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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

द्वितीयोऽध्यायः । २१
केचित् खातेषु कूपेषु पतिताः प्राणमुत्सृजुः
अपरे तैर्विनिहताः केचिज्जीवग्रहं गताः ॥ ४९ ॥
एवं जना हितेच्छाभिः कर्तव्यविषमूर्च्छिताः ।
अहो विनाशं यान्त्युच्चैर्मोहेनान्धीकृताः खलु ॥ ५० ॥
धन्योऽसि भार्गव त्वन्तु यस्मादभ्युदयं गतः ।
विचारः सर्वमूलं हि सोपानं प्रथमं भवेत् ॥ ५१ ॥
परश्रेयोमहासौधप्राप्तौ जानीहि सर्वथा ।
सुविचारमृते क्षेमप्राप्तिः कस्य कथम्भवेत् ॥ ५२ ॥
अविचारः परो मृत्युरविचारहता जनाः ।
विमृश्यकारी जयति सर्वत्राभीष्टसङ्गमात् ॥ ५३ ॥
अविचारहता दैत्या यातुधानाश्च सर्वशः ।
विचारपरमा देवाः सर्वतः सुखभागिनः ॥ ५४ ॥
कुछ ने गड्ढों और कुओंमें गिरकर प्राण त्याग दिये और कोई
उनसे मार खाकर किसी प्रकार अपनी जान बचाकर भाग गये॥ ४९ ॥
इसी प्रकार संसारी लोग अपने कल्याणकी कामनासे कर्त्तव्यरूप
विषको पीकर मूर्च्छित हो गये हैं और मोहसे अन्धे होकर उल्टे
विनाशकी ओर ही जा रहे हैं ॥ ५० ॥
परशुराम ! तुम्हारे हृदयमें विचार उदय हुआ है, अतः तुम धन्य
हो । विचार ही सबका मूल है और परमकल्याणरूप महत्पदकी प्राप्तिके
लिये यही पहली सीढ़ी है—यह तुम निश्चय जानो । भला, सम्यक्
विचारके बिना किसीको कल्याणकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ॥५१-५२॥
अविचार सबसे बड़ी मृत्यु है, सब लोग अविचारसे ही नष्ट हो
रहे हैं । जो विचारपूर्वक चलता है वही सर्वत्र अपने इच्छित पदार्थ
प्राप्त करके अन्तमें विजय ( सफलता ) प्राप्त करता है ॥ ५३ ॥
दैत्य और राक्षस अविचारके कारण ही सब प्रकार नष्ट होते हैं
और देवता लोग विचारनिष्ठ होनेके कारण सब प्रकार सुखके अधिकारी
होते हैं ॥ ५४ ॥