श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०२ ] * देवान्तक और नरान्तककी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट होना * २७३
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बुलवाकर परम भक्तिसे उनका भलीभाँति पूजनकर उनसे | कहा— ॥ ४३१/२ ॥
पूछा कि 'हे श्रेष्ठ द्विजो ! इन दोनोंका क्या नाम रखना | नारदजी बोले—मैं तुम्हारे पुत्रद्वयकी अद्भुत
चाहिये, भूत और भविष्यका ज्ञान करके विचारपूर्वक | और मंगलमयी कीर्तिको सुनकर यहाँ आया हूँ ॥ ४४ ॥
मुझे बतलायें ?' ॥ ३५-३६१/२ ॥ | हे मुने ! इन दोनोंकी कीर्ति आगे और अद्भुत
तब उन लोगोंने ध्यानपूर्वक देखकर कहा—हे | होगी। हे मुने ! तुम्हारा महान् भाग्य है, जो तुम्हें इस
ब्रह्मन् ! हम लोगोंके मतसे तुम इन दोनोंके आचरणके अनुरूप | प्रकारके पुत्रद्वय प्राप्त हुए हैं ॥ ४५ ॥
इनके नाम देवान्तक और नरान्तक रखो ॥ ३७१/२ ॥ | इन्हें देखकर दूसरे लोगोंका मन आनन्दित हो जाता
उनके इस प्रकारके वचन सुनकर ब्राह्मणोंकी | है, तो स्वजनोंका क्या कहना ! नारदजीद्वारा कहे गये ऐसे
भक्तिमें संलग्न रहनेवाले उस ब्राह्मण रौद्रकेतुने अपनी | मंगलमय वचनको सुनकर तब वे दोनों—माता-पिता उन
शाखामें कही गयी विधिके अनुसार उन दोनोंका | नारदमुनिको नमनकर बोले—' [हे मुनिश्रेष्ठ ! ] अब आपकी
नामकरण किया तथा ब्राह्मणों एवं सम्पूर्ण नगर- | कृपासे इन दोनों पुत्रोंको दीर्घायुकी प्राप्ति हो। आप ऐसा
निवासियोंको भोजन कराया ॥ ३८-३९ ॥ | अनुग्रह करें, जिससे ये दोनों पराक्रमी, लोकमें प्रसिद्ध,
तदनन्तर सुमेरु और मन्दराचलकी भाँति प्रतीत | सर्वज्ञ और शत्रुओंका दमन करनेवाले हों' ॥ ४६-४८ ॥
होनेवाले वे दोनों बालक उसी प्रकार बढ़ने लगे, जैसे | ब्रह्माजी बोले—रौद्रकेतु, शारदा और उनके दोनों
समुद्र-तटके तालवृक्ष और बाँसके अंकुर तीव्रतासे बढ़ते | पुत्रोंकी भक्तिको देखकर नारदजीने उन दोनों बालकोंको
हैं। वे दोनों अपनी स्वाभाविक इच्छासे जहाँ-जहाँ पैर | पंचाक्षरी महाविद्याका उपदेश किया ॥ ४९ ॥
रख देते थे, पातालस्थित शेषनागका सिर वहाँ-वहाँ झुक | उन्होंने कहा कि हे पुत्रो ! इससे तुम कामदेवके
जाता था ॥ ४०-४१ ॥ | शत्रु भगवान् शिवको सम्यक् रूपसे प्रसन्न करो तथा
जब वे दोनों खड़े होते थे तो सूर्यमण्डल उनके | उनके सिरपर अपना अभयहस्त रखकर [पंचाक्षरी
सिरपर स्थित प्रतीत होता था। वे दोनों अपने माता- | महाविद्याके] अनुष्ठानका आदेश दिया। हे ब्रह्मन् ! तब
पिताको अनेक प्रकारके कौतुक दिखलाया करते थे ॥ ४२ ॥ | रौद्रकेतुसे ऐसा कहकर और उससे विदा लेकर दिव्यदर्शन
उन दोनों बालकोंकी कीर्ति सुनकर किसी समय | महामुनि नारद अन्तर्धान हो गये ॥ ५०-५१ ॥
नारदजी अकस्मात् रौद्रकेतुके घर गये। उन्होंने उत्सुकतापूर्वक | मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर दोनों पुत्रोंने प्रसन्नतापूर्वक
उन दोनों बालकोंको पकड़कर उन्हें अपनी गोदमें | माता-पितासे कहा कि आप दोनों हम दोनोंको अनुष्ठानके
बैठाकर उनका मस्तक चूमते हुए उनके माता-पितासे | लिये आज्ञा प्रदान करें ॥ ५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नारदोपदेश' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
देवान्तक और नरान्तककी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट होना और उन्हें वरदान देना
व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन् ! उन दोनों (नरान्तक | [जिस प्रकार] किया, वह सब मैं अब तुमसे कहता हूँ।
और देवान्तक)-ने उस (पंचाक्षरी महाविद्या)-का | माता-पिताकी आज्ञा लेकर वे दोनों (देवान्तक और
अनुष्ठान कहाँ और कैसे किया ? आदरपूर्वक पूछनेवाले | नरान्तक) अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरे हुए
मुझसे वह सब विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ | एक ऐसे अत्यन्त सघन वनमें चले गये, जहाँ वायुकी
ब्रह्माजी बोले—हे व्यास ! तुमने बहुत अच्छा | भी गति अवरुद्ध हो जाती थी ॥ २-३ ॥
प्रश्न किया। देवान्तक और नरान्तकने उस अनुष्ठानको | वह वन वापियों एवं सरोवरोंसे समन्वित तथा पुष्पों