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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 470 of 918

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Page 470
प्रकरण ८५# एकाङ्गवधनिष्क्रयः
अध्याय १०

(१) तीर्थघातग्रन्थिभेदोर्ध्वकराणां प्रथमेऽपराधे [सन्दंशच्छेदनं चतु-ष्पञ्चाशतपणो वा दण्डः । द्वितीये छेदनं पणस्य शत्यो वा दण्डः । तृतीये दक्षिणहस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः । चतुर्थे यथाकामी वधः ।

(२) पञ्चविंशतिपणावरेषु कुक्कुटनकुलमार्जारश्वसूकरस्तेयेषु हिंसायां वा चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः, नासाग्रच्छेदनं वा । चण्डालारण्यचराणामर्ध-दण्डः ।

(३) पाशजालकूटावपातेषु बद्धानां मृगपशुपक्षिव्यालमात्स्यानामादाने तच्च तावच्च दण्डः ।

(४) मृगद्रव्यवनान्मृगद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः । बिम्बविहारमृगपक्षि-स्तेये हिंसायां वा द्विगुणो दण्डः ।


एकांग वध अथवा उसकी जगह द्रव्य-दण्ड

( १ ) तीर्थस्थानों में रहने वाले उठाईगीर ( तीर्थघात ), गिरहकट ( ग्रंथिभेद ) और छत फोड़ने वाले ( ऊर्ध्वकर ) व्यक्तियों का अंगूठा तथा कनिष्ठिका उँगली कटवा दी जांय; अथवा उन पर चौवन पण दण्ड किया जाय । दूसरी बार अपराध करने पर उनकी सब उँगलियाँ कटवा दी जाँय अथवा उन पर सौ-पण जुर्माना किया जाय । तीसरी बार यदि वे अपराध करें तो उनका दाहिना हाथ कटवा दिया जाय या उन पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय । चौथी बार भी वे अपराध कर बैठें तो उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

( २ ) यदि कोई व्यक्ति पच्चीस पण से कम कीमत के मुर्गों, नेवले, बिल्ली, कुत्ते और सुअर की चोरी करे या उन्हें मार डाले तो उस पर चौवन पण दण्ड किया जाय या उसकी नाक का अगला हिस्सा काट दिया जाय । यदि वे मुर्गे आदि किसी चाण्डाल के अथवा जंगली हों तो उक्त दण्ड से आधा दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति फाँस कर, जाल बिछाकर और घास-फूस से ढके गढों द्वारा संरक्षित राजकीय मृग तथा अन्य पशु, पक्षी, हिंसक जीव और मछली आदि पकड़े, उससे उनकी कीमत वसूली जाय और उतना ही उस पर जुर्माना किया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति सुरक्षित जंगल के जानवरों तथा लकड़ी आदि की चोरी करे उस पर सौ पण जुर्माना किया जाय । रंग-विरंगी सुंदर चिड़ियों, पालतू हरिणों तथा तोतों को पकड़ने वाले या मारने वाले व्यक्ति पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।