यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
सूर्य की दिव्यता व महिमा व्यापक है. सूर्य संसार के मध्य विराजमान ( स्थित )
व विशाल निर्माण और संहार करने वाले हैं. जब वे अलग कर के अपनी हरी
किरणों को साधते हैं, तब रात्रि संसार को अंधकार से घेर लेती है. ( ३७ )
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे.
अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. ( ३८)
सूर्य मित्र देव और वरुण देव के साथ मनुष्यों को सब ओर से देखते हैं. सूर्य
रूपवान हैं. स्वर्गलोक उन के उस रूप को धारण करता है. दूसरा कृष्ण और हरित
रूप है. उसे आकाश धारण करता है. ( ३८ )
बण्महाँ २ असि सूर्य बडादित्य महाँ २ असि.
महस्ते सतो महिमा पनस्यतेद्धा देव महाँ २ असि.. ( ३९)
हे सूर्य! आप बड़े ही महान् हैं. हे आदित्य देव! आप बड़े महान् हैं. महान्
होने के कारण ही सभी आप की महिमा गाते हैं. वास्तव में आप सभी देवों में
महान् हैं. ( ३९ )
बट् सूर्य श्रवसा महाँ २ असि सत्रा देव महाँ २ असि.
महा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम्.. ( ४०)
हे सूर्य! आप प्रख्यात, महान्, सभी देवों में महान् व असुरनाशक हैं. आप
पुरोहित, प्रकाशक व ज्योति के भंडार हैं. ( ४० )
श्रायन्त ऽ इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत.
वसूनि जाते जनमान ऽ ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. ( ४१)
सूर्य से उत्पन्न हो कर उन के संरक्षण में उन की किरणें संसार के वैभव
को भोगती हैं, वैसे ही हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए ओज और धन को धारण
करें. ( ४१ )
अद्या देवा ऽ उदिता सूर्यस्य निर १७ हसः पिपृता निरवद्यात्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. ( ४२)
हे यजमानो! आज सूर्य की किरणें उदित हो कर हमें पापों व हिंसा से बचाएं.
वे मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, समुद्र, पृथ्वी और स्वर्गलोक हम अहिंसक
यजमानों की इच्छा पूरी करने की कृपा करें. ( ४२ )
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च.
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. ( ४३)
काले अंधकार से भरे पथ पर घूमते हुए सविता देव अपने सोने के रथ पर
३७४ - यजुर्वेद