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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 472 of 918

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Page 472

३८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) शूद्रस्य ब्राह्मणवादिनो देवद्रव्यमवस्तृणतो राजद्विष्टमादिशतो द्विनेत्रभेदिनश्च योगाञ्जनेनान्धत्वमष्टशतो वा दण्डः ।

(२) चोरं पारदारिकं वा मोक्षयतो राजशासनमूनमतिरिक्तं वा लिखतः कन्यां दासीं वा सहिरण्‍यमपहरतः कूटव्यवहारिणो विमांसविक्रयिणश्च वामहस्तद्विपादवधो नवशतो वा दण्डः । मानुषमांसविक्रये वधः ।

(३) देवपशुप्रतिमामनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णरत्नसस्यापहारिण उत्तमो दण्डः शुद्धवधो वा ।

(४)

पुरुषं चापराधं च कारणं गुरुलाघवम् ।
अनुबन्धं तदात्वं च देशकालौ समीक्ष्य च ॥
उत्तमावरमध्यत्वं प्रदेष्टा दण्डकर्मणि ।
राज्ञश्च प्रकृतीनां च कल्पयेदन्तरा स्थितः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे एकाङ्गवधनिष्क्रयो नाम दशमोऽध्यायः; आदितः षडशीतितमः ।

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(१) जो शूद्र अपने को ब्राह्मण बताये और देव-निमित्त द्रव्य का अपहरण करे तथा ज्योतिषी बनकर जो राजा के भावी अनिष्ट को बताये अथवा बगावत करे या किसी की दोनों आँखें फोड़ दे, ऐसे व्यक्ति को औषधियों का सुरमा लगा कर अंधा कर दिया जाय अथवा उस पर आठ-सौ पण जुरमाना किया जाय ।

(२) चोर या व्यभिचारी को छोड़ देने वाले, राजा की आज्ञा को घटा-बढ़ा कर लिखने वाले, आभूषणों सहित कन्या या दासी का अपहरण करने वाले, छल-कपट का व्यवहार करने वाले, अभक्ष्य पशुओं का मांस बेचने वाले, पुरुष का बायाँ हाथ और दोनों पैर काट दिये जाँय, या उस पर नौ-सौ पण दण्ड किया जाय । आदमी का मांस बेचने वाले को प्राण दण्ड की सजा दी जाय ।

(३) देवता के निमित्त पशु, प्रतिमा, मनुष्य, खेत, घर, हिरण्य, सोना, रत्न और अन्न, इन नौ चीजों की जो भी व्यक्ति चोरी करे उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय या उसको पीडारहित प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

(४) राजा और आमात्यों को साथ लेकर प्रदेष्टा को चाहिए कि वह दण्ड देते समय अपराध को, अपराध के कारणों को, अपराधी की हैसियत को, वर्तमान तथा भावी परिणामों को और देश-काल की स्थिति को भली-भाँति सोच समझ ले, तदनन्तर न्याय के अनुसार प्रथम, मध्यम तथा उत्तम आदि दण्डों की सजा सुनाये ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में एकाङ्गवधनिष्क्रय नामक दशवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—