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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 404 में से

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पृष्ठ 41

तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
दत्तात्रेयोक्तवचः श्रुत्वात्यन्तसुकौतुकी ।
जामदग्न्यः पुनरपि पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ १ ॥
भगवन् गुरुणाऽथोक्तं भवता यत्तथैव तत् ।
अविचारात्परो नाशः संप्राप्तः सर्वथा जनैः ॥ २ ॥
विचारेण भवेच्छ्रेयस्तन्निदानमपि श्रुतम् ।
माहात्म्यश्रुतिरित्येव तत्र मे संशयो महान् ॥ ३ ॥
कथं वा तदपि प्राप्यं साधनं तत्र किं भवेत् ।
स्वाभाविकं तद्यदि स्यात्तत् सर्वैर्न कुतः श्रुतम् ॥ ४ ॥
अहं वाद्यावधि कुतः प्रवृत्तिं नाप्तवानिह ।
दुःखं मत्तोऽधिकं प्राप्ता विहताश्च पदे पदे ॥ ५ ॥
न कुतः साधनं प्राप्ता एतन्मे कृपया वद ।
इत्यापृष्टः प्राह भूयो हृष्टो दत्तो दयानिधिः ॥ ६ ॥
तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥
हेमचूड और हेमलेखाका समागम
श्रीदत्तात्रेयजीकी कही बातें सुनकर परशुरामजीने अत्यन्त कुतूहल
और विनयपूर्वक पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥
“भगवन् ! गुरुदेव ! आपने जो कुछ कहा वह सत्य ही है।
लोगोंको सब प्रकार अविचारसे ही बड़ी हानि हुई है ॥ २ ॥
अतः विचारसे ही उनका कल्याण हो सकता है। और उसका
मूल माहात्म्यश्रवण है—यह भी मैंने सुना। किन्तु उसमें मुझे एक
बड़ा सन्देह है ॥ ३ ॥
वह श्रवण भी कैसे प्राप्त हो ? उसके लिये क्या उपाय है। यदि
आप कहें कि वह तो स्वाभाविक ही हो जाता है तो सबहीने माहात्म्य-
श्रवण क्यों नहीं कर लिया ॥ ४ ॥
अथवा मुझे भी आजतक उसे श्रवण करनेकी रुचि क्यों नहीं हुई ?
ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मुझसे भी अधिक दुःख प्राप्त हैं और जो