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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हमारे लिए ज्योति धारिए. ब्राह्मणों व क्षत्रियों में ज्योति स्थापित कीजिए.
वैश्यों, शूद्रों में ज्योति स्थापित कीजिए. मेरे लिए ज्योति धारिए. मुझे ज्योतिष्मान
बनाने की कृपा कीजिए. (४८)
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः.
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश १४ स मा न ऽ आयुः प्र मोषीः.. (४९)
हे वरुण देव! ब्राह्मणगण मंत्रों से आप का वंदन करते हैं. यजमान सदैव
हवियों द्वारा आप की अभिशंसा (प्रशंसा और उपासना) करते हैं. हम यहां सुख
चाहते हुए वरुण देव की प्रशंसा और उपासना करते हैं. उन्हें प्रार्थना सुनने के लिए
जाग्रत करते हैं. वे हम पर क्रोध न करें. हमारी आयु को कम न करें. (४९)
स्वर्ण घर्मः स्वाहा स्वर्णार्कः स्वाहा स्वर्ण शुक्रः स्वाहा स्वर्ण ज्योतिः स्वाहा स्वर्ण
सूर्यः स्वाहा.. (५०)
सोने जैसा प्रकाश उकेरने वाले देव के लिए स्वाहा. सोने जैसे सूर्य के लिए
स्वाहा. सोने जैसे चमकने वाले देव के लिए स्वाहा. सोने जैसी ज्योति वाले देव के
लिए स्वाहा. सोने जैसे सूर्य वाले देव के लिए स्वाहा. (५०)
अग्निं युनज्मि शवसा घृतेन दिव्य १४ सुपर्णं वयसा बृहन्तम्.
तेन वयं गमेम ब्रध्नस्य विष्टप १४ स्वो रुहाणा अधि नाकमुत्तमम्.. (५१)
हम अग्नि को घी से युक्त करते हैं. हम घी की आहुतियों से अग्नि की बढ़ोतरी
करते हैं. अग्निदिव्य गुण वाले हैं. अग्निवय वहन करते हैं. उस से हम ऊपर बाधा रहित
स्वर्गलोक जाते हैं. उत्तम स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं. वहीं अधिष्ठित होते हैं. (५१)
इमौ ते पक्षावजरौ पतत्रिणौ याभ्या १४ रक्षा १४ स्यपह १४ स्यग्ने.
ताभ्यां पतेम सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः.. (५२)
हे अग्नि! आप के दोनों पंख अजर हैं. सदैव उड़ने के लिए तत्पर हैं. दोनों
पंख से आप राक्षसों का नाश करते हैं. आप उन दोनों पंखों से श्रेष्ठ कर्म करने
वालों के उस लोक में प्रस्थान कीजिए, जहां पहले ही उत्पन्न पुरातन ऋषिगण
जा चुके हैं. (५२)
इन्दुर्दक्षः श्येन ऽ ऋतावा हिरण्यपक्षः शकुनो भुरण्युः.
महान्तसधस्थे ध्रुव ऽ आ निष्त्तो नमस्ते अस्तु मा मा हि १४ सीः.. (५३)
हे अग्नि! आप चंद्रमा जैसे दक्ष, बाज जैसे वेगशाली हैं. आप सत्यवान, सोने
जैसे पंख वाले, शक्तिमान, भरणपोषण कर्ता हैं व महान् हैं. ध्रुव (स्थिर), यज्ञ में
सध कर रहते हैं. हे अग्नि! आप को नमन! आप हमारे अनुकूल हों. आप हमारे प्रति
हिंसा मत कीजिए. (५३)
२३४ - यजुर्वेद