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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

७. औपनिषदिक अधिकरण १९९
तस्मिन्नेकाकृतिविकल्पान्यपद्रव्याणि योजयेत् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् उसमें अपद्रव्यों को पहना देना चाहिये ॥ २३ ॥
वृत्तमेकतो वृत्तमुदूखलकं कुसुमकं कण्टकितं कङ्कास्थि गजकर-
कमष्टमण्डलकं भ्रमरकं शृङ्गाटकमन्यानि वोपायतः कर्मतश्च बहुकर्मसहता चैषां
मृदुकर्कशता यथासात्म्यमिति नष्टरागप्रत्यानयनं द्विषष्टितमं प्रकरणम् ॥ २४ ॥
अपद्रव्य का प्रयोग — जिस प्रकार का अपद्रव्य स्त्री के अनुकूल पड़े, उसके साथ
समागम में वैसा ही अपद्रव्य प्रयुक्त करना चाहिये। गोल, एक ओर से गोल, ऊखल (ओखली)
जैसा गोल, कमल जैसा, करेले जैसा काँटेदार, कंक की हड्डी जैसा, हाथीदांत के समान,
अष्टकोण, चक्करदार, सिंघाड़े की आकृति का, कोमल या कठोर, जैसा स्त्री चाहे या जैसा
उसके अनुकूल पड़े, वैसा ही बनाया जा सकता है। ‘नष्टप्रेम के पुनः प्राप्ति की विधि’ नामक
बासठवाँ प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
एवं वृक्षजानां जन्तूनां शूकैरुपहितं लिङ्गं दशरात्रं तैलेन मृदितं पुनरुपबृंहितं
पुनः प्रमृदितमिति जातशोफं खट्वायामधोमुखस्तदन्तरे लम्बयेत् ॥ २५ ॥
शिश्नवर्धक उपाय — इसी प्रकार वृक्ष में उत्पन्न होने वाले रोमदार जन्तुओं
(कन्दलिका) के रोमों का शिश्न पर लेप करे और तेल मले। यह क्रिया दस रात तक निरन्तर
करने पर जब शिश्न में सूजन आ जाये तो चारपाई के छेद से उसे नीचे लटका दे और फिर औंधे
मुँह सो जाये ॥ २५ ॥
तत्र शीतैः कषायैः कृतवेदनानिग्रहं सोपक्रमेण निष्पादयेत् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् शीतल लेप लगाकर इसकी वेदना मिटानी चाहिये ॥ २६ ॥
स यावज्जीवं शूकजो नाम शोफो विटानाम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार रसलम्पटों के शिश्न की मोटाई आजीवन बनी रहती है ॥ २७ ॥
अश्वगन्धाशबरकन्दजलशूकबृहतीफलमाहिषनवनीतहस्तिकर्णवज्रवल्ली -
रसैरेकैकेन परिमर्दनं मासिकं वर्धनम् ॥ २८ ॥
अश्वगन्धा, बड़े लोध की जड़, जलशंकु, बड़ी कटेरी के पके फल, भैंस का मक्खन,
ढाक के पत्ते और वज्रवल्ली (हड़जोड़) का रस — इनमें से किसी एक को लगाने से शिश्न एक
मास तक मोटा बना रहता है ॥ २८ ॥
एतैरेव कषायैः पक्वेन तैलेन परिमर्दनं षाण्मास्यम् ॥ २९ ॥
अश्वगन्धा आदि के कल्क द्वारा सिद्ध किये गये तेल की मालिश करने से शिश्नवृद्धि छह
मास तक बनी रहती है ॥ २९ ॥
दाडिमत्रापुषबीजानि बालुका बृहतीफलरसश्चेति मृद्वग्निना पक्वेन तैलेन
परिमर्दनं परिषको वा ॥ ३० ॥
अनार, बालमखीरा के बीज, एलुवा और कटेरी के फलों के रस — इन सबको मन्द मन्द
अग्नि पर बनाये गये तैल की मालिश करने से या इनकी पोटली बनाकर सेंकने से छह मास तक
शिश्नवृद्धि रहती है ॥ ३० ॥