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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 31

द्वितीयोऽध्यायः । १७
अप्यसत्यात्मकं यस्मात् कथं सत्यसमं भवेत् ।
अथापि नित्यकर्त्तव्यमेतन्नास्यावधिः क्वचित् ॥ २४ ॥
लक्षितो मे स भगवन् संवर्त्तः सर्वशीतलः ।
कर्त्तव्यलेशविषमविषज्वालावनिर्गतः ॥ २५ ॥
हसन्निव लोकतन्त्रमभयं मार्गमाश्रितः ।
वने दावाग्निसङ्कीर्णे हिमाम्बुस्थगजोपमः ॥ २६ ॥
सर्वकर्त्तव्यवैकल्यामृतसंस्वादनन्दितः ।
कथमेतां दशां प्राप्तो यच्च मामाह तत्पुरा ॥ २७ ॥
सर्वमेतत् सुकृपया गुरो मे वक्तुमर्हसि ।
कर्त्तव्यकालभुजगनिगीर्णं मां विमोचय ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वा चरणौ मूर्ध्ना गृहीत्वा दण्डवन्नतः ।
अथ दृष्ट्वा तथाभूतं भार्गवं मुक्तिभाजनम् ॥ २९ ॥
अतः [ कृतिसाध्य होनेके कारण ] असत्यरूप होनेपर भी यह
सत्यके समान कैसे हो सकती है ? यदि कहो कि [ 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि
जिजीविषेच्छतꣳसमाः' इस श्रुतिवचन के अनुसार ] यह तो
मनुष्यको नित्य करते ही रहना चाहिये, तब तो कभी इसकी समाप्ति
ही नहीं होगी ॥ २४ ॥
किन्तु भगवान् संवर्त्त मुनि तो मुझे सब प्रकार शान्त प्रतीत होते
थे । वे तो कर्त्तव्यकी लेशमात्र विषमविषमयी ज्वालासे भी मुक्त
हो चुके थे ॥ २५ ॥
इस लोकव्यवहारको देखकर उन्हें मानो हँसी आती थी और वे
भयशून्य मार्गपर आरूढ थे; जैसे दावाग्निसे व्याप्त वनमें कोई शीतल-
जलमें खड़ा हुआ गजराज हो ॥ २६ ॥
वे सर्वकर्त्तव्यविमुक्ति रूप अमृतका आस्वादन करके परम
आनन्दित जान पड़ते थे । ऐसी अवस्था उन्हें कैसे प्राप्त हुई, जिसका
कि उस समय उन्होंने मुझसे भी वर्णन किया था ॥ २७ ॥
गुरुदेव ! कृपापूर्वक यह सब रहस्य मुझे बताइये । मुझे कर्त्तव्यरूप
काले नागने डसा हुआ है, उससे आप मुझे छुड़ा लीजिये ॥ २८ ॥
ऐसा कहकर परशुरामने उनके दोनों चरणोंको सिरपर रखकर
दण्डवत् प्रणाम किया । तब परशुरामकी ऐसी स्थिति और उन्हें मुक्तिका