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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 404 में से

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पृष्ठ 48

३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
प्रणम्य नाम संश्राव्योपविष्टस्तेन देशितः ।
अथ दृष्ट्वा राजपुत्रं कामेन विकृताकृतिम् ॥ ४५ ॥
ज्ञात्वा योगदृशा सर्वं मत्वा युक्तञ्च तत्तदा ।
दारक्रियार्थं तस्मै तां हेमलेखां ददौ मुनिः ॥ ४६ ॥
तुष्टो राजकुमारोऽपि तामादाय पुरं ययौ ।
मुक्ताचूडोऽतिसन्तुष्टो महोत्सवविधानतः ॥ ४७ ॥
विवाहमकरोत्तस्य विधानेन क्षितीश्वरः ।
अथ राजकुमारोऽपि तया क्रीडापरः सदा ॥ ४८ ॥
सौधेषु वनराजिषु पुलिनादिषु संबभौ ।
हेमलेखां राजपुत्रो भोगेष्वनतिकामिनीम् ॥ ४९ ॥
उदासीनां सदा दृष्ट्वा पप्रच्छ रहसि कचित् ।
किं प्रिये नानुरक्तासि प्रिये मय्यनुरागिणि ॥ ५० ॥
उसने अपना नाम लेकर मुनिको प्रणाम किया और उनकी आज्ञा
पाकर बैठ गया। मुनिने देखा कि कामके कारण राजपुत्रकी चेष्टा
विकृत-सी हो गयी है, तो योगबलसे उन्होंने सब हाल जान
लिया और उसे उचित ही समझा। अतः उन्होंने पत्नीरूपसे उसे
हेमलेखा दे दी ॥ ४५-४६ ॥
इससे राजकुमारको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह उसे लेकर नगरमें
लौट आया। राजा मुक्ताचूड भी बहुत सन्तुष्ट हुआ और उसने
बड़ा महोत्सव करके उनका विधिवत् विवाह संस्कार सम्पन्न कर
दिया ॥ ४७-४८ पू० ॥
तब राजकुमार महलोंमें, उपवनोंमें और नदीतट आदि स्थानोंमें
उसके साथ निरन्तर विहार करने लगा ॥ ४८ उ०-४९ पू० ॥
किन्तु उसने देखाकि हेमलेखाको भोगोंकी विशेष कामना नहीं है
और वह सर्वदा उदासीन ही रहती है। तब एक दिन उसने एकान्तमें
उससे पूछा, "प्रिये ! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ तो भी तुम अपने प्रियतम
मुझसे प्रेम क्यों नहीं करतीं ? ॥ ४९ उ०-५० ॥