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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 45

तृतीयाेऽध्यायः । ३१
तपस्विनामयं धर्मः पूजनं ह्यतिथेस्तु यत् ।
श्रान्तं त्वामभिपश्यामि व्यथितं चण्डवायुना ॥ २५ ॥
बद्ध्वा खर्जूरवृक्षेऽश्वमत्रासीनो गतश्रमः ।
मद्वृत्तमर्हसि श्रोतुमित्युक्तः स तथाकरोत् ॥ २६ ॥
फलानि भोजयामास पाययामास सद्रसम् ।
एवं तं विश्रमं प्राप्तं राजपुत्रमनिन्दिता ॥ २७ ॥
प्राह सा मधुसंस्रावपेशलाकारया गिरा ।
राजपुत्र व्याघ्रपादो मुनिः शिवपदाश्रयः ॥ २८ ॥
येन लोकाः पुण्यतमा जिताः स्वतपसो बलात् ।
परावरज्ञो ह्यनिशं पूजितो मुनिनायकैः ॥ २९ ॥
तस्याहं धर्मतः पुत्री हेमलेखेति विश्रुता ।
विद्युत्प्रभाख्या विद्याध्री सा सर्वाङ्गमनोहरा ॥ ३० ॥
इमां वेणामनुनदीं स्नातुमभ्याययौ क्वचित् ।
तदा तत्राजगामार्थान् सुषेणो वङ्गभूपतिः ॥ ३१ ॥
अतिथियाेंका सत्कार करना तो तपस्वियाेंका धर्म ही है । आप
मुझे बहुत थके हुए और प्रचण्ड पवनसे व्यथित जान पड़ते हैं ॥२५॥
घोड़ेको खजूरके पेड़से बाँधकर यहाँ कुछ देर बैठकर विश्राम
कीजिये । फिर आप मेरा सब वृत्तान्त सुन लेंगे ।” कन्याके इस प्रकार
कहनेपर हेमचूडने वैसा ही किया ॥ २६ ॥
उस बालाने उसे कुछ फल खिलाये और सुस्वादु जल पीनेके लिये
दिया । फिर उसे श्रमहीन देखकर वह मधु-सा बरसानेवाले मीठे
शब्दाेंमें कहने लगी, “राजपुत्र ! व्याघ्रपाद नामके एक मुनि थे ।
वे भगवान् शिवके चरणाश्रित थे ॥ २७–२८ ॥
अपने तपके प्रभावसे उन्होंने स्वर्गादि पुण्यलोकाेंका अधिकार
प्राप्त कर लिया था । वे ब्रह्मज्ञानसम्पन्न थे और बड़े-बड़े मुनिजन
रात-दिन उनकी सेवामें रहते थे ॥ २६ ॥
मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और हेमलेखा नामसे प्रसिद्ध हूँ । एकबार
सर्वाङ्गसुन्दरी विद्युत्प्रभा नामकी विद्याधरी इस वेणा नदीमें स्नान करनेके
लिये आयी । संयोगवश उसी समय वहाँ वंगदेशके राजा सुषेण
भी आये ॥ ३०–३१ ॥