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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
हे इंद्र देव! आप मनोयोग से हमारे यज्ञ में पधारिए. हम आप के लिए सोमरस
संस्कारित करने वाले हैं. आप आ कर इन हवियों को ग्रहण करने की कृपा
कीजिए. ( ८८ )
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः. सुते दधिष्व नश्चनः... (८९)
हे इंद्र देव! आप अपने हरि नाम के घोड़ों से आवाजाही करते हैं. आप अपने
पुत्रों के लिए इस हवि को ग्रहण कीजिए. ( ८९ )
अश्विना पिबतां मधु सरस्वत्या सजोषसा.
इन्द्रः सुत्रामा वृत्रहा जुषन्ता ३४ सोम्यं मधु.. (९०)
अश्विनीकुमार देवी सरस्वती के साथ समान मन वाले हों. वे देवी सरस्वती के
साथ मधुर सोमरस का पान करें. इंद्र देव सुरक्षक व वृत्र हंता हैं. वे भी सोमरस का
पान करें. ( ९० )
यजुर्वेद - २६१

इक्कीसवां अध्याय

उत्तरार्ध
इक्कीसवां अध्याय
इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय. त्वामवस्युरा चके.. (१)
हे वरुण देव! हमारी प्रार्थना सुनने की कृपा करें. आज जो हम हवन कर
रहे हैं, उस से हमें सुख प्रदान करें. हम अपनी रक्षा के लिए आप का आह्वान
करते हैं. ( १ )
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः.
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश १४ स मा न ऽ आयुः प्र मोषीः.. ( २)
ये यजमान ब्रह्मज्ञानमय ऋचाओं से आप की वंदना कर रहे हैं. आहुतियां अर्पित
कर रहे हैं. उन से आप यजमान पर प्रसन्न होइए. वरुण देव बहुप्रशंसित व देव पूजित
हैं. आप जाग्रत होइए और हमारी आयु क्षीण मत कीजिए. ( २ )
त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः.
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषा १४ सि प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (३)
हे अग्नि! आप विद्वान् हैं. आप आहुतियों को देवताओं तक पहुंचाने वाले हैं.
आप यज्ञ में पूजित, बहुत दीप्तिमान व पवित्र हैं. आप वरुण देव को हम पर प्रसन्न
कराइए. हमारे सभी द्वेषियों को नष्ट करने की कृपा कीजिए. ( ३ )
स त्वं नो अग्नेवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या ऽ उषसो व्युष्टौ.
अव यक्ष्व नो वरुण १४ रराणो वीहि मृडीक १४ सुहवो न ऽ एधि.. (४)
हे अग्नि! प्रातः अपने रक्षा साधनों सहित हमारे पास पधारिए. हमारी रक्षा करने
व आहुतियों को देवताओं तक पहुंचाने की कृपा कीजिए. आप उन्हें तृप्ति दीजिए.
आप अच्छी तरह बुलाने योग्य हैं. आप इस सुखदायक आहुति को स्वीकारने की
कृपा कीजिए. ( ४ )
महीम् षु मातर १४ सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हुवेम.
तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं १४ सुशर्माणमदिति १४ सुप्रणीतिम्.. (५)
२७० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
अदिति देवी महामहिमाशालिनी, माता, सुव्रतों वाली, अमर, कभी वृद्ध नहीं
होने वाली हैं, सुखदायिनी व नीतिज्ञा हैं. हम अपनी रक्षा हेतु उन का आह्वान करते
हैं. ( ५ )
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहस ᳪ सुशर्माणमदिति ᳪ सुप्रणीतिम्.
दैवीं नाव ᳪ स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. ( ६ )
अदितिमाता भलीभांति रक्षा करने वाली, पृथ्‍वीलोक से स्वर्गलोक तक
विस्तार वाली, अत्यंत सुखदायिनी, अच्छा आसरा ( आश्रय ) देने वाली, दोषरहित,
मृत्यु का भय दूर करने वाली हैं. अपनेआप चलने वाली, बिना छेदों वाली इस नौका
में आप की कृपा से हम आरोहण करें. हम अपने कल्याण के लिए उस पर चढ़ते
हैं. ( ६ )
सुनावमा रुहेयमस्त्रवन्तीमनागसम्. शतारित्रा ᳪ स्वस्तये.. (७)
यह नाव दोष रहित, बिना छेदों वाली, अपनेआप चलने वाली व सैकड़ों
शत्रुओं से त्राण करने वाली है. हम अपने कल्याण के लिए इस पर आरूढ़ ( चढ़ने )
होने की कृपा करें. ( ७ )
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजा ᳪ सि सुक्रतू.. (८)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे यहां गाय के घी से सींचिए. आप हमारे खेतों
को मधुर अमृत से सींचिए. ( ८ )
प्र बाहवा सिसृतं जीवसे न ऽ आ नो गव्यूतिमुक्षतं घृतेन.
आ मा जने श्रवयतं युवाना श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमा.. (९)
हे मित्र व वरुण देव! आप दोनों देव हमारी प्रार्थना सुनिए. आप अपनी भुजाएं
फैला कर हमें आशीर्वाद व इस जीवन में यश दीजिए. आप हमारे यज्ञ को गाय के
घी से व खेत को मधु अमृत से सींचिए. ( ९ )
शन्नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः.
जम्भयन्तो ऽ हिं वृक ᳪ रक्षा ᳪ सि सनेम्यस्मद्युयवन्नमीवाः... (१०)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे लिए सुखदायी होइए. हम आप के लिए
अन्नमय हवि देते हैं. आप हमारे रोग दूर कीजिए. आप हमारे शत्रुओं व राक्षसों का
विनाश कीजिए. आप भेड़िए और ऐसे ही हिंसक जीवों को हम से दूर भगाइए. ( १० )
वाजे वाजेवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा ऽ अमृता ऽ ऋतज्ञाः.
अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः... (११)
हे मित्र व वरुण देव! आप ब्राह्मण, अमर व सत्यज्ञ हैं. युद्ध में अन्न, बल तथा
यजुर्वेद - २७१

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
धन प्राप्त कीजिए. आप इस यज्ञ में मधुर रस पीजिए. मदमस्त व तृप्त होइए. देवपथों
से गमन करने की कृपा कीजिए. (११)
समिद्धो अग्निः समिधा सुसमिद्धो वरेण्यः.
गायत्री छन्द ऽ इन्द्रियं त्र्यविर्गौर्वयो दधुः... (१२)
हे अग्नि! आप समिधावान हैं. समिधा से आप को अच्छी तरह प्रदीप्त किया
गया है. आप वरेण्य हैं. तीनों लोक और तीनों अवस्थाएं, अग्नि और गायत्री छंद
आप के शरीर को बल और आयु प्रदान करें. (१२)
तनूनपाच्छुचिव्रतस्तनूपाश्च सरस्वती.
उष्णिहा छन्द ऽ इन्द्रियं दित्यवाड्गौर्वयो दधुः... (१३)
अग्नि तन की रक्षा करने वाले और पवित्र संकल्प वाले हैं. सरस्वती देवी
उष्णिक् छंद और दिव्य हवि को धारण करने वाले अंग हमारे लिए बल और आयु
धारण करने की कृपा करें. (१३)
इडाभिरग्निरीड्यः सोमो देवो अमर्त्यः.
अनुष्टुप्छन्द ऽ इन्द्रियं पञ्चाविर्गौर्वयो दधुः.. (१४)
अग्नि प्रार्थनाओं से प्रसन्न होने योग्य हैं. सोम अमर हैं. अनुष्टुप् छंद और पांचों
इंद्रिय रूपी गायों से हमारे लिए बल तथा आयु धारण करने की कृपा करें. (१४)
सुबर्हिरग्निः पूषण्वान्स्तीर्णबर्हिरमर्त्यः.
बृहती छन्द ऽ इन्द्रियं त्रिवत्सो गौर्वयो दधुः... (१५)
अग्नि कुश के अच्छे आसन वाले, पुष्टिदायी, विस्तृत आकाश को शुद्ध करने
वाले व अमर हैं. बृहती छंद तीन बछड़ों वाली गायों से तथा इंद्रियों से हमारे लिए
बल और आयु धारण करने की कृपा करें. (१५)
दुरो देवीर्दिशो महीर्ब्रह्मा देवो बृहस्पतिः.
पङ्क्तिश्छन्द ऽ इहेन्द्रियं तुर्यवाड्‍गौर्वयो दधुः... (१६)
बृहस्पति देव, दूर की देवियां, महिमाशाली ब्रह्मा देव हमारे लिए बल और
आयु धारण करने की कृपा करें. पंक्ति, छंद, इंद्रियां, प्राणिमात्र का पोषण करने
वाली गायों से हमारे लिए बल तथा आयु धारण करने की कृपा करें. (१६)
उषे यह्वी सुपेशसा विश्वे देवा ऽ अमर्त्याः.
त्रिष्टुप्छन्द ऽ इहेन्द्रियं पष्ठवाड्गौर्वयो दधुः... (१७)
महान् तथा श्रेष्ठ स्वरूप वाली उषा देवी, सभी देवता एवं अमर देवगण
हमारे लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा करें. त्रिष्टुप् छंद इंद्रियां पोषण
२७२ – यजुर्वेद 632/17

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
का भार वहन करने वाली गाय हमारे लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा
करें. ( १७ )
दैव्या होतारा भिषजेन्द्रेण सयुजा युजा.
जगती छन्द ऽ इन्द्रियमनड्वागौर्वयो दधु:... ( १८ )
देवताओं के होता, वैद्य इंद्र देव के साथ जुड़ कर रहने वाले हमारे लिए बल और
आयु धारण करने की कृपा करें. जगती छंद, इंद्रियां, मन की गाड़ी को खींचने वाली
गाय हमारे लिए बल और आयु को धारण करने की कृपा करें. ( १८ )
तिस्र ऽ इडा सरस्वती भारती मरुतो विश:.
विराट् छन्द ऽ इहेन्द्रियं धेनुर्गौर्न वयो दधु:... ( १९ )
इड़ा देवी, सरस्वती देवी और भारती देवी तीनों देवियां, मरुद्गण हमारे लिए
बल और आयु धारण करने की कृपा करें. विराट् छंद, इंद्रियां तथा दूध देने वाली
गाय हमारे लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा करें. ( १९ )
त्वष्टा तुरीपो अद्भुत ऽ इन्द्राग्नी पुष्टिवर्धना.
द्विपदा छन्द ऽ इन्द्रियमुक्षा गौर्न वयो दधु:... ( २० )
त्वष्टा देव तेज गति वाले, विलक्षण व मोक्षदाता हैं. इंद्र देव एवं अग्नि
पुष्टिवर्द्धक हैं. द्विपद छंद, इंद्रियां मोक्षदायी गायें हमारे लिए बल और आयु धारण
करने की कृपा करें. ( २० )
शमिता नो वनस्पति: सविता प्रसुवन् भगम्.
ककुप्छन्द ऽ इहेन्द्रियं वशा वेहद्वयो दधु:... ( २१ )
वनस्पति हमारे लिए शांतिदायी हो. सविता देव हमारे लिए सौभाग्य उपजाने
वाले हों. ककुप् छंद, इंद्रियां एवं अनुशासित गौ हमारे लिए आयु तथा बल धारण
करने की कृपा करे. ( २१ )
स्वाहा यज्ञं वरुण: सुक्षत्रो भेषजं करत्.
अतिच्छन्दा ऽ इन्द्रियं बृहदृषभो गौर्वयो दधु:... ( २२ )
यज्ञ के लिए स्वाहा. वरुण देव के लिए स्वाहा. श्रेष्ठ क्षत्रिय के लिए स्वाहा.
ओषधियों के लिए स्वाहा. अतिच्छंदा छंद, इंद्रियां विशाल बैल वाली गाय हमारे
लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा करें. ( २२ )
वसन्तेन ऋतुना देवा वसवस्त्रिवृता स्तुता:.
रथन्तरेण तेजसा हविरिन्द्रे वयो दधु:... ( २३ )
वसुदेवगणों की वसंत ऋतु तथा त्रिवृत छंद से स्तुति की गई है. वसुदेवगण की
यजुर्वेद - २७३

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
रथंतर छंद से स्तुति की गई है. हम तेज और हवि को इंद्र देव हेतु स्थापित करते हैं.
इंद्र देव हमारे लिए बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २३ )
ग्रीष्मेण ऋतुना देवा रुद्राः पञ्चदशे स्तुताः.
बृहता यशसा बल १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२४)
रुद्र देव गणों की पंद्रह प्रार्थनाओं एवं ग्रीष्मऋतु से स्तुति की गई है. विशाल
यश व बल से हवि को इंद्र देव हेतु स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल एवं
आयु धारने की कृपा करें. ( २४ )
वर्षाभिर्ऋतुनादित्याः स्तोमे सप्तदशे स्तुताः.
वैरूपेण विशौजसा हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२५)
आदित्य देवगणों की सत्रह स्तोत्रों एवं वर्षा ऋतु से उपासना की गई है. वैरूप
छंद और ओज से हम इंद्र देव हेतु हवि स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल
एवं आयु धारने की कृपा करें. ( २५ )
शारदेन ऋतुना देवा ऽ एकवि १७ श ऋभव स्तुताः.
वैराजेन श्रिया श्रिय १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२६)
ऋभु देवगणों की इक्कीस स्तोत्रों तथा शरद ऋतु से उपासना की गई है. वैराज
छंद श्रिया ( लक्ष्मी ) की श्री बढ़ाते हैं. हम उस से इंद्र देव हेतु हवि स्थापित करते
हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल तथा आयु धारने की कृपा करें. ( २६ )
हेमन्तेन ऋतुना देवास्त्रिणवे मरुत स्तुताः.
बलेन शक्वरीः सहो हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२७)
मरुद् गण की नौ से तिगुने स्तोत्रों और हेमंत ऋतु से उपासना की गई है.
शक्वरी छंद और बल से हम इंद्र देव के लिए हवि स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे
लिए बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २७ )
शैशिरण ऋतुना देवास्त्रयस्त्रि १७ शेमृताः स्तुताः.
सत्येन रेवतीः क्षत्र १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२८)
हम तीस और तीन देवगणों की रेवती छंद से और शिशिर ऋतु से उपासना
करते हैं. हम सत्य और बल से इंद्र देव की स्थापना करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए
बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २८ )
होता यक्षत्समिधाग्निमिडस्पदेश्विनेन्द्र १७ सरस्वतीमजो धूम्रो न गोधूमैः कुवलैर्भेषजं
मधुशष्पैर्न तेज ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (२९)
होता ने अग्नि में समिधाएं प्रज्वलित की हैं. यह यज्ञ अश्विनी देव, इंद्र देव और
२७४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
सरस्वती देवी के लिए किया जा रहा है. इस यज्ञ से गोधूम ओषधियां, मधु, दूध, सोम
व घी प्राप्त होते हैं. होता सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२९)
होता यक्षत्तनूनपात्सरस्वतीमविर्मेषो न भेषजं पथा मधुमता भरन्नश्विनेन्द्राय वीर्यं
बदरैरुपवाकाभिर्भेषजं तोक्मभिः पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३०)
होता यजमान के शरीर की रक्षा के लिए यज्ञ करते हैं. यह यज्ञ अश्विनीकुमारों,
सरस्वती देवी और इंद्र देव के लिए किया जाता है. देवताओं के लिए अनाज,
ओषध, मधु, पेय, घी, दूध, सोम व घी आदि प्राप्त होते हैं. देवगण इन सब को
ग्रहण करने की कृपा करें. होता सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा
करें. (३०)
होता यक्षन्नराशं१४ सन्न नग्नहुं पतिं१४ सुरया भेषजं मेषः सरस्वती भिषग्रथो न
चन्द्र्यश्विनोर्वपाऽ इन्द्रस्य वीर्यं बदरैरुपवाकाभिर्भेषजं तोक्मभिः पयः सोमः
परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३१)
होता ने अन्न और पुष्टिकारी पदार्थों से यज्ञ किया. यज्ञ में देवताओं को
ओषधियां, बेर, अंकुरित धान आदि चढ़ाए गए. इन देवों के लिए मधु, घी, दूध व
सोम प्राप्त होते है. होता सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३१)
होता यक्षदिडेडित ऽ आजुह्वानः सरस्वतीमिन्द्रं बलेन वर्धयन्नृषभेण
गवेन्द्रियमश्विनेन्द्राय भेषजं यवैः कर्कन्धुभिर्मधु लाजैर्न मासरं पयः सोमः परिस्रुता
घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३२)
होता ने इड़ा देवी के लिए यज्ञ किया. होता ने इड़ा देवी का आह्वान किया.
होता ने इड़ा, सरस्वती देवी, इंद्र और अश्विनीकुमार की बढ़ोतरी के लिए यज्ञ
किया. होता ने उन के लिए जौ, बेर, अनाज और इंद्र देव के लिए बलदायी
ओषधियां चढ़ाईं. देवताओं के लिए मधु, घी, दूध व दही प्राप्त होते हैं. होता सब
के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३२)
होता यक्षद्बर्हिरूर्णम्म्रदा भिषङ्नासत्या भिषजाश्विनाश्वा शिशुमती भिषग्धेनुः
सरस्वती भिषग्दुह ऽ इन्द्राय भेषजं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३३)
होता ने देव वैद्य अश्विनीकुमारों और सरस्वती देवी के लिए कुश का आसन
बिछाया. इंद्र देव बछड़े वाली गाय और बच्चे वाली घोड़ी के चिकित्सक हैं. उन
के लिए इस यज्ञ में मधु, घी व दूध आदि प्राप्त होते हैं. वे इस को ग्रहण करें. यजमान
सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३३)
यजुर्वेद - २७५

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
होता यक्षद्दुरो दिशः कवष्यो न व्यचस्वतीरश्विभ्यां न दुरो दिश ऽ इन्द्रो न रोदसी दुघे
दुहे धेनुः सरस्वत्यश्विनेन्द्राय भेषज १७ शुक्रं न ज्योतिरिन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं
मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३४)
होता ने दिशाओं के द्वार के लिए यज्ञ किया. विद्वान् यजमान ने अश्विनीकुमारों,
इंद्र देव तथा देवी सरस्वती के लिए यज्ञ किया. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक देवताओं
के लिए ओषधि हुए. वाणी गौ हुई. इन्होंने सभी देवताओं के लिए दिव्य तेज और दिव्य
बल प्रदान किया. यज्ञ में देवताओं के लिए मधु, घी व दूध आदि टपकते हैं. देवगण
उन्हें ग्रहण करने व यजमान सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. (३४)
होता यक्षत्सुपेशासोषे नक्तं दिवाश्विना समञ्जाते सरस्वत्या त्विषिमिन्द्रे न
भेषज १७ श्येनो न रजसा हृदा श्रिया न मासरं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु
व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३५)
होता ने दिनरात के लिए यज्ञ किया. होता ने अश्विनीकुमारों और सरस्वती देवी
के लिए यज्ञ किया. उस यज्ञ से दिनरात में स्थित प्रकाश ने मन एवं श्रिया के साथ
मांड, ओषधि तथा श्येन पत्र ने चमक को इंद्र देव में स्थापित किया. उन के लिए
मधु, घी व दूध प्राप्त होता है. देवगण उन्हें ग्रहण करने की कृपा करें. यजमान सब
के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३५)
होता यक्षद्दैव्या होतारा भिषजाश्विनेन्द्रं न जागृवि दिवा नक्तं न भेषजैः शूष १७ सरस्वती
भिषक् सीसेन दुह ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३६)
दिव्य होता ने देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों तथा इंद्र देव को प्रसन्न करने
के लिए यज्ञ किया. सरस्वती देवी योग्य वैद्या और दिनरात काम में लगी रहती हैं.
उन्होंने सीसा से (धातु) शक्ति और बल को दुहा. उस यज्ञ में देव के लिए मधु, घी
और दूध प्राप्त होता है. देवगण उन्हें ग्रहण करने की कृपा करें. यजमान सब के
कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३६)
होता यक्षत्तिस्रो देवीर्न भेषजं त्रयस्त्रिधातवोपसो रूपमिन्द्रे हिरण्ययमश्विनेडा न भारती
वाचा सरस्वती मह ऽ इन्द्राय दुह ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३७)
होता ने भारती देवी, वाणी देवी और सरस्वती देवी के लिए यज्ञ किया. उस
ने इंद्र देव तथा अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ किया. उस ने तीनों गुणों को धारण
करने वाले मंत्रों से यज्ञ किया. सरस्वती देवी ज्योतिर्मय स्वरूप वाली हैं. उन्होंने इंद्र
देव के लिए बल को दुहा. यज्ञ में इंद्र देव के लिए मधु, घी व दूध प्राप्त होते हैं. वे
उन्हें ग्रहण करने की कृपा करें. यजमान सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की
कृपा करें. (३७)
२७६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
होता यक्षत् सुरेतसमृषभं नर्यापसं त्वष्टारमिन्द्रमश्विना भिषजं न सरस्वतीमोजो न
जूतिरिन्द्रियं वृको न रभसो भिषग् यशः सुरया भेषज १७ श्रिया न मासरं पयः सोमः
परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३८)
होता ने त्वष्टा देव के लिए यज्ञ किया. त्वष्टा देव अच्छे वीर्यवाले, बलवान व
परोपकारी हैं. होता ने देव वैद्य अश्विनी देवों के लिए यज्ञ किया. होता ने सरस्वती
देवी के लिए यज्ञ किया. होता ने चिकित्सा और इन सब देवताओं को प्रसन्न करने
के लिए यज्ञ किया. होता ने वृक, सुरा और मांड की ओषधि के रस से यज्ञ किया.
यह यज्ञ वैभवपूर्ण है. ओज, गति, बल तथा यश इंद्र देव में स्थापित किया. इस यज्ञ
में घी व दूध देवगण के लिए प्राप्त होते हैं. यजमान सब के कल्याण के लिए यज्ञ
करने की कृपा करे. (३८)
होता यक्षद्वनस्पति १४ शमितार १७ शतक्रतुं भीमं न मन्यु १४ राजानं व्याघ्रं नमसाश्विना
भाम १४ सरस्वती भिषगिन्द्राय दुह ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३९)
होता ने इंद्र देव, अश्विनी देव और देवी सरस्वती के लिए यज्ञ किया. ये देव
वनस्पति को शुद्ध करने वाले, सैकड़ों यज्ञ करने वाले, भीम, राजा, शेर के समान
गर्जना करने वाले हैं. उपयुक्त क्रोध वाले हैं. होता ने संस्कारयुक्त अन्न से इन देवों
की प्रसन्नता के लिए यज्ञ किया. सरस्वती ने इंद्र देव में क्रोध और बल को दुहा.
इस यज्ञ में देवों के लिए मधु, घी व दूध प्राप्त होते हैं. देवगण उन्हें ग्रहण करें. होता
सब का कल्याण करने की कृपा करें. (३९)
होता यक्षदग्नि १७ स्वाहाज्यस्य स्तोकाना १७ स्वाहा मेदसां पृथक् स्वाहा छागमश्विभ्या
१४ स्वाहा मेष १७ सरस्वत्यै स्वाहा ऋषभमिन्द्राय सिं १७ हाय सहस ऽ इन्द्रिय १४ स्वाहाग्निं
न भेषज १७ स्वाहा सोममिन्द्रिय १४ स्वाहेन्द्र १७ सुत्रामाण १७ सवितारं वरुणं भिषजां
पति १४ स्वाहा वनस्पतिं प्रियं पाथो न भेषज १७ स्वाहा देवा ऽ आज्यपा जुषाणो
अग्निर्भेषजं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (४०)
होता ने अग्नि के लिए यज्ञ किया. अग्नि के लिए स्वाहा. स्तोत्रों के लिए स्वाहा.
मद के लिए अलग से स्वाहा. अश्विनीकुमारों के लिए स्वाहा. छाग के लिए स्वाहा.
देवी सरस्वती के लिए स्वाहा. मेष के लिए स्वाहा. इंद्र देव सिंह के समान
शक्तिशाली हैं. इंद्र देव के लिए स्वाहा. ऋषभ के लिए स्वाहा. सविता देव सुरक्षक
हैं, उन के लिए स्वाहा. वैद्य वरुण बलदायी है, उन के लिए स्वाहा. वनस्पति को
प्रिय अन्न से स्वाहा. देव वैद्य को प्रिय अन्न से स्वाहा. देवगणों के लिए मधु, घी व
दूध प्राप्त होते हैं. देवगण उन्हें स्वीकारने की कृपा करें. यजमानगण सब के लिए
यज्ञ करने की कृपा करें. (४०)
यजुर्वेद - २७७

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
होता यक्षदश्विनौ छागस्य वपाया मेदसो जुषेता ꣳ हविर्होतर्यज.
होता यक्षत्सरस्वती मेषस्य वपाया मेदसो जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.
होता यक्षदिन्द्रमृषभस्य वपाया मेदसो जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४१)
होता ने अश्विनीकुमारों के लिए छाग के मेद से यज्ञ किया. आप भी ऐसी ही
हवि से यज्ञ करने की कृपा कीजिए. होता ने सरस्वती देवी के लिए मेष के मेद से
यज्ञ किया. आप भी ऐसी ही हवि से यज्ञ करने की कृपा करें. होता इंद्र की
प्रसन्नता हेतु ऋषभ की वसा को स्थापित करते हैं. होता सब के कल्याण हेतु ऐसा
यज्ञ करें. ( ४१ )
होता यक्षदश्विनौ सरस्वतीमिन्द्र ꣳ सुत्रामाणमिमे सोमाः सुरामाणश्छागैर्न मेषैर्ऋषभैः
सुताः शष्पैर्न तोक्मभिर्लाजैर्महस्वन्तो मदा मासरेण परिष्कृताः शुक्राः पयस्वन्तोमृताः
प्रस्थिता वो मधुश्चुतस्तानश्विना सरस्वतीन्द्रः सुत्रामा वृत्रहा जुषन्ता ꣳ सोम्यं मधु
पिबन्तु मदन्तु व्यन्तु होतर्यज.. (४२)
होता ने अश्विनीकुमारों के लिए सुंदर छागों ( ओषधि ) से यजन किया. होता
ने वैभवशाली इंद्र देव के लिए ऋषभों से यजन किया. होता ने सरस्वती देवी के
लिए इन ओषधियों से यजन किया. यजमान देवों के लिए धान, खील, परिष्कृत
रसीला मधु चुआने वाला सोम आदि भेंट करते हैं. दोनों अश्विनीकुमार, वैभववान
वृत्र नाशक इंद्र देव, सरस्वती देवी इस मधुर सोमरस को पीएं. मदमस्त हों. हे होता!
आप भी ऐसा ही यज्ञ कीजिए. ( ४२ )
होता यक्षदश्विनौ छागस्य हविष ऽ आत्तामद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः
पुरा पौरुषेय्या गृभो घस्तां नूनं घासे अज्राणां यवसप्रथमाना ꣳ सुमत्क्षराणा ꣳ
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ
उत्साहतोङ्गादङ्गादवत्तानां करत ऽ एवाश्विना जुषेता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४३)
होता ने अश्विनी कुमारों के लिए छाग ( ओषधि ) के बीच के भाग से यज्ञ
किया. द्वेषियों से पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण
अपने पौरुष से अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु
रूप में सैकड़ों गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न
हो. वे अंग पुष्ट हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४३ )
होता यक्षत् सरस्वतीं मेषस्य हविष ऽ आवयदद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः पुरा
पौरुषेय्या गृभो घसन्नूनं घासे अज्राणां यवसप्रथमाना ꣳ सुमत्क्षराणा ꣳ
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्साहतो ऽ
ङ्गादङ्गादवत्तानां करदेव ꣳ सरस्वती जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४४)
आज होता ने देवी सरस्वती के लिए मेष के बीच के भाग से यज्ञ किया. द्वेषियों
२७८ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
से पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण अपने पौरुष
से अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु रूप में सैकड़ों
गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न हो. वे अंग पुष्ट
हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४४ )
होता यक्षदिन्द्रमृषभस्य हविष ऽ आवयदद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः
पुरा पौरुषेय्या गृभो घसन्नूनं घासे अत्राणां यवसप्रथमाना १७ सुमतक्षराणा १७
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्साद्तो ऽ
ङ्गादङ्गादवत्तानां करदेवमिन्द्रो जुषता १७ हविर्होतर्यज.. (४५)
आज होता ने इंद्र देव हेतु ऋषभ के बीच के भाग से यज्ञ किया. द्वेषियों से
पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण अपने पौरुष से
अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु रूप में सैकड़ों
गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न हो. वे अंग पुष्ट
हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४५ )
होता यक्षद्वनस्पतिमभि हि पिष्टतमया रभिष्ठया रशनयाधित. यत्राश्विनोश्छागस्य
हविषः प्रिया धामानि यत्र सरस्वत्या मेषस्य हविषः प्रिया धामानि यत्रेन्द्रस्य ऋषभस्य
हविषः प्रिया धामानि यत्राग्नेः प्रिया धामानि यत्र सोमस्य प्रिया धामानि यत्रेन्द्रस्य
सुत्राम्णः प्रिया धामानि यत्र सवितुः प्रिया धामानि यत्र वरुणस्य प्रिया धामानि यत्र
वनस्पतेः प्रिया पाथा १७ सि यत्र देवानामाज्यपानां प्रिया धामानि यत्राग्नेर्होतुः प्रिया
धामानि तत्रैतान्रस्तुत्येवोपस्तुत्येवोपावस्त्रक्ष्दभीयस ऽ इव कृत्वी करदेवं देवो
वनस्पतिर्जुषता १७ हविर्होतर्यज.. (४६)
होता ने वनस्पति देव के लिए यज्ञ किया. बंधे हुए पशु की भांति वनस्पति
अपने स्थान पर रहने ( स्थिर ) की कृपा करें. जहां छाग की हवि अश्विनीकुमार का
प्रिय धाम है, जहां मेष की हवि सरस्वती देवी का प्रिय धाम है, जहां ऋषभ की हवि
इंद्र देव का प्रिय धाम है, जहां अग्नि का प्रिय धाम है, जहां सोम का प्रिय धाम है,
जहां सुरक्षक इंद्र देव का प्रिय धाम है, जहां सविता देव का प्रिय धाम है, जहां
वरुण देव का प्रिय धाम है, जहां वनस्पति देव का प्रिय धाम है, जहां घी की हवि
पीने वाले का प्रिय धाम है, जहां अग्नि होता हैं, उन का प्रिय धाम है, वहां प्रस्तुत
और अप्रस्तुत हो कर देवगण उत्तम हवि ग्रहण करते हैं. आप भी ऐसा ही यज्ञ
कीजिए. ( ४६ )
होता यक्षदग्नि १७ स्विष्टकृतमयाडग्निरश्विनोश्छागस्य हविषः प्रिया धामान्ययाट् सरस्वत्या
मेषस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्य ऋषभस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडग्नेः प्रिया
धामान्ययाट् सोमस्य प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्य सुत्राम्णः प्रिया धामान्ययाट् सवितुः प्रिया
धामान्ययाड् वरुणस्य प्रिया धामान्ययाड् वनस्पतेः प्रिया पाथा १७ स्ययाड् देवानामाज्यपानां
यजुर्वेद - २७९

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
प्रिया धामानि यक्षदग्नेर्होतुः प्रिया धामानि यक्षत् स्वं महिमानमायजतामेज्या ऽ इषः कृणोतु
सो अध्वरा जातवेदा जुषता १४ हविर्होतर्यज.. (४७)
होता ने अग्नि हेतु भलीभांति यज्ञ किया. अग्नि ने कृपा की. अश्विनीकुमारों
को छाग के धाम समर्पित किए. अश्विनीकुमारों को ऋषभ धाम समर्पित किए.
सरस्वती देवी को मेष के धाम समर्पित किए. वरुण देव के प्रिय धाम समर्पित किए.
वनस्पति के प्रियधाम समर्पित किए. घी की हवि पीने वालों के लिए प्रिय धाम
समर्पित किए. अग्नि सर्वज्ञ हैं. महिमाशाली हैं. वे प्रिय हवि का सेवन करें. यजमानों
का कल्याण करें. हे होता गण! आप भी ऐसा ही यज्ञ कीजिए. ( ४७ )
देवं बर्हिः सरस्वती सुदेवमिन्द्रे अश्विना.
तेजो न चक्षुरक्ष्योर्बर्हिषा दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (४८)
सरस्वती देवी ने देव सुदेव इंद्र और अश्विनीकुमारों के लिए कुश का आसन
दिया. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव में तेज की स्थापना की. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव
की आंखों में दृष्टि की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन
के इच्छुक यजमान उस के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४८ )
देवीद्वारो अश्विना भिषजेन्द्रे सरस्वती.
प्राणं न वीर्यं नसि द्वारो दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (४९)
सरस्वती देवी दिव्य द्वार वाली हैं, अश्विनीदेव ने इंद्र देव में प्राण और वीर्य की
स्थापना की. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि की स्थापना की. इंद्र
देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के इच्छुक यजमान उस के लिए
कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४९ )
देवी उषासावश्विना सुत्रामेन्द्रे सरस्वती.
बलं न वाचमास्य ऽ उषाभ्यां दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५०)
रात्रि देव उषा देवी हैं. सरस्वती देवी ने इंद्र देव में बल की स्थापना की. मुंह में
वाणी शक्ति की स्थापना की. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि की
स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के इच्छुक यजमान उस
के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. ( ५० )
देवी जोष्ट्री सरस्वत्यश्विनेन्द्रमवर्धयन्.
श्रोत्रन्न कर्णयोर्यशो जोष्ट्रीभ्यां दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५१)
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव में जोश बढ़ाया. इंद्र देव का यश
बढ़ाया. दोनों कानों में सुनने की शक्ति स्थापित की. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की
आंखों में दृष्टि की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के
इच्छुक यजमान उस के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. ( ५१ )
२८० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
देवी ऊर्जाहुती दुघे सुदुघेन्द्रे सरस्वत्यश्विना भिषजावतः.
शुक्रं न ज्योति स्तनयोराहुती धत्त ऽ इन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५२)
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमार ऊर्जा वाले, मनोकामना पूरक व रसीले हैं.
दोनों ने इंद्र देव में शुक्र की स्थापना की. बीच के प्रदेश में ज्योति स्थापित की.
अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं.
हमारे लिए धन धारें. धन के इच्छुक यजमान उस के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने
की कृपा करें. ( ५२ )
देवा देवानां भिषजा होताराविन्द्रमश्विना.
वषट्कारैः सरस्वती त्विषिं न हृदये मति १४ होतृभ्यां दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य
व्यन्तु यज.. (५३)
अश्विनीकुमार देवों के देव हैं. वे देवों के चिकित्सक हैं. उन्होंने और सरस्वती
देवी ने इंद्र देव में वषट्कार ( तेज ) व हृदय में बुद्धि की स्थापना की. अश्विनीकुमारों
ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए
धन धारें. धन के इच्छुक यजमान उस के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा
करें. ( ५३ )
देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीरश्विनेडा सरस्वती.
शूषं न मध्ये नाभ्यामिन्द्राय दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५४)
सरस्वती आदि तीनों देवियों सहित अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव के मध्य भाग में
नाभि में बल धारण कराया. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि की
स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के इच्छुक यजमान उस
के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. ( ५४ )
देव ऽ इन्द्रो नराश १४ सस्त्रिवरूथः सरस्वत्याश्विभ्यामीयते रथः.
रेतो न रूपममृतं जनित्रमिन्द्राय त्वष्टा दधदिन्द्रियाणि वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु
यज.. (५५)
सरस्वती देवी, त्वष्टा देव तथा अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव के लिए प्रशंसा योग्य
रथ प्रस्तुत किया. इन देवों ने इंद्र देव में वीर्य की स्थापना की. रूप उपजाया.
जननेंद्रिय में उपजाने की शक्ति की स्थापना की. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की
आंखों में दृष्टि की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के
इच्छुक यजमान उस के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. ( ५५ )
देवो देवैर्वनस्पतिर्हिरण्यपर्णो अश्विभ्या १५ सरस्वत्या सुपिप्पल ऽ इन्द्राय पच्यते मधु.
ओजो न जूतिर्ऋषभो न भामं वनस्पतिर्नो दधदिन्द्रियाणि वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु
यज.. (५६)
यजुर्वेद - २८१

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
वनस्पति देव देवों के देव और सुनहरे पत्तों वाले फलों के स्वामी हैं. वनस्पति
देव अश्विनीकुमारों तथा सरस्वती देवी ने इंद्र देव को अच्छे मीठे फल से पाया. इंद्र
देव में ओज तथा बल धारण कराया. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि
की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के इच्छुक यजमान
उस के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. (५६)
देवं बर्हिर्वारितीनामध्वरे स्तीर्णमश्विभ्यामूर्णम्रदाः सरस्वत्या स्योनमिन्द्र ते सदः.
ईशायै मन्यु १६ राजानं बर्हिषा दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५७)
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमार ने यज्ञसदन में इंद्र देव के लिए कुश का
आसन बिछाया. इन्होंने इंद्र देव में मन्यु (क्रोध) तथा वैभव धारण कराया. (५७)
देवो अग्निः स्विष्टकृद्देवान्यक्षद्यथायथ १४ होताराविन्द्रमश्विना वाचा वाच १७
सरस्वतीमग्नि १४ सोम १४ स्विष्टकृत् स्विष्ट ऽ इन्द्रः सुत्रामा सविता वरुणो भिषगिष्टो
देवो वनस्पतिः स्विष्टा देवा ऽ आज्यपाः स्विष्टो अग्निरग्निना होता होत्रे स्विष्टकृद्यशो
न दधदिन्द्रियमूर्जमपचिति १४ स्वधां वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५८)
भलीभांति लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अग्नि, मित्र देव, वरुण देव, इंद्र देव, सविता
देव, वनस्पति देव तथा घी पीने वाले अन्य देवों ने अग्नि द्वारा ग्रहण की हुई हवि
को ग्रहण किया. देवगण यजमानों द्वारा किए गए यज्ञ से प्रसन्न हुए. देवगण ने
यजमानों के लिए यश, इंद्रिय शक्ति, बल तथा पराक्रम धारण किया. (५८)
अग्निमद्य होतारमवृणीतायं यजमानः पचन् पक्तीः पचन् पुरोडाशान् बध्नन्नश्विभ्यां
छाग १४ सरस्वत्यै मेषमिन्द्राय ऋषभ १४ सुन्वन्नश्विभ्या १४ सरस्वत्या ऽ इन्द्राय सुत्राम्णे
सुरासोमान्.. (५९)
इस यजमान ने आज होता अग्नि का वरण किया. सरस्वती देवी के लिए मेष
से पुरोडाश पकाया. अश्विनीकुमारों के लिए छाग से पुरोडाश पकाया. इंद्र देव के
लिए ऋषभ से पुरोडाश पकाया. सरस्वती देवी तथा अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव हेतु
सुरा (ओषधियों का तीखा रस) और सोम भेंट किया. (५९)
सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदश्विभ्यां छागेन सरस्वत्यै मेषेणेन्द्राय
ऋषभेणाक्षँस्तान् मेदस्तः प्रति पचतागृभीषतावीवृधन्त पुरोडाशैरपुरश्विना सरस्वतीन्द्रः
सुत्रामा सुरासोमान्.. (६०)
आज वनस्पति देव यज्ञ में पधारें. उन्होंने छाग से अश्विनीकुमारों को प्रसन्न
किया. उन्होंने मेष से सरस्वती देवी को प्रसन्न किया. उन्होंने ऋषभ से इंद्र देव को
प्रसन्न किया. तीनों देव इस से आनंदित हुए. इन ओषधियों से पुरोडाश पकाया.
सरस्वती देवी तथा अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव हेतु सुरा (ओषधियों का तीखा रस)
और सोम भेंट किया. (६०)
२८२ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
त्वामद्य ऋष ऽ आर्षेय ऋषीणां नपादवृणीतायं यजमानो बहुभ्य ऽ आ सङ्गतेभ्य ऽ एष मे
देवेषु वसु वार्यायक्ष्यत ऽ इति ता या देवा देव दानान्यदुस्तान्यस्मा ऽ आ च शास्स्वा च
गुरस्वेषितश्च होतरसि भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकाय सूक्ता ब्रूहि.. (६१)
आर्ष ऋषियों के मार्ग पर चलते हुए यजमान ने यज्ञ में सभी देवों का वरण
किया. यजमान ने ऐश्वर्य की कामना से यज्ञ किया. इन देवगणों ने यजमान के लिए
दिव्य दान किए. हे होताओ! आप सभी देवताओं का आह्वान कीजिए. आप भद्र
वाणी से सभी देवताओं का आह्वान कीजिए. आप अच्छे वाणीमय सूत्रों से देवताओं
का आह्वान कीजिए. ( ६१ )
यजुर्वेद - २८३

बाईसवां अध्याय

बाईसवां अध्याय
तेजोसि शुक्रममृतमायुष्पा ऽ आयुर्मे पाहि. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्चिवनोर्बाहुभ्यां
पूष्णो हस्ताभ्यामाददे.. (१)
हे देव! आप तेजोमय, चमकीले, अमर व आयु की रक्षा करने वाले हैं. आप
हमारी आयु की रक्षा कीजिए. सविता देव और अश्विनीकुमार की बाहु तथा पूषा
देव के हाथों आप हम पर कृपा दान कीजिए. (१)
इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य पूर्व ऽ आयुषि विदथेषु कव्या.
सा नो अस्मिन्त्सुत ऽ आ बभूव ऋतस्य सामन्तसरमारपन्ती.. (२)
कवियों ने यज्ञ से ज्ञान पाया. ज्ञान से सृष्टि व आयु को जाना. वे हमारे पुत्रों के
लिए ऋत को जानें. प्रकृति के रहस्यों को जान जाएं. (२)
अभिधा असि भुवनमसि यन्तासि धर्त्ता.
स त्वमग्निं वैश्वानर १४ सप्रथसं गच्छ स्वाहाकृतः.. (३)
हे अश्व! आप दोनों लोकों के धारक, भुवन, नियंत्रक व धारक हैं. आप
वैश्वानर अग्नि में आहुति दीजिए. आप आहुतिपूर्वक अपने निर्धारित स्थान तक
पहुंचने की कृपा कीजिए. (३)
स्वगा त्वा देवेभ्यः प्रजापतये ब्रह्मन्नश्वं भन्त्स्यामि देवेभ्यः प्रजापतये तेन राध्यासम्.
तं बधान देवेभ्यः प्रजापतये तेन राध्नुहि.. (४)
आप सर्वत्र गमन करने वाले हैं. आप देवों तक स्वयं जाने वाले हैं. आप प्रजापति
तक पहुंचने वाले हैं. अग्नि ब्रह्मज्ञानी हैं. हम आप से देवताओं तक पहुंचने की प्रार्थना
करते हैं. देवता और प्रजापति हमें सब प्रकार के धन प्रदान करने की कृपा करें. (४)
प्रजापतये त्वा जुष्टं प्रोक्षामीन्द्राग्निभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि वायवे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि
विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यो जुष्टं प्रोक्षामि सर्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यो जुष्टं प्रोक्षामि.
यो अर्वन्तं जिघा १४ सति तमभ्यमीति वरुणः.
परो मर्त्तः परः श्वा.. (५)
प्रजापति सब के प्रिय हैं. हम प्रजापति की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक करते
२८४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
हैं. इंद्र और अग्नि की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक करते हैं. हम वायु की संतुष्टि
हेतु आप का अभिषेक करते हैं. हम विश्वे देव की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक
करते हैं. हम सभी देवों की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक करते हैं. यज्ञ की जो चंचल
ऊंची उठती हुई लपटें हैं उन्हें जो भी हानि पहुंचाने वाले हों, उन्हें वरुण देव नष्ट करने
की कृपा करें. यज्ञ को नुकसान पहुंचाने वाले कुत्तों और ऐसे व्यक्तियों को दूर
पहुंचाने की कृपा करें. ( ५ )
अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहापां मोदाय स्वाहा सवित्रे स्वाहा वायवे स्वाहा विष्णवे
स्वाहेन्द्राय स्वाहा बृहस्पतये स्वाहा मित्राय स्वाहा वरुणाय स्वाहा.. ( ६)
अग्नि के लिए स्वाहा. सोम के लिए स्वाहा. प्रसन्नता के लिए स्वाहा. सविता
के लिए स्वाहा. वायु के लिए स्वाहा. विष्णु के लिए स्वाहा. इंद्र के लिए स्वाहा.
बृहस्पति के लिए स्वाहा. मित्र के लिए स्वाहा. वरुण के लिए स्वाहा. ( ६ )
हिङ्काराय स्वाहा हिङ्कृताय स्वाहा क्रन्दते स्वाहावक्रन्दाय स्वाहा प्रोथते स्वाहा
प्रप्रोथाय स्वाहा गन्धाय स्वाहा घ्राताय स्वाहा निविष्टाय स्वाहोपविष्टाय स्वाहा
सन्दित्वाय स्वाहा वल्गते स्वाहासीनाय स्वाहा शयानाय स्वाहा स्वपते स्वाहा जाग्रते
स्वाहा कूजते स्वाहा प्रबुद्धाय स्वाहा विजृम्भमाणाय स्वाहा विवृत्ताय स्वाहा स ष्ठ
हानाय स्वाहोपस्थिताय स्वाहायनाय स्वाहा प्रायणाय स्वाहा.. (७)
हिंकार के लिए स्वाहा. हिंकृत के लिए स्वाहा. क्रंदन के लिए स्वाहा. अवक्रंदन
के लिए स्वाहा. कार्य शुरू करने के लिए स्वाहा. कार्य समाप्त करने के लिए स्वाहा.
गंध के लिए स्वाहा. सूंघने के लिए स्वाहा. स्थित के लिए स्वाहा. बैठने के लिए
स्वाहा. स्थिर के लिए स्वाहा. गतिमान के लिए स्वाहा. आसन ग्रहण करने के लिए
स्वाहा. सोने के लिए स्वाहा. जाग्रत के लिए स्वाहा. कूजने के लिए स्वाहा. प्रबुद्ध के
लिए स्वाहा. जम्हा के लिए स्वाहा. चैतन्य होने के लिए स्वाहा. उपस्थित के लिए
स्वाहा. आगमन के लिए स्वाहा. गमन के लिए स्वाहा. ( ७ )
यते स्वाहा धावते स्वाहोद्द्रवाय स्वाहोद्द्रुताय स्वाहा शूकाराय स्वाहा शूक़्ताय स्वाहा
निषण्णाय स्वाहोत्थिताय स्वाहा जवाय स्वाहा बलाय स्वाहा विवर्त्तमानाय
स्वाहा विवृत्ताय स्वाहा विधून्वानाय स्वाहा विधूताय स्वाहा शुश्रूषमाणाय स्वाहा शृण्वते
स्वाहेक्षमाणाय स्वाहेक्षिताय स्वाहा वीक्षिताय स्वाहा निमेषाय स्वाहा यदत्ति तस्मै स्वाहा
यत् पिबति तस्मै स्वाहा यन्मूत्रं करोति तस्मै स्वाहा कुर्वते स्वाहा कृताय स्वाहा.. (८)
जाते हुए के लिए स्वाहा. दौड़ते हुए के लिए स्वाहा. उत्कर्षशील के लिए
स्वाहा. उत्कर्ष हेतु गतिमान के लिए स्वाहा. बैठे हुए के लिए स्वाहा. उठे हुए के लिए
स्वाहा. वेगवान के लिए स्वाहा. बल के लिए स्वाहा. बारबार किए जाने के लिए
स्वाहा. बारबार किए गए के लिए स्वाहा. कांपने वाले के लिए स्वाहा. कांपने के
लिए स्वाहा. सुनने की इच्छा वाले के लिए स्वाहा. सुनने के लिए स्वाहा. देखने के
यजुर्वेद - २८५

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
लिए स्वाहा. देख चुके के लिए स्वाहा. देखनेपरखने के लिए स्वाहा. पलक झपकाने
के लिए स्वाहा. जो खाता है, उस के लिए स्वाहा. जो पीता है, उस के लिए स्वाहा.
जो मूत्र विसर्जित करता है, उस के लिए स्वाहा. करने वाले के लिए स्वाहा. कर
चुके के लिए स्वाहा. ( ८ )
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. ( ९ )
सविता देव को नमस्कार है. सविता देव वरेण्य, सौभाग्यदायी व देवों को
धारण करते हैं. वे बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर उन्मुख करते हैं. वे हमारी बुद्धि को प्रेरित
करने की कृपा करें. ( ९ )
हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये. स चेत्ता देवता पदम्.. ( १० )
सविता देव! आप सोने के हाथों वाले व आप सर्वज्ञ व चित्त में धारण करने
योग्य हैं. हम अपनी रक्षा के लिए आप का आह्वान करते हैं. ( १० )
देवस्य चेततो महीं प्र सवितुर्हवामहे. सुमति १७ सत्यराधसम्.. ( ११ )
हे सविता देव! आप चैतन्य करते हैं. आप सत्य रूपी धन वाले हैं. हम सुमति
( अच्छी बुद्धि ) हेतु आप का आह्वान करते हैं. ( ११ )
सुष्टुति १७ सुमतीवृधो राति १७ सवितुरीमहे. प्र देवाय मतीविदे.. ( १२ )
हे सविता देव! आप सुमति की बढ़ोतरी करते हैं. आप हम को सुष्ठु ( श्रेष्ठ )
गति प्रदान करने की कृपा कीजिए. हम बुद्धिपूर्वक सविता देव की उपासना करते
हैं. ( १२ )
राति १७ सत्यपतिं महे सवितारमुप ह्वये. आसवं देववीतये.. ( १३ )
हम सत्यति, धनशील, वैभववान सविता देव की उपासना करते हैं. हम
देवताओं को तृप्त करने के लिए सविता देव की उपासना करते हैं. ( १३ )
देवस्य सवितुर्मतिमासवं विश्वदेव्यम्. धिया भगं मनामहे.. ( १४ )
सविता देव वैभववान हैं. सभी देवताओं के हितैषी हैं. सौभाग्य बढ़ाने वाली
बुद्धि को पाने के लिए हम उन की उपासना करते हैं. ( १४ )
अग्नि १७ स्तोमेन बोधय समिधानो अमर्त्यम्. हव्या देवेषु नो दधत्.. ( १५ )
हे पुरोहित! आप अग्नि को स्तोत्रों से जाग्रत कीजिए. समिधाओं से
प्रज्वलित कीजिए. अग्नि अमर हैं. देवताओं के लिए हमारी हवि को धारण
करते हैं. ( १५ )
स हव्यवाडमर्त्य ऽ उशिग्दूतश्चनोहितः. अग्निर्धिया समृण्वति.. ( १६ )
२८६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
हे अग्नि! आप हवि वहन करते हैं. आप अमर हैं. आप स्वयं प्रज्वलित होते हैं.
आप देवताओं के दूत हैं. आप हितैषी हैं. आप हवि धारण कर के उसे पहुंचाने की
कृपा करें. ( १६ )
अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे. देवाँ २ आ सादयादिह.. (१७)
अग्नि दूत व हव्य वाहक हैं. हम सम्मुख ही उन की स्थापना करते हैं. हम
उन से अनुरोध करते हैं कि वह यहां पधारें व विराजें और हवि को देवताओं
तक पहुंचाएं. ( १७ )
अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पय:.
गोजरीया र २४ हमाणः पुरन्ध्या.. (१८)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले हैं. आप ने सूर्य को प्रकटाया. आप जल
धारण करने की सामर्थ्य रखते हैं. आप गौ आदि के लिए जीवन धारण करते हैं.
गौ आदि आप की कृपा से जल ( दूध ) धारती हैं. ( १८ )
विभूर्मात्रा प्रभूः पित्राश्वो ऽ सि हयो ऽ स्यत्यो ऽ सि मयो ऽ स्यर्वा ऽ सि सप्तिरसि
वाज्यसि वृषासि नृमणा ऽ असि.
ययुर्नामासि शिशुर्मामास्यादित्यानां पत्वान्विहि देवा ऽ आशापाला ऽ एतं देवेभ्यो ऽ श्वं
मेधाय प्रोक्षित २४ रक्षतेह रन्तिरिह रमतामिह धृतिरिह स्वधृतिः स्वाहा.. (१९)
हे अग्नि! आप वैभव संपन्न हैं. आप माता हैं. आप पिता हैं. आप अश्व हैं. आप
हम हैं. आप गतिशील हैं. आप मय हैं. आप पराक्रमी हैं. आप सुखदायी हैं. आप नम्र
हैं. आप शिशु हैं. आप रक्षक हैं. आप आदित्यों की तरह अपनी राह पर चलते हैं.
आप दिशापति हैं. आप देवताओं के लिए इस संस्कार संपन्न घोड़े की रक्षा की कृपा
कीजिए. यह यहां प्रसन्नता से रमण करें, रमें. यह यज्ञ को धारें. यह स्वयं धारण
करने की शक्ति वाले हैं. इन के लिए स्वाहा. ( १९ )
काय स्वाहा कस्मै स्वाहा कतमस्मै स्वाहा स्वाहाधिमाधीताय स्वाहा मनः प्रजापतये
स्वाहा चित्तं विज्ञातायादित्यै स्वाहादित्यै मह्यै स्वाहादित्यै सुमृडीकायै स्वाहा सरस्वत्यै
स्वाहा सरस्वत्यै पावकायै स्वाहा सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा पूष्णे प्रपथ्याय
स्वाहा पूष्णे नरन्धिषाय स्वाहा त्वष्ट्रे स्वाहा त्वष्ट्रे तुरीपाय स्वाहा त्वष्ट्रे पुरुरूपाय स्वाहा
विष्णवे स्वाहा विष्णवे निभूयपाय स्वाहा विष्णवे शिपिविष्टाय स्वाहा.. (२०)
प्रजापति के लिए स्वाहा. सुख हेतु स्वाहा. सर्वश्रेष्ठ के लिए स्वाहा. विद्या
धारण करने हेतु स्वाहा. मन स्वरूप प्रजापति के लिए स्वाहा. चित्त स्वरूप
प्रजापति के लिए स्वाहा. विशिष्ट ज्ञात आदित्य के लिए स्वाहा. मध्यादित्य के
लिए स्वाहा. सुखदायी के लिए स्वाहा. पवित्र सरस्वती देवी के लिए स्वाहा.
विशालवती देवी के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. श्रेष्ठ पथवाले पूषा
यजुर्वेद - २८७

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
देव के लिए स्वाहा. मानवधारी पूजा देव के लिए स्वाहा. त्वष्टा पूजा देव के
लिए स्वाहा. तीव्र पूषा देव के लिए स्वाहा. विविध रूप पूषा देव के लिए स्वाहा.
विष्णु हेतु स्वाहा. भूपति देव हेतु स्वाहा. सब के चित्त में स्थित विष्णु देव हेतु
स्वाहा. (२०)
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत्त सख्यम्.
विश्वो राय ऽ इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा.. (२१)
सविता देव संसार के नायक हैं. हम उन की मित्रता व संसार के सारे वैभव पाना
चाहते हैं. हम पुष्टता चाहते हैं. हम स्वर्गलोक चाहते हैं. सविता देव हेतु स्वाहा. (२१)
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर ऽ इषव्योतिव्याधी महारथो
जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य
यजमानस्य वीरो जायतां निकामेनिकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ऽ ओषधयः
पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्.. (२२)
हे ब्राह्मण! आप ब्रह्मवर्चस्वी हैं. राष्ट्र में शूरवीर बाणविद्या में निपुण महारथी
क्षत्रिय उत्पन्न हों. तीव्र वेग वाले घोड़े, भार ढोने वाले बैल, दुधारू गाएं लोगों
को मिलें. स्त्रियां चरित्रवती और गुणवती हों. वीर विजयी हों. सभी युवा हों.
अच्छे वक्ता हों. बादल अच्छे बरसें. ओषधियां फलवती हों. योगक्षेम का भी
निर्वाह हो. (२२)
प्राणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा वाचे स्वाहा
मनसे स्वाहा.. (२३)
प्राण को स्वाहा. अपान को स्वाहा. व्यान को स्वाहा. चक्षु को स्वाहा. वाणी
को स्वाहा. मन को स्वाहा. (२३)
प्राच्यै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहा दक्षिणायै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहा प्रतीच्यै
दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहोदीच्यै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहोर्ध्वायै दिशे
स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहावाच्यै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहा.. (२४)
पूर्व दिशा के लिए स्वाहा. पश्चिम दिशा के लिए स्वाहा. दक्षिण दिशा के लिए
स्वाहा. ईशान दिशा के लिए स्वाहा. ऊर्ध्व दिशा के लिए स्वाहा. प्रतीच्य दिशा के
लिए स्वाहा. उदीच्य दिशा के लिए स्वाहा. अर्वाच्य दिशा के लिए स्वाहा. अध्वार्य
दिशा के लिए स्वाहा. अर्वाच्य दिशा के लिए स्वाहा. उवाच्य दिशा के लिए स्वाहा.
ऊर्वाच्य दिशा के लिए स्वाहा. उवाच्य दिशा के लिए स्वाहा. (२४)
अद्भ्यः स्वाहा वार्य्यः स्वाहोदकाय स्वाहा तिष्ठन्तीभ्यः स्वाहा स्रवन्तीभ्यः स्वाहा
स्यन्दमानाभ्यः स्वाहा कूप्याभ्यः स्वाहा सूद्याभ्यः स्वाहा धार्याभ्यः स्वाहार्णवाय स्वाहा
२८८ - यजुर्वेद 632/18