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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 42

२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
शृणु राम प्रवक्ष्यामि निदानं श्रेयसः परम् ।
सद्भिः सङ्गः परं मूलं सर्वदुःखनिवर्हणम् ॥ ७ ॥
परमार्थफलप्राप्तौ बीजं सत्सङ्ग उच्यते ।
त्वं चापि तेन हि सता संवर्त्तेन महात्मना ॥ ८ ॥
सङ्गतः सन्निमां प्राप्तो दशां श्रेयःफलोदयाम् ।
सन्त एव हि संयाता दिशन्ति परमं सुखम् ॥ ९ ॥
विना सत्सङ्गतः केन प्राप्तं श्रेयः परं कदा ।
लोकेऽपि यादृशं सङ्गं यो यः प्राप्नोति मानवः ॥ १० ॥
तत्फलं स समाप्नोति सर्वथा न हि संशयः ।
अत्रेति कीर्त्तयिष्यामि शृणु राम कथामिमाम् ॥ ११ ॥
पुरा दशार्णाधिपतिर्मुक्ताचूड इतीरितः ।
तस्य पुत्रौ हेमचूडमणिचूडौ बभूवतुः ॥ १२ ॥
पद-पदपर ठुकराये जा रहे हैं, उन्हें इस साधनकी प्राप्ति क्यों नहीं
हुई ? कृपा करके यह मुझे बताइये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर
दयानिधि दत्तात्रेयजी बड़े प्रसन्न हुए और पुनः कहने लगे ॥ ५-६ ॥
“परशुराम ! सुनो, मैं तुम्हें कल्याणका जो मूल कारण है वह
बताता हूँ । सत्पुरुषोंका संग ही इसका सबसे प्रधान कारण है, वही
सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति करनेवाला है ॥ ७ ॥
परमार्थरूप फलकी प्राप्तिमें सत्संग बीज कहा जाता है । तुमको
भी उन सन्तशिरोमणि महात्मा संवर्त्तका संग होनेपर ही यह श्रेयरूप
फलको प्राप्त करानेवाली दशा प्राप्त हुई । सन्तजन ही समागम होनेपर
परम सुख प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥
बिना सत्संगके भला कब किसीको परमश्रेयकी प्राप्ति हुई है ?
इसमें सन्देह नहीं कि लोकमें भी जिस-जिसका जैसा-जैसा संग प्राप्त
होता है उसे ठीक वैसा ही फल मिल जाता है । परशुराम ! सुनो,
इस प्रसंगमें मैं तुम्हें यह कथा सुनाता हूँ ॥ १०-११ ॥
प्राचीन समयमें मुक्तापीड नामसे प्रसिद्ध एक दशार्ण देशका राजा
था । उसके हेमचूड और मणिचूड नामके दो पुत्र थे ॥ १२ ॥