्रिपादमूल्यादिति नवपणः, गोमयभस्मना वा प्रलिप्यावघोषणं, शरावमेखलया वा। आ पणमूल्यादिति द्वादशपणः, मुण्डनं प्रव्राजनं वा । आ द्विपणमूल्यादिति चतुर्विंशतिपणः, मुण्डस्येष्टका-शकलेन प्रव्राजनं वा । आ चतुष्पणमूल्यादिति षट्त्रिंशत्पणः । आ पञ्चपण-मूल्यादिति अष्टचत्वारिंशत्पणः । आ दशपणमूल्यादिति पूर्वः साहसदण्डः ।


कीमत से लेकर दो माष कीमत तक की धातुओं, उनसे बनी वस्तुओं और छीजन आदि की चोरी करे उस पर भी बारह पण दण्ड किया जाय ।

( १ ) जो व्यक्ति कोष, भांडागार और अक्षशाला से एक काकणी से लेकर एक माष मूल्य तक की वस्तुओं को चुराये उस पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।

( २ ) जो कर्मचारी स्वयं चोरी कर चोरों का बहाना बतायें उन्हें कष्टकर प्राण-दण्ड दिया जाय । इस दण्ड के सम्बन्ध में आगे राजपरिग्रह नामक प्रकरण में विस्तार से कहा जायगा ।

( ३ ) राजकीय कर्मचारियों के अतिरिक्त कोई व्यक्ति यदि खेतों, खलिहानों, घरों और दूकानों से एक माष से चार माष मूल्य तक की वस्तुओं की दिन में चोरी करे तो उस पर तीन पण दण्ड किया जाय या उसकी देह पर गोबर लीपकर उसे सारे शहर में घुमाया जाय । आठ माष कीमत तक की वस्तुओं को चुराने पर छह पण दण्ड दिया जाय, अथवा गोबर की राख से उसका शरीर काला करके उसे शहर भर में घुमाया जाय । बारह माष मूल्य की वस्तुओं की चोरी करने पर नौ पण दण्ड किया जाय या उपले की राख से उसका शरीर काला करके उसे शहर में घुमाया जाय अथवा सकोरों की माला उसकी कमर या गले में डाल कर उसे शहर में घुमाया जाय । सोलह माष मूल्य की वस्तु की चोरी करने पर चोर को बारह पण दण्ड दिया जाय, या उसका शिर मुड़वा कर उसे देश-निकाला दिया जाय । बत्तीस माष की वस्तु चुराने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाय, अथवा शिर मुड़ाकर पत्थर मारते हुए उसको देश से बाहर खदेड़ा जाय । दो पण ( ३२ माष ) कीमत की वस्तु चुराने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय, अथवा पहिले की तरह उसको देश से बाहर खदेड़ा जाय । चार पण कीमती वस्तु को चुराने वाले पर छत्तीस पण दण्ड किया

Page 466Permalink
३८२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौथा अधिकरण

आ विंशतिपणमूल्यादिति द्विशतः । आ त्रिंशत्पणमूल्यादिति पञ्चशतः । आ चत्वारिंशत्पणमूल्यादिति साहस्त्रः । आ पञ्चाशतपणमूल्यादिति वधः ।
(१) प्रसह्य दिवा रात्रौ वान्तर्याभिकमपहरतोऽर्धमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः । प्रसह्य दिवा रात्रौ वा सशस्रस्यापहरश्चतुर्भागमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः ।
(२) कुटुम्बिकाध्यक्षमुख्यस्वामिनां कूटशासनमुद्राकर्मसु पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः, यथापराधं वा ।
(३) धर्मस्थश्चेद्गदमानं पुरुषं तर्जयति, भर्त्सयत्यपसारयति, अभिग्रसते वा, पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । वाक्पारुष्ये द्विगुणम् ।
(४) पृच्छयं न पृच्छति, अपृच्छयं पृच्छति, पृष्ट्वा वा विसृजति, शिक्षयति, स्मारयति पूर्वं ददाति वेति, मध्यममस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । देयं


जाय । पाँच पण कीमती वस्तु के लिए अठतालीस पण दण्ड, दस पण कीमती वस्तु के लिए प्रथम साहस दण्ड, बीस पण कीमती वस्तु के लिये दो सौ पण दण्ड, तीस पण तक की वस्तु के लिए पाँच सौ पण दण्ड, चालीस पण तक की वस्तु के लिए एक हजार पण दण्ड और पचास पण मूल्य की वस्तु चुराने वाले को प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

(१) किसी रक्षित वस्तु पर दिन या रात में जबरदस्ती डाका डालने पर आधा माष से दो माष तक की वस्तु के लिए छह पण दण्ड दिया जाय । यदि चोर हथियारबन्द हो तो ३/८ माष मूल्य की वस्तु पर ही छह पण दण्ड किया जाय ।

(२) यदि जन-साधारण जाली दस्तावेज या जाली नोट अथवा जाली मुद्राएँ बनायें तो उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय, यदि सुवर्णाध्यक्ष आदि ऐसा कार्य करें तो उन्हें मध्यम साहस दण्ड, यदि गाँव का मुखिया करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड और यदि समाहर्त्ता ही कर बैठे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय, अथवा अपराध के अनुसार यथोचित दण्ड निर्धारित किया जाय ।

(३) यदि न्यायाधीश (धर्मस्थ) अदालत में किसी अभियोक्ता या अभियुक्त को डराये, धमकाये या घुड़के या बाहर निकाल दे, या उससे रिश्वत ले तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि न्यायाधीश गाली दे तो इससे दुगुना दण्ड दिया जाय ।

(४) यदि न्यायाधीश, साक्षी से पूछने योग्य बातों को न पूछकर न पूछी जाने योग्य बातों को पूछे या बिना ही उत्तर पाये बात को छोड़ दे या गवाह को सिखाये या याद दिलाये या उसकी अधूरी बात को स्वयं ही पूरी कर दे, तो उसे मध्यम दण्ड दिया जाय । यदि किसी विचारणीय वस्तु के संबंध में उपयोगी बातों को न पूछ

Page 467Permalink

प्र० ८४ : अ० ६ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८३

देशं न पृच्छति, अदेयं देशं पृच्छति, कार्यमदेशेनातिवाहयति, चलेनातिहरति, कालहरणेन श्रान्तमपवाहयति, मार्गापन्नं वाक्यमुत्क्रमयति, मतिसाहाय्यं साक्षिभ्यो ददाति, तारितानुशिष्टं कार्यं पुनरपि गृह्णाति, उत्तममस्य साहसदण्डं कुर्यात् । पुनरपराधे द्विगुणं, स्थानाद्द्व्यवरोपणं च ।
(१) लेखकश्चेदुक्तं न लिखति अनुक्तं लिखति, दुरुक्तमुपलिखति, सूक्तमुल्लिखति, अर्थोत्पत्तिं वा विकल्पयतीति पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । यथापराधं वा ।
(२) धर्मस्थः प्रदेष्टा वा हैरण्यमदण्ड्यं क्षिपति, क्षेपद्विगुणमस्मै दण्डं दद्यात् । हीनातिरिक्ताष्टगुणं वा । शारीरदण्डं क्षिपति, शारीरमेव दण्डं भजेत । निष्क्रयद्विगुणं वा । यं वा भूतमर्थं नाशयत्यभूतमर्थं करोति, तदष्टगुणं दण्डं दद्यात् ।
(३) धर्मस्थीयाच्चारकान्निःसारयतो बन्धनागाराच्छय्यासनभोजनोच्चारसञ्चारं रोधबन्धनेषु त्रिपणोत्तरा दण्डाः कर्तुः कारयितुश्च ।


कर अनुपयोगी बातें पूछे, यदि बिना गवाह के किसी मामले का निर्णय दे दे, यदि सच्चे साक्षी को कपट की बातों में डालकर झूठा बना दे, यदि व्यर्थ की बातों में साक्षी को उलझाये रखने के बाद छोड़ दे, यदि साक्षी के कथन के क्रम को उलट-पुलट कर लिखे, यदि बीच-बीच में साक्षियों की सहायता करे, यदि निर्णीत मामले को फिर से जिरह में रखे, ऐसे न्यायाधीश को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । दुबारा भी वह यही अपराध करे तो इससे दुगुना दण्ड दिया जाय और उसको पदच्युत किया जाय ।

( १ ) मुहर्रिर ( लेखक ) यदि बयानों को सही-सही न लिखे, न कही हुई बात को लिखे, बुरी बात को अच्छी तथा अच्छी बात को बुरी तरह लिखे या बात के अभिप्राय को ही बदल कर लिखे, उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय या अपराध के अनुसार उसको यथोचित दण्ड दिया जाय ।

( २ ) धर्मस्थ या प्रदेष्टा यदि किसी निरपराधी को सुवर्ण दण्ड दें तो उन पर उससे दुगुना दण्ड किया जाय । यदि वे दण्ड में कमी वेशी करें तो उनसे उसका आठ गुना दण्ड वसूल किया जाय । यदि वे किसी निरपराधी को शारीरिक दण्ड दें तो उनको उससे दुगुना शारीरिक दण्ड दिया जाय । यदि वे शारीरिक दण्ड की जगह अर्थदंड करें तो उनसे उसका दुगुना अर्थदंड वसूल किया जाय । न्यायोचित धन को नष्ट करने और अन्यायपूर्ण धन का संग्रह करने वाले धर्मस्थ या प्रदेष्टा को उस धनराशि का अठगुना दंड दिया जाय ।

( ३ ) न्यायाधीश द्वारा हवालात में बंद कैदी को यदि कोई जेल का कर्मचारी

Page 468Permalink

३८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) चारकादभियुक्तं मुञ्चतो निष्पातयतो वा मध्यमः साहसदण्डः, अभियोगदानं च । बन्धनागारात्सर्वस्वं वधश्च ।
(२) बन्धनागाराध्यक्षस्य संरुद्धकमनाख्याय चारयतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः । कर्मकारयतो द्विगुणः स्थानान्तरत्वं गमयतोऽन्नपानं वा रुन्धतः षण्णवतिदण्डः । परिक्लेशयत उत्कोचयतो वा मध्यमः साहसदण्डः । घ्नतः साहस्रः ।
(३) परिगृहीतां दासीमाहितिकां वा संरुद्धिकामधिचरतः पूर्वः साहसदण्डः । चोरडामरिकभार्यां मध्यमः । संरुद्धिकामार्यामुत्तमः । संरुद्धस्य वा तत्रैव घातः । तदेवाध्यक्षेण गृहीतायार्यायां विद्यात् । दास्यां पूर्वः साहसदण्डः ।
(४) चारकमभित्त्वा निष्पातयतो मध्यमः । भित्त्वा वधः । बन्धनागारात्सर्वस्वं वधश्च ।


घूस लेकर घूमने, फिरने, पानी पीने, सोने, बैठने, खाने, पीने और मल-मूत्र त्यागने की स्वतंत्रता दे या दिलाये तो उस पर उत्तरोत्तर तीन पण अधिक दंड किया जाय ।

( १ ) यदि कोई राजपुरुष किसी अपराधी को हवालात से छोड़ दे या उसको प्रेरित करे, उसे मध्यम साहस दंड दिया जाय और साथ ही अपराधी को जितना देना था उसका भुगतान भी उसी राजपुरुष से किया जाय । यदि कोई प्रदेष्टा ऐसा करे तो उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाय और उसको प्राणदंड दिया जाय ।

( २ ) जेलर की आज्ञा के बिना यदि कैदी बाहर घूमे तो उस पर चौबीस पण दंड दिया जाय और ऐसा कराने वाले व्यक्ति पर अठतालीस पण दंड किया जाय । यदि कोई जेल का कर्मचारी कैदी की जगह बदले, उसके खानेपीने में बाधा डाले, उस पर छियानवे पण दंड, जो किसी कैदी को कोड़े मारे या रिश्वत दिलावे, उसको मध्यम साहस दंड और जो कोई कैदी का वध कर डाले उस पर एक हजार पण दंड किया जाय ।

( ३ ) खरीदी हुई या गिरवी रखी दासी यदि किसी कारण हवालात में बंद कर दी जाय और तब यदि कोई राजपुरुष उसके साथ व्यभिचार करे तो उसे प्रथम साहस दंड दिया जाय । चोर और अकस्मात् विनष्ट पुरुष ( डामरिक ) की पत्नी के साथ ऐसा ही दुर्व्यवहार करने वाले राजपुरुष को मध्यम साहस दंड, और कैद में बंद किसी आर्या स्त्री के साथ ऐसा करने पर उत्तम साहस दंड दिया जाय । यदि कोई कैदी ही ऐसा करे तो उसे प्राणदंड दिया जाय । सुवर्णाध्यक्ष यदि किसी कुलीन स्त्री के साथ दुराचार करे तो उसे भी प्राणदंड दिया जाय । दासी के साथ ऐसा करने पर प्रथम साहस दंड दिया जाय ।

( ४ ) यदि जेलखाने को बिना तोड़े ही कोई कैदी को बाहर निकाल दे तो उसे

कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सर्वाधिकरणरक्षण नामक नवाँ अध्याय समाप्त ।

Page 469Permalink

प्र० ८४ : अ० ९ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८५

(१) एवमर्थचरान् पूर्वं राजा दण्डेन शोधयेत् ।
शोधयेयुश्च शुद्धास्ते पौरजानपदान् दमैः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे सर्वाधिकरणरक्षणं नाम नवमोऽध्यायः
आदितः पञ्चाशीतितमः ।

— : ० : —


मध्यम साहस दंड, यदि तोड़कर निकाले तो प्राणदंड दिया जाय । यदि प्रदेष्टा ऐसा करे तो उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर उसे प्राणदंड की सजा दी जाय ।

( १ ) इस प्रकार राजा को चाहिए कि पहिले वह अपने कर्मचारियों को दंड से शुद्ध करे । फिर वे विशुद्ध हुए राजकर्मचारी दंड-व्यवस्था के द्वारा नगर तथा प्रदेश की जनता को सही रास्ते पर लायें ।

कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सर्वाधिकरणरक्षण नामक नवाँ अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

२५ कौ०

Page 470Permalink
प्रकरण ८५# एकाङ्गवधनिष्क्रयः
अध्याय १०

(१) तीर्थघातग्रन्थिभेदोर्ध्वकराणां प्रथमेऽपराधे [सन्दंशच्छेदनं चतु-ष्पञ्चाशतपणो वा दण्डः । द्वितीये छेदनं पणस्य शत्यो वा दण्डः । तृतीये दक्षिणहस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः । चतुर्थे यथाकामी वधः ।

(२) पञ्चविंशतिपणावरेषु कुक्कुटनकुलमार्जारश्वसूकरस्तेयेषु हिंसायां वा चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः, नासाग्रच्छेदनं वा । चण्डालारण्यचराणामर्ध-दण्डः ।

(३) पाशजालकूटावपातेषु बद्धानां मृगपशुपक्षिव्यालमात्स्यानामादाने तच्च तावच्च दण्डः ।

(४) मृगद्रव्यवनान्मृगद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः । बिम्बविहारमृगपक्षि-स्तेये हिंसायां वा द्विगुणो दण्डः ।


एकांग वध अथवा उसकी जगह द्रव्य-दण्ड

( १ ) तीर्थस्थानों में रहने वाले उठाईगीर ( तीर्थघात ), गिरहकट ( ग्रंथिभेद ) और छत फोड़ने वाले ( ऊर्ध्वकर ) व्यक्तियों का अंगूठा तथा कनिष्ठिका उँगली कटवा दी जांय; अथवा उन पर चौवन पण दण्ड किया जाय । दूसरी बार अपराध करने पर उनकी सब उँगलियाँ कटवा दी जाँय अथवा उन पर सौ-पण जुर्माना किया जाय । तीसरी बार यदि वे अपराध करें तो उनका दाहिना हाथ कटवा दिया जाय या उन पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय । चौथी बार भी वे अपराध कर बैठें तो उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

( २ ) यदि कोई व्यक्ति पच्चीस पण से कम कीमत के मुर्गों, नेवले, बिल्ली, कुत्ते और सुअर की चोरी करे या उन्हें मार डाले तो उस पर चौवन पण दण्ड किया जाय या उसकी नाक का अगला हिस्सा काट दिया जाय । यदि वे मुर्गे आदि किसी चाण्डाल के अथवा जंगली हों तो उक्त दण्ड से आधा दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति फाँस कर, जाल बिछाकर और घास-फूस से ढके गढों द्वारा संरक्षित राजकीय मृग तथा अन्य पशु, पक्षी, हिंसक जीव और मछली आदि पकड़े, उससे उनकी कीमत वसूली जाय और उतना ही उस पर जुर्माना किया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति सुरक्षित जंगल के जानवरों तथा लकड़ी आदि की चोरी करे उस पर सौ पण जुर्माना किया जाय । रंग-विरंगी सुंदर चिड़ियों, पालतू हरिणों तथा तोतों को पकड़ने वाले या मारने वाले व्यक्ति पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

Page 471Permalink

प्र० ८५ : अ० १० ] एकाङ्गवध अथवा द्रव्यदण्ड ३८७

(१) कारुशिल्पिकुशीलवतपस्विनां क्षुद्रकद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः । स्थूलकद्रव्यापहारे द्विशतः । कृषिद्रव्यापहारे च ।
(२) दुर्गमकृतप्रवेशस्य प्रविशतः प्राकारच्छिद्राद्वा निक्षेपं गृहीत्वाऽपसरतः कन्धरावधो द्विशतो वा दण्डः ।
(३) चक्रयुक्तां नावं क्षुद्रपशुं वापहरत एकपादवधः त्रिशतो वा दण्डः ।
(४) कूटकाकपण्यक्षारला शलाकाहस्तविषमकारिण एकहस्तवधः, चतुःशतो वा दण्डः ।
(५) स्तेनपारदारिकयोः साचिव्यकर्मणि स्त्रियाः संगृहीतायाश्च कर्णनासाछेदनं पञ्चशतो वा दण्डः । पुंसो द्विगुणः ।
(६) महापशुमेकं दासं दासीं वापहरतः प्रेतभाण्डं वा विक्रीणानस्य द्विपादवधः, षट्छतो वा दण्डः ।
(७) वर्णोत्तमानां गुरूणां च हस्तपादलंघने राजयानवाहनाद्यारोहणे चैकहस्तपादवधः सप्तशतो वा दण्डः ।


( १ ) जो व्यक्ति बढ़इयों, छोटे कारीगरों, कथकों और तपस्वियों की छोटी-छोटी चीजों की चोरी करे उस पर सौ पण दण्ड किया जाय और बड़ी-बड़ी चीजों की चोरी करे तो दो-सौ पण दण्ड किया जाय । खेती के साधन हल आदि चुराने वाले पर भी दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

( २ ) यदि अनधिकारी व्यक्ति किले में प्रवेश करे अथवा परकोटे की दीवार तोड़ कर माल उड़ा ले जाय तो उसके पैर के पीछे की दो मुख्य नसें कटवा दी जाँय, या उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

( ३ ) चक्रयुक्त ( धन, शस्त्र या यंत्र युक्त ) नाव को अथवा छोटे-छोटे पशुओं की चोरी करने वाले का एक पैर कटवा दिया जाय या उस पर तीन-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति जाली कौड़ी, पांसें, अरला और शलाका आदि जुआ संबंधी सामान बनाये, तथा जो व्यक्ति इसी प्रकार की अन्य कूट-कपट की चीजें बनाये, उसका एक हाथ काट दिया, या उस पर चार सौ पण जुर्माना किया जाय ।

( ५ ) चोरों और व्यभिचारियों की दूतियों के नाक, कान काट लिये जाँय या उन पर पाँच सौ पण दण्ड किया जाय । यदि पुरुष ऐसा दूतकर्म करें तो उन पर दुगुना ( एक हजार पण ) दण्ड दिया जाय ।

( ६ ) गाय, भैंस आदि पशुओं, एक दास, एक दासी को चुराने वाले अथवा मुर्दे के कपड़े बेचने वाले पुरुष के दोनों पैर काट लिये जाँय या उस पर छह-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

( ७ ) जो व्यक्ति श्रेष्ठ पुरुषों या गुरुजनों को हाथ-पैर से मारे या राजा की सवारी एवं घोड़े पर चढ़े उसका या तो एक हाथ और एक पैर काट दिया जाय अथवा उस पर सात-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

Page 472Permalink

३८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) शूद्रस्य ब्राह्मणवादिनो देवद्रव्यमवस्तृणतो राजद्विष्टमादिशतो द्विनेत्रभेदिनश्च योगाञ्जनेनान्धत्वमष्टशतो वा दण्डः ।

(२) चोरं पारदारिकं वा मोक्षयतो राजशासनमूनमतिरिक्तं वा लिखतः कन्यां दासीं वा सहिरण्‍यमपहरतः कूटव्यवहारिणो विमांसविक्रयिणश्च वामहस्तद्विपादवधो नवशतो वा दण्डः । मानुषमांसविक्रये वधः ।

(३) देवपशुप्रतिमामनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णरत्नसस्यापहारिण उत्तमो दण्डः शुद्धवधो वा ।

(४)

पुरुषं चापराधं च कारणं गुरुलाघवम् ।
अनुबन्धं तदात्वं च देशकालौ समीक्ष्य च ॥
उत्तमावरमध्यत्वं प्रदेष्टा दण्डकर्मणि ।
राज्ञश्च प्रकृतीनां च कल्पयेदन्तरा स्थितः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे एकाङ्गवधनिष्क्रयो नाम दशमोऽध्यायः; आदितः षडशीतितमः ।

—: ० :—

(१) जो शूद्र अपने को ब्राह्मण बताये और देव-निमित्त द्रव्य का अपहरण करे तथा ज्योतिषी बनकर जो राजा के भावी अनिष्ट को बताये अथवा बगावत करे या किसी की दोनों आँखें फोड़ दे, ऐसे व्यक्ति को औषधियों का सुरमा लगा कर अंधा कर दिया जाय अथवा उस पर आठ-सौ पण जुरमाना किया जाय ।

(२) चोर या व्यभिचारी को छोड़ देने वाले, राजा की आज्ञा को घटा-बढ़ा कर लिखने वाले, आभूषणों सहित कन्या या दासी का अपहरण करने वाले, छल-कपट का व्यवहार करने वाले, अभक्ष्य पशुओं का मांस बेचने वाले, पुरुष का बायाँ हाथ और दोनों पैर काट दिये जाँय, या उस पर नौ-सौ पण दण्ड किया जाय । आदमी का मांस बेचने वाले को प्राण दण्ड की सजा दी जाय ।

(३) देवता के निमित्त पशु, प्रतिमा, मनुष्य, खेत, घर, हिरण्य, सोना, रत्न और अन्न, इन नौ चीजों की जो भी व्यक्ति चोरी करे उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय या उसको पीडारहित प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

(४) राजा और आमात्यों को साथ लेकर प्रदेष्टा को चाहिए कि वह दण्ड देते समय अपराध को, अपराध के कारणों को, अपराधी की हैसियत को, वर्तमान तथा भावी परिणामों को और देश-काल की स्थिति को भली-भाँति सोच समझ ले, तदनन्तर न्याय के अनुसार प्रथम, मध्यम तथा उत्तम आदि दण्डों की सजा सुनाये ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में एकाङ्गवधनिष्क्रय नामक दशवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

Page 473Permalink
प्रकरण ८६## शुद्धश्चित्रश्च दण्डकल्पः
अध्याय ११

(१) कलहे घ्नतः पुरुषं चित्रो घातः । सप्तरात्रस्यान्तः मृते शुद्धवधः पक्षस्यान्तरुत्तमः । मासस्यान्तः पञ्चशतः समुत्थानव्ययश्च ।

(२) शस्त्रेण प्रहरत उत्तमो दण्डः । मदेन हस्तवधः । मोहेन द्विशतः । वधे वधः ।

(३) प्रहारेण गर्भं पातयत उत्तमो दण्डः । भैषज्येन मध्यमः । परिक्लेशेन पूर्वः साहसदण्डः ।

(४) प्रसभं स्त्रीपुरुषघातकाभिसारकनिग्राहकावघोषकावस्कन्दकोपवेधकान् पथि वेश्मप्रतिरोधकान् राजहस्त्यश्वरथानां हिंसकान् स्तेनान् वा शूलानारोहयेयुः ।


शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड

( १ ) कोई व्यक्ति यदि लड़ाई-झगड़े में किसी व्यक्ति को जान से मार डाले तो उसको कष्टपूर्वक प्राणदण्ड ( चित्रघात ) की सजा दी जाय । झगड़ा होने के बाद चोट खाया व्यक्ति यदि सात दिन बाद मरे तो मारने वाले को शुद्ध प्राणदण्ड ( कष्टरहित वध ) दिया जाय । यदि पन्द्रह दिन बाद मरे तो उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । एक महीने के बाद मरे तो पाँच-सौ पण जुर्माना और साथ ही मृतक की दवाई-दारू का सारा व्यय भी मरने वाले से वसूल किया जाय ।

( २ ) किसी शस्त्र द्वारा चोट पहुँचाने पर उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । यदि बल के घमंड से चोट पहुँचाये तो उसका हाथ काट दिया जाय । यदि क्रोधावेश में प्रहार करे तो उस पर दो सौ पण दण्ड दिया जाय । यदि जान से मार डाले तो उसको प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति प्रहार द्वारा गर्भ गिराये उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । औषध द्वारा गर्भ गिराने वाले को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । कठोर काम कराकर गर्भ गिराने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) यदि कोई व्यक्ति बलात्कार से किसी स्त्री या पुरुष की हत्या कर डाले, बलात्कार से किसी स्त्री को अपहरण कर ले जाय, बलात्कार से किसी स्त्री की नाक-

Page 474Permalink
३९०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौथा अधिकरण

(१) यश्चैनान् दहेदपनयेद्वा स तमेव दण्डं लभेत, साहसमुत्तमं वा।
(२) हिंस्रस्तेनानां भक्तवासोपकरणाग्निमंत्रदानवैयावृत्यकर्मसूत्तमो दण्डः। परिभाषणमविज्ञाने। हिंस्रस्तेनानां पुत्रदारमसमंत्रं विसृजेत्, समंत्रमाददीत।
(३) राज्यकामुकमन्तःपुरप्रधर्षकमटव्यमित्रोत्साहकं दुर्गराष्ट्रदण्डकोपकं वा शिरोहस्तप्रादीपकं घातयेत्।
(४) ब्राह्मणं तमः प्रवेशयेत्।
(५) मातृपितृपुत्रभ्रात्राचार्यतपस्विघातकं वात्वक्छिरःप्रादीपकं घातयेत्। तेषामाक्रोशे जिह्वाच्छेदः। अङ्गाभिरदने तदङ्गान्मोच्यः।


कान काट ले, धमकी देकर हत्या, चोरी की घोषणा करने वाला, बलात्कार से नगर तथा गाँवों का धन ले जाने वाला; भीत तोडकर सेंध लगाने वाला, रास्ते की धर्म-शालाओं तथा प्याउओं की चोरी करने वाला और राजा के हाथी; घोड़े तथा रथों को नष्ट करने, मारने या चुराने वाला, इन सभी प्रकार के अपराधियों को शूली पर लटका दिया जाय।

(१) इन लोगों को जो दाह-संस्कार या क्रिया-कर्म करे या उनको उठा कर गंगा-प्रवाह आदि के लिए ले जाय उसको भी शूली पर चढ़ाया जाय या उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।

(२) जो लोग हत्यारों को खाना, रहना, वस्त्र, आग और सलाह दें तथा उनके यहाँ नौकरी करें उन्हें भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। जिन्हें यह पता नहीं है कि वे हत्यारे या चोर हैं, उन्हें वाक् ताड़ना दी जाय। हत्यारों और चोरों के स्त्री-पुत्र यदि हत्या-चोरी में शामिल न हों तो उन्हें छोड़ दिया जाय, यदि उन्होंने भी किसी प्रकार की सहायता की हो तो उन्हें गिरफ्तार कर यथोचित दण्ड दिया जाय।

(३) राजसिंहासन को हथियाने की इच्छा रखने वाले, अंतःपुर में व्यर्थ का झमेला खड़ा कर देने वाले, आटवी एवं पुलिंद आदि शत्रु राजाओं को उभाड़ने वाले, किले की सेना तथा बाहर की सेना में बगावत फैला देने वाले, पुरुषों के सिर और हाथ में आग लगाकर उनको कत्ल किया जाय।

(४) यदि ऐसा दुष्कर्म करने वाला कोई ब्राह्मण हो तो उसे आजीवन के लिए काल-कोठरी में बंद कर दिया जाय।

(५) जो व्यक्ति माता, पिता, पुत्र, भाई, आचार्य और तपस्वी की हत्या कर डाले, उसके शिर की खाल उतरवा कर उसमें आग लगायी जाय और तब उसको कत्ल कराया जाय। माता-पिता को गाली देने वाले की जीभ कटवा दी जाय। माता-पिता के किसी अंग को कोई जिस अंग से नोचे-खसोटे उसका वही अंग कटवा दिया जाय।