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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 421 में से

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पृष्ठ 392

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
सहित मधुर पेय पीजिए. आप हमारी रक्षा कीजिए और हमारी आयु बढ़ाइए. आप
हमारे पापों व द्वेषियों का नाश कीजिए. आप हमारे सहायक ही रहिए. (४७)
एष व स्तोमो मरुत ऽ इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारो:.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (४८)
हे मरुद्गणो! ये स्तोत्र आप के लिए समर्पित हैं. ये वाणीमयी स्तुतियां आप
को आनंदित करने की कृपा करें. ये स्तुतियां माननीय व श्रेष्ठ फलदायी है. आप
पधारिए. हमें इष्ट सुख, विद्या, अन्न व आयु प्रदान कीजिए. (४८)
सहस्तोमा: सहच्छन्दस ऽ आवृत्: सहप्रमा ऽ ऋषय: सप्त दैव्या:.
पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा ऽ अन्वालेभिरे रथ्यो न रश्मीन्.. (४९)
सात ऋषियों ने स्तुतियों के साथ, छंदों के साथ, प्रमाण के साथ दिव्य सृष्टि
का प्रादुर्भाव किया. इन ऋषियों ने पूर्व ऋषियों का अनुसरण किया. इन धीर
ऋषियों ने वैसे ही इष्ट गंतव्य तक पहुंचाया जैसे लगाम घोड़ों को अपने इष्ट गंतव्य
तक पहुंचाती हैं. (४९)
आयुष्यं वर्चस्य १४ रायस्पोषमौद्भिदम्.
इद १४ हिरण्यं वर्चस्वज्जैत्रायाविशतादु माम्.. (५०)
यह स्वर्णमय धन आयु, वर्चस्व, धन व पुष्टिवर्द्धक है. यह स्वर्णमय धन भूमि
से उत्पन्न है. यह स्वर्णमय धन वर्चस्वदायी है. यह स्वर्णमय धन तेजमय है. यह
स्वर्णमय धन हमें विजयश्री दिलाने की कृपा करें. (५०)
न तद्रक्षा १४ सि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोज: प्रथमज १४ ह्येतत्.
यो बिभर्ति दाक्षायण १४ हिरण्य १४ स देवेषु कृणुते दीर्घमायु: स मनुष्येषु कृणुते
दीर्घमायु:.. (५१)
इस स्वर्णमय धन को राक्षस हिंसित नहीं करते. इस स्वर्णमय धन को पिशाच
भी हिंसित नहीं करते. यह स्वर्णमय प्रथम उत्पन्न देवताओं का ओज है, जो
दक्षवंशीय ब्राह्मण इसे स्वर्णधन आभूषण के रूप में धारते हैं, उन्हें भी देवता मनुष्यों
में दीर्घायु प्रदान करते हैं. (५१)
यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्य १४ शतानीकाय सुमनस्यमाना:.
तन्म ऽ आ बध्नामि शतशारदायायुष्माञ्जरदष्टिर्यथासम्.. (५२)
दक्षवंशीय (दक्षवंश के ब्राह्मणों) ने अच्छे मन से जिस सोने के धागे को
सैकड़ों सेना वाले राजा को बांधा उसे ही हम सौ वर्ष की आयु प्राप्त करने के लिए
अपने शरीर पर बांधते हैं. हम वृद्ध व चिरायु हों. (५२)
३१२ - यजुर्वेद