श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
क्रीडाखण्ड
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीमन्महर्षिकृष्णद्वैपायनव्यासविरचित
[ श्रीगणेशपुराण ]
[ उत्तरार्ध ]
क्रीडाखण्ड
पहला अध्याय
देवान्तक और नरान्तकका जन्म तथा नारदजीका उन्हें पंचाक्षरी महाविद्याका उपदेश देना
[बायाँ स्तम्भ]
मुनिगण बोले— हे सूतजी! हे महामते! हम सबने
आपके द्वारा सम्यक् रूपसे वर्णित आख्यानका आदरपूर्वक
श्रवण किया; परंतु जैसे प्राणी प्रतिदिन अन्नका भक्षण
करनेपर भी तृप्त नहीं होते, वैसे ही हमें भी [कथा-
श्रवणसे] तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप अन्य कथाओंको
कहिये, जिससे हम सब तृप्त हो सकें ॥ १-२ ॥
सूतजी बोले— [हे मुनियो!] मैंने उपासनाखण्डका
वर्णन किया, अब मैं आप सबके समक्ष क्रीडाखण्डका
वर्णन करता हूँ। जिस प्रकारसे गणेशजीने अनेक
दैत्योंका वध किया तथा सज्जनों, द्विजों एवं गौओंका
पालन किया; उसे मैं अत्यन्त आदरपूर्वक सम्यक् रूपसे
कहता हूँ, आप लोग एकाग्र चित्तसे श्रवण करें ॥ ३-४ ॥
मुनिगण बोले— [हे सूतजी!] आप जैसे-जैसे
उस [गणेश] पुराणका वर्णन कर रहे हैं, वैसे-वैसे
हमारी श्रवणेच्छा बढ़ती जा रही है, इसलिये आप
उसका सम्यक् रूपसे कथन करते रहें, जिससे सभी लोग
इस संसार-सिन्धुसे शीघ्र ही मुक्त हो जायें ॥ ५ ॥
सूतजी बोले— पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसे अमित
तेजस्वी व्यासजीसे कहा था और भृगु [मुनि]-ने
जिसका [राजा] सोमकान्तके प्रति कथन किया था; उस
[कथा-प्रसंग]-को मैं आप सबसे कहता हूँ॥ ६ ॥
व्यासजी बोले— हे कमलजन्मा ब्रह्माजी! हे
[दायाँ स्तम्भ]
विभो! गणेशजीके सुन्दर चरितका वर्णन कीजिये।
उन प्रभुने जो-जो रूप धारण करके जो-जो [लीलाएँ]
की हैं; हे ब्रह्मन्! उन्हें मेरे कहनेसे आप कृपा करके
कहिये। इस उपासनाखण्डको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं
हो रही है ॥ ७-८ ॥
उन गणेशजीने जिन-जिन अवतारोंके द्वारा जिन-
जिन महाबली दैत्योंका वध किया है, उनके उन-उन
कर्मोंको आप कहिये। आपके मुखकमलसे उनके बालचरित
तथा अनेक प्रकारकी लीलाओंका श्रवणकर मेरे मनको
विश्राम मिल जायगा ॥ ९-१० ॥
सूतजी बोले— [हे मुनियो!] व्यासजीके इस
प्रकार पूछनेपर उनके अनेक प्रश्नोंको सुनकर कमलासन
ब्रह्माजीने अनेक प्रकारकी दिव्य कथाओंको कहा ॥ ११ ॥
ब्रह्माजी बोले— हृदयको आनन्दित करनेवाले हे
व्यास! तुमने उचित प्रश्न किया है। हे मुने! श्रोताके
आदरपूर्वक कथा-श्रवण करनेसे वक्ताकी कथा सुनानेके
प्रति प्रीति बढ़ जाती है ॥ १२ ॥
[हे व्यासजी!] तुम्हारे-जैसे पुण्यश्लोक श्रोताके
प्रति मैं अत्यन्त गोप्य तथ्योंका भी प्रकाशन कर सकता
हूँ; क्योंकि श्रोताके सत्कथाओंके श्रवणमें रुचि लेनेसे
वक्ताकी कथा सुनानेकी शक्ति बढ़ जाती है ॥ १३ ॥
इस समय मैं तुमसे सम्पूर्ण गणेशचरितको कहूँगा,
२७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
उन प्रभुने अनेक अवतार ले करके पृथ्वीके भारका हरण
किया। उन्होंने अनेक प्रकारसे दैत्योंका वध करके
देवताओंको उनके स्थान (पद)-पर स्थापित किया।
दुष्टोंका निर्मूलन करनेमें सक्षम वे सज्जनोंका पालन
करनेमें तत्पर रहते हैं॥ १४-१५॥
हे मुने! श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान
करनेवाले गणेशजीके आख्यानपर आधारित इतिहासका
श्रवण कीजिये, जिसे भगवान् विष्णुने कहा था॥ १६॥
[भगवान्] विष्णु बोले—पृथक्-पृथक् युगोंमें
गणेशजी भिन्न-भिन्न नामवाले, भिन्न-भिन्न वाहनवाले,
भिन्न-भिन्न कर्मोंवाले, भिन्न-भिन्न गुणोंवाले और भिन्न-
भिन्न दैत्योंका संहार करनेवाले हुए हैं॥ १७॥
वे सत्ययुगमें सिंहवाहन, दस भुजाओंवाले, तेजोमय
स्वरूपवाले, विशाल शरीरवाले, सबको वर देनेवाले और
जितेन्द्रिय हुए। [उस समय] उनका नाम 'विनायक'
था। त्रेतायुगमें वे मयूरवाहन, छः भुजाओंवाले और श्वेत
वर्णवाले थे। [उस समय] वे 'मयूरेश्वर' नामसे
त्रिभुवनमें विख्यात हुए॥ १८-१९॥
द्वापरमें वे रक्त वर्णवाले, मूषकवाहन और चतुर्भुज
स्वरूपवाले हुए। [उस समय] देवताओं और मनुष्योंद्वारा
पूजित उनकी 'गजानन'—इस नामसे प्रसिद्धि हुई॥ २०॥
कलियुगमें वे धूम्रवर्ण, अश्ववाहन और दो भुजाओंवाले
होंगे। म्लेच्छोंकी सेनाओंका विनाश करनेवाले वे 'धूम्रकेतु'—
इस नामसे विख्यात होंगे॥ २१॥
हे मुने! उन्होंने जिस-जिस दैत्यका हनन किया
था, उस सबका अब मैं वर्णन करता हूँ। अंगदेशके एक
नगरमें रौद्रकेतु नामक ब्राह्मण हुआ था॥ २२॥
वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता, वेद-
वेदांगोंका पारगामी विद्वान्, बृहस्पतिके सदृश [बुद्धिमान्],
अग्निहोत्र करनेवाला, देवताओं-गौओं और ब्राह्मणोंकी
पूजा करनेवाला, नित्य ईश्वरकी उपासना करनेवाला और
सभी आगम-शास्त्रोंका पारंगत विद्वान् था॥ २३ १/२॥
उसकी पत्नीका नाम शारदा था, जो रूप और
कान्तिसे सुशोभित थी। उसके सदृश सुन्दर स्त्री न तो
अप्सराओंमें कोई थी, न आठ प्रकारकी नायिकाओंमें ही
[दायाँ स्तम्भ]
कोई थी। उसके मुखकी कान्तिने चन्द्रमा [की कान्ति]-
को पराजित कर दिया था, मानो जिसके कारण ही
चिन्तासे वह क्षयग्रस्त हो गया था॥ २४-२५॥
अनेक दिव्य आभूषणोंसे आभूषित होकर वह इस
धरातलको इस प्रकार जगमगाती थी, जैसे आकाशमण्डलको
नक्षत्रमालाएँ द्योतित करती हैं॥ २६॥
शरत्कालीन कमलके समान नेत्रोंवाली वह शारदा
शरत्कालीन चन्द्रमासे सुशोभित शारद (कार्तिक)मासमें
किसी समय गर्भवती हो गयी। [उस समय] उसके
शरीरके तेज [के आधिक्य]-से कुछ भी विदित नहीं
होता था। उस समय वह साध्वी दोहद-सम्बन्धी जो-
जो इच्छाएँ करती थी, उन सभी इच्छाओंको उसका पति
पूरा करता था॥ २७-२८॥
इस प्रकार उसने नौवें मासमें जुड़वाँ पुत्रोंको जन्म
दिया। वे दोनों अत्यन्त कान्तिमान् और माता-पिताके
अन्तःकरणको आनन्दित करनेवाले थे। वे दोनों आजानुबाहु
(घुटनोंतक लम्बी भुजाओंवाले) और बड़े-बड़े नेत्रोंवाले
थे। उन्हें देखकर उनके पिता (रौद्रकेतु)-ने कहा—'आज
मैं पितरोंके ऋणसे उऋण हो गया। आज मेरा तप धन्य हो
गया, वंश धन्य हो गया और जन्म धन्य हो गया; जो मैंने
इन दोनों पुत्रोंको देख लिया॥ २९-३० १/२॥
तत्पश्चात् उसने अर्घ्य आदिसे श्रेष्ठ द्विजोंका
सम्यक् प्रकारसे पूजनकर और गणोंके स्वामी गणेशजीकी
पूजा की, इसके बाद मातृकापूजनकर शीघ्र ही स्वस्तिवाचन
करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंद्वारा आभ्युदयिक श्राद्ध और
जातकर्म-संस्कार सम्पन्न कराया॥ ३१-३२॥
उसने ब्राह्मणोंका भक्तिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे पूजनकर
उन्हें अनेक प्रकारके दान दिये तथा वस्त्र, रत्न, धन
आदिसे सुहृदोंको सम्मानित किया। पुत्र-जन्मसे अत्यन्त
प्रसन्न उसने अनेक प्रकारके बाजे बजवाते हुए घर-घरमें
शर्करा और ताम्बूल बँटवाया॥ ३३-३४॥
जैसे कोई ध्यानपरायण योगी सद्वस्तु परब्रह्म
परमात्माका दर्शन प्राप्तकर प्रसन्न होता है, [वैसे ही वह
पुत्रोंके जन्मपर प्रसन्न था।] तदनन्तर [सूतकके] दस
दिन बीत जानेपर उसने ज्योतिर्विद् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको
क्री०ख०-अ०२ ] * देवान्तक और नरान्तककी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट होना * २७३
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बुलवाकर परम भक्तिसे उनका भलीभाँति पूजनकर उनसे | कहा— ॥ ४३१/२ ॥
पूछा कि 'हे श्रेष्ठ द्विजो ! इन दोनोंका क्या नाम रखना | नारदजी बोले—मैं तुम्हारे पुत्रद्वयकी अद्भुत
चाहिये, भूत और भविष्यका ज्ञान करके विचारपूर्वक | और मंगलमयी कीर्तिको सुनकर यहाँ आया हूँ ॥ ४४ ॥
मुझे बतलायें ?' ॥ ३५-३६१/२ ॥ | हे मुने ! इन दोनोंकी कीर्ति आगे और अद्भुत
तब उन लोगोंने ध्यानपूर्वक देखकर कहा—हे | होगी। हे मुने ! तुम्हारा महान् भाग्य है, जो तुम्हें इस
ब्रह्मन् ! हम लोगोंके मतसे तुम इन दोनोंके आचरणके अनुरूप | प्रकारके पुत्रद्वय प्राप्त हुए हैं ॥ ४५ ॥
इनके नाम देवान्तक और नरान्तक रखो ॥ ३७१/२ ॥ | इन्हें देखकर दूसरे लोगोंका मन आनन्दित हो जाता
उनके इस प्रकारके वचन सुनकर ब्राह्मणोंकी | है, तो स्वजनोंका क्या कहना ! नारदजीद्वारा कहे गये ऐसे
भक्तिमें संलग्न रहनेवाले उस ब्राह्मण रौद्रकेतुने अपनी | मंगलमय वचनको सुनकर तब वे दोनों—माता-पिता उन
शाखामें कही गयी विधिके अनुसार उन दोनोंका | नारदमुनिको नमनकर बोले—' [हे मुनिश्रेष्ठ ! ] अब आपकी
नामकरण किया तथा ब्राह्मणों एवं सम्पूर्ण नगर- | कृपासे इन दोनों पुत्रोंको दीर्घायुकी प्राप्ति हो। आप ऐसा
निवासियोंको भोजन कराया ॥ ३८-३९ ॥ | अनुग्रह करें, जिससे ये दोनों पराक्रमी, लोकमें प्रसिद्ध,
तदनन्तर सुमेरु और मन्दराचलकी भाँति प्रतीत | सर्वज्ञ और शत्रुओंका दमन करनेवाले हों' ॥ ४६-४८ ॥
होनेवाले वे दोनों बालक उसी प्रकार बढ़ने लगे, जैसे | ब्रह्माजी बोले—रौद्रकेतु, शारदा और उनके दोनों
समुद्र-तटके तालवृक्ष और बाँसके अंकुर तीव्रतासे बढ़ते | पुत्रोंकी भक्तिको देखकर नारदजीने उन दोनों बालकोंको
हैं। वे दोनों अपनी स्वाभाविक इच्छासे जहाँ-जहाँ पैर | पंचाक्षरी महाविद्याका उपदेश किया ॥ ४९ ॥
रख देते थे, पातालस्थित शेषनागका सिर वहाँ-वहाँ झुक | उन्होंने कहा कि हे पुत्रो ! इससे तुम कामदेवके
जाता था ॥ ४०-४१ ॥ | शत्रु भगवान् शिवको सम्यक् रूपसे प्रसन्न करो तथा
जब वे दोनों खड़े होते थे तो सूर्यमण्डल उनके | उनके सिरपर अपना अभयहस्त रखकर [पंचाक्षरी
सिरपर स्थित प्रतीत होता था। वे दोनों अपने माता- | महाविद्याके] अनुष्ठानका आदेश दिया। हे ब्रह्मन् ! तब
पिताको अनेक प्रकारके कौतुक दिखलाया करते थे ॥ ४२ ॥ | रौद्रकेतुसे ऐसा कहकर और उससे विदा लेकर दिव्यदर्शन
उन दोनों बालकोंकी कीर्ति सुनकर किसी समय | महामुनि नारद अन्तर्धान हो गये ॥ ५०-५१ ॥
नारदजी अकस्मात् रौद्रकेतुके घर गये। उन्होंने उत्सुकतापूर्वक | मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर दोनों पुत्रोंने प्रसन्नतापूर्वक
उन दोनों बालकोंको पकड़कर उन्हें अपनी गोदमें | माता-पितासे कहा कि आप दोनों हम दोनोंको अनुष्ठानके
बैठाकर उनका मस्तक चूमते हुए उनके माता-पितासे | लिये आज्ञा प्रदान करें ॥ ५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नारदोपदेश' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
देवान्तक और नरान्तककी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट होना और उन्हें वरदान देना
व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन् ! उन दोनों (नरान्तक | [जिस प्रकार] किया, वह सब मैं अब तुमसे कहता हूँ।
और देवान्तक)-ने उस (पंचाक्षरी महाविद्या)-का | माता-पिताकी आज्ञा लेकर वे दोनों (देवान्तक और
अनुष्ठान कहाँ और कैसे किया ? आदरपूर्वक पूछनेवाले | नरान्तक) अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरे हुए
मुझसे वह सब विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ | एक ऐसे अत्यन्त सघन वनमें चले गये, जहाँ वायुकी
ब्रह्माजी बोले—हे व्यास ! तुमने बहुत अच्छा | भी गति अवरुद्ध हो जाती थी ॥ २-३ ॥
प्रश्न किया। देवान्तक और नरान्तकने उस अनुष्ठानको | वह वन वापियों एवं सरोवरोंसे समन्वित तथा पुष्पों
२७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
एवं पल्लवोंसे सुशोभित था। वहाँ पर्वतोंकी विशाल
गुफाएँ तथा अनेक प्रकारकी प्रस्तर-शिलाएँ थीं ॥ ४॥
वहाँ रहते हुए उन दोनोंने महान् तपस्या प्रारम्भ
कर दी। वहाँ वे दोनों एक अँगूठेपर स्थित होकर
मनको एकाग्र रखते हुए नारदजीद्वारा उपदिष्ट मंगलमयी
पंचाक्षरी विद्याका जप करते थे और भगवान् शंकरका
ध्यान करते थे। ऐसा करते हुए वे दोनों एक हजार
वर्षोंतक निराहार रहे, [तत्पश्चात्] दो हजार वर्षों
तक उन्होंने मात्र वायुका ही भक्षण किया, [तदनन्तर]
एक सहस्र वर्षपर्यन्त वे दोनों सूखे पत्तोंका आहार
करते रहे ॥ ५-७॥
इस प्रकार [पंचाक्षरी महाविद्याका] जप करते हुए
उन दोनोंको दस सहस्र वर्ष बीत गये, तब उनकी इस
महान् तपस्यासे उनके तेजमें बहुत वृद्धि हो गयी ॥ ८॥
[उनके उस तेजसे] सूर्य मन्द किरणोंवाले हो
गये थे और उनका प्रकाश क्षीण प्रतीत होता था।
उन दोनों (देवान्तक और नरान्तक)-का शरीर भस्मसे
लेपित था, उन्होंने व्याघ्रचर्म, गजचर्म और अक्षमाला
धारण कर रखी थी। वे दोनों उषाकालमें पुष्पों और
पल्लवोंसे भगवान् शम्भुका पूजन करते थे। हे वत्स!
उन दोनोंके अद्भुत तेजके प्रभावसे उस तपोवनमें
सिंह और हाथी आदि जन्मजात शत्रुतावाले प्राणी भी
वैररहित हो गये थे ॥ ९-१०१/२ ॥
उनके इस प्रकारके तपसे प्रसन्न पाँच मुखों और
तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकरने उन्हें [दर्शन दिये]।
उनके दस भुजाएँ थीं, वामभागमें अपर्णा (पार्वतीजी)
विराजमान थीं, शिरोभागमें गंगाजी [की धारा] शोभायमान
थीं और उन्होंने अपने दाहिने हाथमें डमरु ले रखा
था॥ ११-१२॥
नागहारसे समायुक्त उनके गलेमें रुण्डमाला सुशोभित
हो रही थी। नीलिमासे युक्त कण्ठवाले वे वृषभपर
आरूढ़ थे और अपनी प्रभासे आकाशको प्रकाशित कर
रहे थे। अनेक प्रकारके अलंकारोंसे युक्त और गौर वर्णके
शरीरवाले उन्होंने चन्द्रमाको सिरपर धारण कर रखा
था-ऐसे परमात्मा (शिव)-को देखकर वे दोनों अत्यन्त
हर्षको प्राप्त हुए ॥ १३-१४॥
[पहले तो] वे दोनों [हर्षातिरेकसे] नृत्य करने
लगे, तत्पश्चात् उन्होंने [भगवान् शिवको] साष्टांग
प्रणाम किया, तदनन्तर उन दोनोंने उन देवाधिदेवसे
कहा- हे देव! हम दोनोंके माता-पिता धन्य हैं, हमारे
जन्म, नेत्र, तप, कुल और शरीर धन्य हैं, जो [हम]
आप महेश्वरका दर्शन कर रहे हैं॥ १५-१६॥
आप वेदान्तके द्वारा भी अगोचर और अगम्य हैं,
आपके वर्णनमें वाणी आदि इन्द्रियाँ भी उपावृत्त हो
(लौट) जाती हैं, आगम और छहों शास्त्र भी आपको
जाननेमें कुण्ठित अर्थात् असफल हो जाते हैं, आप
मनकी सीमासे परे हैं॥ १७॥
आपकी स्तुति करनेमें सहस्र मुखवाले शेषनाग
और सनकादि मुनिगण भी सक्षम नहीं हैं। आप सम्पूर्ण
जगत्के स्रष्टा, पालनकर्ता और संहारक हैं। आप रंकको
राजा और राजाको रंक कर देते हैं, आप सर्पको कंगन
और कंगनको सर्प बना देते हैं। आप निर्धनको धनी और
धनवान्को निर्धन कर देते हैं ॥ १८-१९१/२ ॥
उन दोनोंकी इस प्रकारकी वाणी सुनकर उमापति
महादेवजी बोले- 'तुम दोनोंको साधुवाद है। मैंने तुम्हारे
अमृततुल्य वचनोंका प्रसन्नतापूर्वक श्रवण किया। मैं तुम
दोनोंकी तपस्यासे प्रसन्न होकर पार्वतीसहित वृषारूढ़ हो
ध्यानरत तुम दोनोंको वर देने आया हूँ। तुम दोनों मुझसे
अपने अभीष्ट वर माँग लो' ॥ २०-२११/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तब अन्धकासुरके
शत्रु भगवान् शिवके इन वचनोंको सुनकर उन दोनों-
नरान्तक और देवान्तकने हर्षगद्गद वाणीमें कहा कि 'हे
देवेश्वर ! हे सर्वेश्वर ! हे जगदीश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं,
यदि हमें वरदान देना चाहते हैं और हम दोनोंपर अनुग्रह
करना चाहते हैं, तो देवताओं, राजाओं, यक्षों, राक्षसों,
पिशाचों, मानवों, सर्पों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सभी
अस्त्र-शस्त्रों, वन्य और ग्राम्य पशुओं, ग्रहों-नक्षत्रों, भूतों,
दानवों, असुरों, कृमियों और कीड़ों-मकोड़ों आदिसे भी
दिन या रात्रिमें आपकी कृपासे हम दोनोंकी मृत्यु कदापि न
हो। हे जगदीश ! हमें त्रैलोक्यका राज्य और अपने चरणोंकी
क्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७५
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भक्ति भी प्रदान करें' ॥ २२-२७ ॥
ब्रह्माजी बोले-तब उन दोनों भक्तोंके तपसे प्रसन्न शूलपाणि वृषध्वज भगवान् शंकर उनके द्वारा माँगे जानेवाले सभी वरदानोंको सुनकर उनसे बोले- ॥ २८ ॥
शिवजी बोले-जो भी अभिलषित वरदान [तुम दोनोंने] माँगे हैं, वे तुम्हें वैसे ही प्राप्त होंगे, उसमें अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। तुम्हें किसीसे भय नहीं रहेगा, सब प्रकारसे तुम मृत्युसे रहित रहोगे और तुम्हें त्रैलोक्यका राज्य प्राप्त होगा। सबका अन्त कर देनेवाले यमराज भी तुम दोनोंसे भयभीत रहेंगे। ऐसा कहकर भगवान् शंकरने अभय प्रदान करनेवाला अपना करकमल उन दोनोंके सिरपर रखा ॥ २९-३० ॥
[तदनन्तर] उन दोनोंको अभीष्ट वरदान देकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। वे दोनों भी उनकी पूजा, परिक्रमा और वन्दनाकर उनसे अनुज्ञा ले उनके अन्तर्धान होनेपर अपने घर चले आये। उन दोनोंने प्रसन्नतापूर्वक अपने अत्यन्त प्रसन्न माता-पिताको प्रणाम किया ॥ ३१-३२ ॥
[तत्पश्चात्] उन दोनोंने माता-पिताका आलिंगनकर कर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। तब पिताने उन दोनोंका मस्तक सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक कहा-'तुम दोनोंको भगवान् शंकरका दर्शन प्राप्त होने और सुन्दर वर प्राप्त होनेसे तुम्हारा जन्म और कुल पवित्र हो गया और तुम दोनोंने महान् यशका अर्जन किया ॥ ३३-३४ ॥
हे पुत्रो ! तुम्हारा वृत्तान्त सुनकर मेरे अंग शीतल (पुलकित) हो गये हैं और मुझे अमृतपानसदृश परम तृप्तिका अनुभव हो रहा है, इसमें सन्देह नहीं है' ॥ ३५ ॥
तदनन्तर माताद्वारा अभ्यंजन (तेल-उबटन, स्नानादि) कराये जानेके बाद उन दोनोंने पिता और वेदशास्त्रके विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ अनेक प्रकारके सुन्दर स्वादवाले अन्नों (व्यंजनों)-का भोजन किया ॥ ३६ ॥
तदनन्तर माताने अनेक प्रकारके अलंकारों और आभूषणोंसे दोनों पुत्रोंको अलंकृत किया तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया। फिर उनसे बहुत-से आशीर्वाद प्राप्त करके उन्हें प्रणामकर विदा किया। तत्पश्चात् उन दोनों [देवान्तक और नरान्तक]-ने [सुखपूर्वक] रात बितायी ॥ ३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वरप्राप्तिका वर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
देवान्तककी देवलोकपर विजय
ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास !] तदनन्तर देवान्तक एवं नरान्तक प्रातः उठकर गुरुजनोंका ध्यानकर तथा उनका पूजनकर और सम्पूर्ण देवताओंका स्मरणकर तथा उन्हें प्रणाम करके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशामें गये। मल-मूत्रका त्यागकर और दन्त एवं जिह्वाका शोधनकर उन दोनोंने स्नान करके सन्ध्या-वन्दन एवं इष्टदेवोंका पूजन किया ॥ १-२ ॥
तदनन्तर उन दोनोंने ब्राह्मणोंका भक्तिपूर्वक पूजनकर उन्हें धन और वस्त्र प्रदान किये। फिर कांस्यपात्रस्थित घीमें [अपने मुखका] अवलोकनकर दक्षिणासहित उसे ब्राह्मणको दिया। उसके बाद स्वच्छ दर्पणमें मुख देखकर और वस्त्र धारणकर वे दोनों विचार करने लगे ॥ ३-४॥
ज्येष्ठ भ्राताने कहा-मैं महेश्वरके वरदानसे स्वर्गादिलोकोंकी विजय करूँगा और उन्हींके कृपाप्रसादसे तुम मृत्युलोक और पातालको विजित करो ॥ ५ ॥
ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उन दोनोंने इस प्रकारका निश्चय किया और एक शुभ दिन देखकर उनमेंसे एक [ज्येष्ठ भ्राता]-ने वायुके समान वेगसे स्वर्गलोकको गमन किया ॥ ६ ॥
अमरावती पहुँचकर उसने उद्यान (नन्दनकानन)-परिसरको तोड़-फोड़ डाला और फेंटा कसकर वह बलशाली [देवान्तक] इन्द्रके सम्मुख जा खड़ा हुआ ॥ ७ ॥
उस समय शीघ्रतापूर्वक दौड़ते हुए देवताओंका महान् कोलाहल होने लगा। [वे कहने लगे-] 'यह कौन है ? यह कौन है ? यह इन्द्रके समीप कैसे आ गया?' ॥ ८॥
२७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
'इसका वध करो, इसे कठोर बन्धनमें बाँधो, इस
मनुष्यको दूर भगाओ'—ऐसा कहते हुए वे (देवता)
दौड़ रहे थे। तब उसने सहसा बार-बार उछल-उछल
और कूद-कूदकर उन्हें दूर भगा दिया। उसके [बार-
बार] उछलने और कूदनेसे स्त्रियोंके गर्भ और बड़े-बड़े
वृक्ष गिर गये। [उस समय] पर्वतों, वनों और खानोंसहित
सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी। उसके शरीरकी कान्तिसे सारे
श्रेष्ठ देवता काले पड़ गये॥ ९-११॥
जिस प्रकार रोगोंद्वारा जीता गया व्यक्ति शीघ्र ही
विवर्ण (आभारहित) हो जाता है, वैसे ही उसे देखकर
सारे देवता विवर्ण हो गये॥ १२॥
हे मुने! उस समय इन्द्र भी विह्वल और विवर्ण हो
गये तथा कुछ देवगण तो दशों दिशाओंमें भाग चले और
कुछ युद्धके लिये तैयार होने लगे। कुछ अत्यन्त भयभीत
और अधीर हुए साधारण देवता उसकी शरणमें चले
गये। तब इन्द्र हाथमें वज्र लेकर चार दाँतोंवाले
[गजश्रेष्ठ ऐरावत] हाथीपर समारूढ़ हुए॥ १३-१४॥
[तदनन्तर] उन्होंने अत्यन्त भयंकर गर्जन किया,
जिससे त्रैलोक्य कम्पायमान हो उठा। उन्होंने युद्धके
लिये उद्यत श्रेष्ठ देवताओंको देखकर कहा—'तुम सब
क्या देखते हो, जब वह असुर यहाँ आया, तो तुम्हारा
पौरुष कहाँ चला गया था?' तब वे (देवगण) संग्रामके
लिये उद्यत हो आगे बढ़े॥ १५-१६॥
देवताओंको युद्धके लिये उत्सुक देखकर देवान्तकने
इन्द्रसे कहा—'हे शक्र! क्यों [व्यर्थ] श्रम करते हो?
मुझे प्राप्त वरदानोंपर विचार करो। सम्पूर्ण प्राणियोंका
अन्त कर देनेवाले यमराज भी मेरे भयसे त्रस्त होकर
भाग गये। भगवान् शंकरके वरदानसे मैं तुम्हारे वज्रको
तिनकेके समान मानता हूँ॥ १७-१८॥
मेरे श्वास छोड़नेमात्रसे तुम्हारे देखते-देखते देवता
सब दिशाओंमें पलायन कर जाते हैं, इसलिये हे इन्द्र!
मेरी बात सुनो और शान्तिपूर्वक अपने सभी पद
(अधिकार) मुझे सौंप दो और तुम स्वयं यहाँ-वहाँ
कहीं जाकर रहो, अन्यथा सब कुछ खोकर व्यर्थमें
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
मृत्युको प्राप्त करोगे। हे देवराज! क्या तुम नहीं जानते
कि मेरा नाम 'देवान्तक' है?'॥ १९-२०१/२॥
उसका इस प्रकारका वचन सुनकर इन्द्रका हृदय
विदीर्ण हो गया। [उस समय उन] शतक्रतु इन्द्रके
मुखसे प्रबल अग्नि इस प्रकार बाहर निकली, जैसे कि
अत्यन्त तप्त तैलमें जलकी बूँदें गिरनेपर छींटे बाहर
निकलते हैं॥ २१-२२॥
तदनन्तर क्रोधके आवेशमें इन्द्रने उससे कहा—
'तुम्हारे-जैसे कितने ही दानव मेरे द्वारा मारे गये हैं। रे
नीच असुर! तुम जो इस समय वरदानके गर्वसे यहाँ आ
गये हो, तो मेरे वज्र-प्रहारसे मारे जाकर तुम निश्चित
ही धरतीपर गिरोगे॥ २३-२४॥
रे बलाभिमानी! तेरे इस नामका समास अन्यपद-
प्रधान (बहुव्रीहि) है, जिसका आशय है देवतासे
अन्तको प्राप्त होनेवाला। [तूने भ्रमवश अपने नामको
तत्पुरुष समासान्त अर्थात् देवताओंका अन्त करनेवाला
मान लिया है], अगर तुझमें शक्ति है तो उसका प्रदर्शन
कर, केवल डींग मत हाँक। तदनन्तर [ऐसा कहकर]
इन्द्रने उसका वध करनेके उद्देश्यसे वज्रको मुट्ठीसे
कसकर पकड़कर उसपर प्रहार किया तो वज्र [उसके
शरीरसे टकराकर] उसी प्रकार सैकड़ों टुकड़े हो गया,
जैसे मिट्टीका बना कोई पात्र हाथसे छूटकर चूर-चूर
हो जाता है। देवान्तक [उस प्रहारसे] बिना व्याकुल हुए
रणक्षेत्रमें खड़ा रहा, उसके शरीरका रोम भी नहीं
टूटा॥ २५-२६॥
तदनन्तर उसने उन देवश्रेष्ठ इन्द्रकी पीठपर मुक्केसे
प्रहार किया। इससे वे वैसे ही गिर पड़े, जैसे आँधी
आनेसे वृक्ष गिर पड़ते हैं॥ २७॥
उसके इस प्रकारके पराक्रमको जानकर बल
दैत्यका वध करनेवाले इन्द्र पलायन कर गये। [यह
देखकर देवान्तक] उनके पीछे उसी तरह वेगपूर्वक
दौड़ा, जैसे मृगसमूहोंके पीछे सिंह दौड़ता है॥ २८॥
अपना भयंकर मुख फैलाकर उसने भागते हुए उन
इन्द्रसे कहा—'अब तुम क्यों भागे जा रहे हो, तुम्हारी
क्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७७
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बड़ी-बड़ी बातें कहाँ चली गयीं ? ॥ २९ ॥
हे इन्द्र ! सम्पूर्ण देवसमूहोंके साथ तुम मेरे सामने
आओ; क्योंकि श्रेष्ठ वीर पीठ दिखाकर भागनेवालोंको
नहीं मारते' । [ऐसा कहकर] उसने स्वयं उन देवताओंके
आगे आकर उन्हें मारा। उसने उनके मुखपर थप्पड़
मारकर उनका प्राणान्तकर उन्हें गिरा दिया ॥ ३०-३१ ॥
उसने किसीको घुमाकर पृथ्वीपर पटक दिया, तो
किसीको पाद-प्रहार, किसीको मुष्टि-प्रहार और कुछ
अन्य देवताओंको कुहनीके प्रहारसे मार डाला ॥ ३२ ॥
उसने कुछ अन्य देवताओंका गला पकड़कर उन्हें
तबतक घसीटा, जबतक कि उनका प्राणान्त नहीं हो
गया। उसने कुछ देवताओंके घुटने तोड़ डाले तो कुछकी
भुजाएँ। कुछ देवताओंकी जँघाएँ तोड़कर उसने उन्हें दूर
फेंक दिया। कुछ देवता ऊपरकी ओर मुख करके कुछ
नीचेकी ओर मुख किये गिरे पड़े थे और [भूतलपर
अपना] मुख पटक रहे थे। कुछ चलनेमें असमर्थ हो
गये थे ॥ ३३-३४ ॥
कुछ देवता दुखित होकर मन-ही-मन विचार कर
रहे थे कि जगदीश्वरने क्या अकस्मात् प्रलय प्रारम्भ कर
दिया। वे सभी देवता वैसे ही छिन्न-भिन्न [अंगोंवाले]
हो गये थे, जैसे सिंहसे पीड़ित होकर हाथी हो जाते हैं।
तदनन्तर उस जयशील देवान्तकने उसी प्रकार स्वयं गर्जन
किया, जैसे मेघोंके गर्जन करनेपर मयूरमण्डली गर्जन
करने लगती है। उस समय सूर्य भी अपनी भास्करी नामक
पुरीको छोड़कर दूर चले गये ॥ ३५-३७ ॥
[उस समय] सभी देवता अपने-अपने पदों
(अधिकारों)-को छोड़कर पलायन कर गये। तब वह
निर्भय मनसे स्वयं इन्द्रपदपर आसीन हो गया ॥ ३८ ॥
सभी देवता [उस समय उससे भयभीत होकर]
हिमालयकी श्रेष्ठ गुफाओंमें चले गये और कन्द-मूल-
फलका आहार करते हुए [बड़े ही] कष्टसे दिन बिताने
लगे ॥ ३९ ॥
तदनन्तर पृथ्वीसे तथा सभी दिशाओंसे अगणित
दैत्य-दानवोंने अनेक प्रकारके द्रव्यों, अनेक तीर्थोंसे लाये
हुए जल तथा अनेक ऋषियोंद्वारा उच्चारित मन्त्र-समूहों
और शंख-भेरी-मृदंग एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ
उस देवान्तकका अभिषेक किया ॥ ४०-४१ ॥
तत्पश्चात् दैत्योंने अपने उस स्वामीसे कहा-
'दैत्यकुलमें आपके सदृश न तो कोई हुआ है, न होगा।
आप हम सबको आज्ञा करें' ॥ ४२ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] इस प्रकार उसने
इन्द्र एवं उनके अग्रगामी (प्रधान) देवताओंको अकेले
ही जीत लिया और देवताओंपर राज्य किया तथा
अमरावतीकी रक्षा की ॥ ४३ ॥
तदनन्तर वह करोड़ों दैत्योंसे घिरा हुआ सत्यलोक
(ब्रह्मलोक)-को गया। तब ब्रह्माजी भी [उससे भयभीत
होकर] वहीं चले गये, जहाँ देवता पहलेसे गये
थे, उस समय वह कभी तो ब्रह्माजीके [हंसयुक्त]
विमानपर आरोहण करता था और कभी इन्द्रके वाहन
ऐरावतपर। तदनन्तर एक नायकको वहाँ (ब्रह्मलोकमें)
स्थापितकर (शासन-सूत्र सौंपकर) वह (देवान्तक)
वैकुण्ठलोकको गया, परंतु उसके पहुँचनेके पूर्व ही
भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीजीके साथ क्षीरसागरको चले
गये। तब उसने अपने एक परम विश्वासपात्र दैत्यको
वहाँ नियुक्तकर [अन्य दैत्योंसे] विचार-विमर्श करते
हुए कहा - ॥ ४४-४६ ॥
हे दैत्यो! बताओ, मैंने किसे नहीं जीता है ? मैं कहाँ
जाऊँ। तब उन दैत्योंने कहा कि 'देवताओंका कोई भी
स्थान अब शेष नहीं है ॥ ४७ ॥
अब आप विभिन्न लोकपालोंके पदोंपर दैत्यजनोंको
नियुक्तकर निर्भय होकर और अन्य कार्य छोड़कर केवल
अमरावतीका संरक्षण करें'। मन्त्रियोंद्वारा दिये गये इस
उचित परामर्शको सुनकर देवान्तकने परम प्रसन्नतापूर्वक
उनके कथनानुसार कार्य किया ॥ ४८-४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'स्वर्गविजय-वर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥