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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
जो पितर अग्नि के समान तेजस्वी हैं, जो पितर स्वर्गलोक के बीच में हैं, वे
पितर स्वधा से आनंदित होते हैं. उन को स्वयं प्रकाशित परमात्मा अच्छी नीयत प्रदान
करें. उन के शरीर को आवश्यकता के अनुसार कर्म का फल प्रदान करने की कृपा
करें. (६०)
अग्निष्वात्तान्ऋतुमतो हवामहे नाराश १७ से सोमपीथं य ऽ आशुः.
ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वय १७ स्याम पतयो रयीणाम्.. (६१)
जो पितर अग्नि के समान तेजस्वी हैं, जो नीतिवान हैं, हम उन का आह्वान
करते हैं. हम प्रशंसित व सोमपान में तीव्र गतिशील पितर का आह्वान करते
हैं. वे हमारे ब्राह्मण पितर अच्छी तरह आह्वान योग्य हैं. हम धनों के स्वामी हो
जाएं. (६१)
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे.
मा हि १७ सिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व ऽ आगः पुरुषता कराम.. (६२)
हे पितरगणो! हम दाहिने घुटने पर टिक कर आप को आमंत्रित करते हैं.
आप इस पूरे यज्ञ में अपना अभिमत प्रकट करने की कृपा करें. आप हम को
हिंसित न करें. पितरगण यहां आने और हमारी रक्षा करने की कृपा करें. (६२)
आसीनासो ऽ अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय.
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त ऽ इहोजं दधात.. (६३)
पितरगण लाल सूर्यलोक में विराजे हुए हैं. आप हमारे लिए धन धारिए. मनुष्यों
के लिए ऐश्वर्य दीजिए. पितर पुत्रों के लिए वैभव दें. ऊर्जा धारण करें. (६३)
यमग्ने कव्यवाहन त्वं चिन्मन्यसे रयिम्.
तन्नो गीर्भिः श्रवाय्यं देवत्रा पनया युजम्.. (६४)
हे अग्नि! कविगण आप की स्तुति करते हैं. आप चिन्मय हैं. आप धन धारिए.
आप हमारी उन वाणियों को सुनिए. देवताओं के लिए इस हवि की रक्षा कीजिए.
हवि को उन तक पहुंचाइए. (६४)
यो अग्निः कव्यवाहनः पितॄन् यक्षदृतावृधः.
प्रेदु हव्यानि वोचति देवेभ्यश्च पितृभ्य ऽ आ.. (६५)
हे अग्नि! आप हवि वाहक हैं. आप सत्यमय यज्ञ की बढ़ोतरी करने वाले हैं.
आप देवताओं व पितरों तक हवि प्रेषित करने की कृपा करें. (६५)
त्वमग्न ऽ ईडितः कव्यवाहनावाढव्यानि सुरभीणि कृत्त्वी.
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवी १७ षि.. (६६)
यजुर्वेद - २४९

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
हे अग्नि! आप आकांक्षित, कविगणों से स्तुत व हवि वाहक हैं. आप सुगंधित
हवि को वहन करने की कृपा करें. देवगण प्रीतिपूर्वक इस हवि को ग्रहण करने की
कृपा करें. पितरगण को स्वधामय हवि प्रदान करते हैं. ( ६६ )
ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ २ उ च न प्रविद्म.
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञ १४ सुकृतं जुषस्व.. (६७)
जो हमारे पितर यहां विराजमान हैं और जो यहां नहीं हैं, जिन पितरों को
हम जानते हैं और जिन को नहीं जानते हैं, हे सर्वज्ञ अग्नि! आप उन्हें जानिए.
आप स्वधापूर्वक इस यज्ञ को अच्छी तरह संपादित कीजिए. ( ६७ )
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य ऽ उपरास ऽ ईयुः.
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नून १४ सुवृजनासु विक्षु.. (६८)
पितरों को नमन. जो पितर पूर्व में हुए, जो पितर बाद में हुए, जो पार्थिव हैं,
जो धर्म पालक हैं, उन सभी पितरों को सादर यह हवि प्राप्त हो. ( ६८ )
अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऽ ऋतमाशुषाणाः.
शुचीदयन् दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरपव्रन्.. (६९)
हे अग्नि! जैसे हमारे पितरों ने देह से मुक्त हो कर ऋतलोक को पाया, पवित्र
किया, ज्ञान का विस्तार किया, अज्ञान का भेदन किया, हम भी उन की ही तरह
दिव्यलोक को पाएं. ( ६९ )
उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि.
उशन्नुशत ऽ आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (७०)
हे अग्नि! आप यहां विराजिए. हम यज्ञ और अर्थ की कामना से समिधा से आप
को प्रज्वलित करते हैं. आप अग्रगामी हैं. आप पितरों को हविग्रहण करने के लिए
बुलाने की कृपा करें. ( ७० )
अपां फेनेन नमुचेः शिर ऽ इन्द्रोदवर्तयः. विश्वा यदजयः स्पृधः.. (७१)
हे इंद्र देव! आप ने जलों के फेन से ही नमुचि के सिर को काट दिया. आप
सभी अजेय शत्रुओं से स्पर्द्धा करने वाले हैं. ( ७१ )
सोमो राजामृत १४ सुत ऽ ऋजीषेणाजहान्मृत्युम्.
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान १४ शुक्रमन्धस ऽ इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोमृतं मधु.. (७२)
सोम राजा व अमृत हैं. वे हमें मृत्यु से दूर करते हैं. वे यज्ञ से सत्य, बल व
इंद्रियों में इंद्र का सामर्थ्य उपलब्ध कराते हैं. वे यज्ञ से दूध, अमृत व मधु उपलब्ध
कराते हैं. ( ७२ )
२५० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
अ॒द्भ्यः क्षीरं॒ व्यपिबत् क्रुङ्ङाङ्गिर॒सो धि॒या.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७३)
प्राण रूपी हंस बुद्धि से जल मिश्रित दूध में से दूध पीता है. ऋत से सत्य की
प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध व मधुर पदार्थ
की प्राप्ति कराता है. (७३)
सोम॑म॒द्भ्यो व्यपिबच्छन्द॑सा ह॒ ᳵ सः शु॒चिषत्.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७४)
आदित्य देव सोम को जलों से पृथक् कर के पीते हैं. ऋत से सत्य की प्राप्ति
कराते हैं. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराते हैं. यह हमें दूध व मधुर पदार्थ की
प्राप्ति कराते हैं. (७४)
अन्ना॒त्परिस्रुतो॒ रसं॒ ब्रह्म॑णा॒ व्यपिबत् क्ष॒त्रं पयः॒ सोमं॑ प्रजाप॑तिः.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७५)
ब्राह्मणों के साथ प्रजापति निस्सृत अन्न के रस से सोम रूपी दूध को अलग
कर के पीते हैं. ऋत से सत्य की प्राप्ति कराते हैं. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराते
हैं. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराते हैं. (७५)
रेतो॒ मूत्रं॑ वि॒जहा॑ति॒ योनिं॑ प्रवि॒शदि॑न्द्रि॒यम्.
गर्भो॒ जरायु॒णावृ॑त॒ ऽ उल्बं॑ जहाति॒ जन्म॑ना.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७६)
एक ही मार्ग मूत्र छोड़ता है और वही योनि इंद्रिय में प्रवेश कर के वीर्य छोड़ता
है. गर्भ जरायु से आवृत हो कर जन्म के साथ ही उस को भेद कर छोड़ देता है. ऋत
से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध,
अमृत की प्राप्ति कराता है. यह हमें मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता है. (७६)
दृष्ट्वा रू॒पे व्याक॑रोत्स॒त्यानृ॒ते प्र॒जाप॑तिः. अश्र॑द्धामनृ॒तेऽद॑धाच्छ्र॒द्धा ᳵ स॒त्ये प्र॒जाप॑तिः.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७७)
प्रजापति ने सत्य और असत्य दोनों को अलगअलग रूपों में स्थापित किया
प्रजापति ने असत्य को अश्रद्धा व सत्य को श्रद्धा के रूप में स्थापित किया. ऋत
से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध,
अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता है. (७७)
वे॒देन॑ रू॒पे व्यपिबत् सु॒तासु॒तौ प्र॒जाप॑तिः.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७८)
प्रजापति ने वेदों से ग्राह्य और अग्राह्य रूप को पीया. ऋत सत्य की प्राप्ति
यजुर्वेद - २५१

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ
की प्राप्ति कराता है. (७८)
दृष्ट्वा परिस्रुतो रस ᳵ शुक्रेण शुक्लं व्यपिबत् पयः सोमं प्रजापतिः.
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान ᳵ शुक्रमन्धस ऽ इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोमृतं मधु.. (७९)
प्रजापति ने निस्सृत सोम रस को दूध के साथ पीया. प्रजापति ने चमकीला
सोम रस को दूध के साथ पीया. यह ऋत से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों
में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता
है. (७९)
सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिण ऽ ऊर्णासूत्रेण कवयो वयन्ति.
अश्विना यज्ञ ᳵ सविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपं वरुणो भिषज्यन्.. (८०)
जैसे सीसे के यंत्र से तांत और ऊन आदि को बुना जाता है, वैसे ही मन से
मनीषी और कवि इस यज्ञ की वय की बढ़ोत्तरी करते हैं. अश्विनी देव यज्ञ को संपन्न
करते हैं. सविता देव, सरस्वती देवी, वरुण, इंद्र देव के रूप को ओषधियों से पुष्ट
करते हैं. (८०)
तदस्य रूपममृत ᳵ शचीभिस्तिस्रो दधुर्देवताः स ᳵ रणाः.
लोमानि शष्पैर्बहुधा न तोक्मभिस्त्वगस्य मा ᳵ सम्भवन्न लाजाः.. (८१)
इस यज्ञ के अमृतमय रूप को शची आदि तीनों देवताओं ने धारा. उन्होंने ही
इस की खोज की. बहुत प्रकार की घास के लोम उन के शरीर के रोम हुए. यज्ञ में
त्वक् को प्रकट किया. लाजा उन का मांस हुआ. (८१)
तदश्विना भिषजा रुद्रवर्तनी सरस्वती वयति पेशो अन्तरम्.
अस्थि मज्जानं मास्रैः कारोतरेण दधतो गवां त्वचि.. (८२)
वैद्य अश्विनीकुमार रुद्र जैसे स्वभाव के हैं. उन्होंने और देवी सरस्वती ने इंद्र
देव के शरीर को पूरा बनाया. अस्थि, मज्जा, मांस आदि और गायों की त्वचा
को धारा. (८२)
सरस्वती मनसा पेशलं वसु नासत्याभ्यां वयति दर्शतं वपुः.
रसं परिस्रुता न रोहितं नग्नहुर्धीरस्तसरं न वेम.. (८३)
सरस्वती देवी ने दोनों अश्विनीकुमारों के साथ मिल कर मन से विशेष सुंदर
तथा दर्शनीय शरीर की रचना की, रस ( लहू ) चुआया, धैर्य से विकार नाशक इस
को शरीर में उपजाया. (८३)
पयसा शुक्रममृतं जनित्र ᳵ सुरया मूत्राज्जनयन्त रेतः.
अपामतिं दुर्मतिं बाधमाना ऽ ऊवध्यं वात ᳵ सव्वं तदारात्.. (८४)
२५२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमारों ने दूध से चमकीला अमृत उपजाया. मूत्र
को उपजाया. वीर्य को उपजाया. अज्ञानवाली बुद्धि दुर्मति जन्य बाधाओं को दूर
किया. ऊवध्य और वात को बाहर निकालने का प्रबंध किया. ( ८४ )
इन्द्र सुत्रामा हृदयेन सत्यं पुरोडाशेन सविता जजान.
यकृत् क्लोमानं वरुणो भिषज्यन् मतस्ने वायव्यैर्न मिनाति पित्तम्.. (८५)
इंद्र देव सुरक्षक हैं. उन्होंने हृदय से सत्य को जना. सविता देव ने पुरोडाश से
सत्य को जना. वरुण देव ने ओषध से यकृत को ठीक किया. गले की नाड़ी को
ठीक किया. वायु ने अस्थि और पित्त को यथावस्थित किया. ( ८५ )
आन्त्राणि स्थालीर्मधु पिन्वमाना गुदाः पात्राणि सुदुघा न धेनुः.
श्येनस्य पत्रं न प्लीहा शचीभिरासन्दी नाभिरुदरं न माता.. (८६)
पात्र थाली और आंतें पीए हुए रसों को गुदा और अन्य भागों तक संचरित
करते हैं. हमारे लिए ये अच्छी दुधारू गायों की तरह हैं. श्येन के पंख की तरह हमारा
प्लीहा है. नाभि आसंदी संचालक है. उदर माता की तरह है. ( ८६ )
कुम्भो वनिष्ठुर्जनिता शचीभिर्यस्मिन्नग्रे योन्यां गर्भो अन्तः.
प्लाशिर्व्यक्तः शतधार ऽ उत्सो दुहे न कुम्भी स्वधां पितृभ्यः.. (८७)
कुंभ ने बड़ी आंत को जना. कुंभ में स्थापित सोम से जननेंद्रियों का उद्भव
हुआ. शतधारी सोम ने मूल स्रोत को दुहा. कुंभी ने स्वधा को पितरों के लिए भेंट
किया. ( ८७ )
मुख १४ सदस्य शिर ऽ इत् सतेन जिह्वा पवित्रमश्विनासन्तसरस्वती.
चप्यं न पायुर्भिषगस्य वालो वस्तिर्न शेपो हरसो तरस्वी.. (८८)
इंद्र देव के इस शरीर में मुख और मस्तक सत्य से पवित्र हैं. सत् से जिह्वा और
वाणी पवित्र है. अश्विनीकुमारों और सरस्वती देवी ने इसे पवित्र बनाया है. गुदा
मलविसर्जन से शरीर को पवित्र बनाता है. वस्ति और शेष जननेंद्रिय हैं. ( ८८ )
अश्विभ्यां चक्षुरमृतं ग्रहाभ्यां छागेन तेजो हविषा शृतेन.
पक्ष्माणि गोधूमैः कुवलैरुतानि पेशो न शुक्रमसितं वसाते.. (८९)
दोनों अश्विनीकुमारों ने ग्रहों के रूप में दो अमर नेत्र सिरजे. छाग से तेज
सिरजा. हवि से नेत्रों में ज्योति सिरजी. गेहूं की बाल और पैरों से लोम सिरजे. नेत्र
दोनों पक्षों ( शुक्ल और कृष्ण ) का संरक्षण करते हैं. ( ८९ )
अविर्न मेषो नसि वीर्याय प्राणस्य पन्था ऽ अमृतो ग्रहाभ्याम्.
सरस्वत्युपवाकैर्व्यानं नस्यानि बर्हिर्बर्दरैर्जजान.. (९०)
यजुर्वेद - २५३

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
परम शक्ति की नासिका में भेड़ ने बल सींचा. ग्रहों से अमृतमय प्राणों को
सांस की राह मिली. सरस्वती ने उपवाक से व्यान को प्रकट किया. पैर से बाहर के
लोम उपजाए. ( ९० )
इन्द्रस्य रूपमृषभो बलाय कर्णाभ्या ँ श्रोत्रममृतं ग्रहाभ्याम्.
यवा न बर्हिर्भुवि केसराणि कर्कन्धु जज्ञे मधु सारघं मुखात्.. (९१)
ऋषभ ने इंद्रियों का रूप रचा. कानों में बल बढ़ाया. श्रवण शक्ति वाले कानों
की रचना की. जौ तथा कुशा से भौंहों के बालों की उत्पत्ति की. बेर से मुंह में मीठी
लार उपजाई. ( ९१ )
आत्मन्नुपस्थे न वृकस्य लोम मुखे श्मश्रूणि न व्याघ्रलोम.
केशा न शीर्षन्यशसे श्रियै शिखा सि ँ हस्य लोम त्विषिरिन्द्रियाणि.. (९२)
विराट् इंद्र देव के शरीर में उपस्थ भाग के तथा नीचे के भाग के लोम वृक् के
लोम रूप हुए. विराट् इंद्र देव के शरीर के व्याघ्र के लोम दाढ़ीमूंछ हुए. सिर पर यश
के लिए केश उपजे. शोभा के लिए चोटी बनाई. अन्य इंद्रियों की त्वचा पर बाल
सिंह के लोम के रूप में हुए. ( ९२ )
अङ्गान्यात्मान् भिषजा तदश्विनात्मानमङ्गैः समधात् सरस्वती.
इन्द्रस्य रूप ँ शतमानमायुश्चन्द्रेण ज्योतिरमृतं दधानाः.. (९३)
इंद्र देव के अंगों को वैद्य अश्विनीकुमारों ने आत्मा से जोड़ा और सरस्वती ने
आत्मा को अंगों से जोड़ा. उन्होंने इंद्र के रूप को सौ वर्ष की आयु तक अनश्वर
बनाया. चंद्रमा के साथ ज्योति को अनश्वरता दी. ( ९३ )
सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां पत्नी सुकृतं बिभर्ति.
अपा ँ रसेन वरुणो न साम्नेन्द्र ँ श्रियै जनयन्नप्सु राजा.. (९४)
सरस्वती देवी अश्विनीकुमारों से योनि के बीच में गर्भ धारती हैं. वे अश्विनी
की पत्नी हैं. वे इंद्र देव को धारती हैं. जलों के रस के साथ वरुण देव साम से इंद्र
देव को पुष्ट करते हैं. जलों में सरस्वती श्रीमान् राजा को जनती हैं. ( ९४ )
तेजः पशूना ँ हविरिन्द्रियावत् परिस्रुता पयसा सारघं मधु.
अश्विभ्यां दुग्धं भिषजा सरस्वत्या सुतासुताभ्याममृतः सोम ऽ इन्दुः.. (९५)
वैद्य अश्विनीकुमार और देवी सरस्वती ने पशुओं के तेज से इंद्र देव के लिए हवि
निर्मित की. दूध और घी को मधुमक्खियों के मधु के साथ मिला कर मधुर पेय निर्मित
किया. अमृत जैसा शक्तिवर्द्धक सोमरस तैयार किया. ( ९५ )
२५४ - यजुर्वेद

बीसवां अध्याय

बीसवां अध्याय
क्षत्रस्य योनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसि. मा त्वा हि ँ सीन्मा मा हि ँ सी:.. (१)
हे वेदिके! आप क्षत्रिय का उत्पत्ति स्थान हैं. आप क्षत्रिय की नाभि हैं. यह
आसन आप को कष्ट न दे. आप भी हमें कष्ट मत दीजिए. (१)
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा.
साम्राज्याय सुक्रतुः.
मृत्योः पाहि विद्योत्पाहि.. (२)
आप व्रतधारी, वरुण, पालक और साम्राज्य के लिए सैकड़ों यज्ञ करने वाले
हैं. आप विद्युत् के उत्पात से रक्षा कीजिए. आप मृत्यु से बचाइए. (२)
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
अश्विनोर्भैषज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाभिषिञ्चामि सरस्वत्यै भैषज्येन
वीर्यायान्नाद्यायाभिषिञ्चामीन्द्रस्येन्द्रियेण बलाय श्रियै यशसेभिषिञ्चामि.. (३)
हम देवता सविता देव व अश्विनीकुमारों की बाहु हेतु आप को प्रतिष्ठित करते
हैं. हम पूषा देव के हाथों के लिए आप को प्रतिष्ठित करते हैं. हम अश्विनीकुमारों
की चिकित्सा के तेज से आप को प्रतिष्ठित करते हैं. हम ब्रह्मज्ञान के वर्चस्व हेतु
आप को प्रतिष्ठित करते हैं. हम सरस्वती देवी के ओषधि उपचार से आप को
प्रतिष्ठित करते हैं. हम अन्न व पराक्रम प्राप्ति हेतु आप को प्रतिष्ठित करते हैं. हम
इंद्र देव के इंद्रिय बल व यश हेतु आप का अभिषेक करते हैं. (३)
कोसि कतमोसि कस्मै त्वा काय त्वा.
सुश्लोक सुमङ्गल सत्यराजन्.. (४)
आप कौन हैं ? आप कौन से प्रजापति हैं ? आप किस के लिए हैं ? किस के
लिए आप को प्रतिष्ठित किया जाता है ? आप की अच्छे श्लोक से स्तुति की जाती
है. आप अच्छे कल्याणकारी, सत्यवान व राजा हैं. (४)
शिरो मे श्रीर्यशो मुखं त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि.
राजा मे प्राणो अमृत ँ सम्राट् चक्षुर्विराट् श्रोत्रम्.. (५)
यजुर्वेद - २५५

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
हमारा सिर, मुख, केश व मूंछें शोभायुक्त हों. हमारे प्राण राजा,अमृत व सम्राट्
हों. हमारे नेत्र सब कुछ देखने वाले हों. हमारे कान विराट् हों. ( ५ )
जिह्वा मे भद्रं वाङ्महो मनो मन्युः स्वराज् भामः.
मोदाः प्रमोदा ऽ अङ्गुलीरङ्गानि मित्रं मे सहः.. ( ६ )
हमारी जीभ कल्याणकारी वचन बोले. वाणी महिमा युक्त हो. मन अन्याय पर
क्रोध करे. हमारी अंगुलियां आमोदप्रमोद दें. हमारे मित्र हमारे साथ रहें. ( ६ )
बाहू मे बलमिन्द्रिय ᳵ हस्तौ मे कर्म वीर्यम्. आत्मा क्षत्रमुरो मम.. (७)
हमारे बाहु और इंद्रियां बल युक्त हों. हमारे दोनों हाथ पुरुषार्थी हों. हमारी
आत्मा और हृदय क्षत्रिय धर्म के अनुकूल हों. ( ७ )
पृष्ठीर्मे राष्ट्रमुदरम ᳵ सौ ग्रीवाश्च श्रोणी.
ऊरू अरत्नी जानुनी विशो मेऽङ्गानि सर्वतः.. ( ८)
हमारी पीठ राष्ट्र जैसी हो. पेट, दोनों कंधे, गरदन, दोनों कूल्हे, दोनों जंघाएं,
कमर, घुटने आदि हमारे अंग सब ओर से प्रजा का पोषण करें. ( ८ )
नाभिर्मे चित्तं विज्ञानं पायुर्मेपचितिर्भसत्.
आनन्दनन्दावाण्डौ मे भगः सौभाग्यं पसः.
जङ्घाभ्यां पद्भ्यां धर्मोस्मि विशि राजा प्रतिष्ठितः.. ( ९)
हमारी नाभि और चित्त विशिष्ट ज्ञान युक्त हों. हमारी गुदा संतुलित हो. हमारे
वृषण आनंद युक्त हों. हमारी स्त्रियों के अंग सौभाग्यशाली हों. जांघों, पैरों से हम
धर्माचरण करें. हम समाज में राजा की भांति प्रतिष्ठित हों. ( ९ )
प्रति क्षत्रे प्रति तिष्ठामि राष्ट्रे प्रत्यश्वेषु प्रति तिष्ठामि गोषु.
प्रत्यङ्गेषु प्रति तिष्ठाम्यात्मन् प्रति प्राणेषु प्रति तिष्ठामि पुष्टे प्रति द्यावापृथिव्योः प्रति
तिष्ठामि यज्ञे.. (१०)
हम क्षत्रियों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम राष्ट्र में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम घोड़ों में प्रतिष्ठा
पाते हैं. हम गायों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम प्रत्यंगों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम आत्मा में
प्रतिष्ठा पाते हैं. हम प्राणों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम पुष्टि में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम
स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम पृथ्वी में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम यज्ञ में प्रतिष्ठा पाते
हैं. ( १० )
त्रया देवा ऽ एकादश त्रयस्त्रि ᳵ शाः सुराधसः.
बृहस्पतिपुरोहिता देवस्य सवितुः सवे.
देवा देवैरवन्तु मा.. (११)
२५६ - यजुर्वेद 632/16

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
ग्यारह से तिगुने यानी तैंतीस देव तीन समूह में ऐश्वर्य से युक्त बृहस्पति को
पुरोहित बना कर देवताओं के अनुशासन में रहें. देवता अपनी दिव्य सामर्थ्य से
हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ११ )
प्रथमा द्वितीयैर्द्वितीयास्तृतीयाैस्तृतीयाः सत्येन सत्यं यज्ञेन यज्ञो यजुर्भिर्यजू ष्ँ षि
सामभिः सामान्यृग्भिरृचः पुरोनुवाक्याभिः पुरोनुवाक्या याज्याभिर्याज्या
वषट्कारैर्वषट्कारा ऽ आहुतिभिराहुतयो मे कामान्त्समर्धयन्तु भूः स्वाहा.. ( १२)
प्रथम देवता दूसरे के साथ, दूसरे तीसरे देव के साथ युक्त होने की कृपा करें.
सत्य को सत्य के साथ जोड़ें. यज्ञ को यज्ञ से जोड़ें. यजुर्वेद को सामवेद के साथ
जोड़ें. सामवेद को ऋचाओं से जोड़ें. ऋचाएं पुरोनुवाक्या से युक्त हों. पुरोनुवाक्या
यज्ञ मंत्रों से युक्त हों. आहुतियां हमारी कामनाएं सिद्ध करने की कृपा करें. ( १२ )
लोमानि प्रयतिर्मम त्वङ् म ऽ आनतिरागतिः.
मा ष्ँ संम ऽ उपनतिर्वस्वस्थि मज्जा म ऽ आनतिः.. ( १३)
हमारे हर अंग के रोम जागें. हमारी त्वचा नरम व लुभावनी हो. हमारा मांस
लचीला हो. अस्थियां पूरे शरीर का आधार बनें. हमारी मज्जा शरीर को नरमाई देने
वाली हो. ( १३ )
यद्देवा देवहेडनं देवासश्चकृमा वयम्.
अग्निर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ष्ँ हसः.. ( १४)
हे देवो! आप दिव्यगुणों से ओतप्रोत हों. अग्नि हमें हमारे द्वारा किए गए सभी
पापों से मुक्त करें. अग्नि ऐसे सभी कार्यों से हमें बचाने की कृपा करें. ( १४ )
यदि दिवा यदि नक्तमेना ष्ँ सि चकृमा वयम्.
वायुर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ष्ँ हसः.. ( १५)
हम ने यदि दिन में कोई पाप किया हो, हम ने यदि रात में कोई पाप किया हो
तो वायु हमारे द्वारा किए गए सभी पापों से हमें मुक्त करें. वायु हमें ऐसे सभी पापों
से बचाने की कृपा करें. ( १५ )
यदि जाग्रद्यदि स्वप्न ऽ एना ष्ँ सि चकृमा वयम्.
सूर्यो मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ष्ँ हसः.. ( १६)
जाग्रत अवस्था या सोती हुई अवस्था में जो कोई भी पाप हम ने किया हो तो
सूर्य हमें उस पाप से बचाने की कृपा करें. ( १६ )
यद्ग्रामे यदरण्ये यत्सभायां यदिन्द्रिये.
यच्छूद्रे यदर्ये यदेनश्चकृमा वयं यदेकस्याधि धर्मणि तस्यावयजनमसि.. ( १७)
यजुर्वेद - २५७

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
जो ग्राम में, जो जंगल में, जो सभाओं में, जो इंद्रियों में हम ने पाप किए हैं,
जो पाप शूद्रों और वैश्यों के साथ किए हैं, अधिकार को धारण करने या उस का
निर्वाह करने में जो पाप हम ने किए हैं, उन से हमें मुक्त करने की कृपा करें. (१७)
यदापो अघ्न्या ऽ इति वरुणेति शपामहे ततो वरुण नो मुञ्च.
अवभृथ निचम्पुण नीचेरुरसि निचम्पुण:.
अव देवैर्देवकृतमेनोयक्ष्य मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि.. (१८)
जल में जो अनुचित हैं, उन के प्रति वरुण देव हमें शाप मुक्त करने की कृपा
करें. हे वरुण! आप निरंतर गतिशील हैं. आप अपनी गति मंद करने की कृपा करें.
देवताओं के प्रति देव कार्यों में जो पाप किए हैं, आप उन का प्रायश्चित्त कराइए.
मनुष्यों के प्रति मानवीय व्यवहार में जो पाप किए हैं. उन से बचाइए. शत्रुओं से रक्षा
कीजिए. (१८)
समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तः सं त्वा विशन्त्वोषधीरुतापः.
सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं
द्विष्मः.. (१९)
समुद्र के जलों में आप का हृदय स्थित है. आप अंतःकरण से वहीं विराजते हैं.
वहां जल के मेल से आप में ओषधियों के गुण समाहित हो जाते हैं. जलमय वे
ओषधियां हमारे प्रति मैत्रीपूर्ण हों. जो हम से द्वेष करते हैं तथा जिन से हम द्वेष करते
हैं उन के दुर्मित्र होइए. (१९)
द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव.
पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः.. (२०)
पवित्र किए हुए जल से हम वैसे ही पाप मुक्त हो जाएं, जैसे नहाते ही पसीने
और मैल से मुक्त हो जाते हैं. जैसे छलनी से घी छानने पर मैल रहित हो जाता है,
वैसे ही आप हमारे पाप छान लीजिए. (२०)
उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त ऽ उत्तरम्. देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (२१)
हम अंधकार से ऊपर, स्वर्गलोक व उत्तर दिशा में देखें. हम दिव्यदेव सूर्य की
ओर जाएं. हम उत्तम ज्योति प्राप्त करें. (२१)
अपो अद्यान्वचारिष १४ रसेन समसृक्ष्महि.
पयस्वानग्न ऽ आगमं तं मा स १४ सृज वर्चसा प्रजया च धनेन च.. (२२)
हम ने आज जल में संचरण किया है. जल के संसर्ग से हम ने आज अपनेआप
को प्रक्षालित किया (धोया) है. हे अग्नि देव! हम जल से पवित्र हो कर आप के
पास आए हैं. आप हमारे लिए वर्चस्व, संतान और धन का सृजन कीजिए. (२२)
२५८ - यजुर्वेद

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
एधोस्येधिषीमहि समिदसि तेजोसि तेजो मयि धेहि.
समाववर्ति पृथिवी समुषाः समु सूर्यः.
समु विश्वमिदं जगत्.
वैश्वानरज्योतिर्भूयासं विभून् कामान् व्यश्नवै भूः स्वाहा.. (२३)
हे अग्नि! यह समिधा आप की बढ़ोत्तरी करती है. आप हमारी बढ़ोत्तरी करते
हैं. आप तेजोमय हैं. हमारे लिए तेज धारिए. पृथ्वी हमें उत्तम सुख दे. सूर्य सुख दें.
सारे जगत् को सुख दें. हम वैश्वानर की ज्योति हो जाएं. हम उन की कृपा से विविध
कामनाओं की पूर्ति करें. अग्नि के लिए स्वाहा. (२३)
अभ्या दधामि समिधमग्ने व्रतपते त्वयि.
व्रतं च श्रद्धां चोपैमीन्धे त्वा दीक्षितो अहम्.. (२४)
हे अग्नि! हम आप के लिए समिधा धारते हैं. आप व्रत पति हैं. हम दीक्षित हैं.
आप के प्रति व्रत और श्रद्धा समर्पित करते हैं. आप को प्रज्वलित करते हैं. (२४)
यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह.
तँल्लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना.. (२५)
जहां ब्राह्मण और क्षत्रियजन साथसाथ विचरण करते हुए निर्वाह करते हैं. जहां
देवगण अग्नि देव के साथ रहते हैं, हम उस पुण्य ज्ञानमय लोक को पाएं. (२५)
यत्रेन्द्रश्च वायुश्च सम्यञ्चौ चरतः सह.
तँल्लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र सेदिर्न विद्यते.. (२६)
जहां इंद्र देव और वायु साथसाथ विचरण करते हैं, हम उस पवित्र और ज्ञानमय
लोक को प्राप्त करें. (२६)
अ ँ शुना ते अ ँ शुः पृच्यतां परुषा परुः.
गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः.. (२७)
ओषधियों का रस सोमरस के साथ मिले. आप के कठोर अंग सोम के अंगों के
साथ मिलें. आप की गंध सोम के साथ मिले. झरता हुआ रस हमें आनंदित करे. (२७)
सिञ्चन्ति परि षिञ्चन्त्युत्सिञ्चन्ति पुनन्ति च.
सुरायै बभ्रवै मदे किन्त्वो वदति किन्वः.. (२८)
ओषधि का रस इंद्र को प्रसन्न करता व पवित्र करता है. इस रस के लिए ‘और
क्या और क्या’ बोला जाता है. (२८)
धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्. इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः.. (२९)
हे इंद्र देव! हम स्तुति के साथ आप को धान, धानमय वस्तुएं, दही, मालपूए
यजुर्वेद - २५१

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
आदि समर्पित कर रहे हैं. आप इन सब को स्वीकारने की कृपा कीजिए. ( २९ )
बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम्.
येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि.. ( ३० )
हे मरुद्गण! इंद्र देव वृत्रहंता है. आप उन के लिए बृहत्साम गाइए, जिन्होंने
ज्योति उत्पन्न की, अन्न की बढ़ोत्तरी की, देवों को देवों के लिए जाग्रत
किया. ( ३० )
अध्वर्वो अद्रिभिः सुत ष्यं सोमं पवित्र ऽ आनय. पुनीहीन्द्राय पातवे.. ( ३१)
हे अध्वर्यु! आप पत्थरों से कूट कर निचोड़े गए पवित्र सोम को अपने पुत्रों के
लिए लाइए. इंद्र देव के पीने के लिए आप इसे पवित्र कीजिए. ( ३१ )
यो भूतानामधिपतिर्यस्मिँल्लोका ऽ अधि श्रिताः.
य ऽ ईशे महतो महाँस्तेन गृह्णामि त्वामहं मयि गृह्णामि त्वामहम्.. (३२)
जो प्राणियों के अधिपति हैं, सब लोक जिस के आश्रित हैं, जो ईश्वर हैं,
महान् हैं, हम उस महान् को ग्रहण करते हैं. आप हम को ग्रहण कीजिए. हम आप
को ग्रहण करते हैं. ( ३२ )
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण ऽ एष ते योनिरश्विभ्यां
त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्णे.. ( ३३)
हे ओषधि रूप रस! आप को दोनों अश्विनीकुमारों के लिए उपयाम में ग्रहण
किया गया है. आप को सरस्वती के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. आप
को इंद्र के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. यह अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी
और इंद्र देव का मूल स्थान है. अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी और इंद्र देव की कृपा
से हमारा संरक्षण हो. ( ३३ )
प्राणपा मे अपानपाश्चक्षुष्पाः श्रोत्रपाश्च मे.
वाचो मे विश्वभेषजो मनसोसि विलायकः.. ( ३४)
हे ओषधे! आप हमारे प्राण, अपान, नेत्र, कर्ण और वाणी रक्षक हैं, आप सब
के वैद्य हैं. आप मन का विलय करने की कृपा करें. ( ३४ )
अश्विनकृतस्य ते सरस्वतिकृतस्येन्द्रण सुत्राम्णा कृतस्य.
उपहूत ऽ उपहूतस्य भक्षयामि.. (३५)
हे ओषधे! अश्विनी देवों द्वारा संस्कार किए गए, सरस्वती देवी द्वारा पुष्ट किए
गए, इंद्र देव द्वारा उत्पन्न किए गए, आप को हम आमंत्रित करते हैं. आप का हम
सेवन करते हैं. ( ३५ )
२६० – यजुर्वेद

पूर्वाध [L1R] बीसवां अध्याय

पूर्वाध [L1_R] बीसवां अध्याय
समिद्ध ऽ इन्द्र ऽ उषसामनीके पुरोरुचा पूर्वकृद्वावृधानः.
त्रिभिर्देवैस्त्रि १४ शता वज्रबाहुर्जघान वृत्रं वि दुरो ववार.. (३६)
इंद्र देव समिधावान हैं. सब से पहले उषा काल में पूर्व दिशा को प्रकाशित
करते हैं. पहले किए की बढ़ोतरी करते हैं. तीन के तिगुने सैकड़ों देवों के साथ आगे
बढ़ते हैं. इंद्र देव ने वृत्र को मारा और द्वार खोले. ( ३६ )
नराश १४ सः प्रति शूरो मिमानस्तनूनपात्प्रति यज्ञस्य धाम.
गोभिर्वपावान् मधुना समजन् हिरण्यैश्चन्द्री यजति प्रचेताः.. (३७)
आप सब से प्रशंसित, सुखवीर, शरीर के रक्षक व यज्ञ के धाम हैं. गायों का
दूध पीने वाले व मीठे घी से पुष्ट हैं. सुनहरी कांति वाले का उत्तम चित्त वाले
यजमान यज्ञ करते हैं. ( ३७ )
ईडितो देवैर्हरिवाँ २ अभिष्टिराजुह्वानो हविषा शर्धमानः.
पुरन्दरो गोत्रभिद्वज्रबाहुरा यातु यज्ञमुप नो जुषाणः.. (३८)
इंद्र देवों से उपासित, गतिवान, अभीष्ट, यज्ञ में पूजनीय, हवि हेतु आमंत्रित,
शत्रुनगरी भेदक, गोनाशक के नाशक व वज्रबाहु है. इंद्र देव हमारे यज्ञ का सेवन
करने की कृपा करें. ( ३८ )
जुषाणो बर्हिर्हरिवान् न ऽ इन्द्रः प्राचीन १४ सीदत् प्रदिशा पृथिव्याः.
उरुप्रथाः प्रथमान १४ स्योनमादित्यैरक्तं वसुभिः सजोषः.. (३९)
इंद्र देव तेजोमय, वैभववान, सब के अभीष्ट व प्राचीन हैं. आप पृथ्‍वी की दिशा
में विराजिए. आप आदित्यों और वसुओं के साथ हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा
कीजिए. विशाल कुश के आसन पर विराजिए. ( ३९ )
इन्द्रं दुरः कवष्यो धावमाना वृषाणं यन्तु जनयः सुपत्नीः.
द्वारो देवीरभितो वि श्रयन्ता १४ सुवीरा वीरं प्रथमाना महोभिः.. (४०)
जैसे विदुषी और श्रेष्ठ पत्नी पति के साथ शोभा पाती है, वैसे ही देवताओं से
शोभित वीरों से युक्त विशाल द्वारों वाले प्रख्यात इंद्र देव विधिविधान से पूर्ण यज्ञ
शाला में पधारने की कृपा करें. ( ४० )
उषासानक्ता बृहती बृहन्तं पयस्वती सुदुघे शूरमिन्द्रम्.
तन्तुं ततं पेशसा संवयन्ती देवानां देवं यजतः सुरुक्मे.. (४१)
उषा देवी विशाल दिन और रात को चमकाती हैं. वे महान् व रसीली हैं. देवों
के देव इंद्र देव को भी दीप्तिमान बनाती हैं. ( ४१ )
दैव्या मिमाना मनुषः पुरुत्रा होताराविन्द्रं प्रथमा सुवाचा.
मूर्धन् यज्ञस्य मधुना दधाना प्राचीनं ज्योतिर्हविषा वृधातः.. (४२)
[L47_R] यजुर्वेद – २६१

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
दिव्य कार्य करने वाले यजमान श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से यज्ञ के मूर्धन्य देव इंद्र देव
की स्थापना करते हैं. होता पूर्व दिशा में स्थित हैं. वे हवि से अग्नि की बढ़ोतरी करते
हैं. अग्नि ज्योतिमान हैं. ( ४२ )
तिस्रो देवीर्हविषा वर्धमाना ऽ इन्द्रं जुषाणा जनयो न पत्नी:.
अच्छिन्नं तन्तुं पयसा सरस्वतीडा देवी भारती विश्वतूर्तिः.. ( ४३ )
तीनों देवियां हवि से बढ़ोतरी पाती हैं. वे पत्नी के समान इंद्र देव को पोसती हैं.
वे हमारे तंतु को न तोड़ें. सरस्वती देवी, भारती देवी और इड़ा देवी दूध और हवि से
हमारा यज्ञ पूर्ण करें. सारे विश्व को विघ्नों से बचाएं. ( ४३ )
त्वष्टा दधच्छूष्ममिन्द्राय वृष्णेपाकोचिष्टुर्यशसे पुरूणि.
वृषा यजन्वूषणं भूरिरेता मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्.. (४४)
त्वष्टा देव इंद्र देव का बल और परिपक्व धन को धारें. यश से पूजे जाएं.
यज्ञ में वर्षा करें और शक्ति दें. देव समान मन वाले हों. यज्ञ के मूर्धन्य देवों को
तृप्त करें. ( ४४ )
वनस्पतिरवसृष्टो न पाशैस्तमन्या समञ्जञ्छमिता न देव:.
इन्द्रस्य हव्यैर्जठरं पृणानः स्वदाति यज्ञं मधुना घृतेन.. (४५)
इंद्र देव हवि से जठराग्नि को पूर्ण करें. यज्ञ को मीठे घी से स्वादिष्ट
बनाएं. देवगण बंधनहीन हैं. अपनी सामर्थ्य से प्रकाशमान हैं. वनस्पति के देवता
हैं. ( ४५ )
स्तोकानामिन्दुं प्रति शूर ऽ इन्द्रो वृषायमाणो वृषभस्तुराषाट्.
घृतप्रुषा मनसा मोदमानाः स्वाहा देवा ऽ अमृता मादयन्ताम्.. (४६)
इंद्र देव शत्रुओं के प्रति गर्जना करते हैं. वे शूरवीर, शक्तिशाली शत्रुओं के
नाशक और घी की आहुति से मन से प्रसन्न होते हैं. इंद्र देव हेतु स्वाहा. इंद्र देव
अमृत से सभी को आनंदित करें. ( ४६ )
आ यात्विन्द्रोवस ऽ उप न ऽ इह स्तुतः सधमादस्तु शूरः.
वावृधानस्तवर्षीयस्य पूर्वीर्र्द्यौर्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात्.. (४७)
इंद्र देव हमारी रक्षा के लिए हमारे पास आएं. वह यहां बैठें. उन की यहां स्तुति
की जाए. उन के पराक्रम से बड़ेबड़े कार्यों की बढ़ोतरी हुई. वे हमारे बल को
स्वर्गलोक जैसा विस्तृत व पुष्ट करें. ( ४७ )
आ न ऽ इन्द्रो दूरादा न ऽ आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः.
ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः सङ्गे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून्.. (४८)
२६२ – यजुर्वेद

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
इंद्र देव दूर या पास जहां कहीं भी हों हमारे पास पधारने की कृपा करें. वे उग्र,
बलवान, अभीष्टपूरक, ओजिष्ठ व राजा हैं. वे वज्र जैसी मजबूत भुजा वाले हैं.
युद्धों में शत्रुओं का मर्दन करने वाले हैं. (४८)
आ न ऽ इन्द्रो हरिभिर्यात्वच्छावाॅचीनोवसे राधसे च.
तिष्ठाति वज्री मघवा विरप्शीमं यज्ञमनु नो वाजसातौ.. (४९)
इंद्र देव अपने घोड़ों से हमारी रक्षार्थ हमें संपत्ति देने के लिए पधारें. वे वज्र
वाले और धनवान हैं. वे यज्ञशाला में पधारें और अपनी अन्नमयी हवि स्वीकारने
की कृपा करें. (४९)
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र १४ हवे हवे सुहव १४ शूरमिन्द्रम्.
ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्र १४ स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः... (५०)
इंद्र देव त्राता हैं. हम बारबार उन का आह्वान करते हैं. प्रत्येक हवन में उन का
आह्वान करते हैं. हम शूरवीर का अच्छी तरह आह्वान करते हैं. वे कल्याणकारी,
धनवान और धारणशील हैं. (५०)
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ २ अवोभिः सुमृडीको भवतु विश्ववेदाः.
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (५१)
इंद्र देव अच्छे रक्षक, बहुत सहायकों वाले, सर्व वैभव संपन्न व सर्वज्ञ हैं. वे
हम से द्वेष रखने वाले को बाधित करें और हमें निर्भय बनाएं. उन की कृपा से हम
अच्छे पराक्रम के पालक हो जाएं. (५१)
तस्य वय १४ सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.
स सुत्रामा स्ववाँ २ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (५२)
इंद्र देव के प्रति हम सुमतिपूर्वक यज्ञ करने वाले, भद्र व अच्छे मन वाले हो
जाएं. वे अच्छे रक्षक व सहायकों वाले हैं. वे दूर होते हुए भी हमारा दुर्भाग्य दूर
करने के लिए शीघ्र ही हमारे पास आएं. (५२)
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः.
मा त्वा के चिन्नि यमन् विं न पाशिनोति धन्वेव ताँ २ इहि.. (५३)
इंद्र देव मोर के पंख जैसे रोमों वाले हैं. अपने घोड़ों से यहां आने की कृपा
करें. कोई भी जाल फैला कर आप को पाश में बांध न सके. आप बड़े धनुर्धारी
की तरह यहां पधारिए. (५३)
एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
स न स्तुतो वीरवद्धात्तु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः... (५४)
यजुर्वेद - २६३

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
हे इंद्र देव! आप बलवान व वज्र जैसी भुजाओं वाले हैं. वसिष्ठ ऋषि के वंशज
मंत्रों से आप की अभ्यर्थना कर रहे हैं. वे इंद्र देव हमारे वीरों व गोधन को अपने
संरक्षण में लें. वे सदा हमारा कल्याण करें. (५४)
समिद्धो अग्निरश्विना तप्तो घर्मो विराट् सुतः.
दुहे धेनुः सरस्वती सोम १७४ शुक्क्रमहेन्द्रियम्.. (५५)
अग्नि को समिधा से प्रज्वलित किया गया है. अश्विनी देव को दीप्यमान
बनाया गया है. सरस्वती देवी गाय दुहने की तरह उन के लिए चमकीले महान् सोम
का दोहन करती हैं. (५५)
तनूपा भिषजा सुतेश्विनोभा सरस्वती.
मध्वा रजा १७४ सीन्द्रियमिन्द्राय पर्थिभिर्वहान्.. (५६)
दोनों वैद्य अश्विनीकुमार हमारे तन के रक्षक हैं. देवी सरस्वती मधुर सोमरस
को अनेक मार्गों से वहन करती हुई इंद्र देव के लिए ले जाती हैं. (५६)
इन्द्रायेन्दु १७४ सरस्वती नराश १७४ सेन नग्नहुम्.
अधातामश्विना मधु भेषजं भिषजा सुते.. (५७)
यजमान ने सोमरस तैयार किया. देवी सरस्वती ने उस को महान् ओषधि से
युक्त बनाया. वैद्य अश्विनीकुमारों ने ओषध स्वरूप उस को धारण किया. (५७)
आजुह्वाना सरस्वतीन्द्रायेन्द्रियाणि वीर्यम्.
इडाभिरश्विनाविष १७४ समूर्ज १७४ स १७४ रयिं दधुः... (५८)
सरस्वती देवी इंद्र देव का आह्वान करने वाली हैं. सरस्वती देवी ने उन के लिए
इंद्रियों में पराक्रम स्थापित किया. इड़ा देवी और अश्विनीकुमारों ने उन के लिए
ऊर्जा और धन धारण किया. (५८)
अश्विना नमुचेः सुत १७४ सोम १७४ शुक्क्रं परिस्रुता.
सरस्वती तमा भरद्बर्हिषेन्द्राय पातवे.. (५९)
अश्विनी देवों ने निचोड़े गए चमकीले सोम को ओषधियों के साथ मिलाया.
सरस्वती ने नमुची राक्षस से सोम का हरण किया. इंद्र देव के पीने के लिए कुश के
आसन पर स्थापित किया. (५९)
कवष्यो न व्यचस्वतीरश्विभ्यां न दुरो दिशः.
इन्द्रो न रोदसी उभे दुहे कामान्त्सरस्वती.. (६०)
अश्विनी, सरस्वती और इंद्र देव ने विराट् यज्ञ से स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक
दोनों का दोहन किया. सारी दिशाओं से अपनी कामनाओं का दोहन किया. (६०)
२६४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
उषासानक्तमश्विना दिवेन्द्र  सायमिन्द्रियैः.
सञ्जानाने सुपेशसा समज्याते सरस्वत्या.. (६१)
उषा, रात्रि, दिन और सायंकाल में इंद्र देव को अश्विनीकुमार देवी सरस्वती
के साथ विशेष बल से युक्त करते हैं. (६१)
पातं नो अश्विना दिवा पाहि नक्त  सरस्वति.
दैव्या होतारा भिषजा पातमिन्द्र  सचा सुते.. (६२)
हे अश्विनी देव! आप दिन में हमारी रक्षा करें. हे सरस्वती देवी! आप रात्रि में
हमारी रक्षा करें. वैद्य अश्विनीकुमार दिव्य होता हैं. वे सचेत सोम के द्वारा इंद्र देव
की रक्षा करें. (६२)
तिस्रस्त्रेधा सरस्वत्यश्विना भारतीडा.
तीव्रं परिस्रुता सोममिन्द्राय सुषुवुर्मदम्.. (६३)
तीन प्रकार से अश्विनी सरस्वती, भारती और इड़ा देवी ने तीव्रता से सोम को
इंद्र देव के लिए चुआया है. यह सोम ओषधि से युक्त हैं. (६३)
अश्विना भेषजं मधु भेषजं नः सरस्वती.
इन्द्रे त्वष्टा यशः श्रिय  रूप  रूपमधुः सुते.. (६४)
अश्विनी देव व सरस्वती देवी मीठी ओषधि हमें दें. त्वष्टा देव ने इंद्र देव हेतु
यश, शोभा, रूप, मधु और सोम को धारण किया है. (६४)
ऋतुथेन्द्रो वनस्पतिः शशमानः परिस्रुता.
कीलालमश्विभ्यां मधु दुहे धेनुः सरस्वती.. (६५)
इंद्र देव ऋतु के अनुसार वनस्पति और निचोड़ी हुई सामग्रियों से बढ़ोतरी को
प्राप्त हुए. अश्विनी देव और सरस्वती देवी ने गाय का दूध निकालने के समान इन
के लिए मधुर रस दुहे. (६५)
गोभिर्न सोममश्विना मासरेण परिस्रुता.
समधात  सरस्वत्या स्वाहेन्द्रे सुतं मधु.. (६६)
हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों देवी सरस्वती, गाय के दूध के साथ व सोमरस
को ओषधियों के साथ मिलाइए. वह रस इंद्र देव को अर्पित कीजिए. वे इस आहुति
को भलीभांति ग्रहण करने की कृपा करें. (६६)
अश्विना हविरिन्द्रियं नमुचेर्धिया सरस्वती.
आ शुक्रमसुराद्वसु मघमिन्द्राय जभ्रिरे.. (६७)
सरस्वती देवी ने अश्विनीकुमार के साथ बुद्धिपूर्वक नमुचि राक्षस से हवि और
यजुर्वेद - २६५

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
धन पाया. उस हवि और श्रेष्ठ धन को इंद्र देव के लिए अर्पित किया. ( ६७ )
यमश्विना सरस्वती हविषेन्द्रमवर्धयन्.
स बिभेद बलं मघं नमुचावासुरे सचा.. ( ६८)
अश्विनीकुमार और सरस्वती देवी ने उस हवि से इंद्र देव की बढ़ोत्तरी की.
सचेत इंद्र देव ने उस से नमुचि असुर के बल को भेदा. ( ६८ )
तमिन्द्रं पशवः सचाश्विनोभा सरस्वती.
दधाना ऽ अभ्यनूषत हविषा यज्ञ ऽ इन्द्रियैः.. ( ६९)
अश्विनीकुमार और सरस्वती देवी ने इंद्र देव को पशुओं के दूध, दही और घी
से बनी हवि अर्पित की. उस हवि से उन का बल और यज्ञ बढ़ाया. उन दोनों की
सब प्रकार से प्रशंसा हुई. ( ६९ )
य ऽ इन्द्र इन्द्रियं दधुः सविता वरुणो भगः.
स सुत्रामा हविष्पतिर्यजमानाय सचत.. ( ७०)
सविता देव, वरुण देव और भग देव ने इंद्र देव की इंद्रियों में बल धारण किया.
इंद्र देव ने हविपति की अच्छी तरह रक्षा की. यजमान की मनोकामनाएं पूरी कीं. ( ७० )
सविता वरुणो दधद्यजमानाय दाशुषे.
आदत्त नमुचेर्वसु सुत्रामा बलमिन्द्रियम्.. ( ७१)
सविता देव एवं वरुण देव ने यजमानों की प्रसन्नता हेतु धन और बल धारा.
इंद्र देव ने नमुचि राक्षस से रक्षा और बल तथा धन ले कर यजमानों को समृद्ध
बनाया. ( ७१ )
वरुणः क्षत्रमिन्द्रियं भगेन सविता श्रियम्.
सुत्रामा यशसा बलं दधाना यज्ञमाशत.. (७२)
यजमानों को क्षत्रियोचित बल और इंद्रियों की सामर्थ्य देने वाले वरुण देव
हमारे इस यज्ञ में पधारने की कृपा करें. सौभाग्य और ऐश्वर्यदाता सविता देव तथा
यश और बलधारी इंद्र देव हमारे इस यज्ञ में पधारने की कृपा करें. ( ७२ )
अश्विना गोभिरिन्द्रियमश्वेभिर्वीर्यं बलम्.
हविषेन्द्र १४ सरस्वती यजमानमवर्धयन्.. ( ७३)
अश्विनीकुमारों और देवी सरस्वती ने गायों, घोड़ों और हवियों से इंद्र देव और
यजमान के पराक्रम शक्ति और वैभव की बढ़ोत्तरी की. ( ७३ )
ता नासत्या सुपेशसा हिरण्यवर्तनी नरा.
सरस्वती हविष्मतीन्द्र कर्मसु नोवत.. (७४)
२६६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
सुनहरे पथ पर घूमने वाले विशिष्ट श्रेष्ठ मनुष्य जैसे अश्विनीकुमार देवी
सरस्वती और इंद्र देव हम मनुष्यों के यज्ञ में पधारें. हवि ग्रहण करें. सब प्रकार से
हमारी रक्षा करें. ( ७४ )
ता भिषजा सुकर्मणा सा सुदुघा सरस्वती.
स वृत्रहा शतक्रतुरिन्द्राय दधुरिन्द्रियम्.. (७५)
अश्विनीकुमार वैद्य व सुकर्मा हैं. सरस्वती देवी अच्छा दोहन करने वाली हैं.
वृत्रासुर नाशक सैकड़ों यज्ञ करने वाले इंद्र देव यजमानों के लिए उन की इंद्रियों में
सामर्थ्य प्रदान करें. ( ७५ )
युव १oꣳ सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा.
विपिपानाः सरस्वतीन्द्रं कर्मस्वावत.. (७६)
हे अश्विनीकुमारो ! देवी सरस्वती ! आप युवा हैं. आप नमुचि राक्षस से ओषधि
रस ले कर विभिन्न प्रकार से इंद्र देव को पान कराइए. सब प्रकार से उन की रक्षा
कीजिए. ( ७६ )
पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्द १oꣳ सनाभिः.
यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (७७)
हे अश्विनीकुमारो ! आप यजमान की मातापिता द्वारा पुत्र की रक्षा करने
के समान रक्षा करते हैं. इंद्र देव विद्वान् हैं. वे यजमान की प्रार्थनाओं को सुनते
हैं. संग्राम में विपत्तिग्रस्त होने पर अश्विनी देव रक्षा करते हैं. इंद्र देव अपनी
सामर्थ्य से ओषधियों का पान करते हैं, तो सरस्वती देवी आप की स्तुति करती
हैं. ( ७७ )
यस्मिन्नश्वास ऽ ऋषभास ऽ उक्षणो वशा मेषा ऽ अवसृष्टास ऽ आहुताः.
कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनय चारुमग्नये.. (७८)
हे यजमानो ! अग्नि अन्न ग्रहण करने वाले हैं. सोम को ग्रहण करने वाले हैं.
श्रेष्ठ बुद्धि वाले हैं. आप उन के लिए अपना मन शुद्ध कीजिए. आप उन के लिए
अपनी बुद्धि शुद्ध कीजिए. इस से घोड़े सिंचाई योग्य बैल और सुंदर वस्तुओं की
प्राप्ति होती है. ( ७८ )
अहाव्यग्ने हविरास्ये ते स्रुचीव घृतं चम्वीव सोमः.
वाजसनि १oꣳ रयिमस्मे सुवीरं प्रशस्तं धेहि यशसं बृहन्तम्.. (७९)
हे अग्नि ! हम आप का आह्वान करते हैं. हम आप के मुख में हवि भेंट करते
हैं. आप के लिए सुवा में घी और पात्र में सोम रहता है. आप हमें अन्न, धन,
श्रेष्ठवीर, प्रशंसनीय धन, यश व प्रचुर धन प्रदान कीजिए. ( ७९ )
यजुर्वेद - २६७

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
अश्विना तेजसा चक्षुः प्राणेन सरस्वती वीर्यम्.
वाचेन्द्रो बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम्.. (८०)
यजमान हेतु अश्विनी देव ने तेज से नेत्र ज्योति प्रदान की. यजमान हेतु सरस्वती
देवी ने प्राण के साथ पराक्रम प्रदान किया. यजमान हेतु इंद्र देव ने वाणी के साथ
इंद्रिय सामर्थ्य धारण की. (८०)
गोमद् षु णासत्याश्वावद्यातमश्विना. वर्ती रुद्रा नृपाय्यम्.. (८१)
अश्विनीकुमारो! गोमय, अश्वमय और श्रेष्ठ राह वाले इस सोमयाग में
पधारने की कृपा कीजिए. आप सत्य में निरत हैं. आप अन्यायियों को पीड़ित
कीजिए. (८१)
न यत्परो नान्तर ऽ आदधर्षदृवृषण्वसू. दुःश १७ सो मर्त्यो रिपुः.. (८२)
हे अश्विनीकुमारो! आप ओषधरस की वर्षा करते हैं. जो दुष्ट हो, जो हमारा
शत्रु हो, वह हमें पीड़ित न करे. (८२)
ता न ऽ आ वोढमश्विना रयिं पिशङ्गरसन्दृशम्. धिष्ण्या वरिवोविदम्.. (८३)
हे अश्विनीकुमारो! आप सब को धारने वाले हो. आप दोनों हमारे लिए पीली
सोने जैसी बढ़ने वाली संपदा प्रदान कीजिए. (८३)
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती. यज्ञं वष्टु धियावसुः.. (८४)
सरस्वती देवी पवित्र हैं. अन्न द्वारा शक्तिशाली कार्य करने वाली हैं. यज्ञ को
धारें. धन और बुद्धि बरसाएं. (८४)
चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्. यज्ञं दधे सरस्वती.. (८५)]
सरस्वती देवी सत्य वचन और सत्य मार्ग की प्रेरणादायिनी हैं. सुमतियों को
चेताने वाली हैं. सरस्वती देवी यज्ञ को धारण करें. (८५)
महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना. धियो विश्वा वि राजति.. (८६)
सरस्वती देवी सब की बुद्धियों को विशेष रूप से प्रकाशित करती हैं. सरस्वती
देवी महान् और ज्ञान का समुद्र हैं. वे ज्ञान की पताका फहराती हैं. (८६)
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता ऽ इमे त्वायवः. अण्वीभिस्तना पूतासः.. (८७)
हे इंद्र देव! आप अद्भुत हैं. आप अपने पुत्रों के यज्ञ में पधारने की कृपा
कीजिए. हम ने अंगुलियों से निचोड़ कर आप के लिए सोमरस को पवित्र बनाया
है. (८७)
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः. उप ब्रह्माणि वाघतः.. (८८)
२६८ - यजुर्वेद