विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६५
बाद गर्भाशय का मुख बन्द होजाने पर संभोग होने से भी गर्भ
नहीं रहता ।
वैद्यकशास्त्र बतलाता है:—
तत्र स्त्री पुंसयोः संयोगेतेजः शरीराद्वायुरुदीरयति ।
ततस्तेजोनिलसन्निपाताच्छुक्रंच्युतं योनिमभि-
प्रतिपद्यते संसृज्यतेचार्त्तवेन ॥
अर्थात्—स्त्री पुरुष के संयोग मे आपस के प्रेम सम्पादन
करने और सच्चे प्रेम मे मग्न हो आनन्दित होकर सभोग
करने से स्त्री पुरुष दोनों की इन्द्री के आपस मे संघर्षण के
द्वारा उत्पन्न हुई ऊष्मा (गर्मी) से वायु शरीर से उठता है उस
रगड़ की गरमी के तेज से पुरुष का वीर्य पतला होकर वायु की
सहायता से अपने स्थान से चलकर गर्भाशय के मुख मे गिरकर
गर्भाशय मे जाकर स्त्री के आर्त्तव मे मिल जाता है । इस प्रकार
पुरुष का वीर्य स्त्री के आर्त्तव मे मिलने से गर्भरूप धारण करता है।
सन्तान पर दाम्पत्य प्रेम का प्रभाव
सुन्दर और हृष्ट पुष्ट सन्तान उत्पन्न करने के लिये पति पत्नी
का प्रेम बड़ा भारी कारण है, जादू कैसा असर रखता है। परन्तु
यह प्रेम सच्चा होना चाहिये। सच्चा प्रेम सुन्दर रूप रंग पर
निर्भर नहीं है। सौन्दर्य कुछ और है प्रेम कुछ और। कुरूप पत्नी के
भी सुन्दर सन्तान होती देखी जाती है । सब विचारो की बात है ।
२६६ आनन्द मन्दिर
प्रेम मे एक बड़ी भारी विचित्रता है, प्रेम का बड़ा भारी
महत्व है। यह बात नही है कि सुन्दर स्त्री हो तभी पति का उस
पर प्रेम हो तथा सुन्दर पति हो तभी पत्नी प्रेम करे। जिस प्रेम
मे रंग रूप का भेद भाव रखकर प्रेम होता है वह प्रेम नही
कहा जा सकता ।
ऐसा स्वार्थी प्रेम, प्रेम नही है। वह स्वार्थ का ही प्रेम है।
इसलिये ऐसे दम्पति जो केवल सुन्दरता का विचार करके प्रेम
करते हैं वे महा मूर्ख हैं। उनकी सन्तान सुन्दर कदापि नही हो
सकती । सच्चे प्रेम से पति पत्नी का हृदय एक हो जाता है।
विचार एक हो जाते हैं। इस प्रकार परस्पर प्रेम करने वाले
दम्पति सुन्दर सन्तान उत्पन्न करते हैं।
गर्भाधान के समय दाम्पत्य प्रेम का बड़ा ही सच्चा प्रभाव
पड़ता है इसी से रूपवान गुणवान सन्तान उत्पन्न होती है।
किसी की पत्नी यदि रूपवती न हो अथवा किसी का पति सुन्दर
न हो तो उसे रूपवान, गुणवान, सन्तान उत्पन्न करने की
निराशा नही होनी चाहिये । आपस मे सच्चा प्रेम होना चाहिये
पति को अपनी कुरूप स्त्री को सुन्दर रूपवती समझ कर प्रेम
करना चाहिये और उसी प्रकार पत्नी को भी अपने कुरूप पति
को सर्व श्रेष्ठ रूपवान समझ कर प्रेम करना चाहिये ।
प्रेम के प्रभाव से कुरूप पति पत्नियो के भी सुन्दर गुणवान
सन्तान हो सकती है और प्रेम न होने से रूपवान गुणवान
दम्पति के भी कुरूप और मूर्ख सन्तान उत्पन्न होती है। इस
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६७
प्रकार जो पति पत्नी सुन्दर न होने पर भी सुन्दर सन्तान उत्पन्न
करने की इच्छा रखते हो उन्हे परस्पर सच्चे प्रेम से ही गर्भाधान
क्रिया करनी चाहिये ।
एकवार मेरे पास इलाज के लिये एक स्त्री आई उसके
साथ मे एक लड़की थी और एक लड़का भी चार पांच वर्ष का
था लड़की दो वर्ष की थी । वह स्त्री सुन्दर थी, पजाव की रहने
वाली थी । मैंने उसकी लड़की को देख कर हंसी मे कहा कि आप
तो वड़ी सुन्दर हैं यह लड़की कैसी कुरूप पैदा की है ? तव वह
हसकर कहने लगी । न जाने क्या वात है लड़का मेरे ही रग रूप
का है यह लड़की वदसूरत हुई है । आपही वतलावे क्या
कारण है ?
इस प्रकार वातचीत होरही थी इतने ही मे उसकी नौक-
रानी जो वाहर वैठी हुई थी उस स्त्री को वुलाने आई । उसके
पति ने कुछ पूछने को वाहर वुलाया था । जव वह नौकरानी मेरे
सामने आई तो मैने देखा उस नौकरानी और उस लड़की की
जिसके वावत मुझसे वातचीत होरही थी, सूरत विलकुल मिलती
थी मैने नौकरानी को देखकर कहा, देखिये आपकी लड़की
नौकरानी की शक्ल की है । जव आपकी यह लड़की गर्भ मे थी
तव यह नौकरानी हर समय आपके पास रहती होगी । उस स्त्री
ने हस कर कहा—हां देवी जी ! यह वात तो वहुत ठीक
आपने वतलाई । जव यह लडकी गर्म मे थी तव मै वीमार होगई
थी तभी यह नौकरानी रक्खी गई थी । कोई और स्त्री मेरे
१६८ आनन्द मन्दिर
पास रहने के लिये घर मे नही थी । मेरे पति दफ्तर चले जाते
थे यह मेरे पास हर वक्त बैठी रहती थी ।
मैंने उस स्त्री से कहा, अब गर्भ की दशा मे कभी इसे अपने
पास मत रखना नही तो अब जो बालक होगा वह भी ऐसा ही
काला कलूटा बदशक्ल इसी लडकी की तरह होगा, वह स्त्री
हंसने लगी और बोली—देवी जी ! मुझे यह बात मालूम न थी ।
एक और दूसरी स्त्री मेरे पास इलाज के लिये आईँ । उसके
लड़के का कान बहता था । लडके की अवस्था सात आठ महीने
की थी । मैने उससे पूछा, इसका कान कब से बहता है क्योकि
कान से सवाद आता है ? उस स्त्री ने कहा, जब से यह पैदा हुआ
है इसी तरह कान से मवाद आता है। मैंने उससे पूछा, जब यह
गर्भ मे था तब आपके कान मे कोई शिकायत तो नही थी ? उस
स्त्री ने कहा, जब यह पैदा नही हुआ था तब मेरे कान मे फुड़िया
निकली थी, कान बहने लगा था । यह शिकायत मुझे कई महीने
तक रही । जब यह गर्भ मे था तब भी कई महीने तक कान मे
तकलीफ रही, डाक्टरी इलाज होता रहा। गर्भावस्था मे भी पिच-
कारी से कान धोया जाता था, फिर अच्छा होगया । अब मुझे
जब से यह पैदा हुआ है कान की कोई शिकायत नही है ।
मैने उस स्त्री से कहा, बस यही बात है जब यह गर्भ मे था
तब आपका कान बहता था बल्कि गर्भ रहने के पहिले ही आपके
कान मे शिकायत थी इसीलिये वही असर लड़के मे आगया
है । इस लड़के का कान बहना बडी कठिनाई से दूर तो होजावेगा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६६
परन्तु उसकी जड़ नहीं जावेगी। कुछ न कुछ शिकायत कान की
इसे उम्र भर रहेगी। मैंने दवा बतला दी और कह दिया
कि अधिक दिन तक इलाज करने से फायदा होगा। वह स्त्री दवा
लेकर अपने घर चलीगई।
एक स्त्री मेरे पास इलाज के लिये आई उसकी एक लड़की
जिसकी अवस्था ६, साल की थी कुछ कुछ पागल होगई थी
उसी लड़की के इलाज के लिये वह स्त्री मेरे पास आई थी, मैंने
उस लडकी का हाल पूछा कि इसकी यह दशा कितने दिन से
है ? उस स्त्री ने कहा कि यह कुछ सनक मिजाज की कई वर्ष से
मालूम होती थी अब जिस प्रकार बडी होती जाती है वैसे ही इसका
मिजाज सनकी होता जाता है। मैने उस स्त्री से पूछा कि जब
यह लडकी गर्भ मे थी उस समय आपके यहां कोई सनकी मिजाज
का मनुष्य तो नही था ? उस स्त्री ने कहा, मेरी भौजाई पागल थी
जब मै गर्भवती हुई तब मेरे पति ने मुझे मेरे पिता के यहां भेज-
दिया। मै गर्भावस्था मे बराबर पिता के यहां रहीं और वही यह
लड़की पैदा हुई।
मेरी भौजाई पागल थी मै उसे खाना खिलाती कपडे पहिनाती।
वह कपड़े उतार कर फेंक देती थी तो मैं बार बार कपड़े पहिनाती
थी उसकी सेवा करती थी। वह दस पन्द्रह दिन को कभी कभी
अच्छी भी होजाती थी।
मैंने कहा—यही कारण इस लडकी के सनकी होने का है
इसका कोई इलाज नहीं है इसका आराम होना कठिन है। मैंने
२७० आनन्द मन्दिर
पूछा-आपकी भौजाई अभी है या नहीं ? उसने कहा भौजाई अभी
जिन्दा है और भौजाई का अब यह हाल है कि जब वह गर्भवती
होजाती है तो जब तक बालक पैदा नही होता तब तक बिलकुल
अच्छी रहती है। नाम मात्र को भी पागल पन नहीं रहता,
मेरी भौजाई बड़ी चतुर और गृहस्थी के कामकाज मे परिश्रम
करने वाली पढ़ी लिखी स्त्री है। गर्भावस्था मे सब काम ठीक करती
है। बालक होते ही कुछ दिन बाद फिर पागल होजाती है। बच्चो
की परवरिश के लिये गाय का दूध पिलाया जाता है उसके पास
तक बच्चो को नही जाने दिया जाता।
मैंने कहा इसी प्रकार यह तुम्हारी लड़की भी होगी। इसका
आराम होना तो कठिन है।
इसप्रकार के सैकड़ो उदाहरण मेरे देखने मे आये हैं क्योकि
सभी प्रकार की स्त्रियां रोगी निरोगी प्रतिदिन आया करती हैं।
इस विषय को अधिक उदाहरण देकर बढ़ाने से पुस्तक बहुत बड़ी
होजायगी। इस विषय मे कहना यही है कि माता पिता के शरीर
मे किसी प्रकार का रोग न हो और दोनो प्रसन्न चित्त हो और
संभोग के समय दोनो की प्रबल इच्छा सम्भोग करने की हो
तभी सन्तान आरोग्य होती है। रोगी माता पिता की सन्तान
भी रोगी होती है। गर्भ रह जाने पर भी गर्भावस्था मे गर्भवती
को बडी सावधानी से रहना चाहिये। गर्भावस्था मे भी जैसे आचार
व्यवहार किये जाते हैं उसका प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। सन्तान
के उत्पन्न होने तक माता के विचारो का असर सन्तान पर पड़ता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७१
सन्तान पर माता पिता के रोगों का प्रभाव
जिस प्रकार गर्भावस्था में गर्भवती के आचार विचार तथा
अन्य कामो का प्रभाव सन्तान पर पडता है उसी प्रकार माता
पिता के रोगो का भी प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। यह प्रभाव
ऐसा भयंकर होता है कि माता पिता की अज्ञानता और मुर्खता
से सन्तान का जीवन नष्ट होजाता है। सन्तान जीवन पर्यन्त कष्ट
भोगती है और बहुतेरे बच्चे गर्भ मे ही तथा उत्पन्न होते ही
काल का कलेवा बनजाते हैं।
शुद्ध रज वीर्य से उत्तम सन्तान
शुद्ध रज वीर्य से उत्तम और आरोग्य तथा दीर्घजीवी
सन्तान उत्पन्न होती है और दूषित तथा रोगी रज वीर्य से अनेक
दोषो वाली तथा रोगी सन्तान उत्पन्न होती है। इस कारण
यहां मै शुद्ध रज वीर्य और रज क्या है, वीर्य क्या है, स्त्री
और पुरुष के रजवीर्य तथा जननेन्द्रियो मे किस प्रकार रोग
उत्पन्न होते है और उनका प्रभाव सन्तान पर कैसा पडता है
इस विषय को प्रसगानुसार लिखूगी।
सन्तान होने में बालक रोग
वीर्य को अधिक व्यय करने से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है।
जो अज्ञानी पुरुष वाल्यावस्था मे कुसंगति मे पड़कर अपने वीर्य
को अपने हाथ से नष्ट करते हैं उसे हस्तमैथुन कहते हैं। आगे
चलकर जवानी मे उन्हें २० बीस प्रकार के प्रमेहों में कोई सा प्रमेह
उत्पन्न होता है। प्रमेह वीर्य सम्बन्धी बडे भारी रोगो मे एक रोग
है। वैद्यक शास्त्र बतलाता है कि प्रमेह रोग स्वभाव से ही महादुष्ट
रोगी है। इस कारण इसका इलाज बडी सावधानी से करना
चाहिये। प्रमेह रोग मे पुरुष की जान मे प्रकट रूप मे कोई विशेष
कष्ट तो शुरू मे होता नही क्योंकि स्वप्न मे वीर्य निकल जाने से
कोई तकलीफ मालूम नही होती, पाखाना फिरते समय जोर
करने मे धातु निकलना कुछ भी दुखदाई नही प्रतीत होता,
पेशाब के साथ धातु जाने मे भी कुछ दिक्कत नहीं होती। संभोग
के समय शीघ्रपात होना इत्यादि किसी प्रकार के धातु विकार
मे कुछ तकलीफ मालूम न होने से रोगी पुरुष कुछ भी परवाह
नही करते और कुछ चिन्ता भी नही रहती। दुनियां के सभी काम
रोते भीकते गिरते पडते चले ही जाते हैं।
रोग बढ़ते बढ़ते जब अधिक बढ़ जाता है और शरीर आल सी
और असमर्थ होता मालूम होने लगता है तब कुछ २ चिन्ता होती
है सो भी ऐसी नही कि लगाकर औषधि हो जिससे रोग दूर होजावे।
प्रमेह मौजूद है और सहवास मे कमी न होने पावे यह विचार
सदैव बना रहता है। औषधि मगाया करते हैं सो भी प्रमेह की
नहीं, शीघ्रपात की। जिससे स्त्री प्रसन्न रहे। वे लोग महामूर्ख हैं
जो प्रमेह रोगो को सरल समझ कर परवाह नही करते वे अपने
पैरो मे आप कुल्हाड़ी मारते हैं। सन्तान भी वैसी ही होती है।
॥ ३
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आनन्द
मन्दिर
दसवां अध्याय
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१८
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विवाह विज्ञान-काम
नपुंसकों की संभोग ~~~~~~~~~
आसेक्यश्च सुगंधीच कुम्भीकरश्चैष्य- कृत्य
सरेतसस्त्वमीज्ञेया अशुक्रःषंडसंज्ञितः ॥
अर्थात्—आसेक्य, सुगन्धि, कुम्भिक, और ईर्ष्यक, इन चारों
नपुंसकों में तो उत्तेजनात्मक वीर्य होता है परन्तु स्त्री की सी चेष्टा
वाले नपुंसक में नहीं होता । इसका कारण यह है कि:—
अनयाविप्रकृत्यातु तेषांशुवहा शिराः ।
हर्षात्स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥
अर्थात्—पहिले कहे हुए चार नपुंसकों में वास्तव में तो वीर्य नहीं
है परन्तु उनकी विरुद्ध चेष्टा (वीर्य भक्षण योनि और पुरुष इन्द्री
का सूंघना, गुदा मैथुन और दूसरे को मैथुन करते देखना )
इन कारणों से वीर्य न रहते हुए भी वीर्य वाली नाड़ियां हर्षयुक्त
होकर फूल जाती हैं उसी से उन नपुंसकों की इन्द्री में चैतन्यता
उत्पन्न होजाती है ।
इसप्रकार की स्त्रियां नपुंसक भी देखी जाती हैं । मेरे पास
इलाज के लिये सभी प्रकार की रोगी स्त्रियां आया करती हैं और
२५ पचीस वर्षों में मैं लाखों स्त्रियो का इलाज कर चुकी हूं इनमे
सभी प्रकार के रोगों वाली स्त्रिया देखी गई । जो स्त्रिया मेरे पास
इलाज के लिये आती हैं वे अपना सभी प्रकार का हाल खुलासा कह
नन्द मन्दिर
नासा हाल के उनकी चिकित्सा ठीक नहीं
चिट्टियां भी प्रतिदिन पचासो आया करती हैं ।
उने चिट्ठियों मे भी अपने रोग का खुलासा हाल रोगी स्त्रिया लिख
दिया करती है जो हाल रह जाता है मैं पत्र द्वारा पूछलेती हू ।
स्त्री पुरुषो की सब रोग सम्बन्धी चिट्ठियां गुप्त रक्खी जाती हे
मेरे सिवाय दूसरा कोई नहीं देख सकता इसलिये कोई रोगी स्त्री
पुरुष मुझे अपने रोग का खुलासा हाल लिखने में संकोच नहीं
करता ।
रागी स्त्रियो की जबानी हाल (सुनने, उनके पत्रों से जानने
तथा स्त्रियो की परीक्षा करने से आयुर्वेद में लिखे उपर्युक्त लक्षणो
को मैने बिलकुल सच पाया है इसीलिये अनुभव में आये हुये
लक्षणों को सबको मालूम करने के लिये लिख रही हू ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७५
पुरुषार्थ हीनता या नपुंसकत्व
अब मैं यहां पर सब प्रकार के नपुंसकों का वर्णन विस्तार
करती हूं क्योकि जितने नपुंसक हैं सब माता पिता की
मूर्खता से ही विपरीत रति करने से उत्पन्न होते हैं। इन्हीं सब
नपुंसको से पाठक आसनों का फल समझ ले।
नपुंसक पुरुष के लक्षण
वैद्यक शास्त्र बतलता है कि:—
संकल्प प्रवणो नित्यं प्रियां वश्यामथापि वा ।
न याति लिंग शैथिल्यात्कदाचिद्याति वा यदि ॥
अर्थ यह है कि पुरुष स्त्री प्रसग करने की इच्छा तो मन
में सदैव करे परन्तु अपनी स्त्री से भी प्रसग न कर सके इन्द्री
की कमजोरी के कारण स्त्री के पास जाते भी डरे। यदि किसी
प्रकार प्रसग करे भी तो शीघ्रही उस पुरुष का श्वास फूलने लगे
और शरीर मे पसीना आने लगे। इन्द्री मे ठीक ठीक उत्तेजना न
हो। इसप्रकार वह पुरुष लज्जित होकर बड़ा दुःखी हो और उस
बिचारे के विचार मन के मन मे ही रह जावे। यह साधारण
नपुंसको के लक्षण हैं।
जिन पुरुषो मे ये लक्षण पाये जावे उन्हे नपुंसक समझ
लेना चाहिये चाहे वे जन्म से हों अथवा किन्ही कारणो से पैदा
होगये हो।
२७६ आनन्द मन्दिर
नपुंसकता के विशेष कारण
ध्वजभंगस्य चोत्पत्तिं लक्षणं शृणु विस्तरात् ।
अत्यम्ललवणाक्षार विरुद्धाजीर्ण भोजनात् ॥
जो पुरुष नियम पूर्वक आहार विहार नहीं करते, खटाई नमक
तथा क्षार पदार्थों का अधिक सेवन करते हैं और विरुद्ध भोजन
करते हैं वे कुछ दिनों मे नपुसक हो जाते हैं ।
अत्यंबुपानाद्विषमपिष्टान्नगुरु भोजनात् ।
दधिक्षीरानूपमांससेवनादतिकर्षणात् ॥
जो पुरुष भली भांति विधि पूर्वक न पकाया गया अन्न भक्षण
करते हैं, जो पानी अधिक पिया करते हैं और जो गरिष्ट (पिट्ठी
आदि के ) भारी पदार्थ तथा दही दूध और अनूप सचारी जीवो
का मास सेवन करते हैं इन कारणों सेवे भी कुछ दिनों मे नपुसक
हो जाते हैं ।
कन्यायां चैव गमनादयोनिगमनादपि ।
दीर्घरोमणीं चिरोत्सृष्टां तथैव च रजस्वलाम् ॥
इसका अर्थ यह होता है कि जो पुरुष बारह वर्ष से कम
आयु वाली स्त्री से प्रसंग करते हैं अथवा जो प्राकृतिक नियम के
विरुद्ध अयोनि मैथुन (हस्त मैथुन, लड़कों के साथ दुष्ट कर्मआदि)
करते हैं तथा जिस स्त्री के गुप्त स्थान में बहुत बड़े बड़े बाल हों
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७७
जिसका रज स्खलित होने मे बहुत देरी लगे और जो ऋतु से
हुई हो ऐसी स्त्री से प्रसंग करते हैं वे पुरुष कुछ दिनो मे नपुसक
हो जाते हैं ।
दुर्गंधां दुष्टयोनिं च तथैव च परिश्रुताम् ।
नरस्य प्रमदां मोहादतिहर्षात्प्रगच्छत ॥
वैद्यकशास्त्र बतलाता है कि जो पुरुष ऐसी स्त्री से प्रसंग करता
है जिसकी योनि से दुर्गंधि आती हो । जिस स्त्री के गरमी, सुजाक
रज विकार अथवा प्रदर सोमरोग हो ऐसी स्त्री से गमन करता है
अथवा जिसकी योनि किसी भी रोग से दूषित हो गीली रहती हो
या नियम के विरुद्ध कुआसन उलटे सीधे हो मूर्खता से नियम
विरुद्ध मैथुन करता है वह पुरुष भी नपुंसक हो जाता है ।
चतुष्पदाभिगमनाच्छ्लेफसरचाभिघाततः !
अधावनाद्वा मेढ्रस्य शस्त्रादंत नख क्षतात् ॥
इसका अर्थ यह होता है कि जो अज्ञानी मूर्ख पुरुष पशुओं
के साथ प्रसंग करता है वह शीघ्र ही कुछ दिनो मे नपुसक हो जाता
है और जिसकी इन्द्री मे चोट लगी हो, जो इन्द्री को साफ नहीं
करता, जिसकी इन्द्री मे किसी कारण से शस्त्र लगा हो, नाखून
लगकर घाव हो जाने से और अत्यन्त प्रसंग करने से वीर्य
नष्ट होकर इन्द्री की नसें कमजोर होगई हो वह पुरुष नपुसक
होजाता है ।
चतुर्थ खण्ड: दाम्पत्य कलह-निवारण, प्रेम-संवर्धन एवं गृहस्थ सुख
२७८ आनन्द मन्दिर
वृद्धावस्था की नपुंसकता
जघन्यमध्यप्रवरं वयस्त्रिविध मुच्यते ।
अथ च प्रवरे शुक्रं प्रायशः क्षीयते नृणाम् ॥
वृद्धावस्था मे मनुष्यों का वीर्य क्षीण हो जाता है। मनुष्य की
अवस्था तीन प्रकार की है बुढ़ापे में वीर्य क्षीण होने से मनुष्य
नपुसक हो जाता है ।
रसादीनां संक्षयाच्च तथैवावृष्य सेवनात् ।
बलवर्णेन्द्रियाणां च क्रमेणैव परिक्षयात् ॥
बुढापे में पुरुष के शरीर मे रक्त मांस बल वीर्य बनाने वाले
जो रसादि हैं उनके क्षय होने से तथा जो पुरुष रसादिको को
अधिक बनाने वाले, जिनसे बल वीर्य की वृद्धि और पुष्टि होती है
ऐसे पदार्थों का सेवन नहीं करता अथवा उसे ये पदार्थ खाने को
मिलते ही नही परन्तु विषय वासना में लिप्त रहता है, प्रसग
करने मे जिसने कमी नही की उसके क्रमशः बल वीर्य वर्ण और
इन्द्रियों के क्षीण होने से तथा परिश्रम करते रहने और बलवर्द्धक
पदार्थ खाने को न मिलने से वह मनुष्य बुढापा आते ही शीघ्र ही
नपुँसक होजाता है। फिर बुढ़ापे मे वह अत्यन्त दुर्बल तनक्षीण
बलहीन हो जाता है, शरीर की दशा पलट जाती है, उसे रोग
शीघ्रही घेर लेते हैं। यह बुढ़ापे की नपुसकता है ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७६
चिंता क्रोध और शोक से नपुंसकता
अतिप्रचिंतनाश्चैव शोकात्क्रोधाद्भयादपि ।
ईर्ष्यात्कंठात्तथोद्वेगात्समा विंसतिको नरः ॥
जिनको अत्यन्त चिंता हर समय लगी रहती है, जिनको
क्रोध अधिक आता है, जिनको भारी शोक मे पड़ना पड़ता है, जो
किसी कारण से हृदय में भयभीत रहते हैं और जो पराई ईर्षा
में ही लगे रहते हैं इन कारणों से वे पुरुष भी कुछ दिनो मे
नपुसक होजाते हैं ।
अन्य कारणों से नपुंसकता
वाल्यावस्था से वीर्य के नष्ट करने से जवानी में वेश्याग-
मन से, हस्त मैथुन से, निर्वलता की दशा में अधिक उपवास करने
से, कम खाने से और समय कुसमय खाने से, समय कुसमय प्रसंग
से शरीर के वल वीर्य नष्ट होकर मनुष्य को कुछ दिनों मे नपुसक
वना देते हैं ।
ऊपर लिखे कारणों से तो अच्छे पुरुष जिनके शरीर मे पूर्व
से नपुंसकता का कोई लक्षण नही होता है, अपनी ही अनियमित
क्रियाओ से नपुंसक हो जाते हैं। दूसरे नपुंसक वे होते हैं जो
माता पिता के दोष से जन्म से ही नपुसक पैदा होते हैं । ऐसे
नपुंसकों के विषय में आगे लिखा जाता है जो कई प्रकार के