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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 404 में से

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पृष्ठ 46

३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
स ददर्श विगाहन्तीं नदीं तां लोकसुन्दरीम् ।
क्लिन्नांशुकान्तरात्यन्तव्यक्तपीनकुचद्वयीम् ॥ ३२ ॥
कामवाणहतस्तत्र तां प्रार्थयदथापि सा ।
सौन्दर्यमोहिता तस्य तदुक्तिं सममंसत ॥ ३३ ॥
सङ्गम्याथ तया राजा ययौ स्वनगरं प्रति ।
दधार सापि विद्याधरी गर्भं राजर्षिवीर्यतः ॥ ३४ ॥
भीतापचारात् पत्युः सा गर्भं त्यक्त्वात्र संययौ ।
अमोघवीर्याद्राजर्षेर्जाताहं कन्यका ततः ॥ ३५ ॥
मां ददर्श व्याघ्रपादः सन्ध्योपास्त्यर्थमागतः ।
दयया मामुपादायापालयज्जननी यथा ॥ ३६ ॥
धर्मेण यः पालयिता प्रोच्यते हि पितैव सः ।
अहन्तस्य धर्मपुत्री पितृसेवापरायणा ॥ ३७ ॥
उन्होंने उस त्रिलोकसुन्दरी विद्याधरीको नदीमें स्नान करते देखा।
उसके जलमें भीगे झीने वस्त्रोंमेंसे दोनों पीन पयोधर दिखाई
दे रहे थे ॥ ३२ ॥
इससे राजा सुषेण कामबाणसे बिंधगये और उस विद्याधरीसे
उन्होंने प्रार्थना भी कर दी। राजाके सौन्दर्यसे मोहित होकर उसने
उनकी बात मान ली ॥ ३३ ॥
उसके साथ समागम करके राजा अपने नगरको चले गये। उस
विद्याधरीको राजाके वीर्यसे गर्भ रह गया ॥ ३४ ॥
किन्तु इस व्यभिचारके कारण पतिके डरसे वह गर्भको वहीं
छोड़कर चली गयी। तब राजाके उस अमोघ वीर्यसे मैं कन्या
उत्पन्न हुई ॥ ३५ ॥
जब सन्ध्योपासनके लिये वहाँ व्याघ्रपाद मुनि आये तो उन्होंने
मुझे देखा। वे दयावश मुझे उठा लाये और माताके समान मेरा
पालन करने लगे ॥ ३६ ॥
जो धर्मपूर्वक पालन करता है वह पिता ही कहा जाता है। अतः
मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और पिताजीकी सेवा करती रहती हूँ ॥ ३७ ॥