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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 248 में से

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पृष्ठ 224

१९८ वात्स्यायन-कामसूत्र
जिसमें अण्डकोश भी लगाये गये हों, जो शिश्न के समान आकार का हो और जिसे कमर में
पहना जा सके—ऐसा कृत्रिम साधन कञ्चुक या जालक कहलाता है ॥ १२ ॥
तदभावेऽलाबूनालकं वेणुश्च तैलकषायैः सुभावितः सूत्रेण कट्यां बद्धः
श्लक्ष्णा काष्ठमाला वा ग्रथिता बहुभिरामलकास्थिभिः संयुक्तेत्यपविद्ध-
योगाः ॥ १३ ॥
यदि इस प्रकार के कृत्रिम साधन सम्भव न हों तो अपने शिश्न के प्रमाण के अनुरूप तूम्बी
या बाँस का साधन (लिङ्ग) बनाकर तेल और उबटन से चिकना करके कमर में बाँध ले अथवा
आँवले के समान चिकनी काष्ठ गोलियों की माला शिश्न में पहन लेनी चाहिये—ये अपविद्ध
(त्यक्त) योग हैं ॥ १३ ॥
न त्वविद्धस्य कस्यचिद्द्व्यवहृतिरस्तीति ॥ १४ ॥
क्योंकि इन कृत्रिम साधनों का सम्बन्ध समागम से नहीं है। ये तो केवल असमर्थों के योग
हैं ॥ १४ ॥
दाक्षिणात्यानां लिङ्गस्य कर्णयोरिव व्यधनं बालस्य ॥ १५ ॥
छेदनकर्म—दक्षिण भारत में बच्चों के कर्णछेदन के समान शिश्न का छेदन भी
होता है ॥ १५ ॥
युवा तु शस्त्रेण छेदयित्वा यावद्रुधिरस्यागमनं तावदुदके तिष्ठेत् ॥ १६ ॥
छेदनविधि—यदि युवा पुरुष अपना छेदन कराये तो सुपारी की चमड़ी सरकाकर, नसों
को बचाकर, तीक्ष्ण शस्त्र से कुशलतापूर्वक तिरछा छेदे और जब तक रक्त बहता रहे तब तक
उसे पानी में डुबोये रखे ॥ १६ ॥
वैशद्यार्थं च तस्यां रात्रौ निर्बन्धाद्व्यवायः ॥ १७ ॥
और उस छिद्र को बड़ा करने के लिये, उसी रात को कई बार स्त्री के साथ समागम
करे ॥ १७ ॥
ततः कषायैरेकदिनान्तरितं शोधनम् ॥ १८ ॥
फिर पञ्चकषायों (अमलतास, ब्राह्मी, कनेर, मालती और शङ्खपुष्पी) से एक एक दिन के
अन्तर से धोना चाहिये ॥ १८ ॥
वेतसकुटजशङ्कुभिः क्रमेण वर्धमानस्य वर्धनैर्बन्धनम् ॥ १९ ॥
छिद्रवर्धन—बेंत और कुटज के शंकुओं (कीलों) से उस छिद्र को धीरे-धीरे बढ़ाना
चाहिये ॥ १९ ॥
यष्टीमधुकेन मधुयुक्तेन शोधनम् ॥ २० ॥
व्रणशोधन—मुलहठी और शहद मिलाकर घाव में लगाना चाहिये ॥ २० ॥
ततः सीसकपत्रकर्णिकया वर्धयेत् ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् शीशम के पत्तों की कर्णिका से इसे बढ़ाना चाहिये ॥ २१ ॥
म्रक्षयेद्भल्लातकतैलेनेति व्यधनयोगाः ॥ २२ ॥
इसके बाद भिलावे के तेल से इसे भिगोते रहना चाहिये। व्यधनयोग समाप्त हुए ॥ २२ ॥