यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
कीजिए व सुख प्रदान कीजिए. ( २८ )
अपस्वतीमश्विना वाचमस्मे कृतं नो दस्रा वृषणा मनीशाम्.
अद्यूत्येवसे नि ह्वये वां वृधे च नो भवतं वाजसातौ.. (२९)
हे अश्विनीकुमारो! आप दर्शनीय व शक्तिमान हैं. आप हमारी वाणी को अच्छे
कार्य में लगाइए. हे अश्विनीकुमारो! आप हमारी मनीषा ( बुद्धि ) को अच्छे कार्य
में लगाइए. ( २९ )
द्युभिरक्तुभिः परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्विना सौभगोभिः.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (३०)
हे अश्विनीकुमारो! आप आज ही अपने रक्षा साधनों सहित इस यज्ञ में पधारने
व उस की बढ़ोत्तरी करने की कृपा कीजिए. आप द्वारा प्रदान किए गए धन की रक्षा
में मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, सिंधु देव, पृथ्वीलोक हमारी सहायता करें.
आप द्वारा प्रदान किए गए धन की रक्षा में स्वर्गलोक हमारी सहायता करें. ( ३० )
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च.
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. (३१)
सविता देव सुनहरे रथ पर सवार हो कर लोकों को देखते हुए प्रयाण करते हैं.
वे पृथ्वी को अंधकार से मुक्त करते हैं. वे मनुष्य व देव आदि सभी को कर्म में व
मनुष्य आदि सभी को प्रेरित करते हैं. ( ३१ )
आ रात्रि पार्थिव १४ रजः पितुरप्रायि धामभिः.
दिवः सदा १४ सि बृहती वि तिष्ठस ऽ आ त्वेषं वर्त्तते तमः.. (३२)
रात्रि देवी पृथ्वीलोक को अंधकार से पूरा करती हैं. वे अंतरिक्षलोक को
अंधकार से पूरा करती हैं और स्वर्ग को व्याप्त करती है. इस प्रकार रात्रि देवी सब
को अंधकार से व्याप्त हैं. ( ३२ )
उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति. येन तोकं च तनयं च धामहे.. (३३)
उषा देवी अद्भुत हैं. वे हमारे लिए धनवती हों. वे अद्भुत धन हमारे लिए धारें.
उस धन से हम अपनी संतान का उपयुक्त रीति से भरणपोषण कर सकें. ( ३३ )
प्रातरग्निं प्रातरिन्द्र १४ हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना.
प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्र १४ हुवेम.. (३४)
हम प्रातःकाल अग्नि, इंद्र देव, मित्र देव, वरुण देव व अश्विनीकुमारों का
आह्वान करते हैं. हम प्रातःकाल वनस्पति देव, भग देव, पूषण और रुद्र देव का
आह्वान करते हैं. ( ३४ )
यजुर्वेद - ३८९