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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 404 में से

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पृष्ठ 29

द्वितीयोऽध्यायः । १५
तद्भवचरणद्वन्द्वं तत आसादितं मया ।
अन्धो जनसमायोगमिवात्यन्तसुखावहम् ॥ १२ ॥
तन्मे न विदितं किञ्चित्संवर्त्तमुनिराह यत् ।
श्रुतं माहात्म्यमखिलं त्रिपुराभक्तिकारकम् ॥ १३ ॥
सा भवद्रूपिणी देवी हृदि नित्यं समाहिता ।
एवं मे वर्त्तमानस्य किं फलं समवाप्यते ॥ १४ ॥
भगवन् कृपया ब्रूहि यत्संवर्त्तः पुरावदत् ।
अविदित्वा च तन्नास्ति क्वचिच्च कृतकृत्यता ॥ १५ ॥
तदुक्तमविदित्वा तु यद्यच्च क्रियते मया ।
तद्वालक्रीडनमिव प्रतिभाति समन्ततः ॥ १६ ॥
पुरा मया हि बहुशः क्रतुभिर्दक्षिणोच्छ्रयैः ।
प्रभृतान्नगणैरिष्टा देवाः शक्रमुखा ननु ॥ १७ ॥
अतः मैं वहाँ से आपके चरणयुगलकी शरणमें आया हूँ, जैसे
कोई [अकेला भटकता हुआ] अन्धा अत्यन्त सुखदायक जनसमाजमें
आ जाय ॥ १२ ॥
मुझसे संवर्त्त मुनिने जो कुछ कहा वह मैंने कुछ भी नहीं समझा।
आपके मुखारविन्दसे पहले मैंने भगवती त्रिपुरामें भक्तिभाव जागृत
करनेवाला माहात्म्य पूरा सुना था ॥ १३ ॥
वह त्रिपुरादेवी साक्षात् आपका ही स्वरूप है। वह सर्वदा मेरे
हृदयमें विराजमान है। इस स्थितिमें रहते हुए मुझे किस फलकी प्राप्ति
होगी ॥ १४ ॥
इसके सिवा भगवन् ! संवर्त्तजीने मुझसे पहले जो बात कही थी,
कृपया वह भी समझा दीजिये, क्योंकि उसे बिना समझे कभी
कृतकृत्यता प्राप्त नहीं हो सकती ॥ १५ ॥
उनकी कही हुई बातको समझे बिना मैं जो कुछ भी करता हूँ वह
मुझे सब प्रकार बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें मैंने यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवताओंका पूजन किया था।
उन यज्ञोंमें बड़ी-बड़ी दक्षिणाएँ दी थीं और खूब अन्नदान
किया था ॥ १७ ॥