वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोहे को ताँबे के समान करना—हरड़ और आँवले को मालकाँगनी के साथ पीसकर
लोहे के बर्तन पर लेप करने से वह ताँबे के रंग का हो जाता है ॥ ४८ ॥
श्रवणप्रियङ्गुकातैलेन दुकूलसर्पनिर्मोकेण वर्त्या दीपं प्रज्वाल्य पार्श्वे
दीर्घीकृतानि काष्ठानि सर्पवद् दृश्यन्ते ॥ ४९ ॥
लकड़ियों का सर्प दिखना—सर्प की केंचुली और कपड़े को लपेटकर, बत्ती बनाकर,
मालकाँगनी के तैल में भिगोकर दीपक की तरह जलाये तो आस पास में पड़ी लकड़ियाँ उसके
प्रकाश में सर्पों के समान दीखेंगीं ॥ ४९ ॥
श्वेतायाः श्वेतवत्साया गोः क्षीरस्य पानं यशस्यमायुष्यम् ॥ ५० ॥
यश और आयुवर्धक दूध—सफेद बछड़े वाली सफेद गाय का दूध पीने से यश और
आयु की वृद्धि होती है ॥ ५० ॥
ब्राह्मणानां प्रशस्तानामाशिषः ॥ ५१ ॥
ब्राह्मणों का आशीर्वाद सदैव हितकर—प्रशस्त ब्राह्मणों का आशीर्वाद भी यश और
आयु को बढ़ाता है ॥ ५१ ॥
पूर्वशास्त्राणि सन्दृश्य प्रयोगाननुसृत्य च।
कामसूत्रमिदं यत्नात् संक्षेपेण निवेदितम् ॥ ५२ ॥
उपसंहार—पूर्वाचार्यों के शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन कर और उनके प्रयोगों का
अनुसरण कर प्रयत्नपूर्वक संक्षेप में इस कामसूत्र को कहा गया है ॥ ५२ ॥
धर्ममर्थं च कामं च प्रत्ययं लोकमेव च।
पश्यत्येतस्य तत्त्वज्ञो न च रागात् प्रवर्तते ॥ ५३ ॥
शास्त्र का उद्देश्य रागोद्दीपन नहीं—इस कामशास्त्र के तत्त्व को जानने वाला व्यक्ति
धर्म, अर्थ, काम, विश्वास और लोकाचार को देखकर ही प्रवृत्त होता है, राग या कामुकतावश
नहीं ॥ ५३ ॥
अधिकारवशादुक्ता ये चित्रा रागवर्द्धनाः ।
तदनन्तरमत्रैव ते यत्नाद्विनिवारिताः ॥ ५४ ॥
अशिष्टसम्मत योगों का प्रयोग उचित नहीं—इस शास्त्र में प्रकरणवश राग को बढ़ाने
वाले विचित्र योग कहे गये हैं, लेकिन विवेचन के पश्चात् यह स्पष्ट कर दिया गया है कि कौन
कौन से प्रयोग किये जायें और कौन से नहीं ॥ ५४ ॥
न शास्त्रमस्तीत्येतेन प्रयोगो हि समीक्ष्यते ।
शास्त्रार्थान् व्यापिनो विद्यात् प्रयोगांस्त्वेकदेशिकान् ॥ ५५ ॥
ये बातें शास्त्र में कही गयी हैं, इसीलिये उन्हें प्रयोग नहीं कर बैठना चाहिये, क्योंकि
शास्त्र का विषय तो सार्वभौम होता है, लेकिन उसके प्रयोग एकदेशीय ही होते हैं ॥ ५५ ॥
बाभ्रवीयांश्च सूत्रार्थानागमय्य विमृश्य च।
वात्स्यायनश्चकारेदं कामसूत्रं यथाविधि ॥ ५६ ॥