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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 421 में से

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पृष्ठ 388

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
देवेन नो मनसा देव सोम रायो भाग ँ सहसावन्नभि युध्य.
मा त्वा तनदीशषे वीर्यस्योभयेभ्यः प्रचिकित्सा गविष्ठौ.. (२३)
हे सोम! आप दिव्य हैं. आप हमें मन से धन प्रदान कीजिए व सौभाग्यवान
बनाइए. आप हमें युद्ध में जिताइए. आप को दान देने से कोई नहीं रोक सकता.
आप अतीव बलशाली व अतीव अभययुक्त हैं. हे सोम! आप हमें दोनों लोकों
(पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक) का सुख प्रदान कीजिए. (२३)
अष्टौ व्यख्यत् ककुभः पृथिव्यास्त्री धन्व योजना सप्त सिन्धून्.
हिरण्याक्षः सविता देव ऽ आगाद्दधद्रत्ना दाशुषे वार्याणि.. (२४)
सविता देव आठों लोकों को व्याख्यायित व पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं.
वे सातों समुद्रों को व तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं. वे विभिन्न योजनाओं
को प्रकाशित करते हैं. वे स्वर्णमयी आंखों वाले और यजमानों के लिए अगाध
रत्न धारने वाले हैं. वे यजमानों को बहुत धन देने वाले हैं. (२४)
हिरण्यपाणिः सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अन्तरीयंते.
अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति.. (२५)
सविता देव सोने के हाथों वाले व विलक्षण हैं. वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
दोनों लोकों के बीच सूर्य को प्रेरित करते हैं. वे रोगों व अंधकार को नष्ट करते हैं.
सूर्य अपनी शोभा से दोनों लोकों को आलोकित करते हैं. (२५)
हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृडीकः स्ववां यात्वर्वाङ्..
अपसेधन् रक्षसो यातुधानान्स्थादेवः प्रतिदोषं गृणानः.. (२६)
सूर्य सोने के हाथों (सुनहरे) वाले हैं. वे प्राणदाता, कल्याणदाता, उत्तम
सुखदाता व प्रकाशवान हैं. वे दोषहारक राक्षसों व दुष्टों के नाशक हैं. वे हमारे
अनुकूल होने की कृपा करें. (२६)
ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासोरणवः सुकृता ऽ अन्तरिक्षे.
तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधि च ब्रूहि देव.. (२७)
हे सविता देव! अंतरिक्षलोक में जो आप के धूल रहित उत्तम पथ हैं, आप की
कृपा से हम उन पथों पर चलें. हम आप के उन पथों पर चलते हुए सौभाग्यशाली
हों. हम आप के उन पथों पर सुरक्षापूर्वक चल सकें. आप उन पथों पर हमारे लिए
संदेश कहने की कृपा करें. (२७)
उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम्. अविद्रियाभिरूतिभिः.. (२८)
हे दोनों अश्विनीकुमारो! आप यज्ञ स्थल में पधारने व सोमपान की कृपा करें.
आप हमें सुख प्रदान करने की कृपा करें. आप अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा
३८८ - यजुर्वेद