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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः । १५
तद्भवचरणद्वन्द्वं तत आसादितं मया ।
अन्धो जनसमायोगमिवात्यन्तसुखावहम् ॥ १२ ॥
तन्मे न विदितं किञ्चित्संवर्त्तमुनिराह यत् ।
श्रुतं माहात्म्यमखिलं त्रिपुराभक्तिकारकम् ॥ १३ ॥
सा भवद्रूपिणी देवी हृदि नित्यं समाहिता ।
एवं मे वर्त्तमानस्य किं फलं समवाप्यते ॥ १४ ॥
भगवन् कृपया ब्रूहि यत्संवर्त्तः पुरावदत् ।
अविदित्वा च तन्नास्ति क्वचिच्च कृतकृत्यता ॥ १५ ॥
तदुक्तमविदित्वा तु यद्यच्च क्रियते मया ।
तद्वालक्रीडनमिव प्रतिभाति समन्ततः ॥ १६ ॥
पुरा मया हि बहुशः क्रतुभिर्दक्षिणोच्छ्रयैः ।
प्रभृतान्नगणैरिष्टा देवाः शक्रमुखा ननु ॥ १७ ॥
अतः मैं वहाँ से आपके चरणयुगलकी शरणमें आया हूँ, जैसे
कोई [अकेला भटकता हुआ] अन्धा अत्यन्त सुखदायक जनसमाजमें
आ जाय ॥ १२ ॥
मुझसे संवर्त्त मुनिने जो कुछ कहा वह मैंने कुछ भी नहीं समझा।
आपके मुखारविन्दसे पहले मैंने भगवती त्रिपुरामें भक्तिभाव जागृत
करनेवाला माहात्म्य पूरा सुना था ॥ १३ ॥
वह त्रिपुरादेवी साक्षात् आपका ही स्वरूप है। वह सर्वदा मेरे
हृदयमें विराजमान है। इस स्थितिमें रहते हुए मुझे किस फलकी प्राप्ति
होगी ॥ १४ ॥
इसके सिवा भगवन् ! संवर्त्तजीने मुझसे पहले जो बात कही थी,
कृपया वह भी समझा दीजिये, क्योंकि उसे बिना समझे कभी
कृतकृत्यता प्राप्त नहीं हो सकती ॥ १५ ॥
उनकी कही हुई बातको समझे बिना मैं जो कुछ भी करता हूँ वह
मुझे सब प्रकार बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें मैंने यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवताओंका पूजन किया था।
उन यज्ञोंमें बड़ी-बड़ी दक्षिणाएँ दी थीं और खूब अन्नदान
किया था ॥ १७ ॥

१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तदल्पफलमेवेति श्रुतं संवर्त्तवक्त्रतः ।
मन्ये तदहमल्पं यद् दुःखमेवेति सर्वथा ॥ १८ ॥
असुखं नहि दुःखं स्याद् दुःखमल्पं सुखं स्मृतम् ।
यतः सुखात्यये दुःखं भवेद् गुरुतरं किल ॥ १९ ॥
नैतावदेव चैतस्मादधिकं चास्ति वैभवम् ।
मृत्यूपयोगो यद्भूयो न तन्न स्यात्कदाचन ॥ २० ॥
एवमेव भवेद्यन्मे क्रियते त्रिपुराविधौ ।
बालक्रोडेव मे भाति सर्वं तन्मानसं यतः ॥ २१ ॥
एतद्यदुक्तं भवता कर्तुं तस्यादितोऽन्यथा ।
नियतं चाप्यन्यथा तद्वचोभेदसमाश्रयात् ॥ २२ ॥
आलम्बभेदतश्चापि विविधं प्रतिपद्यते ।
कथमेतत्क्रतुसममसत्यफलसम्मितम् ॥ २३ ॥
किन्तु संवर्त्तजीके मुखसे सुना कि वे सब तो तुच्छ फल
देनेवाले हैं। और जो तुच्छ होता है उसे तो मैं सर्वथा दुःखरूप ही
मानता हूँ ॥ १८ ॥
वास्तवमें सुखका अभाव ही दुःख नहीं है, अल्प सुख भी दुःख
ही माना जाता है; क्योंकि सुखका अन्त होनेपर भी बड़ा भारी दुःख
होता है ॥ १९ ॥
इतना ही नहीं, इस कर्मकाण्डमें एक इससे भी बड़ा भय यह है
कि अन्तमें मृत्यु होती है, और ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे वह
न हो ॥ २० ॥
त्रिपुरादेवीकी उपासनामें मैं जो कुछ करता हूँ उससे भी ऐसा ही
होता है। क्योंकि वह सब भी मानसिक व्यापार ही है, अतः मुझे तो
बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ २१ ॥
आपने जिस विधिसे उपासना करनेको कहा था उस प्रकार भी
की जा सकती है और अन्य प्रकार भी। [ कर्मानुष्ठानके समान ]
विधिसे भी उसका अनुष्ठान हो सकता है और [ भावकी प्रधानतासे ]
बिना विधिके भी; क्योंकि शास्त्रोंमें मतभेद है ही ॥ २२ ॥
इसके सिवा आलम्बन ( इष्टदेव ) के भेदसे भी उपासना अनेक
प्रकारकी है। इस प्रकार असत्य फलवाली होनेसे यह यज्ञोंके समान
ही क्यों नहीं है ? ॥ २३ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । १७
अप्यसत्यात्मकं यस्मात् कथं सत्यसमं भवेत् ।
अथापि नित्यकर्त्तव्यमेतन्नास्यावधिः क्वचित् ॥ २४ ॥
लक्षितो मे स भगवन् संवर्त्तः सर्वशीतलः ।
कर्त्तव्यलेशविषमविषज्वालावनिर्गतः ॥ २५ ॥
हसन्निव लोकतन्त्रमभयं मार्गमाश्रितः ।
वने दावाग्निसङ्कीर्णे हिमाम्बुस्थगजोपमः ॥ २६ ॥
सर्वकर्त्तव्यवैकल्यामृतसंस्वादनन्दितः ।
कथमेतां दशां प्राप्तो यच्च मामाह तत्पुरा ॥ २७ ॥
सर्वमेतत् सुकृपया गुरो मे वक्तुमर्हसि ।
कर्त्तव्यकालभुजगनिगीर्णं मां विमोचय ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वा चरणौ मूर्ध्ना गृहीत्वा दण्डवन्नतः ।
अथ दृष्ट्वा तथाभूतं भार्गवं मुक्तिभाजनम् ॥ २९ ॥
अतः [ कृतिसाध्य होनेके कारण ] असत्यरूप होनेपर भी यह
सत्यके समान कैसे हो सकती है ? यदि कहो कि [ 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि
जिजीविषेच्छतꣳसमाः' इस श्रुतिवचन के अनुसार ] यह तो
मनुष्यको नित्य करते ही रहना चाहिये, तब तो कभी इसकी समाप्ति
ही नहीं होगी ॥ २४ ॥
किन्तु भगवान् संवर्त्त मुनि तो मुझे सब प्रकार शान्त प्रतीत होते
थे । वे तो कर्त्तव्यकी लेशमात्र विषमविषमयी ज्वालासे भी मुक्त
हो चुके थे ॥ २५ ॥
इस लोकव्यवहारको देखकर उन्हें मानो हँसी आती थी और वे
भयशून्य मार्गपर आरूढ थे; जैसे दावाग्निसे व्याप्त वनमें कोई शीतल-
जलमें खड़ा हुआ गजराज हो ॥ २६ ॥
वे सर्वकर्त्तव्यविमुक्ति रूप अमृतका आस्वादन करके परम
आनन्दित जान पड़ते थे । ऐसी अवस्था उन्हें कैसे प्राप्त हुई, जिसका
कि उस समय उन्होंने मुझसे भी वर्णन किया था ॥ २७ ॥
गुरुदेव ! कृपापूर्वक यह सब रहस्य मुझे बताइये । मुझे कर्त्तव्यरूप
काले नागने डसा हुआ है, उससे आप मुझे छुड़ा लीजिये ॥ २८ ॥
ऐसा कहकर परशुरामने उनके दोनों चरणोंको सिरपर रखकर
दण्डवत् प्रणाम किया । तब परशुरामकी ऐसी स्थिति और उन्हें मुक्तिका

१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
दयमानस्वभावोऽथ दत्तो वक्तुमुपाक्रमत् ।
वत्स भार्गव धन्योऽसि यस्य ते बुद्धिरीदृशी ॥ ३० ॥
अब्धौ निमज्जतो नौकासम्प्राप्तिरिव सङ्गता ।
एतावदेव सुकृतिः क्रियाभिरुपसङ्गतः ॥ ३१ ॥
स्वात्मानमारोहयति पदे परमपावने ।
सा देवी त्रिपुरा सर्वहृदयाकाशरूपिणी ॥ ३२ ॥
अनन्यशरणं भक्तं प्रत्येवं रूपिणी द्रुतम् ।
हृदयान्तःपरिणता मोचयेन्मृत्युजालतः ॥ ३३ ॥
यावत् कर्त्तव्यवेतालान्न बिभेति दृढं नरः ।
न तावत् सुखमाप्नोति वेतालाविष्टवत् सदा ॥ ३४ ॥
नृणां कर्त्तव्यकालाहिसन्दष्टानां कथं शुभम् ।
करालगरलज्वालाक्रान्ताङ्गानामिव क्वचित् ॥ ३५ ॥
अधिकारी देखकर सहजदयालु भगवान् दत्तात्रेयने कहना आरम्भ
किया—बेटा परशुराम ! तुम्हें ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई, अतः तुम धन्य
हो । यह ऐसी है जैसे किसी समुद्रमें डूबनेवालेको नौका
मिल जाय ॥ २९-३१ पू० ॥
उपासना आदि क्रियाओंके द्वारा पुण्यवान् पुरुषको यही प्राप्त
होता है कि वह अपने-आपको परमपवित्र पदमें आरूढ कर
सकता है ॥ ३१ उ०-३२ पू० ॥
देवी त्रिपुरा सभीकी हृदयाकाशस्वरूपा है [—उसका यद्यपि कोई
आकार नहीं है—] तथापि अपने अनन्यशरण भक्तके लिये वह तुरन्त
मूर्त्तिमती हो जाती है और उसके अन्तःकरणमें आविर्भूत होकर वह
उसे मृत्युके पाशसे मुक्त कर देती है ॥ ३२ उ०-३३ ॥
जबतक मनुष्यको इस कर्त्तव्यरूप पिशाचका भारी भय नहीं होता,
तबतक उसे सुखकी प्राप्ति नहीं होती, वह भूताविष्ट व्यक्तिके समान
विक्षिप्त रहता है ॥ ३४ ॥
भीषण विषकी ज्वालासे जिसके अंग-प्रत्यंगोंमें दाह हो रहा हो
उस व्यक्तिके समान कर्त्तव्यरूप काले नागसे डसे हुए पुरुषका कल्याण
भला कैसे हो सकता है ? ॥ ३५ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । १६
कर्त्तव्यविषसंसर्गमूर्च्छितं पश्य वै जगत् ।
अन्धीभूतं न जानाति क्रियां स्वस्य हितात्मिकाम् ॥ ३६ ॥
अन्यथा चेष्टते भूयो मोहमापद्यते पुनः ।
एवंविधो हि लोकोऽयं कर्त्तव्यविषमूर्च्छितः ॥ ३७ ॥
अनादिकालतो भीमे पच्यते विषसागरे ।
यथा हि केचित्पथिकाः प्राप्ता विन्ध्यं महानगम् ॥ ३८ ॥
क्षुधाभरसमाक्रान्ताः फलानि ददृशुर्वने ।
विषमुष्टिफलान्याशु तिन्दुकस्य फलेहया ॥ ३९ ॥
भक्षयामासुरत्यन्तक्षुधानष्टरसेन्द्रियाः ।
अथ ते तद्विषज्वालाज्वलिताङ्गाः सुपीडिताः ॥ ४० ॥
अन्धीभूता विचिन्वन्तस्तद्विषोष्णप्रशान्तये ।
अविदित्वा मुष्टिफलं तिन्दुकफलनिषेवणात् ॥ ४१ ॥
मत्वा ज्वालां निजे देहे धत्तूरफलमासदुः ।
भ्रान्त्या जम्बीरबुद्ध्या तत् सर्वैरासीह सुभक्षितम् ॥ ४२ ॥
देखो, यह सारा संसार कर्त्तव्यरूप विषके संसर्गसे मूर्च्छित होनेके
कारण अन्धा हो रहा है, इसलिये इसे अपना हित करनेवाली क्रियाका
पता नहीं लगता ॥ ३६ ॥
यह बार-बार उलटे ही कर्म करता है और पुनः पुनः मोहग्रस्त होता
रहता है। कर्त्तव्यरूप विषसे मूर्च्छित यह लोक अनादिकालसे इसी
प्रकार भीषण विषसमुद्रमें सन्तप्त हो रहा है ॥ ३७-३८ पू० ॥
[ यह बात ऐसी है जैसे—] कुछ यात्री पर्वतराज विन्ध्याचलपर
जा पहुँचे। वे भूखसे अत्यन्त व्याकुल थे। वहां वे फल खोजने लगे,
और काजूके फल समझकर कुचलाके फल खा गये। अत्यन्त क्षुधातुर
होनेके कारण उनकी रसनेन्द्रिय शक्तिहीन हो गयी थी। [ अतः उनके
स्वादकी ओर उनका ध्यान नहीं गया ] ॥ ३८ उ०-४० पू० ॥
अब कुचलाके विषकी ज्वालासे उनके अंग-अंगमें जलन होने
लगी। उससे उन्हें बड़ी बेचैनी हुई। उन्हें यह तो पता था नहीं कि
हमने कुचलाके फल खा लिये हैं, अतः अपने शरीर में उस ज्वालाको
काजू खानेका ही परिणाम समझकर वे अन्धे-से होकर उसकी शान्तिके

२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
उन्मत्ताश्च ततोऽभूवन् मार्गाद् भ्रष्टाश्च ते तदा ।
अन्धीभूयातिगहने पतन्तो निम्नभूमिषु ॥ ४३ ॥
कण्टकैःक्षतसर्वाङ्गा भग्नबाहूरुपादकाः ।
अधिक्षिपन्तश्चान्योऽन्यं कलहञ्चक्रुरुच्चकैः ॥ ४४ ॥
मुष्टिभिश्च शिलाभिश्च काष्ठैर्जघ्नुः परस्परम् ।
अथ ते दीर्णसर्वाङ्गाः पुरं कञ्चित् समासदुः ॥ ४५ ॥
निशीथे दैववशतः पुरद्वारमुपाययुः ।
पुरद्वाराधिपालैस्ते प्रतिरुद्धाः प्रवेशने ॥ ४६ ॥
देशकालानभिज्ञानात् कलहञ्चक्रुरुच्चकैः ।
अथ ते प्रहृता द्वारपालैरतितरां यदा ॥ ४७ ॥
तदा पलायनपरा बभूवुः परितस्तु ते ।
पतिताः परिखे केचिद् भक्षिता मकरादिभिः ॥ ४८ ॥

लिये खोज करने लगे तो उन्हें धतूरेके फल मिल गये । भ्रमवश उन
सबने उन्हें नीबू समझकर खा लिया ॥ ४० उ०-४२ ॥
इससे वे और भी पागल हो गये और अपने मार्गसे भटककर उस
घोर जंगलमें गड्ढोंमें गिरने-पड़ने लगे ॥ ४३ ॥
उनके सारे शरीरमें काँटे लग गये, हाथ-पैर और घुटने घायल
हो गये तथा वे एक दूसरेको बुरा-भला कहकर आपसमें बड़ा कलह
करने लगे ॥ ४४ ॥
होते-होते वे एक-दूसरेपर घूँसे, पत्थर और लकड़ियाँ चलाने लगे ।
इससे उनके सब अंग क्षत-विक्षत हो गये । अन्तमें वे किसी नगरके
पास जा निकले ॥ ४५ ॥
दैववश वे आधी रातके समय नगरके द्वारपर पहुँचे । उस समय
द्वारपालने उन्हें नगरमें प्रवेश करनेसे रोका ॥ ४६ ॥
उन्हें कुछ देश-कालका ज्ञान तो था ही नहीं, इसलिये वे
उनके साथ भी झगड़ा करने लगे । अब तो द्वारपालों ने भी उनको
खूब पीटा ॥ ४७ ॥
तब वे इधर-उधर भागने लगे । उनमेंसे कुछ तो नगरकी खाईमें
गिर गये और वहाँ मकर आदि जलजन्तुओंने उन्हें खा लिया ॥ ४८ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । २१
केचित् खातेषु कूपेषु पतिताः प्राणमुत्सृजुः
अपरे तैर्विनिहताः केचिज्जीवग्रहं गताः ॥ ४९ ॥
एवं जना हितेच्छाभिः कर्तव्यविषमूर्च्छिताः ।
अहो विनाशं यान्त्युच्चैर्मोहेनान्धीकृताः खलु ॥ ५० ॥
धन्योऽसि भार्गव त्वन्तु यस्मादभ्युदयं गतः ।
विचारः सर्वमूलं हि सोपानं प्रथमं भवेत् ॥ ५१ ॥
परश्रेयोमहासौधप्राप्तौ जानीहि सर्वथा ।
सुविचारमृते क्षेमप्राप्तिः कस्य कथम्भवेत् ॥ ५२ ॥
अविचारः परो मृत्युरविचारहता जनाः ।
विमृश्यकारी जयति सर्वत्राभीष्टसङ्गमात् ॥ ५३ ॥
अविचारहता दैत्या यातुधानाश्च सर्वशः ।
विचारपरमा देवाः सर्वतः सुखभागिनः ॥ ५४ ॥
कुछ ने गड्ढों और कुओंमें गिरकर प्राण त्याग दिये और कोई
उनसे मार खाकर किसी प्रकार अपनी जान बचाकर भाग गये॥ ४९ ॥
इसी प्रकार संसारी लोग अपने कल्याणकी कामनासे कर्त्तव्यरूप
विषको पीकर मूर्च्छित हो गये हैं और मोहसे अन्धे होकर उल्टे
विनाशकी ओर ही जा रहे हैं ॥ ५० ॥
परशुराम ! तुम्हारे हृदयमें विचार उदय हुआ है, अतः तुम धन्य
हो । विचार ही सबका मूल है और परमकल्याणरूप महत्पदकी प्राप्तिके
लिये यही पहली सीढ़ी है—यह तुम निश्चय जानो । भला, सम्यक्
विचारके बिना किसीको कल्याणकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ॥५१-५२॥
अविचार सबसे बड़ी मृत्यु है, सब लोग अविचारसे ही नष्ट हो
रहे हैं । जो विचारपूर्वक चलता है वही सर्वत्र अपने इच्छित पदार्थ
प्राप्त करके अन्तमें विजय ( सफलता ) प्राप्त करता है ॥ ५३ ॥
दैत्य और राक्षस अविचारके कारण ही सब प्रकार नष्ट होते हैं
और देवता लोग विचारनिष्ठ होनेके कारण सब प्रकार सुखके अधिकारी
होते हैं ॥ ५४ ॥

२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
विचाराद्विष्णुमाश्रित्य जयन्ति प्रत्यरीन् सदा ।
विचारः सुखवृक्षस्य बीजमङ्कुरशक्तिकम् ॥ ५५ ॥
विराजते विचारेण पुरुषः सर्वतोऽधिकः ।
विचाराद्विधिरुत्कृष्टो विचारात्पूज्यते हरिः ॥ ५६ ॥
सर्वज्ञस्तु विचारेण शिव आसीन्महेश्वरः ।
अविचारान्मृगासक्तो रामो बुद्धिमतां वरः ॥ ५७ ॥
परमामापदं प्राप्तो विचारादथ वारिधिम् ।
बद्ध्वा लङ्कापुरीं रक्षोगणाकीर्णां समाक्रमत् ॥ ५८ ॥
अविचाराद्विधिरपि मूढो भूत्वाभिमानतः ।
शिरश्छेदं समगमदिति संस्तुतमेव ते ॥ ५९ ॥
महादेवोऽविचारेण वरं दत्वा सुराय वै ।
भस्मीभावात् स्वस्य भीतः पलायनपरोऽभवत् ॥ ६० ॥
वे विचारपूर्वक विष्णुभगवान्‌का आश्रय लेकर सर्वदा अपने
शत्रुओंपर विजयी होते हैं। विचार ही सुखरूपी वृक्षका बीज है, इसीमें
सुखका अंकुर फूटनेकी शक्ति है ॥ ५५ ॥
विचारके ही कारण मनुष्यकी सबसे अधिक शोभा होती है।
विचारके कारण ही ब्रह्मा सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और विचारसे ही
विष्णुकी सर्वत्र पूजा होती है ॥ ५६ ॥
विचारके द्वारा ही भगवान् शिव सर्वज्ञ और महेश्वर हैं। तथा
[इसके विपरीत] बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ होनेपर भी अविचारके कारण
रामका सुवर्णमृगके प्रति आकर्षण हुआ और वे बड़ी आपत्तिमं पड़
गये। फिर विचारका आश्रय लेकर ही उन्होंने समुद्रपर पुल बनवाया
और राक्षसोंसे बसी हुई लंकापुरी पर आक्रमण किया ॥ ५७-५८ ॥
यह बात तुमसे कही ही जा चुकी है कि अविचारके कारण ही
अभिमानसे मूढ होकर ब्रह्माने अपना एक सिर कटवा लिया था * ॥ ५९ ॥
महादेवजीने भी अविचारके वशीभूत होकर भस्मासुरको वर दे
दिया और फिर अपने भस्म होनेकी सम्भावनासे भयभीत होकर
भागते फिरे ॥ ६० ॥

  • पहले ब्रह्माके पाँच सिर थे। जब वे सरस्वती को देखकर कामातुर हुए
    तब भगवान् शंकर ने उनकी भर्त्सना की और अपने हाथ से उनका पाँचवाँ
    मस्तक काट डाला।

द्वितीयोऽध्यायः । २३
अविचाराद्धरिः पूर्वं भृगुपत्नीं निहत्य तु ।
शापेन परमं दुःखमाप्तमत्यन्तदुःसहम् ॥ ६१ ॥
एवमन्ये सुरा दैत्या यातुधाना नरा मृगाः ।
अविचारवशादेव विपदं प्राप्नुवन्ति हि ॥ ६२ ॥
महाभागास्ते हि धीरा यान् कुत्रापि च भार्गव ।
विजहाति विचारो नो नमस्तेभ्यो निरन्तरम् ॥ ६३ ॥
कर्त्तव्यमविचारेण प्राप्य मुह्यन्ति सर्वतः ।
विचार्य कृत्वा सर्वेभ्यो मुच्यतेऽपारसङ्कटैः ॥ ६४ ॥
एवं लोकांश्चिरादेषोऽविचारः सङ्गतोऽभवत् ।
यस्याविचारो यावत् स्यात् कुतस्तावद्विमर्शनम् ॥ ६५ ॥
ग्रीष्मभीष्मकरातप्ते मरुौ क्व शिशिरं जलम् ।
एवं चिराविचाराग्निज्यालामालापरीवृते ॥ ६६ ॥
विचारशीतलस्पर्शः कथं स्यात् साधनं विना ।
साधनन्त्वेकमेवात्र परमं सर्वतोऽधिकम् ॥ ६७ ॥
अविचारसे ही पूर्वकालमें विष्णुभगवान् भृगुकी भार्याको मारकर
फिर शापसे अत्यन्त असहनीय आपत्तिमें पड़ गये ॥ ६१ ॥
इसी प्रकार और भी असुर, देवता, राक्षस, मनुष्य एवं मृग आदि
अविचारके अधीन होनेपर ही विपत्तिमें पड़ते हैं ॥ ६२ ॥
परशुराम ! वे बुद्धिमान् पुरुष बड़े ही भाग्यशाली हैं जिन्हें किसी
भी परिस्थितिमें विचार नहीं छोड़ता। उन्हें बार-बार प्रणाम है ॥६३॥
अविचारसे अकर्त्तव्यको ही कर्त्तव्य समझकर लोग सब प्रकार
मोहमें पड़ जाते हैं और विचारपूर्वक कर्म करनेपर वे सब प्रकारके
अपार संकटोंसे भी छुटकारा पा लेते हैं ॥ ६४ ॥
इस प्रकार चिरकालसे इस अविचारने ही लोगोंको प्रभावित कर
रखा है। और जबतक किसीपर अविचारका अधिकार है तबतक वह
विचार कैसे कर सकता है ॥ ६५ ॥
ग्रीष्मकालके प्रचण्ड मार्त्तण्डकी किरणोंसे तपे हुए मरुस्थलमें
भला, शीतल जल कहाँ मिल सकता है ? इसी प्रकार चिरकालसे
अविचाररूप अग्निकी लपटोंसे घिरे हुए अन्तःकरणमें बिना साधन

२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
सर्वहृत्पद्मनिलयदेवतायाः परा कृपा ।
तां विना स्यात् कथं कस्य महाश्रेयः सुसाधनः ॥ ६८ ॥
विचारार्कोऽविचारान्धमहाध्वान्तनिबर्हणः ।
तत्र मूलं भवेद्भक्त्या देवतापरिराधनम् ॥ ६९ ॥
राधिता परमा देवी सम्यक् तुष्टा सती तदा ।
विचाररूपतां याति चित्ताकाशे रविर्यथा ॥ ७० ॥
तस्मान्निजात्मरूपां तां त्रिपुरां परमेश्वरीम् ।
सर्वान्तरनिकेतां श्रीमहेशीं चिन्मयीं शिवाम् ॥ ७१ ॥
आराधयेदकापट्यात् सद्गुरुद्वारतः क्रमात् ।
आराधनेऽपि मूलं स्याद्भक्तिः श्रद्धा च निर्मला ॥ ७२ ॥
तत्रापि मूलं माहात्म्यश्रवणं परिकीर्तितम् ।
अतस्ते प्रथमं राम माहात्म्यं सम्प्रवर्णितम् ॥ ७३ ॥
किये विचारका शीतल स्पर्श कैसे प्राप्त हो सकता है । इसके लिये
परम साधन भी एक ही है और वह सबसे बढ़कर है ॥ ६६-६७ ॥
[ वह है—] सबके हृदयकमलमें निवास करनेवाली श्रीत्रिपुरा-
देवीकी परम कृपा । उसके बिना भला किसीको परम कल्याणकी प्राप्ति
कैसे हो सकती है ? ॥ ६८ ॥
विचाररूपी सूर्य अविचारसे अन्धे हुए लोगोंके अज्ञानरूप महान्
अन्धकारको नष्ट करनेवाला है । उसका मूल भक्तिभावसे उनकी
आराधना करना ही है ॥ ६६ ॥
आराधिता होनेपर महादेवी त्रिपुरा प्रसन्न होकर विचार रूपमें
परिणत हो सूर्यके समान हृदयाकाशमें प्रकट हो जाती हैं ॥ ७० ॥
अतः उन भगवती त्रिपुराकी जो अपनी आत्मस्वरूपा, सर्वान्तर-
यामिनी, महान् ऐश्वर्यशालिनी, चिन्मयी और कल्याणस्वरूपिणी हैं—
सद्गुरुके द्वारा दीक्षित होकर निष्छल भावसे विधिवत् आराधना
करनी चाहिये । उनकी आराधनामें भी निर्मल श्रद्धा एवं भक्ति ही
मूल ( प्रधान कारण ) हैं ॥ ७१-७२ ॥
उनका भी मूल बताया गया है उनके माहात्म्यका श्रवण, इसीसे
हे परशुराम ! पहले मैंने तुम्हें उनका माहात्म्य सुनाया था ॥ ७३ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । २५
तेन श्रुतेनाधुना त्वं प्राप्तवानसि मङ्गलम् ।
विचारं श्रेयसो मूलं यस्मात्ते न हि भीरितः ॥ ७४ ॥
विचारोदयपर्यन्तं भयमस्ति महत्तमम् ।
अविचारात्मदोषेण ग्रस्तस्य प्रतिवासरम् ॥ ७५ ॥
यथा हि सन्निपातेन ग्रस्तस्यौषधसेवनात् ।
अपि तावद्द्भवेद् भीतिर्यावद्धातोश्च शुद्धता ॥ ७६ ॥
प्राप्ते विचारे परमे फलितं जीवितं नॄणाम् ।
यावत् सुजन्म सुनॄणां विचारो न भवेत् परः ॥ ७७ ॥
तावन्तो जन्मतरवो वन्ध्या विफलहेतुतः ।
स एव सफलो जन्मवृक्षो यत्र विमर्शनम् ॥ ७८ ॥
कूपमण्डूकसदृशा ये नरा निर्विमर्शनाः ।
यथा कूपे समुत्पन्नो भेको नो वेद किञ्चन ॥ ७९ ॥
शुभं वाप्यशुभं वापि कूपे एव विनश्यति ।
तथा जना अपि वृथोत्पन्ना ब्रह्माण्डकूपके ॥ ८० ॥
उसके श्रवणसे ही तुम्हें इस [ विचाररूप ] मङ्गलकी प्राप्ति हुई
है । विचार ही कल्याणका मूल है, अतः अब तुम्हें इस लोकमें किसी
प्रकारका भय नहीं है ॥ ७४ ॥
जबतक विचार उदय नहीं होता तबतक तो अविचाररूप दोषसे
ग्रस्त पुरुषके लिये प्रतिदिन (नित्य ही) बड़ा भारी भय रहता है ॥७५॥
जिस प्रकार सन्निपातग्रस्त पुरुषको तबतक तो भय रहता है
जबतक कि औषध सेवन कर लेनेपर भी धातुओंकी अशुद्धि शेष
रहती है ॥ ७६ ॥
उत्तम विचारकी प्राप्ति होनेपर ही मनुष्यका जीवन सफल होता
है । उत्तम मनुष्यजन्म मिलनेपर भी जबतक विचार न हो तबतक
तो निष्फल रहनेके कारण ये मानवजन्मरूप वृक्ष भी वन्ध्य ( व्यर्थ )
हैं । इनमें सफल तो वही जन्मरूप वृक्ष है जिसमें विचारका उदय
हुआ है ॥ ७७-७८ ॥
जो लोग विचारहीन हैं वे तो कूपमण्डूकके समान हैं। जिस
प्रकार कुएँमें उत्पन्न हुआ मेंढक कुएँसे बाहरकी अच्छी या बुरी कोई
भी बात नहीं जानता और कुएँमें ही नष्ट हो जाता है, उसी

२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
शुभं वाप्यशुभं वापि न विदुः स्वात्मनः क्वचित् ।
उत्पद्योत्पद्य नश्यन्ति न जानन्ति स्वकं हितम् ॥ ८१ ॥
सुखबुद्धिश्च दुःखेषु सुखे दुःखनिश्चयम् ।
प्राप्याविचारमाहात्म्यात् पच्यन्ते सृतिपावके ॥ ८२ ॥
दुःखेन क्लिश्यमानाश्च न कथञ्चित् त्यजन्ति तत् ।
यथा पादशताघातैस्ताडितोऽपि महाखरः ॥ ८३ ॥
रासभीमनुयात्येव तथा संसरणं जनः ।
त्वन्तु राम विचारात्मा पारं दुःखस्य सङ्गतः ॥ ८४ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विचारमाहात्म्ये
द्वितीयोऽध्यायः ॥
प्रकार [ विचारहीन ] लोग भी वृथा ही इस ब्रह्माण्डकूपमें उत्पन्न
होते हैं ॥ ७६-८० ॥
उन्हें अपने हिताहितका कुछ भी ज्ञान नहीं होता । वे पुनः
पुनः उत्पन्न होकर मरते रहते हैं, अपने हितका उन्हें कुछ पता
नहीं चलता ॥ ८१ ॥
अविचारके प्रभावसे उनकी [ पुत्र-सम्पत्ति आदि ] दुःखके
साधनोंमें सुखबुद्धि हो जाती है और [ वैराग्यादि ] सुखके साधनोंमें
दुःखबुद्धि । अतः वे [ जन्म-मरणरूप ] संसाराग्निमें जलते
रहते हैं ॥ ८२ ॥
दुःखरूप स्त्री-पुत्रादिसे तरह-तरह क्लेश पानेपर भी वे किसी प्रकार
उन्हें त्याग नहीं पाते । जिस प्रकार गधा सैकड़ों लातें खानेपर भी
गधी के पीछे लगा ही रहता है उसी प्रकार लोग संसारका पीछा
नहीं छोड़ते । परशुराम ! तुम तो विचारवान् हो, इसलिये अब इस
संसाररूप दुःखसे पार हो गये हो ॥ ८३-८४ ॥
द्वितीय अध्याय समाप्त ।

तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
दत्तात्रेयोक्तवचः श्रुत्वात्यन्तसुकौतुकी ।
जामदग्न्यः पुनरपि पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ १ ॥
भगवन् गुरुणाऽथोक्तं भवता यत्तथैव तत् ।
अविचारात्परो नाशः संप्राप्तः सर्वथा जनैः ॥ २ ॥
विचारेण भवेच्छ्रेयस्तन्निदानमपि श्रुतम् ।
माहात्म्यश्रुतिरित्येव तत्र मे संशयो महान् ॥ ३ ॥
कथं वा तदपि प्राप्यं साधनं तत्र किं भवेत् ।
स्वाभाविकं तद्यदि स्यात्तत् सर्वैर्न कुतः श्रुतम् ॥ ४ ॥
अहं वाद्यावधि कुतः प्रवृत्तिं नाप्तवानिह ।
दुःखं मत्तोऽधिकं प्राप्ता विहताश्च पदे पदे ॥ ५ ॥
न कुतः साधनं प्राप्ता एतन्मे कृपया वद ।
इत्यापृष्टः प्राह भूयो हृष्टो दत्तो दयानिधिः ॥ ६ ॥
तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥
हेमचूड और हेमलेखाका समागम
श्रीदत्तात्रेयजीकी कही बातें सुनकर परशुरामजीने अत्यन्त कुतूहल
और विनयपूर्वक पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥
“भगवन् ! गुरुदेव ! आपने जो कुछ कहा वह सत्य ही है।
लोगोंको सब प्रकार अविचारसे ही बड़ी हानि हुई है ॥ २ ॥
अतः विचारसे ही उनका कल्याण हो सकता है। और उसका
मूल माहात्म्यश्रवण है—यह भी मैंने सुना। किन्तु उसमें मुझे एक
बड़ा सन्देह है ॥ ३ ॥
वह श्रवण भी कैसे प्राप्त हो ? उसके लिये क्या उपाय है। यदि
आप कहें कि वह तो स्वाभाविक ही हो जाता है तो सबहीने माहात्म्य-
श्रवण क्यों नहीं कर लिया ॥ ४ ॥
अथवा मुझे भी आजतक उसे श्रवण करनेकी रुचि क्यों नहीं हुई ?
ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मुझसे भी अधिक दुःख प्राप्त हैं और जो

२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
शृणु राम प्रवक्ष्यामि निदानं श्रेयसः परम् ।
सद्भिः सङ्गः परं मूलं सर्वदुःखनिवर्हणम् ॥ ७ ॥
परमार्थफलप्राप्तौ बीजं सत्सङ्ग उच्यते ।
त्वं चापि तेन हि सता संवर्त्तेन महात्मना ॥ ८ ॥
सङ्गतः सन्निमां प्राप्तो दशां श्रेयःफलोदयाम् ।
सन्त एव हि संयाता दिशन्ति परमं सुखम् ॥ ९ ॥
विना सत्सङ्गतः केन प्राप्तं श्रेयः परं कदा ।
लोकेऽपि यादृशं सङ्गं यो यः प्राप्नोति मानवः ॥ १० ॥
तत्फलं स समाप्नोति सर्वथा न हि संशयः ।
अत्रेति कीर्त्तयिष्यामि शृणु राम कथामिमाम् ॥ ११ ॥
पुरा दशार्णाधिपतिर्मुक्ताचूड इतीरितः ।
तस्य पुत्रौ हेमचूडमणिचूडौ बभूवतुः ॥ १२ ॥
पद-पदपर ठुकराये जा रहे हैं, उन्हें इस साधनकी प्राप्ति क्यों नहीं
हुई ? कृपा करके यह मुझे बताइये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर
दयानिधि दत्तात्रेयजी बड़े प्रसन्न हुए और पुनः कहने लगे ॥ ५-६ ॥
“परशुराम ! सुनो, मैं तुम्हें कल्याणका जो मूल कारण है वह
बताता हूँ । सत्पुरुषोंका संग ही इसका सबसे प्रधान कारण है, वही
सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति करनेवाला है ॥ ७ ॥
परमार्थरूप फलकी प्राप्तिमें सत्संग बीज कहा जाता है । तुमको
भी उन सन्तशिरोमणि महात्मा संवर्त्तका संग होनेपर ही यह श्रेयरूप
फलको प्राप्त करानेवाली दशा प्राप्त हुई । सन्तजन ही समागम होनेपर
परम सुख प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥
बिना सत्संगके भला कब किसीको परमश्रेयकी प्राप्ति हुई है ?
इसमें सन्देह नहीं कि लोकमें भी जिस-जिसका जैसा-जैसा संग प्राप्त
होता है उसे ठीक वैसा ही फल मिल जाता है । परशुराम ! सुनो,
इस प्रसंगमें मैं तुम्हें यह कथा सुनाता हूँ ॥ १०-११ ॥
प्राचीन समयमें मुक्तापीड नामसे प्रसिद्ध एक दशार्ण देशका राजा
था । उसके हेमचूड और मणिचूड नामके दो पुत्र थे ॥ १२ ॥

तृतीयोऽध्यायः । २६
सुरूपौ सुगुणौ चोभौ सर्वविद्याविशारदौ ।
कदाचिन्मृगयोत्साहात् सेनाभिः परिवारितौ ॥ १३ ॥
सह्याचलवनं भीमं सिंहव्याघ्रादिसङ्कुलम् ।
महाबलौ विविशतुर्धनुर्बाणधरौ किल ॥ १४ ॥
अथ तत्र मृगान् सिंहान् वराहान् महिषान् वृकान् ।
जघ्नतुर्निशितैर्बाणैर्लाघवात् कार्मुकच्युतैः ॥ १५ ॥
एवं विनिघ्नतोर्वन्थान् मृगान् राजकुमारयोः ।
चण्डवायुः प्रादुरासीच्छर्कराश्मप्रवर्षणः ॥ १६ ॥
पांशुभिर्नभ आक्रान्तमभूद्दर्शनिशोपमम् ।
न दृश्यते तत्र शिला वृक्षः पुरुष एव वा ॥ १७ ॥
कुतो नीचोच्चतां पश्येदेवं ध्वान्तावृत्तो गिरिः ।
निहता शर्करावर्षैः सेनात्यन्तं पलायिता ॥ १८ ॥
दोनों ही बड़े रूपवान्, गुणवान् और सब प्रकारकी विद्याओंमें
कुशल थे। कहते हैं, किसी समय आखेटकी इच्छा होनेपर ये महाबली
राजकुमार धनुष-बाण धारणकर बहुत-सी सेना साथ ले सह्यपर्वतके
भयङ्कर वनमें घुस गये, जो सिंह और व्याघ्रादि जन्तुओंसे भरा
हुआ था ॥ १३-१४ ॥
वहां उन्होंने अपने धनुषोंसे छूटे हुए तीखे बाणों द्वारा बड़ी
फुर्तीसे अनेकों हरिण, सिंह, सूअर, भैंसे और भेड़ियोंका वध कर
दिया ॥ १५ ॥
इस प्रकार जब वे राजकुमार अनेकों जंगली जीवोंका शिकारकर
रहे थे वहाँ बड़ी प्रचण्ड आँधी उठी। उससे रेती और कंकर-पत्थरोंकी
वर्षा होने लगी ॥ १६ ॥
सारा आकाश धूलिसे भर गया। इससे अमावास्याकी रात्रिका-
सा अन्धकार छा गया। फिर वहां शिला, वृक्ष, मनुष्य कुछ भी दिखाई
देना बन्द हो गया ॥ १७ ॥
उस पहाड़पर ऐसा अँधेरा छाया कि कहाँ नीचा है कहाँ ऊँचा है
यह भी दिखायी नहीं देता था। बालूकी वर्षासे पीड़ित होकर सेना भी
तितर-बितर होकर भाग गयी ॥ १८ ॥

३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
वृक्षान् केचिच्छिलाः केचिद् गुहाः केचिदुपासदुः ।
अश्वारूढौ राजपुत्रावपि दूरं पलायितौ ॥ १९ ॥
हेमचूडः क्वचित्तत्र प्रपेदे तापसाश्रमम् ।
कदलीखर्जूरवनैराक्रान्तमतिसुन्दरम् ॥ २० ॥
तत्रापश्यच्छुभां काञ्चित् कन्यामग्निशिखामिव ।
प्रद्योतमानां वपुषा तप्तहेमसुवर्चसाम् ॥ २१ ॥
तां दृष्ट्वा राजपुत्रोऽपि पद्मामिव सुरूपिणीम् ।
स्मयमान इवाऽपृच्छत् का त्वं पद्मानने वने ॥ २२ ॥
निर्जने भीतिजनने निर्भये वशमास्थिता ।
कस्य त्वमपि केनात्र निवस्येकला कथम् ॥ २३ ॥
पृष्टैव प्राह सा कन्या राजपुत्रमनिन्दिता ।
स्वागतन्ते राजपुत्र विष्टरं प्रतिपद्यताम् ॥ २४ ॥


सैनिकोंमेंसे किन्हींने वृक्षोंका, किन्हींने शिलाओंका और किन्हींने
गुफाओंका आश्रय लिया। दोनों राजकुमार भी घोड़ोंपर चढ़े हुए दूर
निकल गये ॥ १६ ॥
उनमेंसे हेमचूड किसी तपस्वियोंके आश्रममें पहुँच गया। वह
बड़ा ही रमणीक था और उसमें केले तथा खजूरके वृक्ष
लगे थे ॥ २० ॥
वहाँ उसने अग्निकी ज्वालाके समान तेजस्विनी एक सुन्दरी
कन्या देखी । उसका शरीर तपाये हुए सुवर्णके समान बड़ा
कान्तिमान् था ॥ २१ ॥
साक्षात् लक्ष्मीके समान रूपवती उस कन्याको देखकर राजपुत्रने
कुछ मुसकाते हुए पूछा, “कमलानने ! तुम कौन हो ? निर्भये ! इस
भयङ्कर निर्जन वनमें तुम विवश होकर किसलिये निवास कर रही हो ?
तुम किसकी पुत्री हो ? यहाँ किसके साथ रहती हो ? इस समय
अकेली क्यों हो ?” ॥ २२-२३ ॥
इस प्रकार पूछे जानेपर उस निर्दोष बालाने राजपुत्रसे कहा,
“राजपुत्र ! आप, भले आये । आइये, आसनपर विराजिये ॥ २४ ॥

तृतीयाेऽध्यायः । ३१
तपस्विनामयं धर्मः पूजनं ह्यतिथेस्तु यत् ।
श्रान्तं त्वामभिपश्यामि व्यथितं चण्डवायुना ॥ २५ ॥
बद्ध्वा खर्जूरवृक्षेऽश्वमत्रासीनो गतश्रमः ।
मद्वृत्तमर्हसि श्रोतुमित्युक्तः स तथाकरोत् ॥ २६ ॥
फलानि भोजयामास पाययामास सद्रसम् ।
एवं तं विश्रमं प्राप्तं राजपुत्रमनिन्दिता ॥ २७ ॥
प्राह सा मधुसंस्रावपेशलाकारया गिरा ।
राजपुत्र व्याघ्रपादो मुनिः शिवपदाश्रयः ॥ २८ ॥
येन लोकाः पुण्यतमा जिताः स्वतपसो बलात् ।
परावरज्ञो ह्यनिशं पूजितो मुनिनायकैः ॥ २९ ॥
तस्याहं धर्मतः पुत्री हेमलेखेति विश्रुता ।
विद्युत्प्रभाख्या विद्याध्री सा सर्वाङ्गमनोहरा ॥ ३० ॥
इमां वेणामनुनदीं स्नातुमभ्याययौ क्वचित् ।
तदा तत्राजगामार्थान् सुषेणो वङ्गभूपतिः ॥ ३१ ॥
अतिथियाेंका सत्कार करना तो तपस्वियाेंका धर्म ही है । आप
मुझे बहुत थके हुए और प्रचण्ड पवनसे व्यथित जान पड़ते हैं ॥२५॥
घोड़ेको खजूरके पेड़से बाँधकर यहाँ कुछ देर बैठकर विश्राम
कीजिये । फिर आप मेरा सब वृत्तान्त सुन लेंगे ।” कन्याके इस प्रकार
कहनेपर हेमचूडने वैसा ही किया ॥ २६ ॥
उस बालाने उसे कुछ फल खिलाये और सुस्वादु जल पीनेके लिये
दिया । फिर उसे श्रमहीन देखकर वह मधु-सा बरसानेवाले मीठे
शब्दाेंमें कहने लगी, “राजपुत्र ! व्याघ्रपाद नामके एक मुनि थे ।
वे भगवान् शिवके चरणाश्रित थे ॥ २७–२८ ॥
अपने तपके प्रभावसे उन्होंने स्वर्गादि पुण्यलोकाेंका अधिकार
प्राप्त कर लिया था । वे ब्रह्मज्ञानसम्पन्न थे और बड़े-बड़े मुनिजन
रात-दिन उनकी सेवामें रहते थे ॥ २६ ॥
मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और हेमलेखा नामसे प्रसिद्ध हूँ । एकबार
सर्वाङ्गसुन्दरी विद्युत्प्रभा नामकी विद्याधरी इस वेणा नदीमें स्नान करनेके
लिये आयी । संयोगवश उसी समय वहाँ वंगदेशके राजा सुषेण
भी आये ॥ ३०–३१ ॥

३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
स ददर्श विगाहन्तीं नदीं तां लोकसुन्दरीम् ।
क्लिन्नांशुकान्तरात्यन्तव्यक्तपीनकुचद्वयीम् ॥ ३२ ॥
कामवाणहतस्तत्र तां प्रार्थयदथापि सा ।
सौन्दर्यमोहिता तस्य तदुक्तिं सममंसत ॥ ३३ ॥
सङ्गम्याथ तया राजा ययौ स्वनगरं प्रति ।
दधार सापि विद्याधरी गर्भं राजर्षिवीर्यतः ॥ ३४ ॥
भीतापचारात् पत्युः सा गर्भं त्यक्त्वात्र संययौ ।
अमोघवीर्याद्राजर्षेर्जाताहं कन्यका ततः ॥ ३५ ॥
मां ददर्श व्याघ्रपादः सन्ध्योपास्त्यर्थमागतः ।
दयया मामुपादायापालयज्जननी यथा ॥ ३६ ॥
धर्मेण यः पालयिता प्रोच्यते हि पितैव सः ।
अहन्तस्य धर्मपुत्री पितृसेवापरायणा ॥ ३७ ॥
उन्होंने उस त्रिलोकसुन्दरी विद्याधरीको नदीमें स्नान करते देखा।
उसके जलमें भीगे झीने वस्त्रोंमेंसे दोनों पीन पयोधर दिखाई
दे रहे थे ॥ ३२ ॥
इससे राजा सुषेण कामबाणसे बिंधगये और उस विद्याधरीसे
उन्होंने प्रार्थना भी कर दी। राजाके सौन्दर्यसे मोहित होकर उसने
उनकी बात मान ली ॥ ३३ ॥
उसके साथ समागम करके राजा अपने नगरको चले गये। उस
विद्याधरीको राजाके वीर्यसे गर्भ रह गया ॥ ३४ ॥
किन्तु इस व्यभिचारके कारण पतिके डरसे वह गर्भको वहीं
छोड़कर चली गयी। तब राजाके उस अमोघ वीर्यसे मैं कन्या
उत्पन्न हुई ॥ ३५ ॥
जब सन्ध्योपासनके लिये वहाँ व्याघ्रपाद मुनि आये तो उन्होंने
मुझे देखा। वे दयावश मुझे उठा लाये और माताके समान मेरा
पालन करने लगे ॥ ३६ ॥
जो धर्मपूर्वक पालन करता है वह पिता ही कहा जाता है। अतः
मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और पिताजीकी सेवा करती रहती हूँ ॥ ३७ ॥

तृतीयोऽध्यायः । ३३
तस्य माहात्म्यतो मेऽत्र भयं नास्त्येव कुत्रचित् ।
नायं सुरासुरैर्वापि कदाचिद् दुष्टबुद्धिभिः ॥ ३८ ॥
प्रवेष्टुमाश्रमोऽर्हः स्यात् प्रविशन्नाशमाप्नुयात् ।
एतन्मेऽभिहितं वृत्तं तिष्ठ किञ्चिन्नृपात्मज ॥ ३९ ॥
आयास्यति स भगवान् पिता मे तं निशामय ।
प्रणम्य तं प्राप्य चेष्टं ततः कल्ये प्रयास्यसि ॥ ४० ॥
हेमलेखावचः श्रुत्वा तत्सौन्दर्येण मोहितः ।
भीतः किञ्चित् प्रवक्तुं तां विमना इव चाभवत् ॥ ४१ ॥
अथालक्ष्य राजपुत्रं कामस्य वशमागतम् ।
प्राह सा विदुषी भूयो राजपुत्र धृतिं भज ॥ ४२ ॥
आगच्छति पिता सद्यस्ततोऽभिलषितं भज ।
एवं वदन्त्यां तस्यां स व्याघ्रपादो महामुनिः ॥ ४३ ॥
आजगाम वनाद्यत्र पुष्पादेः कृतसञ्चयः ।
मुनिं समागतं दृष्ट्वा राजपुत्रः समुत्थितः ॥ ४४ ॥
उनके प्रभावसे मुझे यहाँ कहीं भी किसी प्रकारका भय नहीं है।
इस आश्रममें कोई देवता या असुर भी दूषित विचारसे प्रवेश नहीं
कर सकता। यदि करेगा तो नष्ट हो जायगा। यह मैंने अपना वृत्तान्त
सुनाया। राजपुत्र ! आप कुछ देर यहाँ ठहरिये ॥ ३८-३९ ॥
मेरे पिता भगवान् व्याघ्रपाद आने ही वाले हैं। उनके दर्शन करें
और उन्हें प्रणाम करके अपना मनोरथ पूरा कराकर कल प्रातःकाल
प्रस्थान करें” ॥ ४० ॥
हेमलेखाकी बात सुनकर उसके सौन्दर्यसे मोहित हो जानेके कारण
राजपुत्रने कुछ कहना चाहा, किन्तु बोलनेका साहस न होनेके कारण
वह कुछ अनमना-सा हो गया ॥ ४१ ॥
उसे कामके वशीभूत देख विदुषी हेमलेखाने उससे फिर कहा,
“राजपुत्र ! धैर्य धारण करो ॥ ४२ ॥
पिताजी शीघ्र ही आते होंगे। तब अपनी अभिलाषा पूरी कर
लेना।” उसके ऐसा कहते ही महामुनि व्याघ्रपाद वनसे पुष्पादि संग्रह
करके आ गये। उन्हें आये देखकर राजपुत्र खड़ा हो गया ॥ ४३-४४ ॥

३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
प्रणम्य नाम संश्राव्योपविष्टस्तेन देशितः ।
अथ दृष्ट्वा राजपुत्रं कामेन विकृताकृतिम् ॥ ४५ ॥
ज्ञात्वा योगदृशा सर्वं मत्वा युक्तञ्च तत्तदा ।
दारक्रियार्थं तस्मै तां हेमलेखां ददौ मुनिः ॥ ४६ ॥
तुष्टो राजकुमारोऽपि तामादाय पुरं ययौ ।
मुक्ताचूडोऽतिसन्तुष्टो महोत्सवविधानतः ॥ ४७ ॥
विवाहमकरोत्तस्य विधानेन क्षितीश्वरः ।
अथ राजकुमारोऽपि तया क्रीडापरः सदा ॥ ४८ ॥
सौधेषु वनराजिषु पुलिनादिषु संबभौ ।
हेमलेखां राजपुत्रो भोगेष्वनतिकामिनीम् ॥ ४९ ॥
उदासीनां सदा दृष्ट्वा पप्रच्छ रहसि कचित् ।
किं प्रिये नानुरक्तासि प्रिये मय्यनुरागिणि ॥ ५० ॥
उसने अपना नाम लेकर मुनिको प्रणाम किया और उनकी आज्ञा
पाकर बैठ गया। मुनिने देखा कि कामके कारण राजपुत्रकी चेष्टा
विकृत-सी हो गयी है, तो योगबलसे उन्होंने सब हाल जान
लिया और उसे उचित ही समझा। अतः उन्होंने पत्नीरूपसे उसे
हेमलेखा दे दी ॥ ४५-४६ ॥
इससे राजकुमारको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह उसे लेकर नगरमें
लौट आया। राजा मुक्ताचूड भी बहुत सन्तुष्ट हुआ और उसने
बड़ा महोत्सव करके उनका विधिवत् विवाह संस्कार सम्पन्न कर
दिया ॥ ४७-४८ पू० ॥
तब राजकुमार महलोंमें, उपवनोंमें और नदीतट आदि स्थानोंमें
उसके साथ निरन्तर विहार करने लगा ॥ ४८ उ०-४९ पू० ॥
किन्तु उसने देखाकि हेमलेखाको भोगोंकी विशेष कामना नहीं है
और वह सर्वदा उदासीन ही रहती है। तब एक दिन उसने एकान्तमें
उससे पूछा, "प्रिये ! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ तो भी तुम अपने प्रियतम
मुझसे प्रेम क्यों नहीं करतीं ? ॥ ४९ उ०-५० ॥