त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । २३
अविचाराद्धरिः पूर्वं भृगुपत्नीं निहत्य तु ।
शापेन परमं दुःखमाप्तमत्यन्तदुःसहम् ॥ ६१ ॥
एवमन्ये सुरा दैत्या यातुधाना नरा मृगाः ।
अविचारवशादेव विपदं प्राप्नुवन्ति हि ॥ ६२ ॥
महाभागास्ते हि धीरा यान् कुत्रापि च भार्गव ।
विजहाति विचारो नो नमस्तेभ्यो निरन्तरम् ॥ ६३ ॥
कर्त्तव्यमविचारेण प्राप्य मुह्यन्ति सर्वतः ।
विचार्य कृत्वा सर्वेभ्यो मुच्यतेऽपारसङ्कटैः ॥ ६४ ॥
एवं लोकांश्चिरादेषोऽविचारः सङ्गतोऽभवत् ।
यस्याविचारो यावत् स्यात् कुतस्तावद्विमर्शनम् ॥ ६५ ॥
ग्रीष्मभीष्मकरातप्ते मरुौ क्व शिशिरं जलम् ।
एवं चिराविचाराग्निज्यालामालापरीवृते ॥ ६६ ॥
विचारशीतलस्पर्शः कथं स्यात् साधनं विना ।
साधनन्त्वेकमेवात्र परमं सर्वतोऽधिकम् ॥ ६७ ॥
अविचारसे ही पूर्वकालमें विष्णुभगवान् भृगुकी भार्याको मारकर
फिर शापसे अत्यन्त असहनीय आपत्तिमें पड़ गये ॥ ६१ ॥
इसी प्रकार और भी असुर, देवता, राक्षस, मनुष्य एवं मृग आदि
अविचारके अधीन होनेपर ही विपत्तिमें पड़ते हैं ॥ ६२ ॥
परशुराम ! वे बुद्धिमान् पुरुष बड़े ही भाग्यशाली हैं जिन्हें किसी
भी परिस्थितिमें विचार नहीं छोड़ता। उन्हें बार-बार प्रणाम है ॥६३॥
अविचारसे अकर्त्तव्यको ही कर्त्तव्य समझकर लोग सब प्रकार
मोहमें पड़ जाते हैं और विचारपूर्वक कर्म करनेपर वे सब प्रकारके
अपार संकटोंसे भी छुटकारा पा लेते हैं ॥ ६४ ॥
इस प्रकार चिरकालसे इस अविचारने ही लोगोंको प्रभावित कर
रखा है। और जबतक किसीपर अविचारका अधिकार है तबतक वह
विचार कैसे कर सकता है ॥ ६५ ॥
ग्रीष्मकालके प्रचण्ड मार्त्तण्डकी किरणोंसे तपे हुए मरुस्थलमें
भला, शीतल जल कहाँ मिल सकता है ? इसी प्रकार चिरकालसे
अविचाररूप अग्निकी लपटोंसे घिरे हुए अन्तःकरणमें बिना साधन