यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
सूर्य की दिव्यता व महिमा व्यापक है. सूर्य संसार के मध्य विराजमान ( स्थित )
व विशाल निर्माण और संहार करने वाले हैं. जब वे अलग कर के अपनी हरी
किरणों को साधते हैं, तब रात्रि संसार को अंधकार से घेर लेती है. ( ३७ )
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे.
अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. ( ३८)
सूर्य मित्र देव और वरुण देव के साथ मनुष्यों को सब ओर से देखते हैं. सूर्य
रूपवान हैं. स्वर्गलोक उन के उस रूप को धारण करता है. दूसरा कृष्ण और हरित
रूप है. उसे आकाश धारण करता है. ( ३८ )
बण्महाँ २ असि सूर्य बडादित्य महाँ २ असि.
महस्ते सतो महिमा पनस्यतेद्धा देव महाँ २ असि.. ( ३९)
हे सूर्य! आप बड़े ही महान् हैं. हे आदित्य देव! आप बड़े महान् हैं. महान्
होने के कारण ही सभी आप की महिमा गाते हैं. वास्तव में आप सभी देवों में
महान् हैं. ( ३९ )
बट् सूर्य श्रवसा महाँ २ असि सत्रा देव महाँ २ असि.
महा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम्.. ( ४०)
हे सूर्य! आप प्रख्यात, महान्, सभी देवों में महान् व असुरनाशक हैं. आप
पुरोहित, प्रकाशक व ज्योति के भंडार हैं. ( ४० )
श्रायन्त ऽ इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत.
वसूनि जाते जनमान ऽ ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. ( ४१)
सूर्य से उत्पन्न हो कर उन के संरक्षण में उन की किरणें संसार के वैभव
को भोगती हैं, वैसे ही हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए ओज और धन को धारण
करें. ( ४१ )
अद्या देवा ऽ उदिता सूर्यस्य निर १७ हसः पिपृता निरवद्यात्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. ( ४२)
हे यजमानो! आज सूर्य की किरणें उदित हो कर हमें पापों व हिंसा से बचाएं.
वे मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, समुद्र, पृथ्वी और स्वर्गलोक हम अहिंसक
यजमानों की इच्छा पूरी करने की कृपा करें. ( ४२ )
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च.
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. ( ४३)
काले अंधकार से भरे पथ पर घूमते हुए सविता देव अपने सोने के रथ पर
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उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
सवार हो कर लोकों को देखते हुए जाते हैं. सविता देव मनुष्यों को निवेश ( काम
में लगाते ) करते हुए जाते हैं. ( ४३ )
प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विशपतीव बीरिट ऽ इयाते.
विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान्.. (४४)
यजमान अपने कल्याण के लिए उषाकाल में वायु व पूषा देव को आमंत्रित
करते हैं. यजमान इन देवों के लिए कुश के आसन भेंट करते हैं. ये देव ठाटबाट
से राजा की तरह पधारते हैं. ( ४४ )
इन्द्रवायू बृहस्पतिं मित्राग्निं पूषणं भगम्. आदित्यान् मारुतं गणम्.. (४५)
हम इंद्र देव, वायु देव, बृहस्पति देव, मित्र देव, अग्निपूषा देव भग देव,
आदित्यगण और मरुद्गण का आह्वान करते हैं. ( ४५ )
वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः. करतां नः सुराधसः.. (४६)
वरुण देव और मित्र देव संसार के मित्र हैं. वे अपनी पूरी क्षमता से अपने सभी
रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ये देव हमें श्रेष्ठ धनों से संपन्न
बनाने की कृपा करें. ( ४६ )
अधि न ऽ इन्द्रैषां विष्णो सजात्यानाम्.
इता मरुतो अश्विना.
तं प्रत्नथायं वेनो ये देवास ऽ आ न ऽ इडाभिर्विश्वेभिः सोम्यं मध्वोमासश्चर्षणीधृतः.. (४७)
हे इंद्र देव! हे विष्णु! आप पधारिए. आप सजातीय बंधुओं के बीच
अधिष्ठित होइए. मरुद्गण और अश्विनी देव भी अधिष्ठित होने की कृपा करें.
सभी देव सर्वद्रष्टा हैं. सभी देव मधुर सोमरस को पीने व हमें धारण करने की
कृपा करें. ( ४७ )
अग्न ऽ इन्द्र वरुण मित्र देवाः शर्धः प्र यन्त मारुतोत विष्णो.
उभा नासत्या रुद्रो अध ग्नाः पूषा भगः सरस्वती जुषन्त.. (४८)
हे अग्नि! हे इंद्र देव! हे वरुण देव, हे मित्र देव! हे मरुद्गण! हे विष्णु! आप
हमें सुख व सामर्थ्य प्रदान कीजिए. अश्विनीकुमार, रुद्रगण, पूषा, भग, सरस्वती
आदि देवता भी हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा करें. ( ४८ )
इन्द्राग्नी मित्रावरुणादिति १७ स्वः पृथिवीं द्यां मरुतः पर्वताँ २ अपः.
हुवे विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं भगं नु श १७ स १७ सवितारमूतये.. (४९)
हम इंद्र देव, अग्नि, मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक,
मरुद्गण, पर्वत, जल, विष्णु, पूषा देव, बृहस्पति देव, भग देव व सविता देव
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