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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 421 में से

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पृष्ठ 379

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
मन वाले हैं. आप सुखदाता हैं. आप हमें सुमति दीजिए. आप शत्रुओं की बुद्धि को
हमारे प्रति अनुकूल करने की कृपा कीजिए. ( ६८ )
अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्व १४ शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्.
हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघश १४ स ऽ ईशत.. (६९)
हे सविता देव! आप हमारे घरों व अपने रक्षासाधनों से हमारी रक्षा व हमारा
कल्याण कीजिए. आप सोने की जीभ वाले हैं. हम आप को शीश नवाते हैं. ( ६९ )
प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वर्युभिर्मधुमन्तः सुतासः.
वह वायो नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसो मदाय.. (७०)
हे पुरोहितो! आप पत्थरों से कूट कर, निचोड़ कर सोमरस तैयार कीजिए.
हे वायु! आप घोड़े जोतिए, रथ लाइए. आप आनंद के लिए सोमरस पीने की कृपा
कीजिए. ( ७० )
गाव ऽ उपावातावतं मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (७१)
हे यज्ञ में बह रही जलधाराओ! आप पृथ्वी की रक्षा कीजिए. हे पुराहितो! आप
पत्थरों से कूट कर, निचोड़ कर सोमरस तैयार कीजिए. आप के दोनों कान सोने
के बने हुए हैं. आप उन से हमारी स्तुति सुनने की कृपा कीजिए. ( ७१ )
काव्योराजानेषु क्रत्वा दक्षस्य दुरोणे. रिशादसा सधस्थ ऽ आ.. (७२)
हे देवगण! आप राजा व दक्ष हैं. आप इस यज्ञ में पधारने व यज्ञ पूरा कराने
की कृपा कीजिए. ( ७२ )
दैव्यावध्वर्यू आ गत १४ रथेन सूर्यत्वचा.
मध्वा यज्ञ १४ समञ्जाथे.
तं प्रत्नथायं वेनः.. (७३)
हे पुरोहितो! आप दिव्य हैं. आप सूर्य की तरह चमकने वाले रथ से इस यज्ञ में
पधारने की कृपा कीजिए. हम ने प्रयत्नपूर्वक आप के लिए हवि तैयार की है. ( ७३ )
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी ३ दुपरि स्विदासी ३ त्.
रेतोधा ऽ आसन्महिमान ऽ आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात्.. (७४)
सोम पवित्र हैं. उन की तिरछी किरणों का प्रकाश बहुत दूर तक फैलता है. वे
नीचे ऊपर सब ओर व्याप्त हैं. ये किरणें वीर्य धारण करती हैं. ये किरणें महिमामयी
हैं. ये ऊपर नीचे सब ओर से संसार को धारण करती हैं. ( ७४ )
आ रोदसी अपृणदा स्वर्म्हज्जातं यदेनमपसो अधारयन्.
सो अध्वराय परि णीयते कविरत्यो न वाजसातये चनोहितः.. (७५)
यजुर्वेद - ३७९