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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

तृतीयोऽध्यायः । २६
सुरूपौ सुगुणौ चोभौ सर्वविद्याविशारदौ ।
कदाचिन्मृगयोत्साहात् सेनाभिः परिवारितौ ॥ १३ ॥
सह्याचलवनं भीमं सिंहव्याघ्रादिसङ्कुलम् ।
महाबलौ विविशतुर्धनुर्बाणधरौ किल ॥ १४ ॥
अथ तत्र मृगान् सिंहान् वराहान् महिषान् वृकान् ।
जघ्नतुर्निशितैर्बाणैर्लाघवात् कार्मुकच्युतैः ॥ १५ ॥
एवं विनिघ्नतोर्वन्थान् मृगान् राजकुमारयोः ।
चण्डवायुः प्रादुरासीच्छर्कराश्मप्रवर्षणः ॥ १६ ॥
पांशुभिर्नभ आक्रान्तमभूद्दर्शनिशोपमम् ।
न दृश्यते तत्र शिला वृक्षः पुरुष एव वा ॥ १७ ॥
कुतो नीचोच्चतां पश्येदेवं ध्वान्तावृत्तो गिरिः ।
निहता शर्करावर्षैः सेनात्यन्तं पलायिता ॥ १८ ॥
दोनों ही बड़े रूपवान्, गुणवान् और सब प्रकारकी विद्याओंमें
कुशल थे। कहते हैं, किसी समय आखेटकी इच्छा होनेपर ये महाबली
राजकुमार धनुष-बाण धारणकर बहुत-सी सेना साथ ले सह्यपर्वतके
भयङ्कर वनमें घुस गये, जो सिंह और व्याघ्रादि जन्तुओंसे भरा
हुआ था ॥ १३-१४ ॥
वहां उन्होंने अपने धनुषोंसे छूटे हुए तीखे बाणों द्वारा बड़ी
फुर्तीसे अनेकों हरिण, सिंह, सूअर, भैंसे और भेड़ियोंका वध कर
दिया ॥ १५ ॥
इस प्रकार जब वे राजकुमार अनेकों जंगली जीवोंका शिकारकर
रहे थे वहाँ बड़ी प्रचण्ड आँधी उठी। उससे रेती और कंकर-पत्थरोंकी
वर्षा होने लगी ॥ १६ ॥
सारा आकाश धूलिसे भर गया। इससे अमावास्याकी रात्रिका-
सा अन्धकार छा गया। फिर वहां शिला, वृक्ष, मनुष्य कुछ भी दिखाई
देना बन्द हो गया ॥ १७ ॥
उस पहाड़पर ऐसा अँधेरा छाया कि कहाँ नीचा है कहाँ ऊँचा है
यह भी दिखायी नहीं देता था। बालूकी वर्षासे पीड़ित होकर सेना भी
तितर-बितर होकर भाग गयी ॥ १८ ॥