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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 248 में से

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पृष्ठ 229

७. औपनिषदिक अधिकरण २०३
शास्त्रसम्मत ग्रन्थ—बाभ्रवीय सूत्रों को समझकर और कामशास्त्र का गुरुओं से
अध्ययन कर एवं स्वबुद्धि से चिन्तन मनन करके ही आचार्य वात्स्यायन ने इस 'कामसूत्र' को
शास्त्रीय विधि से लिखा है ॥ ५६ ॥
तदेतद् ब्रह्मचर्येण परेण च समाधिना।
विहितं लोकयात्रार्थं न रागार्थोऽस्य संविधिः ॥ ५७ ॥
निर्माण की अवस्था और प्रयोजन—इस 'कामसूत्र' की रचना अमोघ ब्रह्मचर्य और
निर्विकल्प समाधि द्वारा महर्षि वात्स्यायन ने लोकव्यवहार को सुचारु रूप से चलाने के लिये की
है, इसका विधान राग के निमित्त नहीं किया गया ॥ ५७ ॥
रक्षन् धर्मार्थकामानां स्थितिं स्वां लोकवर्तिनीम्।
अस्य शास्त्रस्य तत्त्वज्ञो भवत्येव जितेन्द्रियः ॥ ५८ ॥
कामतत्त्वज्ञ कामुक नहीं होता—इस शास्त्र के तत्त्व को समझने वाला पुरुष धर्म, अर्थ
एवं काम तथा लोक में अपनी स्थिति की रक्षा करता हुआ निश्चय ही जितेन्द्रिय हो जाता
है ॥ ५८ ॥
तदेतत्कुशलो विद्वान् धर्मार्थाववलोकयन्।
नातिरागात्मकः कामी प्रयुञ्जानः प्रसिध्यति ॥ ५९ ॥
सिद्धि के लिये रागात्मकता का अभाव आवश्यक—जो कामी पुरुष रागात्मक भाव
से इस शास्त्र का अध्ययन एवं प्रयोग करता है, उसे कदापि सिद्धि नहीं मिलती; किन्तु जो
विवेकवान् पुरुष धर्म और अर्थ को दृष्टि में रखकर इसका प्रयोग करता है उसे पूर्ण सिद्धि
मिलती है ॥ ५९ ॥
नष्टरागप्रत्यानयन से चित्रयोग तक
व्याख्यानात्मक द्वितीय अध्याय पूर्ण ॥
॥ वात्स्यायनकृत कामसूत्र पूर्ण ॥
काम० १५