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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 44

३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
वृक्षान् केचिच्छिलाः केचिद् गुहाः केचिदुपासदुः ।
अश्वारूढौ राजपुत्रावपि दूरं पलायितौ ॥ १९ ॥
हेमचूडः क्वचित्तत्र प्रपेदे तापसाश्रमम् ।
कदलीखर्जूरवनैराक्रान्तमतिसुन्दरम् ॥ २० ॥
तत्रापश्यच्छुभां काञ्चित् कन्यामग्निशिखामिव ।
प्रद्योतमानां वपुषा तप्तहेमसुवर्चसाम् ॥ २१ ॥
तां दृष्ट्वा राजपुत्रोऽपि पद्मामिव सुरूपिणीम् ।
स्मयमान इवाऽपृच्छत् का त्वं पद्मानने वने ॥ २२ ॥
निर्जने भीतिजनने निर्भये वशमास्थिता ।
कस्य त्वमपि केनात्र निवस्येकला कथम् ॥ २३ ॥
पृष्टैव प्राह सा कन्या राजपुत्रमनिन्दिता ।
स्वागतन्ते राजपुत्र विष्टरं प्रतिपद्यताम् ॥ २४ ॥


सैनिकोंमेंसे किन्हींने वृक्षोंका, किन्हींने शिलाओंका और किन्हींने
गुफाओंका आश्रय लिया। दोनों राजकुमार भी घोड़ोंपर चढ़े हुए दूर
निकल गये ॥ १६ ॥
उनमेंसे हेमचूड किसी तपस्वियोंके आश्रममें पहुँच गया। वह
बड़ा ही रमणीक था और उसमें केले तथा खजूरके वृक्ष
लगे थे ॥ २० ॥
वहाँ उसने अग्निकी ज्वालाके समान तेजस्विनी एक सुन्दरी
कन्या देखी । उसका शरीर तपाये हुए सुवर्णके समान बड़ा
कान्तिमान् था ॥ २१ ॥
साक्षात् लक्ष्मीके समान रूपवती उस कन्याको देखकर राजपुत्रने
कुछ मुसकाते हुए पूछा, “कमलानने ! तुम कौन हो ? निर्भये ! इस
भयङ्कर निर्जन वनमें तुम विवश होकर किसलिये निवास कर रही हो ?
तुम किसकी पुत्री हो ? यहाँ किसके साथ रहती हो ? इस समय
अकेली क्यों हो ?” ॥ २२-२३ ॥
इस प्रकार पूछे जानेपर उस निर्दोष बालाने राजपुत्रसे कहा,
“राजपुत्र ! आप, भले आये । आइये, आसनपर विराजिये ॥ २४ ॥