यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
कीजिए. सोमरस मधुर है. हम यज्ञ में आप का आह्वान करते हैं. आप अपनी प्रजा
की सर्वविधि ( सब प्रकार से ) रक्षा करते हैं. आप प्रजा का पालनपोषण और उन्हें
बहुविधि प्रकाशित करते हैं. ( ३० )
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. ( ३१ )
सूर्य सब को प्रकाशित करने वाले, सब कुछ जानने वाले व सारे विश्व को
देखने में समर्थ हैं. वे ऊर्ध्वगामी पताका वहन करते हैं. ( ३१ )
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ २ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. ( ३२ )
हे वरुण देव! आप पवित्र बनाने वाले व भरणपोषण करने वाले हैं. आप जिस
दृष्टि से देखते हैं. हम भी उसी दृष्टि से ( लोगों को ) देखने में आप का अनुकरण
करें. ( ३२ )
दैव्यावध्वर्यू आ गत १४ रथेन सूर्यत्वचा.
मध्वा यज्ञ १४ समञ्जाथे.
तं प्रत्नथायं वेनश्चित्रं देवानाम्.. ( ३३ )
हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों दिव्य व ( यज्ञ के ) अध्वर्यु ( पुरोहित ) हैं. आप
सूर्य के समान चमकने वाले रथ से यहां आ जाइए. आप देवताओं के इस यज्ञ को
प्रयत्नपूर्वक ( अच्छी तरह से ) पूर्ण कराइए. ( ३३ )
आ न ऽ इडाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव ऽ एतु.
अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा.. ( ३४ )
हे सविता देव! आप बहुप्रशंसित, कल्याणकारी व अन्नदाता हैं. आप हमारे
यहां यज्ञ स्थान में पधारने की कृपा कीजिए. आप युवा व जगत् के पालनहार हैं.
आप हम सभी को अपनी बुद्धि से तृप्त करने की कृपा कीजिए. ( ३४ )
यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा ऽ अभि सूर्य. सर्वं तदिन्द्र ते वशे.. ( ३५ )
हे इंद्र देव! आप शत्रुनाशी हैं. सूर्य जैसे अंधेरे का नाश करते हैं, वैसे ही आप
वृत्र का नाश करते हैं. हे इंद्र देव! सब कुछ आप के ही वश में है. ( ३५ )
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचनम्.. ( ३६ )
हे सूर्य! आप तारक, संसार के लिए दर्शनीय व ज्योति के आविष्कारक हैं.
आप अपने प्रकाश से सब को प्रकाशित करने वाले हैं. ( ३६ )
तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्वितत १४ सं जभार.
यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै.. ( ३७ )
यजुर्वेद – ३७३
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
सूर्य की दिव्यता व महिमा व्यापक है. सूर्य संसार के मध्य विराजमान ( स्थित )
व विशाल निर्माण और संहार करने वाले हैं. जब वे अलग कर के अपनी हरी
किरणों को साधते हैं, तब रात्रि संसार को अंधकार से घेर लेती है. ( ३७ )
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे.
अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. ( ३८)
सूर्य मित्र देव और वरुण देव के साथ मनुष्यों को सब ओर से देखते हैं. सूर्य
रूपवान हैं. स्वर्गलोक उन के उस रूप को धारण करता है. दूसरा कृष्ण और हरित
रूप है. उसे आकाश धारण करता है. ( ३८ )
बण्महाँ २ असि सूर्य बडादित्य महाँ २ असि.
महस्ते सतो महिमा पनस्यतेद्धा देव महाँ २ असि.. ( ३९)
हे सूर्य! आप बड़े ही महान् हैं. हे आदित्य देव! आप बड़े महान् हैं. महान्
होने के कारण ही सभी आप की महिमा गाते हैं. वास्तव में आप सभी देवों में
महान् हैं. ( ३९ )
बट् सूर्य श्रवसा महाँ २ असि सत्रा देव महाँ २ असि.
महा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम्.. ( ४०)
हे सूर्य! आप प्रख्यात, महान्, सभी देवों में महान् व असुरनाशक हैं. आप
पुरोहित, प्रकाशक व ज्योति के भंडार हैं. ( ४० )
श्रायन्त ऽ इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत.
वसूनि जाते जनमान ऽ ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. ( ४१)
सूर्य से उत्पन्न हो कर उन के संरक्षण में उन की किरणें संसार के वैभव
को भोगती हैं, वैसे ही हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए ओज और धन को धारण
करें. ( ४१ )
अद्या देवा ऽ उदिता सूर्यस्य निर १७ हसः पिपृता निरवद्यात्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. ( ४२)
हे यजमानो! आज सूर्य की किरणें उदित हो कर हमें पापों व हिंसा से बचाएं.
वे मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, समुद्र, पृथ्वी और स्वर्गलोक हम अहिंसक
यजमानों की इच्छा पूरी करने की कृपा करें. ( ४२ )
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च.
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. ( ४३)
काले अंधकार से भरे पथ पर घूमते हुए सविता देव अपने सोने के रथ पर
३७४ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
सवार हो कर लोकों को देखते हुए जाते हैं. सविता देव मनुष्यों को निवेश ( काम
में लगाते ) करते हुए जाते हैं. ( ४३ )
प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विशपतीव बीरिट ऽ इयाते.
विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान्.. (४४)
यजमान अपने कल्याण के लिए उषाकाल में वायु व पूषा देव को आमंत्रित
करते हैं. यजमान इन देवों के लिए कुश के आसन भेंट करते हैं. ये देव ठाटबाट
से राजा की तरह पधारते हैं. ( ४४ )
इन्द्रवायू बृहस्पतिं मित्राग्निं पूषणं भगम्. आदित्यान् मारुतं गणम्.. (४५)
हम इंद्र देव, वायु देव, बृहस्पति देव, मित्र देव, अग्निपूषा देव भग देव,
आदित्यगण और मरुद्गण का आह्वान करते हैं. ( ४५ )
वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः. करतां नः सुराधसः.. (४६)
वरुण देव और मित्र देव संसार के मित्र हैं. वे अपनी पूरी क्षमता से अपने सभी
रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ये देव हमें श्रेष्ठ धनों से संपन्न
बनाने की कृपा करें. ( ४६ )
अधि न ऽ इन्द्रैषां विष्णो सजात्यानाम्.
इता मरुतो अश्विना.
तं प्रत्नथायं वेनो ये देवास ऽ आ न ऽ इडाभिर्विश्वेभिः सोम्यं मध्वोमासश्चर्षणीधृतः.. (४७)
हे इंद्र देव! हे विष्णु! आप पधारिए. आप सजातीय बंधुओं के बीच
अधिष्ठित होइए. मरुद्गण और अश्विनी देव भी अधिष्ठित होने की कृपा करें.
सभी देव सर्वद्रष्टा हैं. सभी देव मधुर सोमरस को पीने व हमें धारण करने की
कृपा करें. ( ४७ )
अग्न ऽ इन्द्र वरुण मित्र देवाः शर्धः प्र यन्त मारुतोत विष्णो.
उभा नासत्या रुद्रो अध ग्नाः पूषा भगः सरस्वती जुषन्त.. (४८)
हे अग्नि! हे इंद्र देव! हे वरुण देव, हे मित्र देव! हे मरुद्गण! हे विष्णु! आप
हमें सुख व सामर्थ्य प्रदान कीजिए. अश्विनीकुमार, रुद्रगण, पूषा, भग, सरस्वती
आदि देवता भी हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा करें. ( ४८ )
इन्द्राग्नी मित्रावरुणादिति १७ स्वः पृथिवीं द्यां मरुतः पर्वताँ २ अपः.
हुवे विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं भगं नु श १७ स १७ सवितारमूतये.. (४९)
हम इंद्र देव, अग्नि, मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक,
मरुद्गण, पर्वत, जल, विष्णु, पूषा देव, बृहस्पति देव, भग देव व सविता देव
यजुर्वेद - ३७५
अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतौ सजोषा:.
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
का आह्वान करते हैं. हम सभी देवों से रक्षा साधनों सहित पधारने का अनुरोध करते
हैं. ( ४९ )
अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतौ सजोषा:.
य: श १७ सते स्तुवते धायि पप्र ऽ इन्द्रज्येष्ठा अस्माँ २ अवन्तु देवा:.. (५०)
यजमान हेतु मेह ( वर्षा ) बरसाने वाले, वृत्रासुर का नाश करने वाले, शत्रुओं
को रुलाने वाले, पर्वतवासी इंद्र देव हमारा भरणपोषण व हमारी रक्षा करने की
कृपा करें. इंद्र देव वरिष्ठ हैं. उन की हम स्तुति करते हैं. उन की हम उपासना करते
हैं. वे हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ५० )
अर्वाञ्चो अद्या भवता यजत्रा आ वो हार्दि भयमानो व्येयेम्.
त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदो यजत्रा:.. (५१)
हे देवगण! आप हमारा कल्याण व हमारे यज्ञ की रक्षा कीजिए. आज आप हमारे
निकट पधारिए. हम डरे हुए यजमानों के हृदय में प्रेम भाव भरिए. आप बुरे कामों व
बुरे लोगों से हमारी रक्षा कीजिए. ( ५१ )
विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऽ ऊती विश्वे भवन्त्वग्नय: समिद्धा:.
विश्वे नो देवा ऽ अवसा गमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे.. (५२)
आज हमारे इस यज्ञ में मरुद्गण सब की रक्षा के लिए पधारने की कृपा करें.
अग्नि व विश्व हमारी रक्षा के लिए पधारने की कृपा करें. समिधाओं से इंद्र देव
बढ़ोतरी पाएं. सभी देव हमें बल प्रदान करें. सभी देव हमें अन्न व धन प्रदान करने
की कृपा करें. ( ५२ )
विश्वे देवा: शृणुतेम १७ हवं मे ये अन्तरिक्षे य ऽ उप द्यवि ष्ठ.
ये अग्निजिह्वा ऽ उत वा यजत्रा ऽ आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वम्.. (५३)
सभी देव हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. जो देव अंतरिक्ष लोक में हैं, जो
देव स्वर्गलोक में हैं, वे देव भी हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. अग्निमुख वाले
देव हमारी दी हुई हवि को स्वीकार करने की कृपा करें. यज्ञ में हम ने कुश के
आसन उन के लिए बिछाए हैं. वे कृपया उस पर विराजें. ( ५३ )
देवेभ्यो हि प्रथमं यज्ञियेभ्योऽमृतत्व १७ सुवसि भागमुत्तमम्.
आदिद्दामान १७ सवितर्व्यूर्णुषेऽनूचीना जीविता मानुषेभ्य:.. (५४)
हे सविता देव! आप देवताओं में प्रथम हैं. आप यज्ञ करने वालों को अमृत और
उत्तम सौभाग्य प्रदान करते हैं. वे फिर ( अंतरिक्ष में ) अपनी किरणों का विस्तार
करते हैं. मनुष्यों के जीवन के लिए वे यत्न करते हैं. ( ५४ )
प्र वायुमच्छा बृहती मनीषा बृहद्रयिं विश्ववार १७ रथप्राम्.
३७६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
द्युतद्यामा नियुतः पत्यमानः कविः कविमियक्षसि प्रयज्यो.. (५५)
हे पुरोहित! आप वैभवशाली, कवि व रथवान हैं. हम श्रेष्ठ बुद्धि से आप
की उपासना करते हैं. आप श्रेष्ठ बुद्धि से यज्ञ करने में अपने को लगाइए. आप
वायु की श्रेष्ठ बुद्धि से उपासना कीजिए. (५५)
इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतं. इन्दवो वामुशन्ति हि.. (५६)
हे इंद्र देव! हे वायु! आप के इन पुत्रों ने आप के लिए सोमरस निचोड़ कर
तैयार किया है. आप सोमरस को ग्रहण करने के लिए पधारिए. इंद्र देव और वायु
देव हमें शांति प्रदान करने की कृपा करें. (५६)
मित्र धँ हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्. धियं घृताची धँ साधन्ता.. (५७)
मित्र देव और वरुण देव पवित्रतादायी, दक्ष और पाप धोने वाले हैं. हम घी से
सींची हुई, साधी हुई बुद्धि से उन की आराधना करते हैं. (५७)
दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः.
आ यात धँ रुद्रवर्तनी.
तं प्रत्नथायं वेनः.. (५८)
हे अश्विनीकुमारो! आप युवा व सुंदर हैं. आप आइए और कुश वाले आसन
पर विराजिए. आप रुद्र जैसी वृत्ति वाले हैं, आप आइए. हम ने आप के लिए
प्रयत्नपूर्वक सोमरस तैयार किया है. आप उसे ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (५८)
विद्यदी सरमा रुग्णमद्रेर्महि पाथः पूर्व्य धँ सध्र्यक्कः.
अग्रं नयत्सुपद्यक्षराणामच्छा रवं प्रथमा जानती गात्.. (५९)
अग्रगण्य श्रेष्ठ अक्षर वाले मंत्रों से यजमान देवों की उपासना करते हैं. पत्थरों से
कूटकूट कर सोमरस निचोड़ा गया है. विद्वान् इस सोमरस का सेवन करते हैं. (५९)
नहि स्पशमविन्दन्नन्यमस्माद्वैश्वानरात्पुर ऽ एतारमग्नेः.
एमेनमवृधन्नमृता ऽ अमर्त्यं वैश्वानरं क्षेत्रजित्याय देवाः.. (६०)
हे अग्नि! यजमानों ने वैश्वानर के बिना और किसी को अग्रणी नहीं जाना.
यजमानों ने आप को अमर जाना. मनुष्यों ने विभिन्न क्षेत्रों में जीत पाने के लिए
वैश्वानर की बढ़ोत्तरी की (६०)
उग्रा विघनिना मृध ऽ इन्द्राग्नी हवामहे. ता नो मृडात ऽ ईदृशे.. (६१)
हे इंद्र देव! हे अग्नि! आप उग्र व विघ्न नाशक हैं. हम आप दोनों देवों का
आह्वान करते हैं. आप इस तरह की स्थितियों में हमें सुख प्रदान करने की कृपा
कीजिए. (६१)
यजुर्वेद - ३७७
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
उपास्मै गायत नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ २ इयक्षते.. (६२)
हे यजमानो! देवताओं द्वारा चाहे गए सोमरस को तैयार कीजिए. सोमरस पवित्र
है. आप उस के लिए और स्तुतियां गाइए. ( ६२ )
ये त्वाहिहत्ये मघवन्नवर्धन्ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ.
ये त्वा नूनमनुमदन्ति विप्राः पिबेन्द्र सोम १४ सगणो मरुद्भिः.. (६३)
हे इंद्र देव! आप धनवान व हरे रंग के घोड़े वाले हैं. मरुद्गण मेधावी हैं. उन्होंने
अहि, शंबर आदि शत्रुओं के नाश के लिए आप को प्रेरित किया. गायों को छुड़ाने
पर उन्होंने आप की स्तुतियां गाईं. वे सदैव आप का अनुमोदन करते हैं. हे इंद्र देव!
आप विप्र हैं. आप पधारिए. आप मरुद्गण के साथ सोमरस को पीने की कृपा
कीजिए. ( ६३ )
जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय मन्द्र ऽ ओजिष्ठो बहुलाभिमानः.
अवर्धनिन्द्रं मरुतश्चिदत्र माता यद्वीरं दधनद्धनिष्ठा.. (६४)
हे इंद्र देव! आप लोगों द्वारा चाहे गए हैं. आप उग्र, साहसी, बुद्धिमान, वेगवान,
ओजवान व बहुत अभिमानी हैं. हे इंद्र देव! ( शत्रुनाश हेतु ) देव माता अदिति ने आप
को गर्भ में धारण किया. मरुद्गणों ने निष्ठापूर्वक आप की स्तुति की है. ( ६४ )
आ तू न ऽ इन्द्र वृत्रहन्नस्माकमर्धमा गहि. महान्महीभिरूतिभिः.. (६५)
हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक व संरक्षणधर्मा हैं. आप हमारे पास पधारिए.
आप अपनी महान् महिमा और रक्षाओं के साथ पधारने की कृपा कीजिए. ( ६५ )
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा ऽ असि स्पृधः.
अशस्तिहा जनिता विश्वतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः.. (६६)
हे इंद्र देव! आप सभी शत्रुओं के साथ स्पर्धा करते हैं. आप दुष्टों का दलन
करते हैं. आप सुख उपजाते हैं. ( ६६ )
अनु ते शुष्मं तुरयन्तमीयतुः क्षोणी शिशुं न मातरा.
विश्वास्ते स्पृधः श्रथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि.. (६७)
हे इंद्र देव! जैसे मातापिता अपने शिशु को संरक्षण देते हैं वैसे ही आप हमें
संरक्षण दीजिए. जब आप शत्रु से स्पर्द्धा करते हैं. तब सारी शत्रु सेना भयभीत हो
जाती है. ( ६७ )
यज्ञो देवानां प्रत्येति सुम्नमादित्यासो भवता मृडयन्तः.
आ वोर्वाची सुमतिर्ववृत्याद १४ होशिचद्या वरिवोवित्तरासत्.. (६८)
हे यजमानो! हम देवताओं के प्रति यज्ञ करते हैं. हे आदित्य देव! आप अच्छे
३७८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
मन वाले हैं. आप सुखदाता हैं. आप हमें सुमति दीजिए. आप शत्रुओं की बुद्धि को
हमारे प्रति अनुकूल करने की कृपा कीजिए. ( ६८ )
अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्व १४ शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्.
हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघश १४ स ऽ ईशत.. (६९)
हे सविता देव! आप हमारे घरों व अपने रक्षासाधनों से हमारी रक्षा व हमारा
कल्याण कीजिए. आप सोने की जीभ वाले हैं. हम आप को शीश नवाते हैं. ( ६९ )
प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वर्युभिर्मधुमन्तः सुतासः.
वह वायो नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसो मदाय.. (७०)
हे पुरोहितो! आप पत्थरों से कूट कर, निचोड़ कर सोमरस तैयार कीजिए.
हे वायु! आप घोड़े जोतिए, रथ लाइए. आप आनंद के लिए सोमरस पीने की कृपा
कीजिए. ( ७० )
गाव ऽ उपावातावतं मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (७१)
हे यज्ञ में बह रही जलधाराओ! आप पृथ्वी की रक्षा कीजिए. हे पुराहितो! आप
पत्थरों से कूट कर, निचोड़ कर सोमरस तैयार कीजिए. आप के दोनों कान सोने
के बने हुए हैं. आप उन से हमारी स्तुति सुनने की कृपा कीजिए. ( ७१ )
काव्योराजानेषु क्रत्वा दक्षस्य दुरोणे. रिशादसा सधस्थ ऽ आ.. (७२)
हे देवगण! आप राजा व दक्ष हैं. आप इस यज्ञ में पधारने व यज्ञ पूरा कराने
की कृपा कीजिए. ( ७२ )
दैव्यावध्वर्यू आ गत १४ रथेन सूर्यत्वचा.
मध्वा यज्ञ १४ समञ्जाथे.
तं प्रत्नथायं वेनः.. (७३)
हे पुरोहितो! आप दिव्य हैं. आप सूर्य की तरह चमकने वाले रथ से इस यज्ञ में
पधारने की कृपा कीजिए. हम ने प्रयत्नपूर्वक आप के लिए हवि तैयार की है. ( ७३ )
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी ३ दुपरि स्विदासी ३ त्.
रेतोधा ऽ आसन्महिमान ऽ आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात्.. (७४)
सोम पवित्र हैं. उन की तिरछी किरणों का प्रकाश बहुत दूर तक फैलता है. वे
नीचे ऊपर सब ओर व्याप्त हैं. ये किरणें वीर्य धारण करती हैं. ये किरणें महिमामयी
हैं. ये ऊपर नीचे सब ओर से संसार को धारण करती हैं. ( ७४ )
आ रोदसी अपृणदा स्वर्म्हज्जातं यदेनमपसो अधारयन्.
सो अध्वराय परि णीयते कविरत्यो न वाजसातये चनोहितः.. (७५)
यजुर्वेद - ३७९
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में अग्नि को यजमान धारण करते हैं. अग्नि सब
को प्रकाशित करते हैं. यज्ञ के लिए हम अग्नि का वरण करते हैं. जैसे घोड़ा सब
ओर विचरता है, वैसे ही अग्नि सब ओर विचरते हैं. ( ७५ )
उक्थेभिर्वृत्रहन्तमा या मन्दाना चिदा गिरा. आङ्गूषैराविवासतः.. (७६)
हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक व आनंददाता हैं. हम श्रेष्ठ उक्थों ( मंत्रों ) से
आप की आराधना करते हैं. ( ७६ )
उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये. सुमृडीका भवन्तु नः.. (७७)
हम आप के पुत्र हैं. अमर देवता हमारी वाणियां सुनने व हमारे प्रति
कल्याणकारी होने की कृपा करें. ( ७७ )
ब्रह्माणि मे मतयः शं ष्ठ सुतासः शुष्म ऽ इयर्ति प्रभृतो मे अद्रिः.
आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नो अच्छ.. (७८)
आप के पुत्रों की बुद्धि सुखदायी है. हम ने पत्थरों से कूट कर सोमरस निचोड़ा
है. आप अपने हरे घोड़ों को साधिए, जोतिए और यहां पधारने की कृपा कीजिए.
हम आप के लिए उक्थ मंत्र गाते हैं. ( ७८ )
अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावाँ २ अस्ति देवता विदानः.
न जायमानो नशते न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध.. (७९)
हे इंद्र देव! आप से अधिक उत्तम कोई नहीं है. आप से ज्यादा धनवान, आप
से ज्यादा कोई देवता विद्वान् नहीं है. आप जैसा कोई न उत्पन्न हुआ है, न ही उत्पन्न
होगा. आप जैसे कार्य भी न किसी ने किए हैं, न करेंगे. ( ७९ )
तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ ऽ उग्रस्त्वेषनृम्णः.
सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यं विश्वे मदन्त्यूमाः.. (८०)
इंद्र देव भुवनों में ज्येष्ठ, उग्र व शत्रुनाशक हैं. यज्ञ में रक्षा करने वाले सभी
देवगण उन को प्रसन्न करते हैं. संसार में इंद्र देव सब का कल्याण करते हैं. ( ८० )
इमा ऽ उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम.
पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोभि स्तोमैरनूषत.. (८१)
हे देवगण! आप बहुत धनवान हैं. आप हमारी वाणी की बढ़ोतरी करने की
कृपा कीजिए. आप अग्नि जैसे वर्ण ( रंग ) वाले और पवित्र हैं. हम आप को
सर्वविध जानना चाहते हैं. हम सर्वविध आप की स्तुति कर रहे हैं. ( ८१ )
यस्यायं विश्व ऽ आर्यो दासः शेवधिपा अरिः.
तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत्सो अज्यते रयिः.. (८२)
३८० - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
जिस का ( इंद्र देव का ) सारा संसार दास है, सारे आर्य जिस के दास हैं,
उदारताहीन लोग उस के लिए दुश्मन हैं. इंद्र देव हमें आयुष्मान बनाने की कृपा करें.
वे हमें धनवैभव प्रदान करें, ताकि हम उस धन का उपभोग कर सकें. ( ८२ )
अय १७ सहस्रम्ऋषिभिः सहस्कृतः समुद्र ऽ इव प्रपथे.
सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. ( ८३ )
इंद्र देव को हजारों ऋषियों ने अपने स्तोत्रों से बलवान बनाया है. वे हजारों
कार्य करने में समर्थ हैं. वे समुद्र की भांति विस्तृत हैं. वे अतीव महिमावान व
गणमान्य हैं. यज्ञों में ब्राह्मणों के कहे अनुसार उन की महिमा का गुणगान किया
जाता है. ( ८३ )
अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्व १७ शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्.
हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघश १७ स ऽ ईशत.. ( ८४ )
हे सविता देव! आप सोने की जीभ वाले और कल्याणदायी हैं. आप हमारे
घरों की सब ओर से रक्षा करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. पापी हम पर
कब्जा न जमा सकें. हम आप को बारबार नमन करते हैं. ( ८४ )
आ नो यज्ञं दिविस्पृशं वायो याहि सुमन्मभिः.
अन्तः पवित्र ऽ उपरि श्रीणानोय १७ शुक्नो अयामि ते.. ( ८५ )
हे वायु! स्वर्गलोक तक छूने ( पहुंचने ) वाले हमारे इस यज्ञ में आप पधारने
की कृपा कीजिए. हम अच्छे मन वाले यजमान आप से आने का अनुरोध करते हैं.
सोम पवित्र, चमकीले व अत्यंत शोभादायक हैं. हम ऊपर से धरती पर आए इस
सोमरस को आप के पीने के लिए भेंट करते हैं. ( ८५ )
इन्द्रवायू सुसन्दृशा सुहवेह हवामहे.
यथा नः सर्व ऽ इज्जनोनमीवः सङ्गमे सुमना ऽ असत्.. ( ८६ )
हे इंद्र देव! हे वायु! आप अच्छी तरह से आह्वान के योग्य हैं. हम अच्छी तरह
आप का आह्वान करते हैं, जिस से हमारे सभी ( आत्मीय ) जन रोग रहित व श्रेष्ठ
मन वाले हो जाएं. ( ८६ )
ऋधगित्था स मर्त्यः शशमे देवतातये.
यो नूनं मित्रावरुणावभिष्टय ऽ आचक्रे हव्यदातये.. ( ८७ )
जो मनुष्य अपने सुख के लिए आप का आह्वान करते हैं, निश्चय ही जो मनुष्य
अपने अभीष्ट की पूर्ति के लिए मित्र देव और वरुण देव का आह्वान करते हैं, हवि
देने के लिए मनुष्य आप का आह्वान करते हैं. आप उन का अभीष्ट पूरा करने की
कृपा कीजिए. ( ८७ )
यजुर्वेद - ३८१
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
आ यातमुप भूषतं मध्वः पिबतमश्विना.
दुग्धं पयो वृषणा जेन्यावसू मा नो मर्धिष्टमा गतम्.. (८८)
हे अश्विनीकुमारो! आप यज्ञ में आने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ की शोभा
बढ़ाइए. आप यज्ञ में दूध और रसों को पीने व धन बरसाने की कृपा कीजिए. (८८)
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता.
अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (८९)
हे अश्विनीकुमारो! आप यज्ञ में पधारने, दिव्य तथा सत्यवाणी प्रदान करने
की कृपा कीजिए. देवगण मनुष्यों के हितैषी हैं. वे यज्ञ में पंक्ति में पधारें और
शत्रुनाश की कृपा करें. (८९)
चन्द्रमा ऽ अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि.
रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं ६४ हरिरेति कनिक्रदत्.. (९०)
सोम देव चंद्रमा के भीतर से निकले हैं. सोम देव दीप्तिमान ( चमकदार ) व
रंगबिरंगे हैं. वे घन गर्जना के साथ स्वर्गलोक की ओर दौड़ते हैं. वे हम पर धन की
वर्षा करने की कृपा करें. (९०)
देवं देवं वोवसे देवं देवमभिष्टये.
देवं देव ६४ हुवेम वाजसातये गृणन्तो देव्या धिया.. (९१)
हम अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए देव का आह्वान करते हैं. हम अपनी अभीष्ट
सिद्धि के लिए देव को हवि समर्पित करते हैं. हम बुद्धिपूर्वक देवता का आह्वान
करते हैं. (९१)
दिवि पृष्ठो अरोचताग्निर्वैश्वानरो बृहन्.
क्ष्मया वृधान ऽ ओजसा चनोहितो ज्योतिषा बाधते तमः.. (९२)
वैश्वानर देव स्वर्गलोक के पृष्ठ देश में दीप्त हैं. वैश्वानर देव हवि से बढ़ोतरी
पाते हैं. वैश्वानर देव दीप्ति से अंधकार नष्ट करते हैं. (९२)
इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात् पद्धतीभ्यः.
हित्वी शिरो जिह्वया वावदच्चरत्त्रि ६४ शतपदा न्यक्रमीत्.. (९३)
हे इंद्र देव! उषा देवी पैर रहित हो कर भी पैर वालों से पूर्व आती हैं. हे अग्नि!
सिर रहित होने पर भी प्राणियों के सिर प्रेरित करती हैं. हे अग्नि! मनुष्यों की जिह्वा
से बोलती हुई आगे बढ़ती हैं. दिन में सैकड़ों पैरों से बढ़ती हैं. (९३)
देवासो हि ष्मा मनवे समन्यवो विश्वे साकं ६४ सरातयः.
ते नो अद्य ते अपरं तुचे तु नो भवन्तु वरिवोविदः.. (९४)
३८२ – यजुर्वेद
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
सभी देव मनन तथा समन्वयशील हैं. सभी देव हमें सभी वैभव प्रदान करने
की कृपा करें. सभी देव आज हमें और भविष्य में हमारी पीढ़ियों के लिए वैभव
प्रदाता हों. ( ९४ )
अपाधमदभिशस्तीरशास्तिहाथेन्द्रो द्युम्न्याभवत्.
देवास्त ऽ इन्द्र सख्याय येमिरे बृहद्भानो मरुद्गण.. (९५)
इंद्र देव उद्दंडों को दंडित करते हैं. वे हिंसा को दूर भगाते हैं. उन से सभी
देवगण मित्रता चाहते हैं. हे मरुद्गण! आप की सभी देवता मित्रता चाहते हैं.
हे अग्नि देव! आप की सभी देवगण मित्रता चाहते हैं. ( ९५ )
प्र व ऽ इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत.
वृत्र ँह हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा.. (९६)
हे यजमानो! आप इष्टदेव व मरुद्गण के लिए विस्तृत मंत्र उच्चारिए. इंद्र देव
वृत्रासुरनाशी हैं. वे सौ तीखे बाणों वाले वज्र से वृत्रासुर का नाश करते हैं. वे सैकड़ों
यज्ञ कर्ता हैं. ( ९६ )
अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्य ँह शवो मदे सुतस्य विष्णवि.
अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा.
इमा ऽ उ त्वा यस्यायमय ँह सहस्रमूर्ध्व ऽ ऊ षु ण:... (९७)
इंद्र देव सोमरस से मदमस्त हो कर यजमान के बल की बढ़ोतरी करते हैं. वे
एवं विष्णु देव यजमान पूर्व ऋषियों की भांति ही आप की महिमा स्तोत्रों से
अभिव्यक्त हैं. ( ९७ )
यजुर्वेद - ३८३
चौंतीसवां अध्याय
चौंतीसवां अध्याय
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति.
दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (१)
मन जैसा दूर विचरता है वैसे जाग्रत अवस्था में ही सोते में भी दूर विचरता है.
मन दूरगामी, प्रकाशमान, प्रकाश का प्रवर्तक व अकेला प्रकाशमान है. हमारा मन
कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो. ( १ )
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः.
यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (२)
मनीषीगण इसी मन से यज्ञ आदि कार्य संपन्न करते हैं. इसी मन से धीर लोग
श्रेष्ठ कार्य में लगते हैं. मन अपूर्व व यजमानों में आदरणीय है. हमारा वह मन
कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( २ )
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु.
यस्मान्न ऽ ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (३)
जो सभी प्राणियों में ज्ञानमय, चैतन्य, धैर्यमय व अमृतस्वरूप है, जिस के बिना
कोई कार्य नहीं किया जाता है, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो
जाए. ( ३ )
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्.
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (४)
जिस अमर मन से सब कुछ जाना जाता है, जिस से भूतकाल, वर्तमानकाल
और भविष्यकाल को ग्रहण किया जाता है, जिस से सात पुरोहित ( होता ) यज्ञ का
विस्तार करते हैं, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ४ )
यस्मिन्नृचः साम यजूं ४ षि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः.
यस्मिंश्चित्त ४ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (५)
जैसे रथ के पहिए में अरे होते हैं, वैसे ही जिस मन में ऋग्वेद, सामवेद और
३८४ - यजुर्वेद 632/24
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
यजुर्वेद के मंत्र प्रतिष्ठित हैं, जिस मन में प्रजाओं के चित्त का ज्ञान ओतप्रोत है,
हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ५ )
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेभीशुभिर्वाजिन ऽ इव.
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. ( ६ )
अच्छा सारथी घोड़ों को नियंत्रण में रखता है. निर्धारित स्थान पर ले जाता है.
वैसे ही जो मनुष्यों को नियंत्रण में रखता है, उन्हें निर्धारित स्थान पर ले जाता है.
जो हृदय में प्रतिष्ठित है, जो अजर है, जो गतिमान है, हमारा वह मन कल्याणकारी
संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ६ )
पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (७)
हम अपने पिता इंद्र देव की स्तुति करते हैं. वे महान् और बलवान हैं. उन्होंने
वृत्रासुर को मर्दित कर दिया. उन्होंने तीनों लोकों में अपनी शक्ति को प्रतिष्ठित
किया. ( ७ )
अन्विदनुमते त्वं मन्यासै शं च नस्कृधि.
क्रत्वे दक्षाय नो हिनु प्र ण ऽ आयूं ष्षि ष तारिषः... ( ८ )
हे अनुमते! आप हमारी इच्छाओं का अनुमोदन व हमारा कल्याण करने की कृपा
कीजिए. आप हमारे यज्ञ व हमारी आयु की बढ़ोतरी कीजिए. आप हमें तारिए. ( ८ )
अनु नोद्यानुमतिर्यज्ञं देवेषु मन्यताम्. अग्निश्च हव्यवाहनो भवतं दाशुषे मयः... (९)
हे अनुमते! आज आप हमारे यज्ञ को देवताओं में मान्यता प्राप्त कराइए. हवि
वहन करने वाले अग्नि हमारे प्रति दानशील होने की कृपा करें. ( ९ )
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामति स्वसा.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिद्धि नः... (१०)
हे सिनीवाली देवी! आप देवताओं की बहन, बहुत केशों वाली व प्रजा का
पालन करने वाली हैं. हम ने हवि ग्रहण करने के लिए आप को आमंत्रित किया है.
आप हवि ग्रहण करने व हमें संतान प्रदान करने की कृपा करें. ( १० )
पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः.
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेभवत्सरित्.. (११)
पांच नदियां एक जैसी स्रोत वाली सहित सरस्वती नदी में मिल जाती हैं. वही
सरस्वती देश में पांच प्रकार से प्रसिद्ध हुई. ( ११ )
त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा ऽ ऋषिर्देवो देवानामभवः शिवः सखा.
तव व्रते कवयो विद्मनापसोजायन्त मरुतो भ्राजदृष्टयः... (१२)
यजुर्वेद – ३८५
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
हे अग्नि! आप प्रथम पूजनीय हैं. अंगिरा ऋषि ने आप को प्रकट किया है. आप
देवों के देव हैं. आप हमारे लिए कल्याणकारी हों. आप के व्रत से मरुद्गण कवि
और विद्वान् हुए हैं. आप हमारे लिए मित्र हों. आप के व्रत से मरुद्गण ज्ञाता हुए हैं.
आप के व्रत से मरुद्गण सर्वद्रष्टा हुए हैं. आप के व्रत से मरुद्गण उत्तम आयुधों
से युक्त हुए हैं. (१२)
त्वं नो अग्ने तव देव पायुभिर्मघोनों रक्ष तन्वश्च वन्द्य.
त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेष ऽ रक्षमाणस्तव व्रते.. (१३)
हे अग्नि! आप हमारे हैं. आप हमारी रक्षा करने व हमें धनवान बनाने की कृपा
कीजिए. आप हमारे शरीर को पुष्ट बनाने की कृपा कीजिए. आप वंदनीय व रक्षक
हैं. आप हमारी संतान की रक्षा करने की कृपा कीजिए. हमारी गायों की व लगातार
हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. (१३)
उत्तानायामव भरा चिकित्वात्सद्यः प्रवीता वृषणं जजान.
अरुषस्तूपो रुशदस्य पाज ऽ इडायास्पुत्रो वयुनेजनिष्ट.. (१४)
हे अग्नि! आप पृथ्वी से उत्पन्न हैं. ज्ञान पूर्ण कर्म से अग्नि का प्रादुर्भाव हुआ
है. वे शीघ्र ही अरणि मंथन से प्रज्वलित होते हैं. वे तेजोमय व अद्भुत हैं. वे वायु
से और अधिक प्रसार पाते हैं. (१४)
इडायास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या ऽ अधि.
जातवेदो निधीमह्याग्ने हव्याय वोढवे.. (१५)
हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. हम पृथ्वी के मध्य नाभि में आप की स्थापना करते
हैं. हम हवि रूप निधि आप को समर्पित करते हैं. आप उसे वहन करने की कृपा
कीजिए. (१५)
प्र मन्महे शवसानाय शूषमाङ्गूषं गिर्वणसे अङ्गिरस्वत्.
सुवृक्तिभिः स्तुवत ऽ ऋग्मियायार्चा्मार्कं नरे विश्रुताय.. (१६)
इंद्र देव शक्ति की चाह रखते हैं. वे श्रेष्ठ वाणी वाले हैं. वे विद्वान् हैं. हम
अंगिरा ऋषि की ही तरह उन की स्तुति करते हैं. अच्छी स्तुतियों से हम उन की स्तुति
करते हैं. मनुष्यों के नेतृत्व के लिए प्रख्यात उन की ऋग्वेद के मंत्रों से अर्चना करते
हैं. (१६)
प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्य ऽ शवसानाय साम.
येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा ऽ अर्चन्तो अङ्गिरसो गा ऽ अविन्दन्.. (१७)
हे यजमानो! आप महा महिमाशली इंद्र देव को नमस्कार कीजिए. यजमानो!
आप महा महिमाशाली इंद्र देव की प्रसन्नता के लिए हवि भेंट कीजिए, जिस से
३८६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
हमारे पूर्वजों और पितरों ने अर्चना की. पद जान कर अंगिरस ऋषि की तरह मंत्र
गाए और मार्ग दर्शन प्राप्त किया. ( १७ )
इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः सुन्वन्ति सोमं दधति प्रया ऽ४ सि.
तितिक्षन्ते अभिशस्तिं जनानामिन्द्र त्वदा कश्चन हि प्रकेतः.. (१८)
हे इंद्र देव! आप सोम जैसा सखाभाव चाहते हैं. आप सोमरस निचोड़ते हैं. आप
सोमरस धारण करते हैं. सोम मनुष्यों का कठोर व्यवहार सहते हुए भी सोमरस प्रदान
करते हैं. अन्न बल को धारते हैं. ( १८ )
न ते दूरे परमा चिद्रजा ऽ४ स्या तु प्र याहि हरिवो हरिभ्याम्.
स्थिराय वृष्णे सवना कृतेमा युक्ता ग्रावाणः समिधाने अग्नौ.. (१९)
हे इंद्र देव! आप के लिए परम ( अतीव ) दूर स्थान भी दूर नहीं है. आप हरि
नामक घोड़ों को जोतिए और हरि की ( घोड़े की ) तरह आने की कृपा कीजिए.
हम आप से अपनी स्थिरता व बल की कामना करते हैं. प्रातः संध्या सवन में यज्ञ
किया जा रहा है. यह पत्थर सोम निचोड़ने के लिए है. यह समिधा अग्नि प्रज्वलित
करने के लिए है. ( १९ )
अषाढं युत्सु पृतनासु पप्रि ऽ४ स्वर्षांमप्सां वृजनस्य गोपाम्.
भरेषुजा ऽ४ सुक्षिति ऽ४ सुश्रवसं जयन्तं त्वामनु मदेम सोम.. (२०)
हे सोम! आप युद्धों में बहुत अधिक पराक्रम प्रदर्शित करते हैं. आप शत्रुजयी,
सेना, गोपालक, बल रक्षक व उत्तम वास स्थान वाले हैं. आप विजेता, यशस्वी हैं.
हे सोम! आप हमें आनंदित करते हैं. हम आप का अनुकरण करते हैं. ( २० )
सोमो धेन ऽ४ सोमो अर्वन्तमाशु ऽ४ सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति.
सादन्यं विदथ्य ऽ४ सभेयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै.. (२१)
सोम उन यजमानों को दुधारू गाएं प्रदान करते हैं, जो उन्हें आहुति प्रदान करते
हैं. ऐसे यजमानों को वेगवान घोड़े प्रदान करते हैं. वे यजमानों को वीर पुत्र प्रदान
करते हैं. सोम घरेलू पुत्र प्रदान करते हैं. वे कर्मशील पुत्र प्रदान करते हैं. वे पितृकर्म
में दक्ष व आज्ञापालक पुत्र प्रदान करते हैं. ( २१ )
त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः.
त्वमा ततन्थोर्वन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ.. (२२)
हे सोम! आप इन सभी ओषधियों को उपजाते हैं. आप ने जल को उपजाया.
आप ने गायों को उपजाया. आप ने अंतरिक्ष का विस्तार किया. आप ने संसार को
ज्योतिष्मान बनाया. आप ने अंधकार दूर करने की कृपा की. ( २२ )
यजुर्वेद - ३८७
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
देवेन नो मनसा देव सोम रायो भाग ँ सहसावन्नभि युध्य.
मा त्वा तनदीशषे वीर्यस्योभयेभ्यः प्रचिकित्सा गविष्ठौ.. (२३)
हे सोम! आप दिव्य हैं. आप हमें मन से धन प्रदान कीजिए व सौभाग्यवान
बनाइए. आप हमें युद्ध में जिताइए. आप को दान देने से कोई नहीं रोक सकता.
आप अतीव बलशाली व अतीव अभययुक्त हैं. हे सोम! आप हमें दोनों लोकों
(पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक) का सुख प्रदान कीजिए. (२३)
अष्टौ व्यख्यत् ककुभः पृथिव्यास्त्री धन्व योजना सप्त सिन्धून्.
हिरण्याक्षः सविता देव ऽ आगाद्दधद्रत्ना दाशुषे वार्याणि.. (२४)
सविता देव आठों लोकों को व्याख्यायित व पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं.
वे सातों समुद्रों को व तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं. वे विभिन्न योजनाओं
को प्रकाशित करते हैं. वे स्वर्णमयी आंखों वाले और यजमानों के लिए अगाध
रत्न धारने वाले हैं. वे यजमानों को बहुत धन देने वाले हैं. (२४)
हिरण्यपाणिः सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अन्तरीयंते.
अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति.. (२५)
सविता देव सोने के हाथों वाले व विलक्षण हैं. वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
दोनों लोकों के बीच सूर्य को प्रेरित करते हैं. वे रोगों व अंधकार को नष्ट करते हैं.
सूर्य अपनी शोभा से दोनों लोकों को आलोकित करते हैं. (२५)
हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृडीकः स्ववां यात्वर्वाङ्..
अपसेधन् रक्षसो यातुधानान्स्थादेवः प्रतिदोषं गृणानः.. (२६)
सूर्य सोने के हाथों (सुनहरे) वाले हैं. वे प्राणदाता, कल्याणदाता, उत्तम
सुखदाता व प्रकाशवान हैं. वे दोषहारक राक्षसों व दुष्टों के नाशक हैं. वे हमारे
अनुकूल होने की कृपा करें. (२६)
ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासोरणवः सुकृता ऽ अन्तरिक्षे.
तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधि च ब्रूहि देव.. (२७)
हे सविता देव! अंतरिक्षलोक में जो आप के धूल रहित उत्तम पथ हैं, आप की
कृपा से हम उन पथों पर चलें. हम आप के उन पथों पर चलते हुए सौभाग्यशाली
हों. हम आप के उन पथों पर सुरक्षापूर्वक चल सकें. आप उन पथों पर हमारे लिए
संदेश कहने की कृपा करें. (२७)
उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम्. अविद्रियाभिरूतिभिः.. (२८)
हे दोनों अश्विनीकुमारो! आप यज्ञ स्थल में पधारने व सोमपान की कृपा करें.
आप हमें सुख प्रदान करने की कृपा करें. आप अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा
३८८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
कीजिए व सुख प्रदान कीजिए. ( २८ )
अपस्वतीमश्विना वाचमस्मे कृतं नो दस्रा वृषणा मनीशाम्.
अद्यूत्येवसे नि ह्वये वां वृधे च नो भवतं वाजसातौ.. (२९)
हे अश्विनीकुमारो! आप दर्शनीय व शक्तिमान हैं. आप हमारी वाणी को अच्छे
कार्य में लगाइए. हे अश्विनीकुमारो! आप हमारी मनीषा ( बुद्धि ) को अच्छे कार्य
में लगाइए. ( २९ )
द्युभिरक्तुभिः परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्विना सौभगोभिः.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (३०)
हे अश्विनीकुमारो! आप आज ही अपने रक्षा साधनों सहित इस यज्ञ में पधारने
व उस की बढ़ोत्तरी करने की कृपा कीजिए. आप द्वारा प्रदान किए गए धन की रक्षा
में मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, सिंधु देव, पृथ्वीलोक हमारी सहायता करें.
आप द्वारा प्रदान किए गए धन की रक्षा में स्वर्गलोक हमारी सहायता करें. ( ३० )
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च.
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. (३१)
सविता देव सुनहरे रथ पर सवार हो कर लोकों को देखते हुए प्रयाण करते हैं.
वे पृथ्वी को अंधकार से मुक्त करते हैं. वे मनुष्य व देव आदि सभी को कर्म में व
मनुष्य आदि सभी को प्रेरित करते हैं. ( ३१ )
आ रात्रि पार्थिव १४ रजः पितुरप्रायि धामभिः.
दिवः सदा १४ सि बृहती वि तिष्ठस ऽ आ त्वेषं वर्त्तते तमः.. (३२)
रात्रि देवी पृथ्वीलोक को अंधकार से पूरा करती हैं. वे अंतरिक्षलोक को
अंधकार से पूरा करती हैं और स्वर्ग को व्याप्त करती है. इस प्रकार रात्रि देवी सब
को अंधकार से व्याप्त हैं. ( ३२ )
उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति. येन तोकं च तनयं च धामहे.. (३३)
उषा देवी अद्भुत हैं. वे हमारे लिए धनवती हों. वे अद्भुत धन हमारे लिए धारें.
उस धन से हम अपनी संतान का उपयुक्त रीति से भरणपोषण कर सकें. ( ३३ )
प्रातरग्निं प्रातरिन्द्र १४ हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना.
प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्र १४ हुवेम.. (३४)
हम प्रातःकाल अग्नि, इंद्र देव, मित्र देव, वरुण देव व अश्विनीकुमारों का
आह्वान करते हैं. हम प्रातःकाल वनस्पति देव, भग देव, पूषण और रुद्र देव का
आह्वान करते हैं. ( ३४ )
यजुर्वेद - ३८९
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
प्रातःर्जितं भगमुग्र ९४ हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्त्ता.
आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह.. ( ३५ )
हम प्रातःकाल में अदिति देव का आह्वान करते हैं. वे विजेता, सौभाग्यवान, उग्र
व संसार के धारक हैं. यह कहा गया है कि धनवान, गरीब, रोगी, राजा कोई भी हो
वे अभीष्ट मनोकामना सिद्धि हेतु सूर्य की उपासना ( आराधना ) करते हैं. ( ३५ )
भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददनः.
भग प्र नो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम.. ( ३६ )
हे भग देव! आप हमारे पथ के प्रणेता हैं. हे भग देव! आप सत्य रूपी धन के
प्रदाता हैं. हे भग देव! आप उन्नतिदायी बुद्धि के प्रदाता हैं. हे भग देव! आप हमारे
लिए गाएं उत्पन्न करें. हे भग देव! आप हमारे लिए घोड़े उत्पन्न करें. हे भग देव!
आप की कृपा से हम नेतृत्व करने वाली संतान वाले हो जाएं. ( ३६ )
उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व ऽ उत मध्ये अह्नाम्.
उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवाना ९४ सुमतौ स्याम.. ( ३७ )
हम सूर्य की कृपा से सद्बुद्धि वाले व धनवान हो जाएं. हम उन की कृपा से सूर्योदय
में धन प्राप्त करें. हम उन की कृपा से मध्याह्न और सूर्यास्त में धन संपन्न हों. ( ३७ )
भग ऽ एव भगवाँ २ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम.
तं त्वा भग सर्व ऽ इज्जोहवीति स नो भग पुर ऽ एता भवेह.. ( ३८ )
हे भग देव! आप धनवान व भाग्यवान हैं. आप की कृपा से हम यजमान भी
धनवान और भाग्यवान हो जाएं. यजमान भग देव का आह्वान करते हैं. आप हमारे यहां
पधार कर हमारे यज्ञ और सभी इष्ट कार्यों को सफल बनाने की कृपा कीजिए. ( ३८ )
समध्वरायोपसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय.
अर्वाचीनं वसुविदं भगं नो रथमिवाश्वा वाजिन ऽ आ वहन्तु.. ( ३९ )
हम उषाकाल में यज्ञ व नमन करते हैं. हम उषाकाल में पवित्र गतिविधियां
संपन्न करते हैं. जैसे अश्ववान रथ गतिशील रहते हैं, वैसे ही भग देव हमें प्राचीन
और श्रेष्ठ धन वाला बनाने की कृपा करें. ( ३९ )
अश्वावतीर्गोमतीर्न ऽ उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः.
घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः... ( ४० )
जैसे अश्वमयी वीरवती व कल्याणी उषा देवी घी व दूध देती हैं, वैसे ही प्रभात
वेला हमारा कल्याण करने की कृपा करें. हमारे लिए घी व दूध दुहें. अज्ञान
अंधकारमय बाधाएं सब ओर से दूर करें. आप सभी देवगण सदैव हमारा कल्याण
करने की कृपा करें. ( ४० )
३९० - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
पूषन् तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन. स्तोतारस्त ऽ इह स्मसि.. (४१)
हे पूषा देव! हम स्तोता आप के व्रत में लगें. हम कभी नष्ट न हों. हम यज्ञ में
आप की स्तुति करते हैं तथा आप की चाह रखते हैं. ( ४१ )
पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो अभ्यानडर्कम्.
स नो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा धियंधिय १॑४ सीषधाति प्र पूषा.. (४२)
पूषा देव हमारे पथ दर्शक हैं. मंत्र से कामना किए जाने पर वे राक्षसों का
नाश करते हैं और शत्रुनाशक साधन प्रदान करते हैं. वे हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कार्यों
में साधने की कृपा करें. ( ४२ )
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णोर्गोपा ऽ अदाभ्यः. अतो धर्माणि धारयन्.. (४३)
विष्णु ने अपने तीन पैरों में ही संपूर्ण विश्व को धारण कर लिया. वे उस
सामर्थ्य से लोकों को धारते हुए विराजमान हैं. ( ४३ )
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवा १॑४ सः समिन्धते. विष्णोर्यत्परमं पदम्.. (४४)
जो ब्राह्मण जाग्रत हो कर यज्ञ विधान करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे
ब्राह्मण विष्णु देव के परम धाम को प्राप्त करते हैं. ( ४४ )
घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा.
द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा.. (४५)
स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक वरुण देव की शक्ति से सुदृढ़ हुए हैं. स्वर्गलोक
और पृथ्वीलोक श्रेष्ठ रूप वाले हैं और वृद्धावस्था रहित हैं. प्रभूत ( अत्यंत ) सामर्थ्य
का मूल स्रोत हैं. पृथ्वी घीमयी, लोकों का आश्रय स्थली, व्यापक व विशेष मधुर
रसों के दोहन की सामर्थ्य रखती है. ( ४५ )
ये नः सपत्ना ऽ अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान्.
वसवो रुद्रा ऽ आदित्या ऽ उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तारमधिराजमक्रन्.. (४६)
जो हमारे शत्रु हैं, वे हार जाएं. हम उन शत्रुओं को इंद्र देव और अग्नि की
क्षमता से बाधित करें. वसुगण हमारे चित्त को उग्र, पराक्रमी व अधिपति बनाने की
कृपा करें. रुद्रगण और आदित्यगण हमारे चित्त को उग्र व पराक्रमी और अधिपति
बनाने की कृपा करें. ( ४६ )
आ नासत्या त्रिभिरेकादशैर्रिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना.
प्रायुस्तारिष्टं नी रपा १॑४ सि मृक्षत १॑४ सेधतं द्वेषो भवत १॑४ सचाभुवा.. (४७)
अश्विनीकुमार नाशरहित ( अविनाशी ) हैं. आप दोनों ग्यारह से तिगुने
( ११ × ३ = ३३ ) देवताओं सहित पधारिए. आप दोनों ग्यारह से तिगुने देवताओं
यजुर्वेद - ३९१
उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
सहित मधुर पेय पीजिए. आप हमारी रक्षा कीजिए और हमारी आयु बढ़ाइए. आप
हमारे पापों व द्वेषियों का नाश कीजिए. आप हमारे सहायक ही रहिए. (४७)
एष व स्तोमो मरुत ऽ इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारो:.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (४८)
हे मरुद्गणो! ये स्तोत्र आप के लिए समर्पित हैं. ये वाणीमयी स्तुतियां आप
को आनंदित करने की कृपा करें. ये स्तुतियां माननीय व श्रेष्ठ फलदायी है. आप
पधारिए. हमें इष्ट सुख, विद्या, अन्न व आयु प्रदान कीजिए. (४८)
सहस्तोमा: सहच्छन्दस ऽ आवृत्: सहप्रमा ऽ ऋषय: सप्त दैव्या:.
पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा ऽ अन्वालेभिरे रथ्यो न रश्मीन्.. (४९)
सात ऋषियों ने स्तुतियों के साथ, छंदों के साथ, प्रमाण के साथ दिव्य सृष्टि
का प्रादुर्भाव किया. इन ऋषियों ने पूर्व ऋषियों का अनुसरण किया. इन धीर
ऋषियों ने वैसे ही इष्ट गंतव्य तक पहुंचाया जैसे लगाम घोड़ों को अपने इष्ट गंतव्य
तक पहुंचाती हैं. (४९)
आयुष्यं वर्चस्य १४ रायस्पोषमौद्भिदम्.
इद १४ हिरण्यं वर्चस्वज्जैत्रायाविशतादु माम्.. (५०)
यह स्वर्णमय धन आयु, वर्चस्व, धन व पुष्टिवर्द्धक है. यह स्वर्णमय धन भूमि
से उत्पन्न है. यह स्वर्णमय धन वर्चस्वदायी है. यह स्वर्णमय धन तेजमय है. यह
स्वर्णमय धन हमें विजयश्री दिलाने की कृपा करें. (५०)
न तद्रक्षा १४ सि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोज: प्रथमज १४ ह्येतत्.
यो बिभर्ति दाक्षायण १४ हिरण्य १४ स देवेषु कृणुते दीर्घमायु: स मनुष्येषु कृणुते
दीर्घमायु:.. (५१)
इस स्वर्णमय धन को राक्षस हिंसित नहीं करते. इस स्वर्णमय धन को पिशाच
भी हिंसित नहीं करते. यह स्वर्णमय प्रथम उत्पन्न देवताओं का ओज है, जो
दक्षवंशीय ब्राह्मण इसे स्वर्णधन आभूषण के रूप में धारते हैं, उन्हें भी देवता मनुष्यों
में दीर्घायु प्रदान करते हैं. (५१)
यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्य १४ शतानीकाय सुमनस्यमाना:.
तन्म ऽ आ बध्नामि शतशारदायायुष्माञ्जरदष्टिर्यथासम्.. (५२)
दक्षवंशीय (दक्षवंश के ब्राह्मणों) ने अच्छे मन से जिस सोने के धागे को
सैकड़ों सेना वाले राजा को बांधा उसे ही हम सौ वर्ष की आयु प्राप्त करने के लिए
अपने शरीर पर बांधते हैं. हम वृद्ध व चिरायु हों. (५२)
३१२ - यजुर्वेद